शनिवार, 21 नवंबर 2015

40 दिनों तक 0.06 ग्राम हींग का करें सेवन, फिर देखें कमाल

पान चबाइए, सेक्स पावर बढ़ाइए!

नई दिल्ली: अगर आप अपनी सेक्स क्षमता में कमी से परेशान हैं तो घबराने की जरूरत नहीं है। इसका इलाज आपके घर में ही है। सेक्स क्षमता यानी सेक्स पावर बढ़ाने में हींग बहुत ही फायदेमंद है। हींग का इस्तेमाल सदियों से पुरुषों के नपुसंकता की समस्या का समाधान घरेलू नुस्खे के रूप में किया जाता रहा है। हींग कामोत्तेजक के रूप में काम करती है। इसलिए जिन पुरुषों को समय पूर्व स्खलन की समस्या होती है उनके इस समस्या को हींग नैचुरल तरीके से ठीक करने में बहुत मदद करती है।
हर्ब दैट हील: नैचुरल रेमिडी फॉर गुड हेल्थ पुस्तक के अनुसार 40 दिनों तक 6 सेंटीग्राम (0.06 ग्राम) हींग का सेवन करने से आप सेक्स ड्राइव को बेहतर बना सकते हैं। मिक्सचर के रूप में लगभग 0.06 ग्राम हींग को घी में फ्राई करें और उसमें शहद और बरगद के पेड़ का लैटेक्स मिलाकर इस मिश्रण को बना लें। नपुसंकता को ठीक करने के लिए सुबह सूर्य निकलने के पहले इस मिश्रण का सेवन खाली पेट 40 दिनों तक करें।
इरेक्टाइल डिसफंक्शन और समय पूर्व स्खलन की समस्या को अगर आप नैचुरल तरीके से ठीक करना चाहते हैं तो हींग एक अच्छा विकल्प बन सकता है। एक गिलास गुनगुना गर्म पानी में एक चुटकी हींग का पाउडर मिलाकर सेवन करना फायदेमंद होता है। हींग का इस्तेमाल डायट के रूप में करना सबसे अच्छा तरीका होता है। किसी-किसी को इसका ड्राई रूप में सेवन करना अच्छा नहीं लगता है इसलिए हींग को तड़के के रूप में इस्तेमाल करना ही सबसे अच्छा विकल्प होता है। असल में हींग इरेक्टाइल डिसफंक्शन की समस्या को बिना किसी साइड इफेक्ट के दूर करने में बहुत सहायता करती है। हींग शरीर के प्रजनन अंग में रक्त संचार को बढ़ाकर काम के उत्तेजना को बढ़ाती है।
ज़ी मीडिया ब्‍यूरो 

अब सिर्फ आवाज के दम पर इधर से उधर जाएगा सामान

अब सिर्फ आवाज के दम पर इधर से उधर जाएगा सामान




लंदन : वैज्ञानिकों ने एक अनूठा सोनिक ट्रैक्टर बीम विकसित किया है जो ध्वनि तरंगों का उपयोग कर वस्तुओं को उठाने और एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में सक्षम होगा। इस खोज में भारतीय मूल का एक वैज्ञानिक भी शामिल है।



यह ट्रैक्टर बीम एक ध्वनिक होलोग्राम उत्पन्न करने के लिए उच्च क्षमता के ध्वनि तरंगों का इस्तेमाल करता है जो छोटी वस्तुओं को उठाने और एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने में सक्षम होता है।
ट्रैक्टर बीम ऐसा उपकरण है जो शारीरिक संपर्क के बगैर किसी भी वस्तु को खींच लेता है। विज्ञान कथा लेखकों की रचनाओं और स्टार ट्रेक जैसे प्रोगामों में सामान को पकड़ने, उठाने और एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए ट्रैक्टर बीम की अवधारणा का उपयोग किया गया है, जिससे वैज्ञानिक और इंजीनियर बहुत हद तक प्रभावित हुए।
अल्ट्राहैप्टिक्स के सहयोग से ब्रिस्टल और ससेक्स विश्वविद्यालयों के अनुसंधानकर्ताओं ने इस तकनीक का विकास किया। आने वाले समय में व्यापक तौर पर इस तकनीक का उपयोग किया जा सकता है। इस अध्ययन का प्रकाशन नेचर कम्युनिकेशन्स नामक जर्नल में हुआ है।

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शुक्रवार, 6 नवंबर 2015

भविष्य में 3डी प्रिंटर से ही बनेगी कार?



क्या एक दिन आप 3डी प्रिंटर पर बनी कार चलाएँगे? कार टेकनोलॉजी से जुड़े ताज़ा शोध इस पूरे उद्योग में क्रांतिकारी बदलाव लाने जा रहे हैं और ये बिलकुल संभव है कि आप आने वाले समय में 3डी प्रिंटर पर बनी कार ही चलाएँ.
अमरीकी ऊर्जा विभाग की प्रयोगशाला ओक रिज नेशनल लेबोरेटरी ने 3डी प्रिंटर पर न केवल स्पोर्ट्स कार बनाई बल्कि 2015 के डीट्रॉयट ऑटो शो में इसे प्रदर्शित भी किया है.
पहली नजर में तैयार की गई शेलबी कोबरा कार आम स्पोर्ट्स कार जैसी ही लगती है, चाहे ये प्लास्टिक से बनी है. हालांकि ये स्टील से भी बनाई जा सकती है.
इसमें कहीं भी स्टील के पैनल का इस्तेमाल नहीं हुआ है. ये कार 85 मील प्रति घंटे की रफ्तार से चलाई जा सकती है.

थ्री-डायमेंशनल तरीके से कार प्रिंटिंग?

थ्री डायमेंशनल प्रिटिंग वो नई तकनीक है जिसके इस्तेमाल में पहले कंप्यूटर में डिज़ाइन बनाया जाता है.
फिर उक्त कमांड के ज़रिए 3डी प्रिंटर, या ये कहें कि इंडस्ट्रियल रोबोट उस डिज़ाइन को, सही पदार्थ (मेटीरियल) का इस्तेमाल करते हुए परत दर परत प्रिंट करता है या बनाता है.
इस प्रयोग में पिघले हुए प्लास्टिक का इस्तेमाल करते हुए उसे मनचाहा आकार दिया जाता है. ऐसा मेटल से भी किया जा सकता है.
इस तकनीक को अंजाम देने वाले उपकरण को थ्री-डी प्रिंटर या फिर इंडस्ट्रियल रोबोट कहा जाता है.

छह सप्ताह में कार तैयार

इस लैब के डॉक्टर चैड ड्यूटी ने बीबीसी फ्यूचर को बताया, "हमने इसे प्लास्टिक की परतों से बनाया है. 24 घंटे में प्लास्टिक से बॉडी को प्रिंट किया (बनाया) जा सकता है."
Image copyrightBBC FUTURE
वो बताते हैं, "बाद में इसमें इंजन और उपरी बाडी, लाइट, ब्रेक, गियर, और अन्य चीजों को असेंबल किया जाता है. कुल 6 सप्ताह में 6 लोग ऐसी कार तैयार कर लेते हैं. ख़ास बात यह है कि इसको बाद में डि-असेंबल कर पूरी तरह से अलग किया जा सकता है."
दरअसल प्लास्टिक की परत दर परत प्रिंट करके कार तैयार करने का मतलब केवल ढांचा तैयार करना नहीं, बल्कि कार के अलग अलग हिस्सों को थ्री-डायमेंशनल प्रिटिंग के जरिए पहले प्रिंट करना और फिर उन्हें असेंबल करना है.
ज़ाहिर है ये कार फ़िलहाल बिक्री के लिए नहीं बनी है. इसे प्रयोग के दौरान तैयार किया गया है. लेकिन इसने दूसरे कार निर्माताओं को ऐसी कार तैयार करने का विकल्प तो दे ही दिया है.

बेहद सस्ती होगी कार

अमरीकी कार निर्माता लोकल मोटर ने प्रिंट करके कार को तैयार किया है जिसे डीट्रॉयट ऑटो शो में प्रदर्शित किया गया.
Image copyrightBBC FUTURE
लोकल मोटर्स के जे रोजर्स कहते हैं, "इस कार को बनाना आसान है और ये काफी कम खर्चे में बनाई जा सकती है. इसके रख रखाव का खर्च भी बेहद कम हो जाता है. मेरे ख्याल से यही भविष्य की कार होगी."
ऐसे में जाहिर है कि ऑटोमोटिव इंडस्ट्री एक नए युग के लिए तैयारी करती दिख रही है.

sabhaar : bbc.co.uk

हाइड्रोजन से चलने वाली कार



जापान की कार निर्माता कंपनी टोयोटा की योजना हाइड्रोजन ईंधन से चलने वाली कार का निर्माण बढ़ाना है. इसलिए अब टोयोटा इससे जुड़े अपने हज़ारों पेटेंट्स को दूसरी कार निर्माता कंपनियों के साथ साझा करने जा रही है.
टोयोटा ने इसी साल जापान के अलावा अपनी मिराई कार का निर्यात ब्रिटेन, अमरीका, जर्मनी और डेनमार्क को किया है. यह कार हाइड्रोजन से चलती है.
टोयोटा की इस कार की क़ीमत ब्रिटेन में 66 हज़ार पाउंड यानी लगभग 66 लाख रूपए है. अमरीका के कैलिफ़ोर्निया में इस कार पर 25 फ़ीसदी सब्सिडी है जबकि जापान में 40 फ़ीसदी से ज़्यादा सब्सिडी दी जा रही है.
ब्रिटेन में इस पर कोई सब्सिडी नहीं है. कंपनी को उम्मीद है कि पेटेंट साझा करने से दूसरी कंपनियां भी हाइड्रोजन ईंधन की सस्ती कार बनाएगी.
Image copyrightToyota Motor Sales
टोयोटा के एक अधिकारी स्कॉट ब्राउनली का कहना है, "हमने अपनी कार को काफ़ी सुरक्षित बनाया है. हाइड्रोजन ज्वलनशील होती है इसलिए हमने आग से बचाव की व्यवस्था की है. इसके अलावा इस कार के ईंधन की टंकी पर 150 टन का दबाव भी है और उस लिहाज़ से भी हमारी कार सुरक्षित है."
इस कार के लिए हौन्डा कंपनी के हाइड्रोनन स्टेशन तैयार किए हैं, जहां हाइड्रोजन गैस का निर्माण होता है और उसे एकत्र किया जाता है.
sabhar : bbc.co.uk

रविवार, 1 नवंबर 2015

OLX और क्विकर की तरह फेसबुक पर बेचिए अपना सामान

OLX और क्विकर की तरह फेसबुक पर बेचिए अपना सामान

नई दिल्ली. सोशल नैटवर्किंग साइट फेसबुक अपने यूजर्रस के लिए एक नया फीचर लांच करने वाली है इस फीचर की मदद से यूजर ई-कॉमर्स साइट की तरह फेसबुक को यूज कर सकेंगे. फिलहाल फेसबुक इस फीचर पर काम कर रही है. 
रिपोर्ट के मुताबिक, फेसबुक 'लोकल मार्किट' नाम से एक फीचर पर काम कर रहा है. टेस्टिंग पर चल रह ये फेसबुक का नया फीचर सामान खरीदने वाला प्लेटफार्म बन जाएगा. न्यूज के मुताबिक, फेसबुक के कई यूजर ने यह जानकारी दी है कि उनके आईफोन के फेसबुक एप्प में मेसेंजर बटन की जगह पर बेहद कम समय के लिए नया फचर दिखाई दिया. 
फेसबुक के इस फीचर की मदद से यूजर जिस सामान को बेचना चाहते है वो इस प्लेटफार्म पर पोस्ट कर सकेंगे.  'लोकल मार्किट' नाम के इस फीचर में सामान बेचने के साथ-साथ खरीदने का भी ऑप्शन है. OLX और क्विकर जैसे फेसबुक के इस फीचर में सामान की कीमत और फोटो भी दिखाई देगी sabhar :http://palpalindia.com/

भविष्य में होने वाली घटनाओं को पहले से जानने की कला

parapsychology know future before incident

स्वामी ओमानंद तीर्थ
छठी इंद्रिय या अतींद्रीय ज्ञान की शक्ति जगाने के लिए योग में अनेक उपाय बताए गए हैं। इसे परामनोविज्ञान का विषय भी माना जाता है। असल में यह संवेदी बोध का मामला है।

योगीजनों का मानना है कि इस का केंद्र ब्रह्मरंध्र है। जो दोनों आंखो के बीच भ्रूमध्य स्थान से कुछ ऊपर कपाल के ठीक बीच में है। मनुष्य के शरीर में जिन सूक्ष्म नाड़ियों का जाल फैला हुआ है उनमें तीन प्रमुख है इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना।� सुषुम्ना मध्य में स्थित है और जब नासिका के दोनों स्वर चलते हैं तो माना जाता है कि उसके सक्रिय होने के लिए उपयुक्त स्थिति जाती है।



इस सक्रियता से अतींद्रिय ज्ञान जाग्रत होता है। इन तीन नाड़ियों के अलावा पूरे शरीर में हजारों नाड़ियां होती हैं। प्राणायाम और आसनों से इनकी शुद्धि होती है और शुद्धि के बाद अतींद्रिय ज्ञान जगाने का अभ्यास किया जाता है। अभ्यास के लिए सर्वप्रथम जरूरी है साफ और स्वच्छ वातावरण, जहां फेफड़ों में ताजी हवा भरी जा सके।

स्वच्छ वातावरण में किए गए प्राणायाम का अभ्यास किया जा सकता है। फिर ध्यान का अभ्यास शुरु होता है। भृकुटी पर ध्यान लगाकर निरंतर मध्य स्थित अंधेरे को देखते रहें और बोध करते रहें कि श्वास अंदर और बाहर ‍हो रही है। मौन ध्यान और साधनासे मन की क्षमता का विकास होता जाता है, जिससे काल्पनिक शक्ति और आभास करने की क्षमता बढ़ती है।

इसी के माध्यम से पूर्वाभास और साथ ही इससे भविष्य के गर्भ में झांकने की क्षमता� भी बढ़ती है। यही अतींद्रिय ज्ञान के विकास की शुरुआत है। कोई हमारे पीछे चल रहा है या दरवाजे पर खड़ा है जैसी बातों का आभास होने लगता है।

धैर्य के साथ नियत समय पर, नियत अवधि तक नियमित अभ्यास किया जाए तो इस शक्ति का विकास होने लगता है। इस विकास के साथ अनागत को जानने की क्षमता तो बढ़ती ही है, मन की शांति और स्थिरता भी बढने लगती है। दरअसल इस साधन अभ्यास का यही मुख्य लाभ है।
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फ्यूचर ह्यूमन - मशीन और इंसान का मेल

कभी स्वास्थ्य कारणों से तो कभी सेना में जरूरत के लिए रोबोटिक कंकालों पर शोध होता है. बीते दशक में इंसान के शरीर की ही तरह हरकतें करने में सक्षम रोबोटिक हाथ, पैर और कई तरह के बाहरी कंकाल विकसित किए जा चुके हैं.



पूरी तरह रोबोटिक
आइला नाम की यह मादा रोबोट दिखाती है कि एक्सो-स्केलेटन यानि बाहरी कंकाल को कैसे काम करना चाहिए. जब किसी व्यक्ति ने इसे पहना होता है तो आइला उसे दूर से ही नियंत्रित कर सकती है. आइला को केवल उद्योग-धंधों में ही नहीं अंतरिक्ष में भी इस्तेमाल किया जा सकता है.

हाथों से शुरु
जर्मनी में एक्सो-स्केलेटन पर काम करने वाला डीएफकेआई नाम का आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस रिसर्च सेंटर 2007 में शुरू हुआ. शुरुआत में यहां वैज्ञानिक रोबोटिक हाथ और उसका रिमोट कंट्रोल सिस्टम बनाने की ओर काम कर रहे थे. तस्वीर में है उसका पहला आधुनिक प्रोटोटाइप.

बेहद सटीक
डीएफकेआई ने 2011 से दो हाथों वाले एक्सो-स्केलेटन पर काम शुरू किया. दो साल तक चले इस प्रोजेक्ट में रिसर्चरों ने इंसानी शरीर के ऊपरी हिस्से की कई बारीक हरकतों की अच्छी नकल कर पाने में कामयाबी पाई और इसे एक्सो-स्केलेटन में भी डाल सके.


रूस का रिमोट कंट्रोल
केवल जर्मन ही नहीं, रूसी रिसर्चर भी रिमोट कंट्रोल सिस्टम वाले एक्सो-स्केलेटन बना चुके हैं. डीएफकेआई ब्रेमन के रिसर्चरों को 2013 में रूसी रोबोट को देखने का अवसर मिला. इसके अलावा रूसी साइंटिस्ट भी आइला रोबोट पर अपना हाथ आजमा चुके हैं.
बिल्कुल असली से हाथ
दुनिया की दूसरी जगहों पर विकसित किए गए सिस्टम्स के मुकाबले डीएफकेआई के कृत्रिम एक्सो-स्केलेटन के सेंसर ना केवल हथेली पर लगे हैं बल्कि बाजू के ऊपरी और निचले हिस्सों पर भी. नतीजतन रोबोटिक हाथ का संचालन बेहद सटीक और असली सा लगता है. इसमें काफी जटिल इलेक्ट्रॉनिक्स इस्तेमाल होता है.


भार ढोएंगे रोबोटिक पैर
डीएफकेआई 2017 से रोबोटिक हाथों के साथ साथ पैरों का एक्सो-स्केलेटन भी पेश करेगा. यह इंसान की लगभग सभी शारीरिक हरकतों की नकल कर सकेगा. अब तक एक्सो-स्केलेटन को पीठ पर लादना पड़ता था, लेकिन भविष्य में रोबोट के पैर पूरा बोझ उठा सकेंगे.


लकवे के मरीजों की मदद
इन एक्सो-स्केलेटनों का इस्तेमाल लकवे के मरीजों की सहायता के लिए हो रहा है. ब्राजील में हुए 2014 फुटबॉल विश्व कप के उद्घाटन समारोह में वैज्ञानिकों ने इस तकनीकी उपलब्धि को पेश किया था. आगे चलकर इन एक्सो-स्केलेटन में बैटरियां लगी होंगी और इन्हें काफी हल्के पदार्थ से बनाया जाएगा.



अंतरिक्ष में रोबोट
फिलहाल इन एक्सो-स्केलेटन की अंतरिक्ष में काम करने की क्षमता का परीक्षण त्रिआयामी सिमुलेशन के द्वारा किया जा रहा है. इन्हें लेकर एक महात्वाकांक्षी सपना ये है कि ऐसे रोबोटों को दूर दूर के ग्रहों पर रखा जाए और उनका नियंत्रण धरती के रिमोट से किया जा सके. भविष्य में खतरनाक मिशनों पर अंतरिक्षयात्रियों की जगह रोबोटों को भेजा जा सकता है.

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हाथों से बिल्कुल असली से हाथ

दुनिया की दूसरी जगहों पर विकसित किए गए सिस्टम्स के मुकाबले डीएफकेआई के कृत्रिम एक्सो-स्केलेटन के सेंसर ना केवल हथेली पर लगे हैं बल्कि बाजू के ऊपरी और निचले हिस्सों पर भी. नतीजतन रोबोटिक हाथ का संचालन बेहद सटीक और असली सा लगता है. इसमें काफी जटिल इलेक्ट्रॉनिक्स इस्तेमाल होता है.शुरु

जर्मनी में एक्सो-स्केलेटन पर काम करने वाला डीएफकेआई नाम का आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस रिसर्च सेंटर 2007 में शुरू हुआ. शुरुआत में यहां वैज्ञानिक रोबोटिक हाथ और उसका रिमोट कंट्रोल सिस्टम बनाने की ओर काम कर रहे थे. तस्वीर में है उसका पहला आधुनिक प्रोटोटाइप.


रोटी बनाने वाला रोबोट

भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में से एक है जहां आज भी तीनों वक्त का खाना गर्म खाया जाता है और जहां रोटी भी ताजा ही बनाई जाती है. मां के हाथ ही रोटी का स्वाद तो सबको पसंद होता है लेकिन आज कल की भाग दौड़ की जिंदगी में उस स्वाद के लिए कई बार लोग तरस जाते हैं. खास कर अगर महिला और पुरुष दोनों ही कामकाजी हों, तो खाना पकाने का वक्त कम ही मिल पाता है.इस समस्या से निपटने के लिए भारत में लोग रसोइये रख लेते हैं. लेकिन जो भारतीय विदेशों में रहते हैं, उनके पास यह विकल्प भी नहीं है. उन्हीं को ध्यान में रखते हुए यह रोटी बनाने वाला रोबोट तैयार किया गया है. इसे बनाने वाली कंपनी का दावा है कि उनकी मशीन आटा गूंथने से ले कर, पेड़े बनाने, बेलने और रोटी को सेंकने तक का सारा काम खुद ही कुछ मिनटों में कर लेती है. हालांकि इसके दाम को देख कर लगता नहीं है कि बहुत लोग इसे खरीदेंगे. एक रोटी मेकर के लिए एक हजार डॉलर यानि 65 हजार रुपये तक खर्च करने होंगे.







Screenshot der Website rotimatic.com


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शनिवार, 31 अक्तूबर 2015

गंजे सिर पर आएंगे बाल, अमेरिकी रिसर्चर्स ने खोजी गंजेपन की नई दवा

प्रतीकात्मक फोटो है।प्रतीकात्मक फोटो है।

न्यूयॉर्क। अगर आपके सिर के बाल पूरी तरह से झड़ गए हैं तो आपके लिए एक अच्छी खबर है। अमेरिका के कुछ रिसर्चर्स ने ऐसी दवा खोजने का दावा किया है जो गंजे लोगों के सिर पर बाल उगाने में मददगार हो सकेगी। अभी इस दवा का यूज कैंसर के इलाज के लिए किया जा रहा है। 
यह दावा अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी के मेडिकल सेंटर में किए गए एक एक्सपेरिमेंट के बाद किया गया है। रिसर्चर्स एन्जेला क्रिस्टियानो और सहयोगियों द्वारा किए गए इस एक्सपेरिमेंट में कैंसर के इलाज के काम आ रही रुक्सोलिटाइनिब और टोफासिटाइनिब नामक दवाएं गंजेपन के इलाज में भी यूजफुल पाई गई है। रिसचर्च ने चूहों पर यह सफल एक्सपेरिमेंट किया है। जिन चूहों पर यह एक्सपेरिमेंट किया गया, उनके शरीर के सारे बाल गिर चुके थे। रिसर्चर्स का कहना है कि बाल झड़ने की समस्या वाले इन चूहों की स्किन पर इन दवाओं का पांच दिनों तक लेप किया गया और दस दिनों के भीतर ही बालों की जड़ें फूटनें लगीं। लगभग तीन हफ्ते में ही काफी घने बाल आ गए।

रिसर्चर्स ने एलोपेशिया एरिटा नामक बीमारी के इलाज के लिए चूहों पर यह एक्सपेरिमेंट किया था। मेल पैटर्न बाल्डनैस के लिए ज़िम्मेदार एलोपेशिया एरिटा नामक बीमारी बालों की जड़ों के इम्यून सिस्टम में गड़बड़ी के कारण पैदा होती है। 
क्या है एलोपेशिया एरिटा (Alopecia Areata) : एलोपेशिया गंजेपन की बीमारी है। एलोपेशिया की बीमारी कई तरह की होती है जिनमें से एक टाइप को ‘एलोपेशिया एरिटा’ कहते। एलोपेशिया एरिटा में बाल झड़ने लगते हैं। इससे बाल जड़ों से ही पैचेस के रूप में झड़ने लगते हैं। सिर के अलावा दाढ़ी मूछों के बालों पर भी ये बीमारी अटैक करती है। यह पुरुषों और महिलाओं दोनों में से किसी को भी हो सकती है। अधिकांश मामलों में एलोपेशिया एरिटा की बीमारी परिवार में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को आती है और कम उम्र के पुरुष भी इसका शिकार हो जाते हैं। 
भारतीय आयुर्वेद में भी हैं एलोपेशिया एरिटा का इलाज :
एलोपेशिया एरिटा की बीमारी को संस्कृत में इंद्रलुप्त भी कहा जाता है। भारतीय आयुर्वेद में इस बीमारी के इलाज के कई नुस्खे मिलते हैं। आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ.बी.एस. राठोर बता रहे हैं एलोपेशिया एरिटा के इलाज के तीन आयुर्वेदिक नुस्खों के बारे में
 :2. त्रिफला चूर्ण और भृंगराज की पत्तियों का तेल : एलोपेशिया एरिटा के इलाज के लिए घर पर ही हेयर ऑइल बनाया जा सकता है। इसके लिए चाहिए त्रिफला चूर्ण 300 ग्राम, भृंगराज की पत्तियों का जूस 300 मिलीग्राम और काला तिल का ऑइल 300 मिलीग्राम ( ये सारी चीज़ें पंसारी या जड़ी बूटी बेचने वालों की दुकान पर मिलेंगी)। इन सारी चीज़ों को आपस में मिला लें और धीमी आंच पर तब तक उबालें, जब तक कि पूरा पानी भाप बनकर उड़ न जाए और सिर्फ गाढ़े हरे रंग का तेल बाकी रहे। इस मिक्सचर को छान लें और एक बोतल में भर कर अंधेरे स्थान पर रखें। रोज रात को इस तेल की मालिश अफैक्टेड एरिया में करें और सुबह शिकाकाई व रीठा पाउडर से धो लें। इससे बालों की ग्रोथ होने की संभावना बढ़ जाती है। ध्यान रहे कि बालों पर केमिकल बेस शैम्पू का इस्तेमाल न करें।
1.कच्ची प्याज का रस : प्याज सल्फर का एक रिच सोर्स है और सल्फर ब्लड सर्कुलेशन बढ़ाने में काफी मददगार है। ऐसे में एलोपेशिया एरिटा से निजात पाने के लिए प्याज का रस काफी असरदार साबित हुआ है। कई एक्सपेरिमेंट्स में प्याज के रस का यूज़ करने के अच्छे रिज़ल्ट मिले हैं। प्याज का रस न केवल बाल झड़ने से रोकता है बल्कि एलोपेशिया एरिटा की वजह से हुआ गंजापन दूर करने में भी इफैक्टिव है। प्याज का रस और पेस्ट अफैक्टेड एरिया पर सीधे लगाना काफी फायदेमंद है। इसके लिए बस कच्ची प्याज़ लीजिए और उसका रस निकाल लीजिए। इस रस और पेस्ट को सीधे स्कैल्प में लगाएं और चालीस मिनट तक लगा रहने दें। इसके बाद किसी माइल्ड शैम्पू से धो लें। और बेहतर रिजल्ट के लिए प्याज के रस में दो चम्मच शहद और एक चम्मच नारियल का तेल भी मिलाया जा सकता है।
प्रतीकात्मक फोटो है।


3. टमाटर की पत्तियों का जूस : एलोपेशिया एरिटा के इलाज के लिए टमाटर की पत्तियों का जूस भी काफी इफैक्टिव माना गया है। टमाटर की पत्तियों का जूस अफेक्टेड एरिया पर मालिश करने के अलावा इन पत्तियों का तीन चम्मच जूस रोज पीने से भी बाल आने शुरू हो जाते हैं।

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मंगलवार, 27 अक्तूबर 2015

पौरुष बचाना चाहते हैं तो तुरंत छोड़ दीजिए ये 10 गंदी आदतें

habits that are causing infertility in men


क्या आप जानते हैं अपनी उन आदतों के बारे में जो आपके पौरुष को घटा रही हैं? जाने आनजाने आप ऐसे कई काम करते होंगे जो आपके स्पर्म काउंट के लिए घातक हैं। हो सकता है इसमें से कुछ आप अभी भी कर रहे हों। देखिए क्या हैं वह आदतें और संभल जाइए।

habits that are causing infertility in men


गर्म पानी से नहाने में शरीर को तो आराम मिलता है लेकिन यह मर्दानगी के लिए घातक है क्योंकि टेस्टिकल्स का तापमान बढ़ जाता है इसलिए यह स्पर्म काउंट भी घटाता है और उनकी गुणवत्ता पर भी असर पड़ता है।

बहुत कसे अंतरवस्त्र पहनने से टेस्टिकल्स में गर्मी बढ़ती है और स्पर्म काउंट घटता है। ब्रीफ के बजाए बॉक्सर पहने तो अच्छा है।


सोया से बनीं कोई भी चीज आपके लिए सही नहीं है। इसमें ईसोफ्लेवोन्स होते हैं जो स्पर्म की गुणवत्ता भी खराब करते हैं।

स्पर्म काउंट सही रखने के लिए यह भी जरूरी है कि नियमित रूप से सेक्स करते रहें। बहुत समय तक ऐसा न करने से स्पर्म अपना आकार बदल लेते हैं और पुराने होने लगते हैं।

मोबाइल और लैपटॉप से निकलने वाले रेडिएशन का भी स्पर्म काउंट पर बुरा असर पड़ता है। खास तौर से लैपटॉप को गोद में रख कर काम करने पर।

शराब पीने से भी टेस्टॉसटेरॉन की मात्रा कम होती है। इसलिए इससे दूर रहिए तो बेहतर है। ज्यादातर पुरषों के घटते पौरुष का यही कारण होता है।

और ऐसा ही कुछ सिगरेट के लिए है। किसी भी तरह का तंबाकू नपुंसकता की तरफ ले जाता है इसलिए यह न सिर्फ स्पर्म काउंट ही नहीं कम करता बल्कि हमेशा के लिए नपुंसक बना सकता है।

पड़े पड़े टीवी देखते रहते हैं तो इस आदत को छोड़ दीजिए। यह मोटापा बढ़ाता है और मोटापे से स्पर्म काउंट घटता है। शोध कहता है कि जो पुरुष टीवी देखने के बजाए नियमित कसरत करते हैं उनका पौरुष बढ़ता है।


सनस्क्रीन लगाने से सूरज और धूप से तो शरीर को बचा लेंगे लेकिन अपनी मर्दानगी को नुकसान पहुंचाएंगे। शोध कहता है कि सनस्क्रीन में सूरज की खतरनाक किरणों से बबचाने वाला जो केमिकल होता है वह आपके हार्मोन के लिए बुरे हैं। पुरुषों में 30 प्रतिशत तक पौरुष घटा देते हैं।


तनाव तो वैसे भी सेहत के लिए बुरा है। मानसिक स्थिति के साथ साथ पौरुष नकारात्मक असर डालता है।

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व‌िज्ञान आत्मा और भूत-प्रेतों की दुन‌िया

अपनी इच्छा से प्रकट और अदृश्य हो सकती है आत्‍मा

आत्मा और भूत-प्रेतों की दुन‌िया बड़ी रहस्यमयी है। ज‌िनका इससे सामना हो जाता है वह मानते हैं क‌ि आत्मा और भूत-प्रेत होते हैं और ज‌िनका इनसे सामना नहीं होता है वह इसे कल्पना मात्र मानते हैं। लेक‌िन भूत-प्रेत या आत्माओं का वजूद नहीं है इसे स‌िरे से खार‌िज करना सही नहीं होगा।

कई बार कुछ ऐसी घटनाएं सामने आई हैं जो अशरीरी आत्मा के वजूद को मानने पर व‌िवश कर देती है। ‌व‌िज्ञान भी इस व‌िषय पर परीक्षण कर रहा है और कई ऐसे प्रमाण सामने आए हैं जो यह बताते हैं क‌ि मृत्यु के बाद भी आत्मा का अस्त‌ित्व रहता है और यह कभी भी अपनी इच्छा से प्रकट और अदृश्य हो सकती है। इसी तरह की एक घटना के बारे में यहां हम बात कर रहे हैं।
हम ज‌िस घटना की बात करने जा रहे हैं वह लुध‌ियाना के एक न‌‌िवासी की है जो कारोबार के स‌िलस‌िले में पूर्वी अफ्रीका की राजधानी नैरोबी में जाकर बस गए। एक बार इनकी पत्नी अफ्रीका से पंजाब आई तो अचानक द‌िल का दौड़ा पड़ा और स्‍थ‌ित‌ि गंभीर हो गई।

च‌िक‌ित्सकों ने काफी प्रयास क‌िया लेक‌िन वह नाकामयाब रहे और व्यवसायी की पत्नी ने देह त्याग द‌िया। मरने से पहले इन्होंने अपने अंत‌िम संस्कार की जैसी बात की थी उसी व‌िध‌ि और तरीके से अंत‌िम संस्कार कर द‌िया गया।
हम ज‌िस घटना की बात करने जा रहे हैं वह लुध‌ियाना के एक न‌‌िवासी की है जो कारोबार के स‌िलस‌िले में पूर्वी अफ्रीका की राजधानी नैरोबी में जाकर बस गए। एक बार इनकी पत्नी अफ्रीका से पंजाब आई तो अचानक द‌िल का दौड़ा पड़ा और स्‍थ‌ित‌ि गंभीर हो गई।

च‌िक‌ित्सकों ने काफी प्रयास क‌िया लेक‌िन वह नाकामयाब रहे और व्यवसायी की पत्नी ने देह त्याग द‌िया। मरने से पहले इन्होंने अपने अंत‌िम संस्कार की जैसी बात की थी उसी व‌िध‌ि और तरीके से अंत‌िम संस्कार कर द‌िया गया।
कुछ ऐसे बीता और कारोबारी की तबीयत भी खराब हो गयी और च‌िक‌ित्सकों ने लंदन जाकर उपचार कराने की सलाह दी। लंदन में ज‌ब च‌िक‌ित्सकों ने जांच की और बताया क‌ि रोग अध‌िक गंभीर नहीं है कुछ द‌िनों के उपचार से स्वस्‍थ हो जाएंगे तो न‌िश्च‌िंत होकर कारोबारी अपने होटल में पहुंचे।

उस रात जैसे ही इन्होंने ने कमरे का दरवाजा खोला इन्हें लगा क‌ि कमरे में कोई पहले से मौजूद है। आगे बढ़कर जब इन्होंने देखा तो सामने इनकी मरी हुई पत्नी पलंग पर बैठी नजर आई। इस दृश्य को देखकर कारोबारी ठ‌िठक गए लेक‌िन इनकी पत्नी की आत्मा ने आगे बढ़कर बोलना शुरु क‌िया।कारोबारी की पत्नी बोली तुमने जो मेरा अंत‌िम संस्कार करवाया है उससे मैं संतुष्ट हूं। मैंने दक्ष‌िणा में दी हुई अंगूठी भी देखी है। मैं हमेशा आपके साथ रहती हूं और अफ्रीका से साथ-साथ लंदन आई हूं। यहां च‌िक‌ित्सकों की जांच के बाद अब मुझे शांत‌ि म‌िली है।

अमेर‌िका में कुछ द‌िनों पहले हुई दुर्घटना में अपने दूसरे बेटे की जान मैंने ही बचाई थी। जब पत्नी की आत्मा ने व‌िदाई मांगी तो कारोबारी की आंखें भर आई और उन्होंने अपनी पत्नी को गले लगा ल‌िया।

कारोबारी ने अपने इस अनुभव को 'रूहों की दुन‌िया' नामक की पुस्तक में ल‌िखा है। यह ल‌िखते हैं क‌ि उस समय जब इन्होंने पत्नी को गले लगाया तो उसका शरीर वैसा ही था जैसे वह जीवनकाल में थी। इसके बाद वह अदृश्य हो गई।

इस घटना का उल्लेख परलोक और पुनर्जन्म नाम की पुस्तक में भी है।

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रविवार, 25 अक्तूबर 2015

लिंग परिवर्तन अजय’ बन गया ‘आकृति’

साथियों के साथ अजय (अब आकृति) की फाइल फोटोअब ‘अजय’ बन गया ‘आकृति’, 6 सालों से लगा रहा था अस्पताल के चक्कर

वडोदरा। शहर के रावपुरा इलाके में रहने वाले अजय की इच्छा आखिरकार पूरी हो ही गई। वह पिछले 6 सालों से लिंग परिवर्तन करवाकर ‘युवती’ बनना चाहता था और वडोदरा के सयाजी हॉस्पिटल के चक्कर लगा रहा था। जबकि सेवासदन और खुद केंद्र सरकार ने तीन साल पहले ही अजय को ‘आकृति पटेल’ नामक ‘युवती’ का दर्जा दे दिया था। इसके बाद भी उसका लिंग परिवर्तन नहीं हो सका था। वह लगातार हॉस्पिटल के चक्कर लगाता रहा।
अजय ने कोशिश जारी रखते हुए अपनी आवाज मीडिया के जरिए दुनिया तक पहुंचाई और उसकी मेहनत रंग ले आई। शुक्रवार को उसकी सफल सर्जरी हो गई और इस तरह वह पूर्ण रूप से स्त्री बन गया। इस सर्जरी को डॉ. गौतम अमीन (मनोचिकित्सक), डॉ. उमेश शाह (कॉस्मेटिक-प्लास्टिक सर्जन), डॉ. संजीव शाह (सर्जन) और डॉ. कमलेश परीख (किडनी स्पेशलिस्ट) की टीम ने सफलतापूर्वक अंजाम दिया।
आकृति के बताए अनुसार गत 12 फरवरी 2009 में उसने लिंग परिवर्तन के लिए सयाजी हॉस्पिटल में संपर्क किया था। शुरुआत में अस्पताल के डॉक्टर्स ने यह कहकर उसे चलता कर दिया था कि अस्पताल में इस तरह का ऑपरेशन नहीं होता।
इसके बाद 2005 में एक युवक ने सयाजी हॉस्पिटल में ही लिंग परिवर्तन करवाया था। इसी का दावा करते हुए अजय ने फिर अस्पताल से लिंग परिवर्तन का ऑपरेशन करने की मांग की। इसके बाद उसका हॉस्पिटल में मनोचिकित्सक से काउंसलिंग और एंटी डिप्रेशन का उपचार शुरू हुआ।एथिक्स कमिटि ने लिंग परिवर्तन की स्वीकृति के लिए गांधीनगर स्थित हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर डिपार्टमेंट के कमिश्नर को रिपोर्ट्र्स भेजीं। लेकिन यहां से कोई जवाब नहीं आया। तबसे लेकर अजय अब तक लगातार हॉस्पिटल के चक्कर लगा रहा था। लेकिन उसे पता नहीं चल पा रहा है कि उसका ऑपरेशन कब होगा। आखिरकार अजय की कोशिश रंग लाई। अजय के ऑपरेशन के लिए सयाजी हॉस्पिटल में सात सदस्यों के एक बोर्ड का गठन किया गया है। इसी बोर्ड ने सेक्स चेंज के लिए ऑपरेशन की तिथि निश्चित की।
इलाके के लोग आकृति कहकर ही बुलाते थे:
सर्जरी करने वाले डॉक्टर्स की टीम के साथ आकृति
वडोदरा के रावपुरा इलाके में रहने वाले अजय एच. पटेल को पिछले कई वर्षो से लोग अंजलि उर्फ आकृति के नाम से ही पहचानते हैं। लंबे बाल, हाथों में चूड़ियां, लिपिस्टिक और लड़कियों के कपड़े अब अजय का परिधान थे। शारीरिक व मानसिक रूप से युवति के सभी गुण-लक्षण उसमें थे, यह बात खुद सयाजी हॉस्प्टिल के डॉक्टर्स ने उसकी जांच के बाद कही थी।
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जहां लोग दिन में न चाहते हुए भी सो जाते हैं

दिन में अपने आप ही सो जाते हैं यहां के लोग, सामने आई रहस्यमय सच्चाई

कजाकिस्तान में एक गांव ऐसा है, जहां लोग दिन में न चाहते हुए भी सो जाते हैं। इस बीमारी के कारण आधा गांव खाली हो गया है। अब तक इसका कोई ठोस कारण समझ नहीं आया है।
दुनियाभर में कई ऐसे लोग हैं, जिन्हें रात में भी नींद नहीं आती। इससे वे काफी परेशान भी रहते हैं। लेकिन कजाकिस्तान में एक गांव ऐसा है, जिसके रहवासी दिन में ही अपने आप सोने लगते हैं। इनके जागने का हिसाब-किताब भी अजीब है। कभी दो घंटे में ही जाग जाते हैं तो कभी दो दिन भी लग जाते हैं। कजाकिस्तान के इस गांव का नाम कलाची है। यहां के लोग जब दिन में सोने के बाद जागते हैं तो इन्हें कुछ भी याद नहीं रहता। कहा जाता है कि कई लोग जागने के बाद या तो भविष्य की बातें करने लगते हैं या फिर अपने अतीत की। उन्हें कभी परियां दिखाई देती हैं तो कभी दीवारों पर चलते हुए मेंढक। दिन होते ही किसी भी समय लोग सो जाते हैं। इन्हें जगाने की चाहे कितनी भी कोशिश करो, सब व्यर्थ है। यहां तक कि स्कूल जाने वाले अधिकतर बच्चे भी दिन के समय सो जाते हैं। यह सिलसिला मार्च, 2013 से चल रहा है। शुरुआत में गांव की आबादी 810 थी और करीब 140 लोग इससे पीड़ित थे। लेकिन इस अजीबोगरीब बीमारी के बाद से लोग धीरे-धीरे अब गांव छोड़ रहे हैं।
तो सच क्या है?
इस गांव के लोगों को यह समस्या क्यों है, इसका पता विभिन्न स्तरों पर लगाया जा रहा है। कई बार इलाके में रेडिएशन की मात्रा को जांचा गया, लेकिन वहां इसकी कोई समस्या नहीं निकली। डॉक्टर्स भी इसकी कोई वजह नहीं बता पाए। दरअसल, यहां सोवियत संघ के समय की कुछ ऐसी यूरेनियम माइंस है, जिनमें कार्बन मोनो ऑक्साइड की मात्रा बहुत ही ज्यादा है। वहां से गैस के लगातार रिसाव होने के कारण यह पूरे इलाके में फैल गई। 2015 में इसकी जांच यहां के घरों में की गई, जिसमें पाया गया कि वो लोगों के घरों में संभावित मात्रा से 10 गुना अधिक है। इसे ही दिन में सोने का कारण माना जा रहा है। वैज्ञानिकों ने भी अब इस बात की पुष्टि कर दी है। यह बात 20 हजार से भी अधिक परीक्षणों के बाद सामने आई है। यह परीक्षण गांव की जमीन, मिट्‌टी, हवा, जानवर, इमारतों आदि पर किए गए हैं।
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जमीन के नीचे मिली थी ये 'देवताओं की बस्ती', 1400 साल पुराने मंदिर भी मिले

ग्वालियर में मिली देवताओं की बस्तीइस बस्ती में बने मंदिर

ग्वालियर. ग्वालियर से 30 किलोमीटर दूर पढ़ावली स्थित पहाड़ी पर ये है देवताओं की बस्ती। करीब 1400 साल से अधिक पुराने इन सैकड़ों मंदिरों में देवी-देवताओं के अलावा ऋषि मुनि के स्थान हैं। एक हजार साल पहले ये मंदिर भूकंप की भैंट चढ़ गायब था। 2005 में खुदाई के दौरान इसका पता चला। अब तक यहां 95 मंदिर खोजे जा चुके हैं और 110 होना बाकी हैं। इसके अलावा इस क्षेत्र में हजारों मंदिर और दबे हुए हैं।
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रविवार, 13 सितंबर 2015

सुपर कंडक्टिव - ग्रैफीन कंडोम




कंडोम के क्षेत्र में नई नई खोजें हो रही हैं. 2004 में जिस अति प्रवाहकीय, अति मजबूत पदार्थ ग्रैफीन की खोज के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था, अब उसका एक महत्वपूर्ण इस्तेमाल सामने आया है. इससे बेहतर कंडोम बनाने की कोशिश हो रही है.
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जब वो धरती पर थे... )

Homo floresiensis (Photo: Smithsonian’s Human Origins Program)
होमो फ्लोरेसिएन्सिस (हॉबिट
गंभीर दिखने वाला ये इंसान 2003 में इंडोनेशियाई द्वीप पर मिला. यह सिर्फ एक मीटर लंबा था और जेआरआर टल्कियेन की लॉर्ड ऑफ द रिंग्स कहानी में हॉबिट जैसा दिखता था. इसलिए इसे हॉबिट कहा जाता है. शायद यह आधुनिक मनुष्य से अलग प्रजाति का था. धरती पर दोनों ही रहते थे. करीब 15,000 साल पहले हॉबिट प्रजाति ने दुनिया को अलविदा कह दिया.
Sauriersaal 20
ब्रैकियोसॉरस
ये प्राणी धरती से 15 करोड़ साल पहले विलुप्त हो गया था. शाकाहारी ब्रैकियोसॉरस धरती पर रहने वाली सबसे बड़ी प्रजातियों में से एक था. पूरे आकार का डायनोसोर बनने में इसे 10 से 15 साल लगते थे. खूब भूख और बढ़िया मैटाबोलिज्म वाला ये प्राणी 13 मीटर ऊंचा और इससे दुगना बड़ा होता था.

Quagga (Photo: Museum für Naturkunde Berlin)

क्वागा
घोड़े और जेबरा का मिक्स दिखने वाला ये जानवर असल में एक जेबरा है. दक्षिण अफ्रीकी जेबरा की ये एक उप प्रजाति है. लोग इसका शिकार करते और खाने में इसकी टक्कर थी पालतू जानवरों से. क्वागा 1883 में धरती से खत्म हो गया.
Woolly Mammoth (Courtesy of Smithsonian Institution)
वुली मैमथ
 
आइस एज में जिंदा रहने के लिए वुली मैमथ की खाल बहुत ऊनी होती थी. ये हाथी भी आज के हाथी जितने ही बड़े होते थे. हालांकि ये पांच हजार साल पहले धरती से खत्म हो गए. कारण गर्म होता वातावरण और हमारे पूर्वज शिकारी थे.
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अगले महाविनाश में इंसान का सफाया!

कभी डायनासोर सबसे ज्यादा शक्तिशाली जीव थे जो पूरी तरह खत्म हो गए. आज इंसान सबसे ज्यादा शक्तिशाली है, लेकिन उसके सफाये की आशंका भी उतनी ही प्रबल है.

पृथ्वी पर जीवन बीते 50 करोड़ साल से है. अब तक पांच बार ऐसे मौके आए हैं जब सबसे ज्यादा फैली और प्रभावी प्रजातियां पूरी तरह विलुप्त हुई हैं. भविष्य में सर्वनाश का छठा चरण आएगा और इंसान के लिए यह बुरी खबर है, क्योंकि इस वक्त धरती पर सबसे ज्यादा प्रबल प्रजाति उसी की है.
इंग्लैंड की लीड्स यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने सर्वनाश और क्रमिक विकास पर शोध किया है. वैज्ञानिकों के मुताबिक आखिरी सर्वनाश की घटना 6.6 करोड़ साल पहले घटी. तब एक बड़ा धूमकेतु पृथ्वी से टकराया और 15 करोड़ साल तक धरती पर विचरण करने वाले डायनासोर एक झटके में खत्म हो गए. डायनासोरों की तुलना में इंसान ने पृथ्वी पर बहुत कम समय गुजारा है, करीब 15 लाख साल.
वैज्ञानिकों के मुताबिक बीती घटनाओं के दौरान, एक समान दिखने वाली या बहुत ही कम अंतर वाली प्रजातियों का 50 से 95 फीसदी तक सफाया हुआ. शोध टीम के प्रमुख प्रोफेसर एलेक्जेंडर डनहिल कहते हैं, "जीवाश्मों के आधार पर बीते दौर के व्यापक सफाये को देखें तो पता चलता है कि मौजूदा जीवों की लुप्त होने की रफ्तार भी काफी ऊंची है." दूसरे शब्दों में कहें तो धरती सर्वनाश के छठे चरण की ओर बढ़ रही है.
ट्राइएशिक-जुरासिक काल का सबसे बड़ा जीव
शोध टीम के मुताबिक सर्वनाश के लिए जिम्मेदार कई घटनाएं फिलहाल इंसान के बस में नहीं हैं. इतिहास को देखें तो पता चलता है कि खगोलीय या भूगर्भीय घटनाओं के कारण पृथ्वी की जलवायु में अभूतपूर्व बदलाव आए और ज्यादातर जीव उजड़ गए. 20 करोड़ साल पहले ट्राइएशिक-जुरासिक काल के दौरान भी यही हुआ. प्रोफेसर डनहिल के मुताबिक, "ऐसे जीव जो इन परिस्थितियों के मुताबिक खुद को बहुत तेजी से नहीं ढाल पाए वे लुप्त हो गए." ट्राइएशिक-जुरासिक काल के 80 फीसदी जीव बदलाव की भेंट चढ़े.
हालांकि महाविनाश की वो घटनाएं वक्त बीतने के साथ धीमी पड़ती गईं. यही कारण है कि मगरमच्छ और सरीसृप प्रजाति के कई जीव बच गए. और फिर धीरे धीरे क्रमिक विकास के साथ स्तनधारी और पंछी बने.
बीती घटनाओं के आधार पर नतीजे निकाले जाएं तो अगले महाविनाश में सबसे ज्यादा नुकसान इंसान को होगा. डनहिल कहते हैं, "20 करोड़ साल पहले फूटे ज्वालामुखियों ने वायुमंडल में बहुत ही ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड और ग्रीन हाउस गैसें छोड़ीं, इनकी वजह से जानलेवा ग्लोबल वॉर्मिंग हुई. तथ्य यह है कि हम इंसानी गतिविधियों से वैसे ही हालात तैयार कर रहे हैं, वो भी समय के मुकाबले कहीं ज्यादा तेजी से."
इंसान की वजह से आज प्रकृति तबाह हो चुकी है और कई प्रजातियां लुप्त होने पर मजबूर हो चुकी हैं. प्रोफेसर डनहिल के मुताबिक किसी भी और प्रजाति की तुलना में इंसान धरती पर सबसे ज्यादा फैले हैं, "आप कह सकते हैं कि हम इतने बड़े इलाके में फैले हैं कि क्रमिक विकास की बड़ी घटना में हमारा पूरी तरह सफाया नहीं होगा, लेकिन दुनिया की ज्यादातर आबादी अब भी आहार, पानी और ऊर्जा के लिए प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है. प्रकृति में होने वाली बड़ी उथल पुथल का असर इंसानों पर निश्चित रूप से नकारात्मक होगा."
ओएएसजे/एमजे (एएफपी)
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सिरकटा मुर्गा, जो 18 महीने तक ज़िंदा रहा!

  • 12 सितंबर 2015
हेडलेस चिकनImage copyrightBBC World Service
अमरीका में 70 साल पहले एक किसान ने एक मुर्गे का सिर काट दिया, लेकिन वह मरा नहीं बल्कि 18 महीने तक जिंदा रहा.
चकित करने वाली इस घटना के बाद यह मुर्गा 'मिरैकल माइक' नाम से मशहूर हुआ.
ये सिरकटा मुर्गा इतने दिनों तक ज़िंदा कैसे रहा?

पढ़ें विस्तार से

10 सितंबर 1945 को कोलाराडो में फ़्रूटा के अपने फ़ार्म पर लॉयल ओल्सेन और उनकी पत्नी क्लारा मुर्गे-मुर्गियों को काट रहे थे.
लेकिन उस दिन 40 या 50 मुर्गे-मुर्गियों में से एक सिर कट जाने के बाद भी मरा नहीं.
ओल्सेन और क्लारा के प्रपौत्र ट्रॉय वाटर्स बताते हैं, “जब अपना काम ख़त्म कर वे मांस उठाने लगे तो उनमें से एक जिंदा मिला जो बिना सिर के भी दौड़े चला जा रहा था.”
दम्पति ने उसे सेब के एक बक्से में बंद कर दिया, लेकिन जब दूसरी सुबह लॉयल ओल्सेन ये देखने गए कि क्या हुआ तो उसे ज़िंदा पाकर उन्हें बहुत हैरानी हुई.
बचपन में वाटर्स ने अपने परदादा से ये कहानी सुनी थी.
वाटर्सImage copyrightBBC World Service
Image captionअमरीका के फ्रूटा में हर साल 'हेडलेस चिकन' महोत्सव मनाया जाता है.
वाटर्स कहते है, “वो मीट बाज़ार में मांस बेचने के लिए ले गए और अपने साथ उस ‘हेडलेस चिकन’ को भी लेते गए. उस समय घोड़ा गाड़ी हुआ करती थी.”
“बाज़ार में उन्होंने इस अजीब घटना पर बियर या ऐसी चीजों की शर्त लगानी शुरू कर दी.”
यह बात जल्द ही पूरे फ़्रूटा में फैल गई. एक स्थानीय अख़बार ने ओल्सेन का साक्षात्कार लेने के लिए अपना रिपोर्टर भेजा.
कुछ दिन बाद ही एक साइडशो के प्रमोटर होप वेड 300 मील दूर यूटा प्रांत के साल्ट लेक सिटी से आए और ओल्सेन को अपने शो में आने का न्यौता दिया.

अमरीका का टूर

वह पहले साल्ट लेक सिटी गए और फिर यूटा विश्वविद्यालय पहुंचे जहां 'माइक' की जांच की गई. अफ़वाह उड़ी कि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने कई मुर्गों के सिर काटे ताकि यह पता लगाया जा सके कि वे सिर के बिना ज़िंदा रहते हैं या नहीं.
माइक को 'मिरैकल माइक' नाम होप वेड ने ही दिया था. उस पर 'लाइफ़ मैग्ज़ीन' ने भी कहानी की.
इसके बाद तो लॉयड, क्लारा और माइक पूरे अमरीका के टूर पर निकल पड़े.
वे कैलिफ़ोर्निया, एरिज़ोना और अमरीका के दक्षिण पूर्वी राज्यों में गए.
माइक की इस यात्रा से जुड़ी बातों को क्लारा ने नोट किया था जो आज भी वाटर्स के पास मौजूद है.
वाटर परिवारImage copyrightBBC World Service
Image captionक्लारा और लॉयड
लेकिन ओल्सेन जब 1947 के बसंत में एरिज़ोना के फ़ीनिक्स पहुंचे तो माइक की मृत्यु हो गई.
माइक को अक्सर ड्रॉप से जूस वगैरह दिया जाता था और उसकी भोजन नली को सीरिंज से साफ किया जाता था, ताकि गला चोक न हो.
लेकिन उस रात वे सीरिंज एक कार्यक्रम में भूल गए थे और जब तक दूसरे का इंतज़ाम होता, माइक का दम घुटने से मौत हो गई.

ताज्जुब

वाटर्स कहते हैं, “सालों तक ओल्सेन यह दावा करते रहे कि उन्होंने माइक को बेच दिया था. लेकिन एक रात उन्होंने मुझे बताया कि असल में वह मर गया था.”
हालांकि ओल्सेन ने कभी नहीं बताया कि उन्होंने माइक का क्या किया लेकिन उसकी वजह से उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ.
न्यूकैसल यूनिवर्सिटी में सेंटर फ़ॉर बिहैवियर एंड इवोल्यूशन से जुड़े चिकन एक्सपर्ट डॉ. टॉम स्मल्डर्स कहते हैं कि आपको ताज्जुब होगा कि चिकन का पूरा सिर उसकी आंखों के कंकाल के पीछे एक छोटे से हिस्से में होता है.
रिपोर्टों के अनुसार माइक की चोंच, चेहरा और आंखें निकल गई थीं, लेकिन स्मल्डर्स का अनुमान है कि उसके मस्तिष्क का 80 प्रतिशत हिस्सा बचा रह गया था, जिससे माइक का शरीर, धड़कन, सांस, भूख और पाचन तंत्र चलता रहा.

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कोरोनावायरस / महामारी से लड़ने में रोबोट्स की मदद लेगा भारत, यह संक्रमितों तक खाना-दवा पहुंचाएंगे, टेम्परेचर और सैंपल लेने का काम भी करेंगे

दैनिक भास्कर Apr 06, 2020, 02:05 PM IST नई दिल्ली..  कोरोना से लड़ने के लिए चीन समेत दुनियाभर के कई देश रोबोट्स की मदद ले रहे हैं। यह ...