मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

दूसरे विश्व युद्ध में हुआ था चमत्कार, 'मरने' के 2 साल बाद जिंदा लौटा योद्धा




लंदन. द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान हर ओर कोहराम मचा हुआ था। जमीन से लेकर पानी तक हर ओर मौत का मंजर छाया था। कुछ योद्धा ऐसे भी थे जो इन सब के बीच से जिंदा वापस लौट आए थे। कुछ ऐसी ही रोचक कहानी है ब्रिटेन के नाविक जॉन केप्स की।

70 साल पहले ब्रितानी पनडुब्बी एचएमएस परसियल समुद्र में डूब गई थी। जॉन इस हादसे में जिंदा बचने वाले एकमात्र नाविक थे।

ग्रीस के टापू केफा़लोनिया में 70 साल पहले एक ब्रितानी पनडुब्बी समुद्र के भीतर एक खदान से जा टकराई थी, जिस पर सवार लोगों के बचने की दास्तान द्वितीय विश्वयुद्ध की सबसे विवादास्पद कहानियों में से एक रही है।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भूमध्यसागर का साफ़ पानी ब्रितानी पनडुब्बियों के लिए मौत के जाल से कम नहीं था। इन पनडुब्बियों पर कभी हवाई हमले होते थे तो कभी सागर की गहराईयों के भीतर से उनपर वार किया जाता था। लेकिन ये पनडुब्बियां सबसे अधिक शिकार होती थीं समुद्री खदानों की।

भूमध्यसागर से गुज़रने वाली हर पांच में से दो पनडुब्बियां पानी में समा जाती थीं और ज़ाहिर था उस पर सवार हर यात्री के लिए ये पनडुब्बी एक सामुहिक कब्र बन जाया करती थी। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान सिर्फ़ चार ब्रितानी पनडुब्बियां इस मौत के जाल से बचकर निकलने में सफल रहीं, जिसमें सबसे अनूठा रहा छह दिसंबर 1941 को एचएमएस परसियस का समुद्र की गहराईयों में गोता लगाना।

पहेली

1941 के नवंबर महीने के अंत में ब्रितानी पनडुब्बी परसियस ने जब माल्टा से अपनी यात्रा शुरू की तब उसमें 59 नाविकों के एक दल के अलावा, दो यात्री सवार थे जिनमें से एक 31 वर्षीय जॉन केप्स थे।

केप्स उस दौरान नौसेना में कार्यरत थे और एलेक्ज़ेंड्रिया जा रहे थे। लंबी कद-काठी और खूबसूरत मिजाज़ के जॉन केप्स को एक राजनयिक के बेटे होने के कारण यूं तो नौसेना का कोई बड़ा अधिकारी होना चाहिए था लेकिन वो एक जहाज़ में मशीनों की देखभाल करने वाले एक मामूली कर्मचारी थे।

छह दिसंबर को कड़कड़ाती ठंड की रात में उनकी पनडुब्बी समुद्र तट से लगभग तीन मील की दूरी पर समंदर के बीचोबीच थी। जॉन केप्स के अनुसार जब वो इंजन रूम में बिछे ट्यूब के एक बिस्तर पर आराम कर रहे थे तभी अचानक उन्हें एक भयंकर धमाके की आवाज़ सुनाई दी।

अचानक हुए इस दिल दहलाने वाले धमाके से नाव पहले डगमगाई, फिर अचानक किसी चीज़ से बुरी तरह टकरा गई। ये टकराव इतना तेज़ था कि केप्स के शरीर की नसें तक हिल गईं। अचानक गुल हुई बिजली के बीच वो अपने बिस्तर से उछल गए और कमरे में चारों तरफ लुढ़कते रहे।

केप्स समझ गए कि उनका जहाज़ किसी खदान या सुरंग से जा टकराया है। खतरे को भांपने के बावजूद वो अपने आसपास टॉर्च ढूंढने की कोशिश करते रहे। लगातार बढ़ती गंध और इंजन रूम में दाखिल होते पानी के बीच उन्होंने देखा कि उनके आसपास दर्जनों लोगों की क्षतविक्षत लाशें बिछ गई हैं।

इसके बाद केप्स ने अपने बचाव की कोशिशें शुरु कीं और इस दौरान उन्हें जिस किसी के भी शरीर में ज़रा भी जान नज़र आई वो उसे लेकर बचाव यंत्रों की तरफ भागे। इस यंत्र में रबर का एक फेफड़ा, ऑक्सिजन की बोतल, माउथपीस और काला चश्मा शामिल था।

ये बचाव यंत्र सिर्फ 100 फ़ीट की गहराई तक ही परखा हुआ था, लेकिन केप्स उस वक्त 270 फ़ीट की गहराई पर थे, जहां से इससे पहले कोई जीवित बचकर नहीं लौटा था।

जान बचाने जमकर पी शराब

एचएमएस पेरसियस के मलबे से वही रम की वो बोतल मिली, जिससे जॉन ने आखिरी घूंट पिया था।

अपने घायल साथियों को एक सुरक्षित जगह पर रखने के बाद उन्होंने अपनी बोतल में बचे रम को गटागट पिया। इस क्षण को बयां करते हुए केप्स कहते हैं, "मैंने खुद को बिलकुल खुला छोड़ दिया और थोड़ी ही देर में ऑक्सिजन की मदद से मध्यसागर के बीचोबीच पहुंच गया। मेरा शरीर दर्द से टूट रहा था। ऐसा लग रहा था कि मेरा फेफड़ा और शरीर किसी भी वक्त अलग हो सकता है, मैं तड़प उठा और सोचने लगा कि ऐसी हालत में भला मैं कब तक ज़िंदा रह सकता हूं?"

फिर अचानक एक झटके के साथ केप्स समुद्र की सतह पर पहुंच गए और खुद को लहरों के बीच पाया। लेकिन जॉन की कठिन परिक्षा अभी खत्म नहीं हुई थी। जॉन के साथी कर्मचारी उनकी तरह खुशकिस्मत नहीं थे, और दिसंबर के सर्द महीने में समुद्री लहरों के बीचोबीच जॉन केप्स बिल्कुल अकेले थे। अंधेरे में उन्हें कुछ सफेद चट्टानें दिखीं और ये तय हो गया यही उनका सहारा हैं।

संदेहास्पद कहानी

अगली सुबह केफालोनिया के दो मछुआरों ने बेहोशी की हालत में केप्स को बचाया। अगले 18 महीनों तक वो एक घर से दर इन लोगों के बीच शरण लिए रहे, ताकि इटली में शासक करने वालों के हाथ ना लग जाएं।

अपनी पहचान छुपाने और स्थानीय लोगों जैसा दिखने के लिए उन्होंने न सिर्फ 32 किलो तक अपना वज़न घटाया बल्कि बालों को भी काला रंग दिया। वो याद करते हैं, "ऐसा भी हुआ है कि नाउम्मीदी के हालातों में कुछ स्थानीय बेहद ग़रीब लेकिन मित्रवत परिवारों ने उन्हें बचाने के लिए अपने पूरे परिवार की जान जोख़िम में डाला था।"

आखिरकार मई 1943 में ब्रिटेन की रॉयल नेवी द्वारा चलाए जा रहे एक गुप्त बचाव ऑपरेशन में उन्हें वापस ले जाया गया। इस कठिन परिक्षा से गुज़रने और ज़िंदा वापस लौटने के लिए जॉन केप्स को सम्मानित भी किया गया था, लेकिन उनकी कहानी इतनी अदभुत थी कि कई लोगों को इसपर विश्वास नहीं था।

इस घटना का कोई गवाह भी नहीं था और केप्स को एक अच्छा कथावाचक माना जाता था, जिसकी खुद की लिखी कहानियों में कई बार भिन्नताएं पायी गईं थी। 1985 में जॉन केप्स की मृत्यु हो गई, लेकिन 1997 में उनकी ओर से सुनाई गई कहानी आखिरकार सच साबित हुई।

ब्रितानी पनडुब्बी एचएमएस परसियस के मलबे की खोज में लगे एक दल को खाली पड़ा तिरपाल का संदूक, बचाव यंत्र और पनडुब्बी का वही कमरा हाथ लगा। उसकी हालत हुबहू वैसी थी जैसा जॉन केप्स ने बताया था, और साथ ही रम की वो बोतल भी हाथ आई जिससे जॉन केप्स ने अपना आखिरी लेकिन विजयी घूंट हलक में उतारा था।

('सी वुल्व्स' के लेखक टिम क्लेटन द्वारा बीबीसी को दी गई जानकारी पर आधारित) साभार बीबीसी हिंदी

 
 
sabhar :लंदन. द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान हर ओर कोहराम मचा हुआ था। जमीन से लेकर पानी तक हर ओर मौत का मंजर छाया था। कुछ योद्धा ऐसे भी थे जो इन सब के बीच से जिंदा वापस लौट आए थे। कुछ ऐसी ही रोचक कहानी है ब्रिटेन के नाविक जॉन केप्स की।

70 साल पहले ब्रितानी पनडुब्बी एचएमएस परसियल समुद्र में डूब गई थी। जॉन इस हादसे में जिंदा बचने वाले एकमात्र नाविक थे।

ग्रीस के टापू केफा़लोनिया में 70 साल पहले एक ब्रितानी पनडुब्बी समुद्र के भीतर एक खदान से जा टकराई थी, जिस पर सवार लोगों के बचने की दास्तान द्वितीय विश्वयुद्ध की सबसे विवादास्पद कहानियों में से एक रही है।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भूमध्यसागर का साफ़ पानी ब्रितानी पनडुब्बियों के लिए मौत के जाल से कम नहीं था। इन पनडुब्बियों पर कभी हवाई हमले होते थे तो कभी सागर की गहराईयों के भीतर से उनपर वार किया जाता था। लेकिन ये पनडुब्बियां सबसे अधिक शिकार होती थीं समुद्री खदानों की।

भूमध्यसागर से गुज़रने वाली हर पांच में से दो पनडुब्बियां पानी में समा जाती थीं और ज़ाहिर था उस पर सवार हर यात्री के लिए ये पनडुब्बी एक सामुहिक कब्र बन जाया करती थी। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान सिर्फ़ चार ब्रितानी पनडुब्बियां इस मौत के जाल से बचकर निकलने में सफल रहीं, जिसमें सबसे अनूठा रहा छह दिसंबर 1941 को एचएमएस परसियस का समुद्र की गहराईयों में गोता लगाना।

पहेली

1941 के नवंबर महीने के अंत में ब्रितानी पनडुब्बी परसियस ने जब माल्टा से अपनी यात्रा शुरू की तब उसमें 59 नाविकों के एक दल के अलावा, दो यात्री सवार थे जिनमें से एक 31 वर्षीय जॉन केप्स थे।

केप्स उस दौरान नौसेना में कार्यरत थे और एलेक्ज़ेंड्रिया जा रहे थे। लंबी कद-काठी और खूबसूरत मिजाज़ के जॉन केप्स को एक राजनयिक के बेटे होने के कारण यूं तो नौसेना का कोई बड़ा अधिकारी होना चाहिए था लेकिन वो एक जहाज़ में मशीनों की देखभाल करने वाले एक मामूली कर्मचारी थे।

छह दिसंबर को कड़कड़ाती ठंड की रात में उनकी पनडुब्बी समुद्र तट से लगभग तीन मील की दूरी पर समंदर के बीचोबीच थी। जॉन केप्स के अनुसार जब वो इंजन रूम में बिछे ट्यूब के एक बिस्तर पर आराम कर रहे थे तभी अचानक उन्हें एक भयंकर धमाके की आवाज़ सुनाई दी।

अचानक हुए इस दिल दहलाने वाले धमाके से नाव पहले डगमगाई, फिर अचानक किसी चीज़ से बुरी तरह टकरा गई। ये टकराव इतना तेज़ था कि केप्स के शरीर की नसें तक हिल गईं। अचानक गुल हुई बिजली के बीच वो अपने बिस्तर से उछल गए और कमरे में चारों तरफ लुढ़कते रहे।

केप्स समझ गए कि उनका जहाज़ किसी खदान या सुरंग से जा टकराया है। खतरे को भांपने के बावजूद वो अपने आसपास टॉर्च ढूंढने की कोशिश करते रहे। लगातार बढ़ती गंध और इंजन रूम में दाखिल होते पानी के बीच उन्होंने देखा कि उनके आसपास दर्जनों लोगों की क्षतविक्षत लाशें बिछ गई हैं।

इसके बाद केप्स ने अपने बचाव की कोशिशें शुरु कीं और इस दौरान उन्हें जिस किसी के भी शरीर में ज़रा भी जान नज़र आई वो उसे लेकर बचाव यंत्रों की तरफ भागे। इस यंत्र में रबर का एक फेफड़ा, ऑक्सिजन की बोतल, माउथपीस और काला चश्मा शामिल था।

ये बचाव यंत्र सिर्फ 100 फ़ीट की गहराई तक ही परखा हुआ था, लेकिन केप्स उस वक्त 270 फ़ीट की गहराई पर थे, जहां से इससे पहले कोई जीवित बचकर नहीं लौटा था।

जान बचाने जमकर पी शराब

एचएमएस पेरसियस के मलबे से वही रम की वो बोतल मिली, जिससे जॉन ने आखिरी घूंट पिया था।

अपने घायल साथियों को एक सुरक्षित जगह पर रखने के बाद उन्होंने अपनी बोतल में बचे रम को गटागट पिया। इस क्षण को बयां करते हुए केप्स कहते हैं, "मैंने खुद को बिलकुल खुला छोड़ दिया और थोड़ी ही देर में ऑक्सिजन की मदद से मध्यसागर के बीचोबीच पहुंच गया। मेरा शरीर दर्द से टूट रहा था। ऐसा लग रहा था कि मेरा फेफड़ा और शरीर किसी भी वक्त अलग हो सकता है, मैं तड़प उठा और सोचने लगा कि ऐसी हालत में भला मैं कब तक ज़िंदा रह सकता हूं?"

फिर अचानक एक झटके के साथ केप्स समुद्र की सतह पर पहुंच गए और खुद को लहरों के बीच पाया। लेकिन जॉन की कठिन परिक्षा अभी खत्म नहीं हुई थी। जॉन के साथी कर्मचारी उनकी तरह खुशकिस्मत नहीं थे, और दिसंबर के सर्द महीने में समुद्री लहरों के बीचोबीच जॉन केप्स बिल्कुल अकेले थे। अंधेरे में उन्हें कुछ सफेद चट्टानें दिखीं और ये तय हो गया यही उनका सहारा हैं।

संदेहास्पद कहानी

अगली सुबह केफालोनिया के दो मछुआरों ने बेहोशी की हालत में केप्स को बचाया। अगले 18 महीनों तक वो एक घर से दर इन लोगों के बीच शरण लिए रहे, ताकि इटली में शासक करने वालों के हाथ ना लग जाएं।

अपनी पहचान छुपाने और स्थानीय लोगों जैसा दिखने के लिए उन्होंने न सिर्फ 32 किलो तक अपना वज़न घटाया बल्कि बालों को भी काला रंग दिया। वो याद करते हैं, "ऐसा भी हुआ है कि नाउम्मीदी के हालातों में कुछ स्थानीय बेहद ग़रीब लेकिन मित्रवत परिवारों ने उन्हें बचाने के लिए अपने पूरे परिवार की जान जोख़िम में डाला था।"

आखिरकार मई 1943 में ब्रिटेन की रॉयल नेवी द्वारा चलाए जा रहे एक गुप्त बचाव ऑपरेशन में उन्हें वापस ले जाया गया। इस कठिन परिक्षा से गुज़रने और ज़िंदा वापस लौटने के लिए जॉन केप्स को सम्मानित भी किया गया था, लेकिन उनकी कहानी इतनी अदभुत थी कि कई लोगों को इसपर विश्वास नहीं था।

इस घटना का कोई गवाह भी नहीं था और केप्स को एक अच्छा कथावाचक माना जाता था, जिसकी खुद की लिखी कहानियों में कई बार भिन्नताएं पायी गईं थी। 1985 में जॉन केप्स की मृत्यु हो गई, लेकिन 1997 में उनकी ओर से सुनाई गई कहानी आखिरकार सच साबित हुई।

ब्रितानी पनडुब्बी एचएमएस परसियस के मलबे की खोज में लगे एक दल को खाली पड़ा तिरपाल का संदूक, बचाव यंत्र और पनडुब्बी का वही कमरा हाथ लगा। उसकी हालत हुबहू वैसी थी जैसा जॉन केप्स ने बताया था, और साथ ही रम की वो बोतल भी हाथ आई जिससे जॉन केप्स ने अपना आखिरी लेकिन विजयी घूंट हलक में उतारा था।
sabhar : bhaskar.com
('सी वुल्व्स' के लेखक टिम क्लेटन द्वारा बीबीसी को दी गई जानकारी पर आधारित) साभार बीबीसी हिंदी
 
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