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August 24, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

टमाटर घटाता है प्रोस्टेट कैंसर का ख़तरा

टेन में हुए इस अध्ययन के मुताबिक़ नियमित तौर पर टमाटर खाने वाले पुरुषों में प्रोस्टेट कैंसर होने का ख़तरा 20 फ़ीसदी कम हो जाता है. दुनिया भर के पुरुषों में होने वाले कैंसरों में प्रोस्टेट कैंसर दूसरे नंबर पर है.
कैंसर विशेषज्ञ खाने में फल और सब्जी की भरपूर मात्रा के साथ संतुलित आहार लेने की सलाह देते हैं.ब्रिटेन में हर साल इसके 35,000 नए मामले आते हैं और 10,000 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती है. विशेषज्ञ रेड और प्रोसेस्ड मीट के साथ ही साथ चर्बी और नमक की कम मात्रा लेने की भी सलाह देते हैं. ब्रिस्टल विश्वविद्यालय के अध्ययनकर्ता दल ने 50 से 69 साल की उम्र के बीस हज़ार ब्रितानी पुरुषों पर शोध किया और पाया कि नियमित तौर पर टमाटर खाने वालों में प्रोस्टेट कैंसर होने का जोखिम 18 फ़ीसदी कम हो जाता है. भरपूर मात्रा में फल और सब्जी फल और सब्जी भरपूर मात्रा में खाने वालों में भी कैंसर का जोखिम कम सब्जी और फल खाने वालों की तुलना में 24 फ़ीसदी कम पाया गया. टमाटर के अंदर कैंसर प्रतिरोधी गुण की वजह लाइकोपेन को माना जाता है. लाइकोपेन एक एंटीऑक्सीडेंट है जो डीएनए और कोशिका को क्षति पहुंचाने से रोक सकत…

चीन का सबसे अमीर गांव, जहां हर आदमी कमाता है 80 लाख रुपए सालाना

जियांगयिन। आलीशान बंगला, महंगी कार, अच्छी शिक्षा, हर तरह की सुख-सुविधाएं और वो भी मुफ्त में। ये एक सपना हो सकता है, लेकिन चीन के हुआझी गांव में रहने वाले लोगों के लिए ये कोई सपना नहीं, बल्कि हकीकत है। ये गांव चीन के जियांगयिन शहर के पास है और इसे पूरे देश में सबसे अमीर कृषि गांव कहा जाता है। इस गांव में रहने वाले सभी 2000 रजिस्टर्ड लोगों की सालाना आमदनी एक लाख यूरो (करीब 80 लाख रुपए) है। हुआझी गांव आज एक सफल समाजवादी गांव का मॉडल पेश कर रहा है। हालांकि, शुरुआती दौर में गांव की तस्वीर ऐसी नहीं थी। 1961 में स्थापना के बाद यहां कृषि की हालत बहुत खराब थी, लेकिन गांव की कम्युनिस्ट पार्टी कमिटी के पूर्व अध्यक्ष रहे वू रेनवाओ ने इस गांव की सूरत ही बदल दी।  वू ने कैसे बदली गांव की सूरत वू ने औद्योगिक विकास की योजना के लिए पहले गांव का निरीक्षण किया और फिर एक मल्टी सेक्टर इंडस्ट्री कंपनी बनाई। उन्होंने सामूहिक खेती की प्रणाली का नियम बनाया। इसके साथ ही, 1990 में कंपनी को शेयर बाजार में सूचीबद्ध कराया। गांव के लोगों को कंपनी में शेयरधारक बनाया गया। मुफ्त में मिलती हैं सुविधाएं गांव की स्टील, सिल्…

अब टाईप करने की भी ज़रूरत नहीं हिंदी में बोलना काफी

जो काम बोल कर हो जाए उसके लिए टाईप करने की जहमत क्यों उठाना. और वैसे भी बढ़ती तकनीकी के साथ जो न हो कम है. पहले टच स्क्रीन का आविष्कार और अब टाईप तो क्या टच करने की भी ज़रूरत नहीं. जी हां, गूगल पर सर्च करने के लिए अब आपको टाइप करने की जरूरत नहीं, क्योंकि यह काम अब आप बोलकर ही कर सकते हैं वो भी हिंदी में. गूगल कंपनी ने एंड्रॉयड ओएस पर हिंदी में वॉइस सर्च की सर्विस देना शुरू किया है. यानि इस सर्विस के तहत आप गूगल पर हिंदी में बोलकर सर्च कर सकते हैं. गौरलब है कि गूगल ने अपनी इस सर्विस के बारे में दो महीने पहले ही बता दिया था. तब कंपनी ने कहा था कि गूगल वॉइस सर्च अब भारतीय उच्चारण को भी समझेगा. इसके तहत हिंदी में बोलकर सर्च करने का फीचर आपकी भाषा समझ लेगा. लेकिन बोलकर सर्च करने और टाइप करके सर्च करने के रिजल्ट्स में अंतर दिख सकता है. एंड्रॉयड ओएस वाले डिवाइस पर हिंदी में सर्च करने के लिए आपको सेटिंग में बदलाव होगा. सबसे पहले अपने एंड्रॉयड फोन की सेटिंग्स में जाइए. फिर अकाउंट्स में गूगल खोलें. फिर इसके सर्च में जाइए. इसके बाद फिर वॉइस खोलिए. इसमें लैंग्वेज में हिंदी (भारत) चुनकर सेव कर दीजिए. …

भविष्य में होंगे मस्तिष्क प्रत्यारोपण

बेहद गोपनीय अमेरिकी सैन्य शोधकर्ताओं का कहना है कि अगले कुछ महीनों में वे मस्तिष्क प्रत्यारोपण के विकास से जुड़ी नई प्रगति के बारे में जानकारी पेश करने वाले हैं. मस्तिष्क प्रत्यारोपण की मदद से याददाश्त बहाल की जा सकेगी. अमेरिका की डिफेंस एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट्स एजेंसी (डीएआरपीए) प्रबुद्ध स्मृति उत्तेजक को बनाने की योजना के कार्यक्रम का नेतृत्व कर रही है. यह इंसानी दिमाग को बेहतर तरीके से समझने के लिए बनाई गई योजना का हिस्सा है. इस योजना में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने दस करोड़ अमेरिकी डॉलर की सहायता दी है. विज्ञान ने पहले ऐसा काम नहीं किया है. और इस पर नैतिक सवाल भी उठ रहे हैं कि जख्मी सैनिक की याददाश्त को बहाल करने और बूढ़े होते मस्तिष्क के प्रबंधन के नाम पर क्या इंसानी दिमाग के साथ छेड़छाड़ जायज है. कुछ लोगों का कहना है कि जिन लोगों को इससे लाभ पहुंचेगा उनमें पचास लाख अमेरिकी हैं जो अल्जाइमर बीमारी से पीड़ित हैं और करीब तीन लाख अमेरिकी फौजी हैं जिनमें महिलाएं और पुरुष शामिल हैं. ये वो सैनिक हैं जो इराक और अफगानिस्तान में युद्ध के दौरान घायल हुए और उनके मस्तिष्क में चोटें आ…

10 उभरती तकनीकें जो बदल देंगी जीने का अंदाज

।। ब्रह्मानंद मिश्र ।। नयी दिल्ली

सदियों से इंसान नये अविष्कारों के जरिये भावी पीढ़ी के जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास करता रहा है. मौजूदा दौर में भी कई ऐसी नयी टेक्नोलॉजी पर शोधकार्य जारी है, जो कुछ वर्षो बाद जीने के अंदाज को बदल सकती हैं. इन्हीं में से 10 उभरती तकनीकों के बारे में बता रहा आज का नॉलेज.. तकनीकी विकास की अवधारणा, मानव विकास की सतत कड़ी है. शायद इसी वजह से तेजी से बदलते आधुनिक युग में भी तकनीक ही विकास की सबसे बड़ी कारक साबित हो रही हैं. इस क्षेत्र में आनेवाली छोटी-बड़ी चुनौतियां ही नयी तकनीक के खोज में लगे वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के लिए प्रेरणास्नेत हैं. आज के दौर में नैनो टेक्नोलॉजी से लेकर बायोटेक्नोलॉजी तक, इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी से लेकर कॉग्निटिव साइंस की विशिष्टताओं तक ने इंसानी संवेदनशीलता के स्तर को और भी ऊंचा कर दिया है. दूसरी तरफ देखें तो प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और बदलते वैश्विक पर्यावरण ने मानव जाति को भविष्य के बारे में नये सिरे से सोचने के लिए मजबूर कर दिया है. आज बढ़ती जनसंख्या की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना, मानव जीवन को तरह-तरह की भयानक बीमारियों से मु…

मरने के बाद शव का दाह संस्कार किया जाता, आखिर क्यों

हिन्दू धर्म में गर्भधारण से लेकर मृत्यु के बाद तक कुल सोलह संस्कार बताए गए हैं। सोलहवें संस्कार को अंतिम संस्कार और दाह संस्कार के नाम से जाना जाता है। इसमें मृत व्यक्ति के शरीर को स्नान कराकर शुद्ध किया जाता है।

इसके बाद वैदिक मंत्रों से साथ शव की पूजा की जाती है फिर बाद में मृतक व्यक्ति का ज्येष्ठ पुत्र अथवा कोई निकट संबंधी मुखाग्नि देता है।

शास्त्रों के अनुसार परिवार के सदस्यों के हाथों से मुखाग्नि मिलने से मृत व्यक्ति की आत्मा का मोह अपने परिवार के सदस्यों से खत्म होता है। और वह कर्म के अनुसार बंधन से मुक्त होकर अगले शरीर को पाने के लिए बढ़ जाता है।
शास्त्रों में बताया गया है शरीर की रचना पंच तत्व से होती है ये पंच तत्व हैं पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। शव का दाह करने से शरीर जल कर पुन: पंचतत्व में विलीन हो जाता है। जबकि अन्य संस्कारों में ऎसा नहीं हो पाता है।

क्योंकि शव को जलाने से सबसे पहले पृथ्वी को राख के रुप में अपना अंश मिला जाता है। धुआं आसमान में जाता है जिससे आकाश का तत्व आकाश में मिल जाता है आैर वायु तत्व वायु में घुल जाता है।

अग्नि शरीर को जलाकर आत्मा को शुद्धि प्रदान करत…

संस्कृत से आई 'नमाज़', इसी से मिला 'बग़दाद'

राकेश भट्ट बीबीसी मॉनीटरिंग हाल ही में स्कूलों में संस्कृत सप्ताह मनाने का सीबीएसई का निर्देश अपने साथ प्रतिक्रियाएं लेकर भी लेकर आया. कुछ स्वागत में तो कुछ विरोध में. हज़ारों साल जनमानस से लेकर साहित्य की भाषा रही संस्कृत कालांतर में क़रीब-क़रीब सुस्ता कर बैठ गई, जिसका एक मुख्य कारण इसे देवत्व का मुकुट पहनाकर पूजाघर में स्थापित कर दिया जाना था. भाषा को अपने शब्दों की चौकीदारी नहीं सुहाती– यानी भाषा कॉपीराइट में विश्वास नहीं करती, वह तो समाज के आँगन में बसती है. भाषा तो जिस संस्कृति और परिवेश में जाती है, उसे अपना कुछ न कुछ देकर ही आती है. पढ़िए राकेश भट्ट का लेख विस्तार से वैदिक संस्कृत जिस बेलागपन से अपने समाज के क्रिया-कलापों को परिभाषित करती थी उतने ही अपनेपन के साथ दूरदराज़ के समाजों में भी उसका उठाना बैठना था. जिस जगह विचरती उस स्थान का नामकरण कर देती. दजला और फ़रात के भूभाग से गुज़री तो उस स्थान का नामकरण ही कर दिया. हरे भरे खुशहाल शहर को ‘भगवान प्रदत्त’ कह डाला. संस्कृत का भगः शब्द फ़ारसी अवेस्ता में “बग” हो गया और दत्त हो गया “दाद” और बन गया बग़दाद. इसी प्रकार संस्कृत का “अश्वक” प…