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शनिवार, 26 जुलाई 2014

जब आपका कपड़ा हर सेकेंड बदलेगा अपना रंग

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वाशिंगटन : कल्पना कीजिए कि रंग बदलने वाले आपके कपड़े आपको गिरगिट की तरह रंग बदलने जैसा बना दें तो आपको कैसा लगेगा। बुडापेस्ट के एक कपड़ा डिजायनर ने एक ऐसा कपड़ा बनाने का दावा किया है जो सेकेंडों में रंग बदल सकता है। ज्यूडिट एस्टर कारपैटी की अध्यक्षता वाली इस परियोजना के तहत, कपड़े में आवाज और सेंसर लगाया गया है।
‘गिजमोडो’ ने खबर दी कि इस परियोजना में 12 वोल्ट आपूर्ति के साथ एक आर्डूइनो और चार इंडस्ट्रीयल 24 वोल्ट डीसी बिजली आपूर्ति नियंत्रित करने वाले 20 कस्टम पिंट्रिड सर्किट बोर्ड शामिल हैं जो निक्रोम तार वाले दो टेक्सटाइल वूवन को गर्म करे। कारपैटी ने कहा, मेरा इरादा यह खोजने का था कि मैं डिजिटल मीडिया की दुनिया को वस्त्र कला में कैसे लेकर आउं।
(एजेंसी)
sabhar :http://zeenews.india.com/

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एक स्थूल शरीर का उपयोग एक से अधिक आत्माएँ कर सकती है

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एक स्थूल शरीर का उपयोग एक से अधिक आत्माएँ कर सकती है. पूर्व जन्म याद आने को जाति स्मरण कहा जाता है.

शरीरों को परिभाषित करने का अपना-अपना ढंग हैं. जैन आगम के अनुसार संसारिक जीव के पाँच शरीर हो सकते हैं, ये शरीर हैं: 1. औदारिक़ 2. वैक्रियक 3. आहरक 4. तैजस और 5. कार्मणा . औदारिक़ को छोड़कर शेष सभी चार शरीर संपूर्ण ब्रह्मांड मे बे रोक-टोक गमन कर सकते हैं. वैदिक धर्मानुसार शरीर दो हैं, एक सूक्षम शरीर और दूसरा स्थूल शरीर. जैन धर्म द्वारा परिभाषित औदरिक शरीर तो स्थूल शरीर हुआ, और शेष चार शरीर सूक्ष्म शरीर के भेद हैं. इस प्रकार दोनों धर्मों में लगभग समानता कहीं जा सकती है.

प्रत्येक संसारिक के कम से कम दो शरीर तैजस और कार्मणा अवश्य होते हैं और अधिक से अधिक चार शरीर एक साथ हो सकते हैं. जो हमे दिखाई देता है वह औदारिक़ शरीर है. चौथा शरीर वैक्रियक और आहरक में से हो सकता है. औदरिक शरीर ही स्थूल शरीर है. किसी भी वस्तु को हम पहिले पॉलिथीन की पन्नि में रखते हैं और फिर डब्बे में. जिस शरीर को लिए हम आम लोगो को नज़र आते हैं वह स्थूल शरीर ही तो है. सामान्यत: हम स्थूल शरीर को ही देख सकते हैं, शेष शरीर आम प्राणी को सामान्य अवस्था में दिखाई नहीं देते हैं.

मृत्यु के समय जीव का इस स्थूल शरीर से सम्बंध टूट जाता है. जिसे मृत्यु कहते हैं. इस मृत्यु के बाद जब जीव पुन: नवजात शिशु शरीर धारण करता है तो उसे पुनर्जन्म, अंग्रेजी में Reincarnation or Rebirth कहते हैं. और यदि किसी दूसरी जन्मी देह में प्रवेश कर जाती है तो उसे परकाया प्रवेश कहते हैं.

गर्भ धारण करते ही स्थूल शरीर की नीव रखी जाती है, और जीव उसमें आ जाता है. गर्भ धारण करने के बाद मनुष्य जन्म में सामान्यत: नो माह का समय लगता है. यदि कोई मनुष्य आज मरे और आज ही पैदा हो जाए, तो इसका क्या अर्थ हुआ? इसका अर्थ हुआ कि जो जीव गर्भ धारण करने से अब तक गर्भ के शिशु शरीर में विद्यमान था, वह चला गया और आज ही मरने वाले मनुष्य की आत्मा उस गर्भ के शिशु शरीर में प्रवेश कर गयी है. कभी-कभी आत्मा पूर्व के किसी शरीर को भी धारण कर लेती है जैसे कोई पॅकिंग बदल दी गयी हो, और इससे संबंधित सच्च घटनाओं का ब्यौरा प्रस्तुत है:

एक- भारत की घटना:
आगरा के सुरेश वर्मा 28 अगस्त, 1983 को दुकान से कार से घर लौट रहे थे और दरवाजा खुलवाने के लिए हॉर्न बजाया. इसी बीच पहिले से ही घात लगाकर बैठे दो आदमी बंदूक ताने उनकी ओर लपके और गोली दाग दी. एक गोली उनके पैर में लगी और दूसरी सिर में. और सुरेश वर्मा की मृत्यु हो गयी.

28 अगस्त, 1983 को ही आगरा से 13 किलोमीटर दूर बढ़ ग्राम में सुरेश वर्मा की आत्मा ने पुन: जन्म ले लिया. उसका नाम टीटू रखा गया. आश्चर्य की बात यह थी कि सुरेश वर्मा के सिर व कान के पास जहाँ गोली लगी थी उस जगह उनके इस जन्म में भी निशान थे.

प्रश्न यह उठता है कि सुरेश वर्मा 28 अगस्त, 1983 को मारे गये और उस ही दिन उनकी आत्मा ने जन्म ले लिया. इसका मतलब यह हुआ कि उस गर्भस्थ शिशु के शरीर में पहिले से विद्यमान आत्मा चली गयी और उसके स्थान पर सुरेश वर्मा की आत्मा उस शिशु के शरीर में आ गयी थी.

यानि कि टीटू के शरीर में पहिले कोई दूसरी आत्मा रही, और जन्म के समय उस शिशु के शरीर में सुरेश वर्मा की आत्मा आ गयी. शिशु टीटू ने सुरेश वर्मा के पुनर्जन्म के रूप में जन्म लिया.

दो- भारत की घटना:
सन 1958 की बात है, मुज़फ़्फ़रनगर जिले के ग्राम रसुलपुर जाटान के एक लगभग तीन साल चार माह के बच्चे जसवीर पुत्र गिरधारी सिंह, जाट को चेचक निकली और उसकी मृत्यु हो गयी. रात अधिक हो गयी थी. अत: शरीर को रख दिया गया ताकि सुबह क्रियाक्रम के लिए शमसान ले जाया जा सके.

सुबह जब क्रियाक्रम के लिए ले जाने की तैयारी करने लगे तो सब यह देखकर दंग रह गये कि बालक के शरीर में धीरे-धीरे प्राणों का संचार हो रहा है. बालक जीवित हो गया, और कुछ दिनों में स्वस्थ हो गया. उसके व्यवहार में भारी परिवर्तन हो गया था. वह उस घर के किसी भी सदस्य के हाथ का कुछ भी खाने को तैयार न था, कहता था कि वह तो ब्राह्मण है. अत: इस घर का कुछ न खाएगा. बच्चे ने बताया की वह तो शोभाराम त्यागी है.

पता चला कि उस ही दिन रात के 11 बजे शोभाराम त्यागी पुत्र शंकर लाल त्यागी नामक एक 22-23 वर्ष के युवा की मृत्यु बारात में जाते वक़्त तांगे से गिरकर हो गयी थी. उस शोभा राम त्यागी की आत्मा जसवीर के शरीर में प्रवेश कर गयी थी.

जिस शरीर को अभी तक जसवीर की आत्मा भोग रही थी, मरने के बाद जसवीर की आत्मा तो प्रस्थान कर गई. उसके स्थान पर शोभाराम त्यागी की आत्मा उस शरीर में आ गई, और अब उस शरीर का उपभोग शोभाराम त्यागी की आत्मा करेगी और किया.

तीन- इंग्लैंड की घटना:
लिवरपूल, इंग्लैंड में एक ऐसा केस सामने आया कि एक बच्चा पैदा हुआ और उसके हाथ पर उसके स्वर्गीय पिता का गोदने का निशान था. प्रिसीला और टेडी फ्रेंटम पति और पत्नी थे. टेडी वक्कुम क्लीनर के पार्ट्स बनाने वाली कंपनी में काम करता था. टेडी की उम्र जब 16 साल की थी तब उसने अपने हाथ पर गोदना गुदवाया था. जब टेडी 35 वर्ष का था तब उसकी पत्नी गर्भवती हुई. टेडी अपने बच्चे का मुँह देख पाता कि इससे एक महीने पहिले ही उसकी मृत्यु हो गयी.

डॉक्टर और मनोवैज्ञानिकों दोनों ने टेडी के नवजात बच्चे के हाथ के गोदने का परीक्षण किया. प्रिसीला का मानना था की उसका पति अपने बच्चे के रूप में पुन: आ गया है. यानि कि बच्चे के शरीर में पहिले कोई आत्मा थी, और टेडी की मृत्यु के बाद टेडी की आत्मा ने उस अजन्मे बच्चे के शरीर में प्रवेश कर लिया.

चार- भारत की घटना:
कैरल सन 1937 में एक उच्च सैनिक अधिकारी के रूप में ब्रिटन से भारत आए थे. उन्होनें अपनी पुस्तक में ज़िक्र किया है कि लगभग सन 1939 कि बात है वें असम-बर्मा सीमा पर कैंप में थे. उनका कैंप एक नदी के किनारे लगा था. ''एक दिन मैने टेलिस्कोप से देखा कि एक युवक की बही जा रही पहिले को, एक दुर्बल और बूढ़ा दाढ़ी वाला नदी से बाहर खींचने का प्रयास कर रहा है. मैंने इस घटना की ओर और साथी अधिकारिओं का ध्यान भी आकृष्ट किया. हम सबने अपनी-अपनी टेलिस्कोप से देखा कि वह बूढ़ा उस लाश को निकालकर एक पेड़ के पीछे ले गया. हम सब उत्सुकता से यह दृश्य देख रहे थे. कुछ क्षणों बाद हमारे आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब हमने पेड़ के पास जवान आदमी को चलते देखा.

हमने सिपाहियों को बुलाया और उस आदमी को पकड़ कर लाने को कहा. सिपाही उस युवक को पकड़ कर ले आए. मैने उस युवक से कहा, `सच-सच बताओ, तुम कौन हो? मैने अच्छी तरह देखा था कि तुम बहे जा रहे थे और दाढ़ी वाला बूढ़ा तुम्हारी लाश निकालने कि कौशिश कर रहा था. अब तुम जिंदा हो.’ इस पर उस युवक ने कहा कि वह वही बूढ़ा व्यक्ति है किंतु शरीर उस मृत्य युवक का है. उसने बताया कि वह योग साधना से शरीर परिवर्तन में निपुण है. जब भी उसका शरीर बूढ़ा हो जाता है तो वह ऐसा कर लेता है. कैरल ने उसकी बात पर यकीन नहीं किया. तो उसने कैरल से पेड़ के पास पड़े बूढ़े आदमी का शरीर मॅंगाकर देखने के लिए कहा. कैरल के कहने पर सैनिक पेड़ के पास से बूढ़े का मृत्य शरीर उठा लाए, जिसे देखकर सबके आश्चर्य का ठिकाना न रहा.

उस युवक की मृत्यु से पहिले युवक के उस शरीर को कोई दूसरी आत्मा भोग रही थी अब उसे इस बूढ़े की आत्मा इस्तेमाल करेगी.

पाँच- भारत की घटना:
32 वर्ष पूर्व प्रकाशित पुस्तक पूर्व जन्म की स्मृति में कैकई नन्दन सहाय की एक दिलचस्प घटना छपी थी और बताया कि उनके चचेरे भाई श्री नंदन सहाय को हैजा हो गया था. उस समय उनकी आयु 19 वर्ष की थी. उनकी मृत्यु हो गयी थी. मृत्यु के समय श्री नन्दन सहाय की पत्नी को दो मास का गर्भ था. पति की मृत्यु के बाद से ही पत्नी को ख़राब-ख़राब सपने आने शुरू हो गये. एक दिन सपने में पत्नी ने अपने मृत्य पति को देखा. वह कह रहे थे, `मैं तुम्हारे पास ही रहूँगा. तुम्हारे पेट से जन्म लूँगा. लेकिन तुम्हारा दूध नहीं पिऊंगा. मेरे लिये दूध का अलग से प्रबंध रखना. मेरी बात की सत्यता यह होगी कि जन्म से ही मेरे सिर पर चोट का निशान होगा.’

समय पर पुत्र ने जन्म लिया. बच्चे के सिर पर चोट का निशान था. बच्चा अपनी माँ का दूध नहीं पीता था. उसके लिये अलग से धाय रखी गई. धाय ही उसे दूध पिलाती थी.

बच्चा किसी और स्त्री का दूध तो पी लेता था किंतु अपनी पूर्व जन्म की पत्नी और इस जन्म की माँ का दूध न पिता था. माँ का दूध निकालकर चम्मच से पिलाने पर बच्चा वह दूध उलट देता था.

यानि कि दो माह तक गर्भस्थ शिशु में कोई अन्य आत्मा रही और श्री नंदन सहाय की मृत्यु के बाद वह आत्मा उस गर्भस्थ शिशु में आ गयी. अपनी पत्नी के प्रति अथाह प्रेम के कारण श्री नंदन सहाय ने अपनी पत्नी के गर्भ से अपने ही बालक के रूप में जन्म लिया.

छ: - भारत की घटना:
वेदांत के महान ज्ञाता अदिगुरु शंकराचार्य से महान मीमांसक मंडन मिश्र की धर्म पत्नी भारती ने शास्त्रार्थ किया और हारने लगी. भारती विदुषी थी. भारती ने सोचा की सन्यासी को कामकला का कुछ भी ज्ञान नहीं होता है. फिर अदिगुरु शंकराचार्य तो बालकपन में ही सन्यासी हो गये थे. अत: अदिगुरु शंकराचार्य को कामकला का बिल्कुल भी ज्ञान नहीं होना चाहिए. झट से भारती ने कामकला पर शास्त्रार्थ प्रारंभ कर दिया. तब अदिगुरु शंकराचार्य ने इसके लिए समय मांगा. भारती ने समय दे दिया. अदिगुरु शंकराचार्य ने एक मृत्य राजा की देह में प्रवेश करके कामकला का ज्ञान प्राप्त किया था और भारती को शास्त्रार्थ में पराजित किया था.

यानि की राजा के शरीर का उपभोग पहिले राजा ने किया और उनके मरने के बाद कुछ समय तक अदिगुरु शंकराचार्य ने किया.

सूक्ष्म शरीर जब स्थूल शरीर को छोड़कर गमन करता है तों उसके साथ अन्य सूक्ष्म परमाणु कहिए या कर्म भी गमन करते हैं जो उनके परिमाप के अनुसार अगले जन्म में रिफ्लेक्ट होते हैं, जैसे तिल, मस्सा, गोली का निशान, चाकू का निशान, आचार-विचार, संस्कार आदि.

मनुष्य की जिस वस्तु, जीव के प्रति आशक्ति होती है, उसके विछोह पर करूण रुदन करता है. सामान्य मनुष्य की सबसे अधिक प्रीति अपने शरीर के प्रति होती है. इसीलिए मृत्यु जैसी वेदना और किसी घटना में नहीं है. किंतु यह भी सत्य है कि स्थूल शरीर पॅकिंग है और उसमें विद्यमान सूक्षम शरीर उस पॅकिंग में वेष्ठित बहुमूल्य निधि.

इन घटनाओं से यह पता चलता है की एक शरीर का उपभोग एक से अधिक आत्माएँ कर सकती हैं. स्थूल शरीर को आत्माएँ किसी वस्त्र बदलने की तरह बदल देती हैं. इस स्थूल शरीर बदलने की क्रिया को ही जन्म-मरण या परकाया में प्रवेश कहा जाता है. संसारिक भाषा में हम आत्मा को सूक्ष्म शरीर कह सकते हैं.

सात - हॉलैंड की घटना:
एम्सटरडम के एक स्कूल में वहां के प्रिंसिपल की लड़की मितगोल के साथ हाला नाम की एक ग्रामीण लड़की की बड़ी मित्रता थी. हाला देखने में बड़ी सुंदर और मितगोल विद्वान् थी. वें प्राय: पिकनिक और पार्टियाँ साथ मनाया करती थी. एक बार दोनों सहेली एक साथ कार से जा रही थी. गंभीर दुर्घटना घट गयी. उनकी कार एक विशालकाय वृक्ष से जा टकराई. मितगोल को गंभीर चोटें आयी, उसका सम्पूर्ण शरीर क्षत-विक्षत हो गया और उसका प्राणांत हो गया. हाला को बाहर से तो कोई घाव नहीं थे किंतु अन्दर कहीं ऐसी चोट लगी की उसका भी प्राणांत हो गया. दोनों के शव कार से बाहर निकालकर रखे गए.

तभी एकाएक ऐसी घटना हुई कि जैसे किसी शक्ति ने मितगोल के प्राण हाला के शरीर में प्रविष्ट करा दिए हों. वह एकाएक उठ बैठी और प्रिंसिपल को पिता जी कहकर लिपटकर रोने लगी. सब आश्चर्यचकित थे कि हाला प्रिंसिपल साहब को अपना पिता कैसे कह रही है? उनकी पुत्री मितगोल का शरीर तो क्षत-विक्षत अवस्था में पड़ा हुआ है.

प्रिंसिपल साहब ने उसे जब हाला कहकर संबोधित किया तो उसने बताया कि पिता जी मैं हाला नहीं आपकी बेटी मितगोल हूँ. मैं अभी तक इस क्षत-विक्षत हो गए शरीर में थी. अभी-अभी किसी अज्ञात शक्ति ने मुझे हाला के शरीर में डाल दिया है.

हर तरह से परीक्षण किए गए और पाया गया कि सच में ही मितगोल के प्राण हाला के शरीर में आ गए हैं. इस प्रकार शरीर परिवर्तन की यह अनोखी घटना घटी.

आठ - भारत की घटना:
लोग समझते हैं कि चंद्रगुप्त मौर्य ने सम्राट महापद्म यानि कि घनान्द को जीता था. जी नहीं ऐसा नहीं हुआ था. सम्राट घनान्द तो एक नैतिक और बहुत बलशाली सम्राट था. सम्राट घनान्द के भय से तो सिकन्दर सिंधु नदी को पार करने का भी साहस न जुटा सका था और वापिस लौट गया था. महापद्म नन्द की मृत्यु के बाद उस शरीर में दूसरी आत्मा ने प्रवेश कर लिया था. कौन थी वह आत्मा? पढ़े इसका ब्यौरा `किस्से जगदीश के' में...?

निष्कर्ष:
इन घटनाओं से पता चलता है कि स्थूल और सूक्षम शरीर अलग-अलग हैं. स्थूल शरीर की भूमिका पॅकिंग भर की है. और सूक्षम शरीर की भूमिका शक्ति की है. एक स्थूल शरीर को दो भिन्न-भिन्न प्राण या कि आत्मा इस्तेमाल कर सकती हैं. किंतु उसे रहना वहीं होगा जहाँ का पॅकिंग है. जैसे शोभाराम त्यागी की आत्मा और शरीर जसवीर के शरीर का, त्यागी को जसवीर की जिंदगी जीनी पड़ी.

अदिगुरु शंकराचार्य ने राजा के शरीर में प्रवेश करके राजा की जिंदगी जी.

प्रत्येक घटना में शेष जीवन शरीर के अनुसार स्थान पर जीना पड़ा. किंतु यदि कोई आत्मा लावारिस लाश में प्रवेश करती है तो उसे कौनसी जिंदगी ज़ीनी होगी यह परिस्थितियों पर निर्भर करेगा.

इससे यह सिद्ध होता है कि एक स्थूल शरीर का उपभोग दो प्राण यानि कि आत्माएँ कर सकती हैं. परकाया प्रवेश एक विद्या है. सिद्ध योगी अपनी इच्छा के अनुसार अपना शरीर बदल सकते हैं. कई बार परकाया प्रवेश अनायास ही हो जाता है. इसके कौन कारण हैं, यह अभी तक अज्ञात है.......?

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जेनेटिक मैपिंग से इलाज

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वैज्ञानिकों ने इंसानी डीएनए में ऐसे 100 जगह ढूंढ निकाले हैं जिनके कारण व्यक्ति में शिजोफ्रेनिया जैसी बीमारी पैदा हो सकती है. इससे बीमारी के कारणों से पर्दा उठा.इस तरह की जेनेटिक मैपिंग से नए इलाज की संभावनाएं पैदा होती हैं. हालांकि उनमें भी अभी कई साल लग जाएंगे. लेकिन नए नतीजों से ठोस आनुवंशिक सबूत मिले हैं जो इस थ्योरी को पक्का करते हैं कि प्रतिरोधक प्रणाली और इस बीमारी के बीच कैसा जुड़ाव है.
शिजोफ्रेनिककी जेनेटिक मैपिंग में दुनिया भर से 100 वैज्ञानिकों ने हिस्सा लिया. इस सबसे बड़े शोध से पहले वैज्ञानिकों को सिर्फ कुछ हिस्से पता थे, जो जेनेटिक कारणों की ओर इशारा करते थे.
जेनेटिक मैपिंग से मदद की उम्मीद
शोध में डेढ़ लाख से ज्यादा लोगों के आनुवंशिक कोड देखे गए और इनमें से 37,000 को ये बीमारी होने की आशंका थी. शोधकर्ताओं ने डीएनए में 180 मार्कर ढूंढ निकाले, जिनमें से 83 ताजा शोध में पता लगे हैं. वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि और मार्कर पता चल सकते हैं.
शोध के सह लेखक स्टीव मैककैरल हार्वर्ड और एमआईटी में जेनेटिक संस्थान के निदेशक हैं, "यह आनुवंशिक पर्दाफाश है, शिजोफ्रेनिया एक तरह का रहस्य ही था. इस तरह के नतीजे आपको काम देते हैं. इनसे वो जीन सामने आते हैं तो बीमारी का कारण हैं. " नेचर नाम की पत्रिका में ये शोध छापा गया है. इसे एक अहम शोध बताया जा रहा है.
शिजोफ्रेनिया ऐसी मानसिक बीमारी है जिससे सच और कल्पना में अंतर मुश्किल हो जाता है. एक फीसदी आबादी को यह बीमारी है. वैज्ञानिक वैसे तो लंबे समय से ये जानते थे कि जीन्स में गड़बड़ी ही इस बीमारी का कारण है लेकिन उन्हें बड़ा और अहम ठोस सबूत अब मिला है.
शोध के लेखक डॉक्टर माइकल ओ'डोनोवैन ने इस शोध को बीमारी का इलाज ढूंढने में बड़ा कदम बताया है. हालांकि डोनोवैन यह भी कहते हैं कि ये मैप आपको ये तो बताता है कि कहां शुरू करना है लेकिन ये नहीं कि शोध खत्म कहां किया जाए.
इस शोध से यह भी साफ हुआ है कि प्रतिरोधक प्रणाली में शुरू होने वाली गड़बड़ी के कारण ये बीमारी होती है. ओ'डोनोवैन का यह ही कहना था कि अधिकतर व्यक्तियों में कम से कम 20 से 30 जीन ऐसे होते हैं जिनके कारण शिजोफ्रेनिया हो सकता है. भले ही इस जीन्स वाला व्यक्ति खुद इस बीमारी से पीड़ित नहीं हो.
एएम/एजेए (एपी) sabhar :http://www.dw.de/

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ALIENS के अस्तित्व को लेकर वैज्ञानिक कर रहे माथापच्ची

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ALIENS के अस्तित्व को लेकर वैज्ञानिक कर रहे माथापच्ची, जानने के लिए पढ़ें

एलियन यानी ऐसे जीव जो पृथ्वी के बाहर किसी दूसरे ग्रह पर रहते हों। पर एलियन होते भी हैं या नहीं, यह एक बड़ा सवाल है। एलियंस की मौजूदगी पर दशकों से रिसर्च होती रही हैं, लेकिन अब तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि एलियंस हैं भी या नहीं। यदि हैं तो वे कहां रहते हैं? वे तकनीकी रूप से कितने सक्षम हैं?
ऐसे सवालों के जवाब पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों के लिए चुनौती है। किसी दूसरे ग्रह पर जीवन की तलाश पिछले छह दशकों से तो बेहद तेज हो गई है। इस बारे में कई ठोस सबूत तो मिले हैं, लेकिन अब तक कुछ स्पष्ट नहीं हो पाया है। 

कई जगह है मौजूदगी की उम्मीद

केवल मंगल ग्रह ही ऐसा नहीं है, जहां एक्स्ट्राटेरेस्ट्रियल लाइफ (यानी दूसरे ग्रह पर जीवन) की संभावना हो। हमारे सौरमंडल में कई ऐसे स्थल हैं, जो रहने योग्य हो सकते हैं। इनमें जूपिटर और शनि के बर्फीले चंद्रमा, यूरोपा आदि शामिल हैं, जहां पर जीवन का समर्थन करने में सक्षम सर्फेस ओशियन्स मौजूद हो सकते हैं। वैसे वैज्ञानिकों के अनुसार हमारे सौरमंडल में शनि ग्रह का चंद्रमा टाइटन और सोलर सिस्टम से बाहर का ग्रह ‘ग्लीज 581जी’ में जीवन होने की सबसे अधिक संभावना है। ये दोनों पृथ्वी से 20.5 प्रकाश वर्ष की दूरी पर हैं। एक प्रकाश वर्ष में करीब 10 खरब किलोमीटर होते हैं। 
पृथ्वी जैसी तलाश
एलियन्स की खोज के लिए वैज्ञानिकों ने अपनी प्राथमिकता एक ऐसा ग्रह खोजने की रखी है, जहां पृथ्वी जैसी परिस्थितियां हों। वैज्ञानिकों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने पृथ्वी जैसे ग्रह की तलाश के लिए दो तरह की सूची भी तैयार की है।
इनमें एक का नाम अर्थ सिमिलरटी इंडेक्स और दूसरी सूची का नाम प्लैनेटरी हैबिटैबिलिटी इंडेक्स है। इसमें उन ग्रहों या चंद्रमाओं का नाम है, जिनकी परिस्थितियां पृथ्वी जैसी होने की संभावना है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि पिछले करीब पांच-सात वर्ष में ऐसे ग्रहों की तलाश में तेजी आई है, जहां पर जीवन होने की संभावना अधिक हो सकती है। नासा ने वर्ष 2009 में केप्लर स्पेस टेलिस्कोप अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित किया था। इस टेलिस्कोप ने हजारों ऐसे ग्रहों या चंद्रमाओं का पता लगाया है, जहां जीवन पनपने की संभावना है। 
पिछले वर्ष 4 नवंबर को नासा ने बताया कि केप्लर स्पेस क्राफ्ट ने 104 ऐसे ग्रह खोजे हैं, जहां लाइफ सपोर्ट करने की परिस्थितियां हैं। 
 होंगे तो कैसे होंगे?

कई हॉलीवुड और बॉलीवुड मूवीज में एलियन को करीब-करीब इंसान के जैसा ही दिखाया गया है, जबकि वैज्ञानिकों का एक धड़ा ऐसा भी है जो यह कहता है कि एलियन्स यदि हैं तो वे बॉयोलॉजिकल नहीं, बल्कि आर्टिफिशियल होंगे। यानी उनके हाथ-पैर और सिर हों, ये जरूरी नहीं है। 

क्या है उनका धर्म?

क्या एलियन मनुष्य की तरह भगवान में विश्वास करते होंगे? इस सवाल पर ब्रिटेन के जाने-माने एथोलॉजिस्ट और इवोल्यूशनरी बायोलॉजिस्ट रिचर्ड डॉवकिन्स कहते हैं कि एलियन्स की सिविलाइजेशन हमसे बेहद एडवांस होगी और वे किसी भी धर्म को नहीं मानने वाले होंगे। 

कैसे हो पाएगी खोज?
वैज्ञानिकों का कहना है कि तकनीक बेहतर होने से यह उम्मीद है कि 20 से 25 वर्ष में इस दिशा में कुछ बेहतर परिणाम मिल सके। अब ऐसे टेलिस्कोप भी बन रहे हैं, जिनमें ऐसी क्षमता है कि वह किसी ग्रह में जैविक पदार्थो से निकलने वाली रोशनी को पहचान सके। उदाहरण के तौर पर क्लोरोफिल की उपस्थिति, जो किसी भी पेड़-पौधे में मौजूद अहम तत्व होता है।
20वीं शताब्दी के मध्य से एलियंस और दूसरे ग्रहों पर जीवन को लेकर रिसर्च किया जा रहा है। इसमें रेडियो से एक्स्ट्राटेरेस्ट्रियल लाइफ के सिग्नल खोजने से लेकर टेलिस्कोप की मदद से एक्स्ट्रासोलर प्लैनेट खोजने तक की मुहिम शामिल है। फिर भी कुछ स्पष्ट पता नहीं चल पाया है। 

80 के करीब प्रजातियां हो सकती हैं एलियंस की। कैनेडा के पूर्व रक्षा मंत्री पॉल हेलेयर ने पिछले वर्ष एक इंटरव्यू में कई रिपोर्ट के हवाले से यह दावा किया था। एक्स्ट्राटेरेस्ट्रियल लाइफ के जानकार पॉल ने कहा कि वे दिखने में हमारे जैसे ही हो सकते हैं। 

40 फीसदी से ज्यादा लोग भारत और चीन में मानते हैं कि एलियंस पृथ्वी पर मनुष्य के भेष में घूमते हैं और वे हमारे ही बीच हैं। यह बात रायटर्स के एक सर्वे में सामने आई थी। वैश्विक स्तर पर 20 फीसदी लोग मानते हैं कि एलियंस हमारे ही बीच हैं।

2010 में जाने-माने वैज्ञानिक स्टीवन हॉकिंग ने भी एलियंस और दूसरे ग्रहों पर जीवन होने की बात खुले रूप से स्वीकारी। उन्होंने कहा कि ब्रह्मांड के दूसरे ग्रहों पर प्राणी हैं। संभव है कि वे संसाधनों की तलाश में पृथ्वी पर हमला करें और हमसे आगे बढ़ जाएं।

दूसरे ग्रह पर जीवन की तलाश में अब तक कई मिशन चलाए जा चुके हैं। कुछ प्रमुख के बारे में जानें। 

वाइजर 1-2: नासा ने इस प्रोग्राम की शुरुआत 1970 के दशक में की थी। इसके तहत नासा ने वाइजर-1 और वाइजर-2 स्पेसक्राफ्ट लॉन्च किए थे। इनका उद्देश्य आउटर सोलर सिस्टम का पता लगाना था। 

हबल स्पेस टेलिस्कोप: हबल स्पेस टेलिस्कोप को वर्ष 1990 में स्पेस शटल की मदद से धरती की कक्षा में स्थापित किया गया था। यह अभी ऑपरेशन में है। यह गहन अंतरिक्ष से तस्वीरें भेज रहा है, जिसमें कोई बैकग्राउंड लाइट नहीं है।

कैसिनी: 16 यूरोपियन यूनियन देशों और अमेरिका ने शनि पर खोज करने के लिए कैसिनी-ह्यूजेन्स नाम के स्पेसक्राफ्ट को वर्ष 1997 में लॉन्च किया। इसमें ऑर्बिटर और एटमॉस्फेरिक प्रॉब भी है।

कोरोट मिशन: यह मिशन वर्ष 2006 में फ्रेंच और यूरोपियन स्पेस एजेंसियों के साथ विश्व के कई देशों ने चलाया था। इसका उद्देश्य सोलर सिस्टम के बाहर ग्रहों और तारों का पता लगाना था। यह मिशन 2015 तक चलेगा।

द केप्लर मिशन: वर्ष 2009 में नासा ने एक स्पेस ऑब्जरवेटरी लॉन्च की। इससे कई ग्रहों की खोज हो सकी। इसके बाद मार्स मिशन भी दूसरे ग्रह पर जीवन खोजने का ही एक हिस्सा है, जिससे काफी कुछ पता चला है। 
कंटेंट- शादाब समी sabhar :http://www.bhaskar.com/

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शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

सड़कों पर तेज दौड़ने वाली यह है भविष्य की ट्राम, देखिए तस्वीरें

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सड़कों पर तेज दौड़ने वाली यह है भविष्य की ट्राम, देखिए तस्वीरें

इंटरनेशनल डेस्क। रूस का ये नया ट्राम किसी साइंस फिक्शन मूवी से कम नहीं है। इस अति आकर्षक ट्राम को रूसी कंपनी यूवीजेड ने डिजाइन किया है। एलेक्सी मास्लोव Alexei Maslov इसके डिजाइनर हैं। इसे रशिया वन या आर1 नाम दिया गया है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, यूवीजेड ने इस खूबसूरत ट्राम को अगले 20-50 साल को ध्यान में रख कर डिजाइन किया है। 
 
एडवांस तकनीक और कम्पोजिट मैटीरियल के इस्तेमाल के चलते आर 1 के हर पैनल बड़ी आसानी से बदला जा सकेगा। वहीं, ट्राम की नुकीली नाक ड्राइवर को बेहतर व्यू देगी, जिससे पदयात्रियों से भिड़ने की संभावना न के बराबर रहेगी।
 
बैटमोबाइल (कॉमिक सुपरहीरो बैटमैन द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला कार) सरीखा दिखने वाला ये ट्राम जितना एडवांस्ड बाहर से दिखता है, उतना ही हाईटेक अंदर से भी है। वाई-फाई, जीपीएस और कमाल की एलईडी लाइटिंग इसके इंटीरियर को ​चार-चांद लगाती हैं। एलईडी लाइटिंग की खासियत है कि ये मौसम के हिसाब से रोशनी देती है।
 
ये भी खास

डायनैमिक एलईडी लाइटिंग के अलावा एयर कंडीशन, एंटी बैक्टीरियल हैंड रेलिंग के अलावा मोबाइल चार्ज करने के लिए यूएसबी 3.0 पोर्ट सरीखी सुविधा भी है। वैसे, आर 1 महज एक कॉन्सेप्ट है। हालांकि, कंपनी ने इसे 2015 तक रूसी पटरियों पर उतारने की योजना बनाई है।

सड़कों पर तेज दौड़ने वाली यह है भविष्य की ट्राम, देखिए तस्वीरें

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भगवान श्रीकृष्ण ने क्यों कहा है कि 'हर वस्तु में होता है आश्चर्य'

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स्वामी सुखबोधानंद
'भारतीय दर्शन कहता है कि सफलता ही सब कुछ नहीं है बल्कि व्यक्ति को संतुष्टि भी चाहिए। सफलता के बावजूद जीवन में असफलता का एहसास बना रहेगा क्योंकि जीवन में संतुष्टि से ही आनंद आता है।'
हम जो भी करते हैं वह क्रिया होना चाहिए, उसमें किसी काम को करने की इच्छा झलकनी चाहिए। अगर हम कोई काम प्रतिक्रिया स्वरूप करते हैं तो जीवन को नरक बना लेते हैं। छोटा सा उदाहरण देखिए, हम गुड इवनिंग क्यों कहते हैं? इसलिए कि आते-जाते हम मिलते हैं तो एकदूसरे का अभिवादन करते हैं। तो क्या यह औपचारिक है? शायद नहीं, क्योंकि इसका मतलब होता है।
मतलब है कि यह शाम सुंदर है और अगर सुंदर नहीं है तो हम इसे सुंदर बना सकते हैं। लेकिन अगर हम शब्दों के बारे में सोचते नहीं हैं और उन्हें बस यंत्रवत उच्चारते जाते हैं तो जीवन में आश्चर्य और आनंद नहीं रहता। हम बस गुड इवनिंग, गुड मार्निंग कहते हैं लेकिन हमारा आशय सुबह-शाम को सुंदर बनाने का नहीं होता। तब हम सुबह-शाम को महसूस नहीं कर रहे हैं। हम प्रतिक्रिया स्वरूप गुड मार्निंग कह रहे हैं लेकिन गुड मार्निंग का अर्थ हमें पता नहीं है। इस तरह के यंत्रवत जीवन में हमें कभी भी आश्चर्य की अनुभूति नहीं हो सकती है।
जीवन में अगर आनंद पाना है तो सावधान भाव से, जागरूक भाव से, चैतन्य भाव से चीजों को ग्रहण करना होगा, तो ही जीवन की उन्नति होगी। हर छोटी चीजों में आनंद को महसूस करना होगा, अनुभव करना होगा। अनुभव से ही ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है। कभी विचार किया आपने कि हमारे देश में तलाक की दर सबसे ज्यादा किस प्रोफेशन के लोगों में है। मैं बताता हूं, तलाक की सबसे ज्यादा दर सॉफ्टवेयर इंजीनियरों में है और सबसे कम है मार्केटिंग क्षेत्र में कार्यरत प्रोफेशनल में। इसकी वजह भी है।
देखिए, मार्केटिंग के लोगों को आदत रहती कि कोई भी प्रॉडक्ट 16-18 बार जब तक रिजेक्ट न हो उसे स्वीकार नहीं किया जाएगा। मार्केटिंग वाले हर बार अस्वीकार किए जाने पर अपना कार्ड आगे बढ़ा देते हैं, कि सर जब भी जरूरत हो तब याद कीजिएगा।
जीवन में जब पत्नी से विवाद होता है तो यह अनुभव काम आता है और हर बार बात बिगड़ने से बच जाती है। लेकिन जब सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल्स के बीच झगड़ा होता है तो वे इंटरनेट पर नए विकल्प सर्च करने लगते हैं। इस उदाहरण को सच मानिए या कल्पना जो भी, लेकिन सीख यही है कि हम अपने अनुभवों से ही समृद्ध होते हैं। अनुभव ही हमारे जीवन का अर्थ है।
जीवन एक आश्चर्य है। लेकिन बहुत सारे लोग जीवन के आश्चर्य का आनंद ही नहीं उठाते। जब हम अनुभव नहीं करते तो हम किसी भी चीज का आनंद नहीं ले पाते हैं। किसी को नियाग्रा फाल भेजिए और अगर वह अनुभव नहीं करता तो कहेगा अरे मेरे गांव में पानी नहीं है और यहां पानी बरबाद हो रहा है।
जीवन में अगर अनुभव नहीं है तो जीवन यंत्रवत है। यंत्रवत जीवन में ही तनाव नजर आता है। प्रसन्न्ता का अभाव वहीं है जहां जीवन यंत्रवत हो गया है और उसमें अनुभव के लिए जगह नहीं बची है। चीजों को समझने में जानकारी (नॉलेज) आपकी मदद नहीं कर सकती है बल्कि आपका ज्ञान (अनुभव) ही मदद कर सकता है।
भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्‌गीता में कहा 'हर चीज में आश्चर्य है।' लेकिन तभी, जब हम आश्चर्य का अनुभव करें। अपने दिल को खोलकर रहो तो हर पल आनंद है। जब सूर्य उगता है तो आश्चर्य है, फूल खिलना आश्चर्य है, बारिश आश्चर्य है। हर छोटी-छोटी घटना में आश्चर्य और आनंद है। चीजों को समझने से आश्चर्य है और न समझो तो भी आश्चर्य है!
कई बार जब मैं युवाओं से बात करता हूं तो उन्हें मर्लिन मुनरो का उदाहरण देता हूं। बताता हूं कि किस तरह जीवन में बाह्य सफलता के साथ आंतरिक प्रसन्न्ता भी महत्व रखती है। मर्लिन मुनरो हॉलीवुड की सबसे सुंदर नायिका थी। उसके पास बहुत पैसा था और उसके कई प्रेम प्रसंग भी थे, लेकिन उसने आत्महत्या कर ली। तो जीवन में सफलता सबकुछ नहीं है।
वह जीवन की परिपूर्णता नहीं है। सफलता के बावजूद भी जीवन में असफलता का एहसास बना रहेगा। भारतीय दर्शन यही कहता है कि सफलता ही सब कुछ नहीं है बल्कि आपको संतुष्टि भी चाहिए। संसार में बाहरी जीत सफलता है लेकिन आंतरिक जीत संतुष्टि है। इसलिए जीवन का लक्ष्य पता होना चाहिए।
पता होना चाहिए कि हम क्या पाना चाहते है। सफलता और संतुष्टि के बीच संतुलन साधना हर किसी को आना चाहिए। यह आ गया तो ही जीवन सुंदर है।

( स्वामी जी के व्याख्यान पर आधारित) sabhar :http://naidunia.jagran.com/

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गुरुवार, 24 जुलाई 2014

बलात्कारी को जलाने वाली ब्रा

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भारत के कुछ युवा इंजीनियरों ने मिलकर ऐसी इलेक्ट्रिक ब्रा तैयार की है जो बलात्कार जैसी घटनाओं में सुरक्षा कवच की तरह काम करेगी. ब्रा को सोसाइटी हार्नेसिंग एक्विप्मेंट 'शी' नाम दिया गया है.
दिसंबर 2012 में दिल्ली में एक छात्रा के साथ हुए बलात्कार कांड ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान अपनी ओर खींचा. महिलाओं, छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं समेत हजारों लोगों ने सड़कों पर प्रदर्शन किया. इस हादसे के बाद ही बलात्कार के मामलों में कानूनों को सख्त किया गया. लेकिन इस तरह की घटनाएं थमी नहीं हैं. इस पूरे दौर ने 22 साल की इंजीनियरिंग की छात्रा मनीषा मोहन को भी प्रभावित किया जिन्होंने इलेक्ट्रिक ब्रा तैयार करने का फैसला किया.
मनीषा और उनके दो साथियों ने इस बारे में सर्वे किया और इलेक्ट्रिक शॉक देने वाली शी ब्रा तैयार करने से पहले कई और मॉडल बनाने कोशिश की. उन्होंने डॉयचे वेले को बताया कि उनके इस काम के लिए उन्हें अंतर्राष्ट्रीय प्रोत्साहन मिल रहा है.
जला सकती है 'शी'
ब्रा में दबाव के खिलाफ सेंसर लगे हैं. ये इलेक्ट्रिक सर्किट से जुड़े हुए हैं जो 3,800 किलो वॉट तक का इलेक्ट्रिक शॉक दे सकता है. यह इतना ज्यादा है कि जबरदस्ती करने वाला जल भी सकता है. इसके प्रेशर सेंसर जैसे ही क्रियाशील होते हैं और ब्रा में लगा जीपीएस पुलिस को भी खबर कर देता है.
मनीषा ने बताया, "ब्रा में इलेक्ट्रॉनिक सर्किट कपड़े की दो पर्तों के बीच लगा है, यह वॉटरप्रूफ है." तकनीक बेहद आसान है, प्रेशर सेंसर किसी भी तरह की छीना झपटी या दबाव पर प्रतिक्रिया देते हैं. ब्रा में एक स्विच भी है जिसे किसी ऐसी जगह चालू किया जा सकता है जहां खतरे का अंदेशा हो.
सुरक्षित और आरामदेह
जिन महिलाओं ने इसे ट्रायल के दौरान पहन कर देखा है उनके मुताबिक यह आरामदेह है. नई दिल्ली की एक कॉलेज छात्रा रेवती ने डॉयचे वेले से कहा, "मेरे ख्याल में यह ब्रा बेहद मददगार साबित होगी. इससे बड़े शहरों में महिलाएं और लड़कियां देर रात आत्मविश्वास के साथ बाहर निकल सकेंगी."
मनीषा बताती हैं कि ब्रा कागज की तरह पतली है, यह पहनने में आसान होगी और पसंद भी की जाएगी. मनीषा को भारत के प्रतिष्ठित इनोवेशन स्कॉलर्स इन रेसिडेंस कार्यक्रम के लिए चुना गया है. इस कार्यक्रम की मेजबानी राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा राष्ट्रपति भवन में 20 दिनों तक चलेगी. यह कार्यक्रम प्रतिभाशाली छात्रों के लिए अपनी प्रतिभा दिखाने का अच्छा अवसर होता है.
अपराध के ताजा राष्ट्रीय आंकड़ों के मुताबिक 2013 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 309,546 मामले दर्ज हुए. जबकि 2012 में 244,270 मामले दर्ज हुए थे. इलेक्ट्रिक ब्रा या इस जैसे दूसरे उपायों से भारत के ग्रामीण इलाकों में ऐसे मामलों को रोकने में तो मदद की उम्मीद नहीं है, लेकिन सुरक्षा के लिए इस तरह के कदम अहम हैं. ब्रा बाजार में आने से पहले तैयारी के अंतिम चरण में है. मनीषा कहती हैं कि ब्रा बहुत जल्द बाजार में उपलब्ध होगी.
रिपोर्ट: मुरली कृष्णन/एसएफ
संपादन: महेश झा sabhar :http://www.dw.de/

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घटती आबादी का जवाब रोबोट

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बाल धोने से लेकर पैर दबाने तक, घर का काम से लेकर अंतरिक्ष को मापने तक, जापान में रोबोट अब आम जिंदगी का हिस्सा बनने लगे हैं. अब जल्द ही वहां की बूढ़ी होती जनसंख्या की देखभाल रोबोट करेंगे.
बोलने वाला रोबोट किरोबो
एक नए शोध में जापान के स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि नर्सिंग सेक्टर में करीब दो करोड़ लोगों की जरूरत होगी क्योंकि जापान के लोग बूढ़े हो रहे हैं. 2012 में इस सेक्टर में काम कर रहे लोगों की संख्या करीब 1.5 करोड़ थी.
देखभाल और नर्सिंग जैसे कामों को कम लोग पसंद करते हैं क्योंकि यह मेहनत का काम है. अकसर कर्मचारी इस तरह के कामों को छोड़ देते हैं क्योंकि बड़े बूढ़ों को उठाने और उनकी मदद करने में वे खुद बीमार हो जाते हैं. साथ ही जापान में कम बच्चे पैदा हो रहे हैं और बेहतर स्वास्थ्य की वजह से लोगों की उम्र बढ़ रही है. इस संकट को टालने के लिए जापान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक स्कीम तैयार की है जिसमें बड़े बूढ़ों की मदद के लिए रोबोट लगाए जाएंगे.
केयर होम में मदद
नवंबर में 15 कंपनियों के इंजीनियरों और एक्सपर्टों ने 10 नर्सिंग होम में प्रयोग किए. इनके मालिकों से रोबोट में निवेश करने को कहा गया. होकाईडो बुंकयो विश्वविद्यालय के माकोतो वातानाबे ने कहा, "यह बात साफ है कि आने वाले सालों में कर्मचारियों की कमी होगी और यह एक अच्छा जवाब है, खास कर ऐसे वक्त में जब जापान को आर्थिक परेशानियां हो रही हैं."
अस्पताल के लिए

लेकिन वातानाबे कहते हैं कि यह बहुत हैरानी वाली बात नहीं कि रोबोट अब नर्सिंग में भी आ गए हैं क्योंकि जापानी 1970 की दशक में कार बनाने में रोबोट का इस्तेमाल कर चुके हैं, "अब जापान इस सेक्टर में भी रोबोट को लगाने में पहले नंबर पर है." जापान में खास बूढ़े लोगों को ध्यान में रख कर रोबोट बनाए जा रहे हैं.
कम्यूनिकेशंस एंड्रॉयड
मिसाल के तौर पर होस्पी रीमो जिसे इस वक्त बनाया जा रहा है. यह उन लोगों के लिए है जो बिस्तर से हिल नहीं सकते. इनमें और डॉक्टरों के बीच संपर्क में होस्पी रीमो मदद कर सकता है. एंड्रॉयड रोबोट के चेहरे का भाव खुश करने वाला होता है. वह खुद चल फिर सकता है और वह हाई डेफनिशन तस्वीरों के जरिए संपर्क करता है.
पैनासोनिक ने इस बीच एक ऐसे रोबोट का आविष्कार किया है जो लोगों के बाल धोता है. हेडकेयर रोबोट के हाथों में 24 अंगुलियां हैं और वह बिलकुल मनुष्य की तरह बालों को धो सकता है. शैंपू लगाने से पहले रोबोट के दो हाथ मनुष्यों के सर को नापते हैं और तय करते हैं कि सर के कौन से हिस्से में कितना दबाव डालना है.
जापानी डॉक्टरों ने ऐसा सूट भी बनाया है जिससे कमजोर से कमजोर मरीज भी चल फिर सकता है. इस रोबोट को कपड़े की तरह पहना जा सकता है. वैसे तो इस रोबोट सूट का आविष्कार जापान के किसानों के लिए किया गया लेकिन अब बूढ़े और कमजोर लोग भी इसका इस्तेमाल कर सकते हैं. इस सूट में जोड़ों की जगह खास मोटर लगे हैं. पीठ, घुटनों और कंधों पर लगे मोटरों से मरीज को ताकत मिलती है. रोबोट सूट का वजन करीब 25 किलो है जो एक कमजोर मरीज के लिए काफी भारी हो सकता है लेकिन वैज्ञानिक इसका वजन कम करके दो साल में इसे बाजार में लाना चाहते हैं. इस वक्त एक सूट का दाम करीब 7,000 डॉलर है लेकिन वैज्ञानिक इसे कम करके 2,000 डॉलर तक लाना चाहते हैं.
बेबी रोबोट नोबी से वैज्ञानिक बच्चों पर और शोध कर सकेंगे

हर काम के लिए रोबोट
सेहत ही नहीं, बल्कि अंतरिक्ष में भी रोबोट काम आते हैं. अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन आईएसएस में 13 इंच का रोबोट जापानी एस्ट्रोनॉट कोइची वाकाता का साथ देते हैं. फुकुशिमा दाइची परमाणु प्लांट में रोबोट रेडियोधर्मी इलाकों में जाकर वहां की तस्वीरें वैज्ञानिकों को भेजते हैं. जापान में कला में भी रोबोट दिख रहे हैं. जापानी नाटककार ओरीजा हिराता ने आंटोन चेकोव के नाटक "तीन बहनें" में एक रोबोट से एक्टिंग कराई थी. एनईसी कॉर्प ने कहा है कि वह जल्द ही घर में इस्तेमाल किया जाने वाला रोबोट ला रहा है जिसमें कैमरा, माइक और सेंसर होगा और जो लोगों से बात कर सकेगा.
बूढ़े लोगों के लिए शायद आराम हो लेकिन टोकिया के मेइजी गाक्विन विश्वविद्यालय में पढ़ा रहे टॉम गिल कहते हैं कि उन्हें यह बात परेशान करती है कि आदमी की जगह रोबोट बुढ़ापे में उनका ख्याल रखेंगे, "मुझे यह दुखी और अकेला सा कर देता है."
रिपोर्टः जूलियन रायल/एमजी
संपादनः ए जमाल

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योगी के साथ योग जारी रहेगा

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अच्छे खेल के साथ योग ने भी विश्व कप जीतने में जर्मन टीम की मदद की. टीम हर दिन समुद्र के किनारे योगाभ्यास करती थी. योगी के नाम से मशहूर कोच योआखिम लोएव की टीम आगे भी ऐसा करती रहेगी.
 
"मैं इस वक्त किसी ऐसे काम के बारे में नहीं सोच सकता जो मेरे अभी के काम से अच्छा हो." लोएव टीम को 2016 के यूरोकप के लिए भी ट्रेन करेंगे और टीम और खिलाड़ियों पर काम करते रहेंगे.
लोएव ने पिछले साल ही जर्मन फुटबॉल संघ डीएफबी के साथ अपना करार 2016 तक बढ़ाया था. लेकिन मीडिया में इस तरह की अफवाहें उड़ रही थीं कि लोएव टीम को छोड़ना चाहते हैं. लेकिन कोच ने खुद इन अफवाहों को गलत बताया, "मैंने तो इसके बारे में एक पल भी नहीं सोचा. मैं तो सिर्फ वही कर रहा हूं जिसको लेकर विश्व कप से पहले बात हुई थी, कि हम मैच के बाद टूर्नामेंट का विश्लेषण करेंगे."
वर्ल्ड कप विजेता टीम का सफर बर्लिन के मशहूर ब्रांडेनबुर्ग गेट पर आकर थमा. विशाल मंच पर कोच समेत पूरी टीम आई. खिलाड़ियों ने एक एक ट्रॉफी उठाई और मुग्ध दर्शकों के साथ झूमने लगे.

लोएव कहते हैं कि विश्व कप के दौरान कई चीजें बदल जाती हैं और इसके बाद उन्हें थोड़ा वक्त चाहिए था ताकि वह अपनी भावनाओं को काबू में कर सकें और आगे के बारे में सोचें. 54 साल के योआखिम लोएव को जर्मन प्यार से योगी लोएव कहते हैं. 2006 में उन्होंने अपने बॉस यूर्गेन क्लिन्समान के जाने के बाद टीम की कमान संभाली. उनके आने के बाद टीम 2010 में सेमी फाइनल तक पहुंची और इस बार कप ही अपने नाम कर गई.
1990 के बाद पहली बार जर्मन टीम ने इस साल विश्व कप जीता है. लेकिन योगी के साथ योग ने भी टीम को सबसे ऊपर पहुंचाने में मदद की है. योगा कोच पैट्रिक ब्रूमे हर दिन टीम को ब्राजील के समुद्री तट पर योग कराते थे. ब्रूमे के मुताबिक, "खास तौर से कमर, पैरों और जांघ के लिए योग कराया जाता था." और तो और फाइनल से पहले एक ऐसा खिलाड़ी था जो योग करके अपने शरीर को स्ट्रेच करना चाहता था. ब्रूमे एक मनौवैज्ञानिक हैं जो जीवमुक्ति नाम का योग कराते हैं. इससे शरीर लचीला रहता है और इसमें कई मॉडर्न व्यायाम भी मिलाए गए हैं. इस बार टीम में योग की सफलता को देखते हुए लग रहा है कि यह आने वाले दिनों में भी योग टीम की ट्रेनिंग का हिस्सा रहेगा.
ब्रूमे कहते हैं कि योग ऐसे कई व्यायामों और कार्यक्रमों का हिस्सा है जो फुटबॉल खिलाड़ी अपनी ट्रेनिंग के दौरान करते हैं. जर्मनी की टीम में मुख्य कोच लोएव के अलावा उनका एक सहायक होता है जो इस वक्त हंस डीटर फ्लिक हैं. टीम के मैनेजर हैं ऑलिवर बीयरहोफ और खास गोलकीपर के ट्रेनर हैं आंद्रेआस कोएपके. इसके अलावा कई लोग हैं जो आयोजन और टीम की देख रेख के लिए टीम के साथ जाते हैं.
एमजी/ओएसजे(डीपीए) sabhar :http://www.dw.de/

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एचआईवी के इलाज में एक नया कदम

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एचआईवी वायरस

वैज्ञानिकों ने एचआईवी संक्रमण के इलाज में एक ''रोमांचक'' कदम बढ़ाने की बात कही है.
एचआईवी वायरस, संक्रमित व्यक्ति के डीएनए का हिस्सा बनकर दशकों तक निष्क्रिय रह सकता है जिससे बीमारी का इलाज नामुमकिन हो जाता है.

नया शोध क्या कहता है आगे पढ़ें
लेकिन अब वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि वायरस को फिर से सक्रिय किया जा सकता है.
ये अध्ययन एड्स 2014 कॉन्फ़्रेंस में पेश किया गया.
छह संक्रमित व्यक्तियों पर किए गए शुरुआती अध्ययन में पाया गया है कि कीमोथेरेपी में दवा की कम मात्रा इस्तेमाल करने से वायरस को सक्रिय किया जा सकता है.
विशेषज्ञों का कहना है कि ये एक आशाजनक शुरुआत है लेकिन सिर्फ़ दवा से ही एचआईवी का इलाज मुमकिन नहीं होगा.
एंटी-वायरल दवाओं से एचआईवी वायरस, रक्त प्रवाह में उस स्तर तक पहुंच सकता है जहां इसकी जांच नहीं हो पाती. इसका मतलब ये है कि एचआईवी पॉज़िटिव लोग लगभग सामान्य जीवनकाल जी सकते हैं.
लेकिन इसमें एक मुश्किल होती है. एचआईवी वायरस अपना डीएनए हमारे डीएनए में मिला सकता है जहां ये प्रतिरक्षी तंत्र और दवाओं की पहुंच से बाहर हो जाता है. इस प्रक्रिया को एचआईवी रिज़र्वायर कहते हैं.
इसलिए जब एचआईवी का इलाज बंद हो जाता है, ये वायरस रिज़र्वायर से बाहर आकर फिर से काम करना शुरु कर देता है.
एचआईवी के इलाज पर हो रहे अंतरराष्ट्रीय अध्ययन का मक़सद इसके वायरस को इन छिपी हुई जगहों से बाहर निकालना है.
डेनमार्क के आरहाउस विश्वविद्यालय की एक टीम ने कीमोथेरेपी में इस्तेमाल होने वाली रोमिडेपसिन नाम की दवा का इस्तेमाल किया. ये अध्ययन छह ऐसे लोगों पर किया गया जिनमें एचआईवी वायरस उस स्तर पर पहुंच गया था, जहां उसकी पहचान या जांच नहीं हो सकती थी.
इन सभी को तीन हफ़्तों तक सप्ताह में एक बार रोमिडेपसिन की कम मात्रा दी गई.
छह में से पांच मरीज़ों के ख़ून में वायरस के स्तर में काफ़ी उछाल देखा गया.
अध्ययन में शामिल एक वैज्ञानिक, डॉक्टर ओले सोगार्ड ने बीबीसी को बताया, "(एचआईवी के इलाज) की दिशा में लिया गया हर नया कदम हमेशा ही रोमांचक होता है और ये एक बहुत अहम कदम है."
डॉक्टर सोगार्ड ने कहा कि इस बारे में काफ़ी संशय है कि ये दवा कितनी कारगर होगी. उन्होंने कहा, "हमने ये दिखा दिया है कि वायरस को कोशिका से बाहर निकाला जा सकता है. अब अगला कदम इन कोशिकाओं को मारना होगा.''
उन्होंने कहा, "इस दवा का परीक्षण अब अगले चरण में जा रहा है जिसमें रोमिडेपसिन को किसी ऐसी चीज़ या दवा के साथ दिया जाएगा जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मज़बूत बनाएगा और हमारे मामले में ये एचआईवी का टीका है."

चुनौतियां

हालांकि इस अध्ययन में अभी कई चुनौतियां हैं.
अध्ययन टीम ये नहीं बता सकी कि रोमिडेपसिन के इस्तेमाल से किस अनुपात में एचआईवी छिपाने वाली कोशिकाएं सक्रिय होती हैं.
एक और मुश्किल ये भी है कि ये नहीं बताया जा सकता कि इस दवा से एचआईवी के किस रिज़र्वायर पर असर पड़ रहा है. एचआईवी वायरस ख़ून में प्रतिरक्षी तंत्र की कोशिकाओं में छिप सकता है लेकिन उसके इससे भी बड़े रिज़र्वायर पेट और केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में होते हैं. अभी ये साफ़ नहीं है कि ख़ून पर आधारित इस कीमोथेरेपी से इनमें मौजूद वायरस सक्रिय होते हैं या नहीं.

रोमिडेपसिन दवा के इस्तेमाल से डीएनए के कसे हुए गुच्छे ''ढीले'' पड़ जाते हैं. इससे छिपे हुए एचआईवी का जेनेटिक कोड सामने आ जाता है और नए वायरस बनते हैं. sabhar :http://www.bbc.co.uk/

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इस सत्य तक जाना हो, तो निर्वस्त्र जाना होगा

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osho pravachan on knowledge

यह मजे की बात है। जिस दिन तुमने जो-जो जाना है, यदि उसे बिल्कुल विस्मरण कर दोगे, उस दिन तुम्हें आत्म स्मरण आएगा कि गुरु देता है ध्यान। इसका अर्थ है कि गुरु छीन लेता है ज्ञान। और जहां तुम्हें ऐसा गुरु मिले, जो तुमसे ज्ञान छीनता हो, वहां हिम्मत करके रुक जाना।

क्योंकि वहां से भागने का मन होगा। सोचेंगे, यहां हम तो कुछ लेने आए थे, उल्टा और गंवाने लगे। आदमी लेने के लिए घूम रहा है। कहीं से कुछ मिल जाए तो थोड़ा और अपनी संपत्ति बढ़ा ले। अपनी तिजोरी में थोड़ी जानकारी और रख लें, थोड़ा और पंडित हो जाएं।एक जर्मन खोजी रमण के पास आया और उसने कहा कि मैं आपके चरणों में आया हूं कुछ सीखने। आप मुझे सिखाएं। रमण ने कहा, तुम गलत जगह आ गए। अगर सीखना है, तो कहीं और जाओ। अगर भूलना है, तो हम राजी हैं। रमण के वचन हैं--‘इफ यू हैव कम टू लर्न देन यू हैव कम टु दि रांग परसन।

इफ यू आर रेडी टु अनलर्न देन आई एक रेडी टू हेल्प यू।’ वह जो तुमने जाना है, उसी के कारण तुम्हें अपना पता नहीं चल पा रहा है। तुम्हारे और तुम्हारे जानने के बीच में तुम्हारी जानकारी की दीवार खड़ी हो गई है।अगर तुम्हें स्वयं को जानना है तो और सब जानने के वस्त्र उतारकर रख दो। स्वयं का जानना तभी घटता है, जब भीतर और कुछ जानने का उपद्रव नहीं रह जाता। जब सब जानना शून्य हो जाता है, तब आती है आत्म-स्मृति; कबीर उसको ‘सुरति’ कहते हैं। तब होता है आत्म-स्मरण। तब आदमी स्व-विवेक से भर जाता है, आत्मज्ञान से।

आत्मज्ञान कोई जानकारी नहीं है। क्योंकि वह तो तुम हो ही। तुम्हारी जानकारियों के पर्दे जरा हट जाएं, थोड़ा तुम घूंघट के पट खालो, तुम्हें अपनी छवि दिखाई पड़नी शुरू हो जाएगी। यह सारा अस्तित्व दर्पण है। जिस दिन तुम्हारी आंख पर घूंघट नहीं होता, उस दिन तुम्हें अपनी छवि सब जगह दिखाई पड़ने लगती है।

चांद-तारे तुम्हीं को गुंजाते हैं। पक्षी तुम्हारा ही गीत गाते हैं। झरने तुम्हारा ही कल-कल नाद करते हैं। फूल तुम्हीं को खिलाते हैं। तुम ही इस अस्तित्व में फूले-फले समाए होते हो। लेकिन एक शर्त अनिवार्य है; कि सब जानकारी हटा कर रख दी जाए। सत्य तक जाना हो, तो निर्वस्त्र जाना होगा। सत्य तक जाना हो, तो जानने के सारे वस्त्र छोड़े देने होंगे। सत्य तक कोई नग्न होकर, शून्य होकर ही पहुंचता है। शून्यता यानी ध्यान।
ओशो

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बुधवार, 23 जुलाई 2014

विज्ञान ईश्वर के अस्तित्व से इन्कार नहीं कर सकता

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god के लिए चित्र परिणाम

photo : gogale


संसार की प्रत्येक वस्तु का कोई न कोई निर्माता होता है तभी वह बनती है। इतने बड़े विश्व का भी कोई न कोई निर्माता होना चाहिए। सृष्टि की विभिन्न वस्तुओं में से प्रत्येक में अपने-अपने नियम क्रम पाये जाते हैं। उन्हीं के आधार पर उनकी गतिविधियां संचालित होती हैं। यह नियम न होते तो सर्वत्र अस्त-व्यस्तता और अव्यवस्था दृष्टिगोचर होती। इन नियमों का निर्धारणकर्ता कोई न कोई होना चाहिए। जो भी शक्ति इस निर्माण एवं नियन्त्रण के लिए उत्तरदायी है वही ईश्वर है। वस्तुओं का उगना, बढ़ना जीर्ण होना, मरना और फिर उनका नवीन रूप धारण करना, यह परिवर्तन क्रम भी बड़ा विचित्र किन्तु विवेकपूर्ण है। इस प्रगति चक्र को घुमाने वाली कोई शक्ति होनी चाहिए। यह जड़ता का स्वसंचालित नियम नहीं हो सकता।

विज्ञान इस निष्कर्ष पर पहुंच गया है कि संसार का मूल तत्व एक है। एक ही ऊर्जा अपनी विभिन्न चिनगारियों के रूप में, विभिन्न दिशाओं में, विभिन्न रंग-रूप में उछल-कूद कर रही है। यहां आतिशबाजी का तमाशा हो रहा है। कुशल शिल्पी बारूद को कई उपकरणों के साथ बनाकर कई प्रकार के बारूदी खिलौने बना देते हैं, उनमें से कोई आवाज करता है, कोई चिनगारियां उड़ाता है, कोई रंग-बिरंगी रोशनी करता है, कोई उड़ता-उछलता है। इन हलचलों की इस भिन्नता और विचित्रता के रहते इस संसार में दृश्यमान भिन्न-भिन्न आकृति-प्रकृति के पदार्थों के बारे में लागू होती है। उनके स्वरूप में और गुण, धर्म अलग हैं तो भी वे जिस सत्ता से उत्पन्न होते हैं वह व्यापक और एक है।

विज्ञान ने कभी यह नहीं कहा है कि- ‘ईश्वर नहीं है।’ उसने केवल इतना ही कहा- उसकी अनुसन्धान प्रक्रिया की पकड़ में ईश्वर जैसी कोई सत्ता नहीं आती। इन्द्रिय बोध के आधार पर सूक्ष्मदर्शी उपकरणों की सहायता से प्रयोगशालाओं में वैज्ञानिक अनुसन्धान चलते हैं। इस परिधि में जो कुछ आता है वही विज्ञान का प्रतिपाद्य विषय है। उसकी अपनी छोटी सीमा और मर्यादा है। उससे जितना कुछ ज्ञान पकड़ा पाया जाता है उसे ही प्रस्तुत करना उसका विषय है। इस मर्यादा में यदि ईश्वर नहीं आया है तो उसका अर्थ यह नहीं कि उसकी सत्ता है ही नहीं।

विज्ञान अपने शैशव से क्रमशः विकसित होता हुआ किशोरावस्था में प्रवेश कर रहा है अभी उसे प्रौढ़, वृद्ध एवं परिपक्व होने में बहुत समय लगेगा। उसे अभी तो आज की गलती कल सुधारने से ही फुरसत नहीं। बाल-बुद्धि आज जिस बात का जोर-शोर से प्रतिपादन करती है उसके आगे के तथ्य सामने आने पर पूर्व मान्यताएं बदलने की घोषणा करनी पड़ती है। यह स्थिति संभव है आगे न रहे जब विज्ञान अपनी किशोरावस्था पार करेगा और यौवन की प्रौढ़ता में प्रवेश करेगा तो उसे ऐसे आधार भी हाथ लग जायेंगे जो आज के भौंड़े उपकरणों की अपेक्षा प्रकृति की अधिक सूक्ष्मता की थाह ला सकें। तब सम्भवतः उन्हें पदार्थ की भौतिक शक्ति के अन्तराल में छिपी हुई चेतना की परतें भी दृष्टिगोचर होने लगेंगी। आज भी इसकी संभावना स्वीकार की जा रही है। इसलिए ईश्वर के अस्तित्व की सिद्धि न होने पर भी विज्ञान अन्यान्य अनेकों सम्भावनाओं की तरह ईश्वर की सम्भावना का भी खण्डन नहीं करता, वह केवल नम्र शब्दों में इतना ही कहता है अभी प्रयोगशालाओं ने अपनी पकड़ में ईश्वर को नहीं जकड़ पाया है। उसका खण्डन इसी सीमा तक है। विज्ञानी नास्तिकता दुराग्रही नहीं हैं। वह अपनी वर्तमान स्थिति का विवरण मात्र प्रस्तुत करती है।

ईश्वर की सत्ता को प्रामाणित करने के लिए यह आधार ही काफी है कि सृष्टि के प्रत्येक घटक को नियम और क्रम के बन्धन में बँधकर रहना पड़ रहा है। कभी−कभी भूकम्प, तूफान, उल्कापात, जैसी घटनाएँ− प्राणियों के पेट के विचित्र आकृति−प्रकृति की सन्तानों का होना जैसे व्यतिक्रम दीख पड़ते हैं, पर गहराई से विचार करने पर वे भी ऐसे नियम कानूनों के आधार पर होते हैं जिन्हें आमतौर से नहीं जानते वे अपन काम करते हैं और जब अवसर पाते हैं तो विलक्षण स्थिति उत्पन्न करते हैं।

महामना मालवीय किसी बहुत जरूरी काम से जा रहे थे। सड़क के किनारे उन्हें एक बीमार बुढ़िया कराहती हुई पड़ी दिखाई दी।

गाड़ी रुकवाई और बुढ़िया को अपनी गाड़ी में लादकर अस्पताल पहुँचाया।

साथी वकील ने पूछा− ऐसे छोटे काम के लिए आपको अपना बहुमूल्य समय क्यों नष्ट करना चाहिए था? मालवीय जी ने गम्भीरतापूर्वक कहा− पीड़ितों की सहायता से बढ़कर और क्या महत्त्वपूर्ण या आवश्यक कार्य हो सकता है?

‘दि मिस्टीरियस यूनीवर्स’ ग्रन्थ के लेखक सर जेम्स जीन्स ने अत्यन्त गम्भीरतापूर्वक यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि− “इस ब्रह्मांड का सृष्टा कोई विशुद्ध गणितज्ञ रहा होगा। उसने न केवल मानव प्राणी की वरन् अन्य सभी जड़ चेतन कहे जाने वाले प्राणियों और पदार्थों की संरचना में गणित की उच्चस्तरीय विद्या का पूरी तरह प्रयोग किया है। यदि इसमें कहीं कोई भूल रह जाती तो हर चीज बनने से पूर्व ही बिखर जाती। प्राणी जीवन धारण करने से पूर्व ही मर जाते और ग्रह−पिण्ड अपना पूर्ण रूप बनाने से पूर्व ही एक−दूसरे के साथ टकरा कर चूर−चूर हो जाते हैं। यह सृष्टा के गणित ज्ञान का चमत्कार ही है कि न केवल पृथ्वी वरन् समस्त ब्रह्मांड एक क्रमबद्ध प्रक्रिया के साथ गतिशील है।”

न्यूटन की खोजें किसी समय अत्यन्त सत्य मानी गई थीं, पर अब परिपुष्ट विज्ञान ने उन्हें क्षुद्र, असामयिक एवं व्यर्थ सिद्ध कर दिया है। गुरुत्वाकर्षण की खोज किसी समय एक अद्भुत उपलब्धि थी अब आइंस्टीन का नवीनतम सिद्धान्त प्रामाणिक माना गया है और गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त को बाल−विनोद ठहराया गया है। ‘आइंस्टीन के अनुसार देश, काल और एकीकरण की− स्पेश टाइम और काजेशन− के एकीकरण सिद्धान्त की एक वक्राकृति मात्र है जिसे हम पृथ्वी का घुमाव मानते हैं। यह इस वक्रता के दो उपाँशों का आनुपातिक सम्बन्ध भर है। इसी से पृथ्वी घूमती दीखती है और उसकी गतिशीलता को अनुभूति में एक कड़ी गुरुत्वाकर्षण की भी जुड़ जाती है। यह आकर्षण तथ्य नहीं वरन् हलचलों की एक भोंड़ी सी अनुभूति मात्र है।”

कोई चित्रकार यदि अन्य किसी ग्रह पर बैठकर पृथ्वी का रंगीन चित्र बनाये तो वह रंग बिरंगे दृश्यों का एक समतल दृश्य ही होगा। गोला भी बनाया तो वह केवल एक पक्षीय होगा। पूरा गोला इस तरह बनाया जाना असंभव है जो दोनों ओर की स्थिति को एक साथ दिखा सके। कल तक लम्बाई−चौड़ाई बताने वाले चित्र ही तैयार होते थे। − हराई का आभास उनसे यत्किंचित् ही होता था। अब ‘थ्री डाईमेंशनल’ स्थिति देखने की भी सुविधा बन चली है और गहराई को देख सकना भी सम्भव हो गया है। आगे चित्रकला के विकास में कई और डाईमेंशनल जुड़ेंगे, पर अभी तो वे सम्भव नहीं। इसलिए जो भी चित्र बने वे अधूरी दृश्य प्रक्रिया पर निर्भर है। अन्य ग्रह पर बैठकर बनाया गया पृथ्वी का चित्र यहाँ की हलचलों की सही जानकारी दे सके यह सम्भव नहीं। भले ही उस ग्रह के निवासी उस चित्र को कितना ही सर्वांगपूर्ण क्यों न मानें।

हमारे पूर्वज धरती को समतल मानते थे। पीछे पता चला कि वह गोल है। इसके बाद यह जाना गया कि वह घूमती भी है और परिक्रमा भी करती है। इसके उपराँत यह जाना गया कि वह अपने अधिष्ठाता के साथ अन्य भाइयों के साथ किसी महासूर्य की प्रक्रिया के लिए भी दौड़ी जा रही है और वह महासूर्य किसी अतिसूर्य की परिक्रमा में निरत है। अपने सौरमण्डल जैसे अन्य कितने ही सौरमंडल उस महासूर्य सहित अतिसूर्य की प्रदिक्षणा में निरत है। मालूम नहीं यह महा− अति और अत्यन्त अति का सिलसिला कहा जाकर समाप्त हो रहा होगा और पृथ्वी के भ्रमण की कितनी हलचलों का भाग्य उन अचिन्त्य− परिक्रमाओं के साथ जुड़ा होगा। कुछ दिन पूर्व यह भी पता लगा कि पृथ्वी लहकती और थिरकती भी है। सीधे−साधे ढंग से अपनी धुरी पर घूमती भर नहीं है वरन् वह कई प्रकार की कलाबाजियां भी दिखाती है। साँस लेती हुई फूलती और पिचकती भी है इससे उसकी भ्रमणशीलता में अन्तर आता है तदनुसार गुरुत्वाकर्षण भी घटता−बढ़ता है।

अपनी आकाश गंगा में हमारे सौरमण्डल जैसे लाखों सौरमण्डल हैं। इन सौरमण्डलों के अपने ग्रह−उपग्रह हैं। समूचे ब्रह्मांड में कितनी गंगाएं हैं? इन प्रश्न का उत्तर वैज्ञानिक अरबों में गिनते हैं। प्रत्येक आकाश गंगा कितने सौरमण्डल अपनी कमर के साथ रस्सी में बाँधे हैं और वे सौरमण्डल कितने ग्रहों को जकड़े बाँधे बैठे है और उन ग्रहों के साथ कितने उपग्रह चिपके हैं इस सारे पिण्ड परिवार की गणना की जाय तो हमारा अंक गणित झक मारेगा और उस गिनती की पूरी कल्पना तक कर सकना मनुष्य के क्षुद्र मस्तिष्क के लिए सम्भव न हो सकेगा। समस्त ब्रह्मांड में हमारी पृथ्वी जैसे क्षुद्र ग्रह कितने होंगे? और उनमें से कितनी ही- कितने चित्र विचित्र आकृति−प्रकृति के प्राणियों को अपनी गोदी में खिला रही होगी। वहाँ की आणविक− रासायनिक जैवीय परिस्थितियाँ एक दूसरे से कितनी अधिक भिन्न विपरीत होंगी यह सब कल्पना करना ही हमारे लिए अशक्य है। अभी तो अपनी पृथ्वी के वातावरण में जो हलचलें चल रही हैं उन्हीं की खोज अत्यन्त विस्मयजनक परदे उठाती चल रही हैं और उन्हीं की खोज अत्यन्त विस्मयजनक परदे उठाती चल रही है और उन्हीं उलझनों से हम हतप्रभ रह रहे हैं जब अन्य ग्रह तारकों में पृथ्वी से सर्वथा भिन्न प्रकार के वातावरण को ध्यान में रखते हुए हमारे विज्ञान में सर्वथा विचित्र अपरिचित विज्ञान का ककहरा पढ़ेंगे तो लगेगा कि इतने असीम ज्ञान−विज्ञान का क्षुद्र मानव मस्तिष्क द्वारा खोज पाया जाना तो दूर उसकी समूची कल्पना करना तथा अशक्य है।

विज्ञान अभी अपना बचपन भी पार नहीं कर पाया कि उसे अपने विषय की गहराई दिन−दिन अधिक दुरूह प्रतीत होती जा रही है। पदार्थ की सबसे छोटी इकाई इलेक्ट्रॉन घोषित तो कर दी गई है पर उसका किसी भी यन्त्र से अब तक प्रत्यक्षीकरण नहीं किया जा सका। न उसे आंखें से देखो गया है न चित्र से उतारा गया है। वह मात्र एक परिकल्पना है जिसे ‘रूप हीन’ कहकर पिण्ड छुड़ाया गया है। इस इकाई की गतिविधियाँ तो नोट करली गई हैं, पर वे क्यों होती हैं इन हलचलों के लिए उन्हें प्रेरणा एवं क्षमता कहाँ से मिलती हैं। खर्च होने वाली शक्ति की वे पूर्ति कहाँ से करती हैं इसका कोई उत्तर प्राप्त नहीं किया जा सका। अणु विज्ञान के मूर्धन्य मनीषी आइन्स्टीन और मैक्स प्लेक तक इस सम्बन्ध में चुप है और यह सोचते हैं कि भौतिक सत्ता के ऊपर कोई अभौतिक सत्ता छाई हुई है। यह अभौतिक सत्ता क्या हो सकती है और उसका उद्देश्य एवं क्रिया−कलाप क्या होना चाहिए यह खोज पाना अभी विज्ञान के लिए बहुत आगे की बात है।

परमाणु परिवार से लेकर सौरमण्डल और ब्रह्मांड संव्याप्त ग्रहपिण्ड परिकर के बारे में हम अभी इतना भी नहीं जानते जितना कि सारे शरीर की तुलना में एक बात। हम केवल पंचतत्वों से बने हुए स्थूल पदार्थों के बारे में ही थोड़ी बहुत जानकारी प्रयोगशालाओं के माध्यम से प्राप्त कर सके हैं। जीव सत्ता− मस्तिष्कीय सम्भावना, अचेतन मन की अतीन्द्रिय शक्ति के अगणित प्रमाण होते हुए भी अभी वैज्ञानिक व्याख्या नहीं हो सकती है। असंख्य क्षेत्रों की जानकारियां अभी प्रारंभिक अवस्था को भी पार नहीं कर सकी हैं। ऐसी दशा में यदि ईश्वर जैसा अति सूक्ष्म तत्व प्रयोगशालाओं की पकड़ में नहीं आया तो यह नहीं कहा जाना चाहिए कि वह नहीं हैं। तत्वदर्शी दृष्टि से हम उसकी सत्ता महत्ता और व्यवस्था सहज ही सर्वत्र बिखरी देख सकते हैं और उस पर श्रद्धा भरा विश्वास कर सकते हैं।
sabhar :http://hindi.speakingtree.in/

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