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समाधि का पहला अनुभव कैसा होता है?

होगा तो ही जानोगे। कहा जा सके, ऐसा नहीं है। कुछ-कुछ इशारे किये जा सकते हैं। जैसे अंधेरे में अचानक दीया जल जाये, ऐसा होता है। या जैसे बीमार मरता हो और अचानक कोई दवा लग जाये...मरते-मरते कोई दवा लग जाये; और जीवन की लहर, जीवन की पुलक फिर फैल जाये--ऐसा होता है। जैसे कोई मुर्दा जिंदा हो जाये--ऐसा होता है समाधि का पहला अनुभव।

अमृत का अनुभव है। परम संगीत का अनुभव है। पर होगा तो ही होगा। और होगा तो ही तुम समझ पाओगे; मेरे कहने से समझ में न आ सकेगा। प्रेम में जैसा होता है। अब कोई किसी को कैसे समझाये? जिसने प्रेम न किया हो, जिसने प्रेम जाना न हो, उसके सामने तुम कितना लाख सिर पटको, कितनी व्याख्या करो--सुन लेगा सब, मगर फिर भी पूछेगा कि मेरी कुछ समझ में नहीं आया, कुछ और थोड़ी व्याख्या करिए।

ऐसा ही जैसे अंधे को तुम प्रकाश समझाओ, या बहरे को नाद समझाओ--नहीं समझ में आ सकेगा। जिसके नासापुट खराब हो गये हैं, जिसे गंध नहीं आती, उसे गंध का कोई अनुभव कैसे बताओगे? अनुभव कभी भी शब्दों में बांधे नहीं जा सकते, लेकिन कुछ इशारे किये जा सकते हैं।

गीत प्राणों में जगे, पर भावना में बह गए!
एक थी मन की कसक,
जो साधनाओं में ढल…

भविष्य में ऐसी होगी हमारी दुनिया |