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शनिवार, 14 जून 2014

इस तरह परलोक गई आत्माओं से बात कर सकते हैं आप?

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और होने लगती हैं अनहोनी घटनाएं

और होने लगती हैं अनहोनी घटनाएं


आत्मा एक उर्जा की तरह होती है जो कभी नहीं नष्ट होती है। यह जिस शरीर में जाती है उस रूप रंग में ढल जाती है। जब तक यह शरीर से बाहर है एक उर्जा के रुप में ब्रह्माण्ड में कहीं मौजूद रहती है।

लेकिन शरीरधारी जीव और अशरीरी आत्मा के बीच संपर्क बनाना कठिन होता है क्योंकि दोनों का अपना अलग अस्तित्व और अपनी सीमाएं हैं। अगर आत्माएं जीवित लोगों की दुनिया में आ जाती हैं या जीवित व्यक्ति आत्माओं की दुनिया में झांकने का प्रयास करते हैं तो यह दोनों के लिए प्रकृति के नियम के विपरीत है।

लेकिन कभी कभी ऐसी स्थिति बन जाती है कि आत्माएं अपनी दुनिया से निकलकर जीवित लोगों की दुनिया में आ जाती है और अनहोनी घटनाएं होने लगती है।

आत्माओं से बात करने का तरीका

आत्माओं से बात करने का तरीका

ऐसे दावे किए जाते हैं कि इंसानों ने कुछ ऐसे माध्यम और तरीके खोज निकाले हैं जिनसे आत्माओं की दुनिया से संपर्क किया जा सकता है और आत्माओं से बात की जा सकती है।

यहां ऐसे ही कुछ माध्यमों की चर्चा की जा रही है जिनके विषय में कहा जाता है कि इससे मनुष्य आत्माओं से संपर्क बनाने में सफल होता हैं।

तीन पैर के टेबल से भूत बुलाने की विधि

इस विधि में एक तिपाए टेबल का इस्तेमाल किया जाता है तो हल्का और गोल होता है। एक पाए के नीचे लकड़ी का एक गुटका रखा जाता है। इसके बाद टेबल को चारों तरफ से घेर कर लोग बैठ जाते हैं। इसके बाद जिस व्यक्ति की आत्मा को बुलाना होता है उनका सभी मिलकर ध्यान करते हैं।

माना जाता है कि जब अपने आप टेबल के पाए खटखटाने लगे तो इसका मतलब है कि आत्मा का आगमन हो चुका है। इसके बाद उनसे प्रश्न किया जाता है और संकेतिक तौर पर टेबल की खटखट से हर प्रश्न मिलने लगता है।
प्लेनचिट से होती है भूतों से बातें

प्लेनचिट से होती है भूतों से बातें

भूतों से बात करने का एक जरिया है प्लेनचिट। यह एक दिल के आकार का दिखने वाला लकड़ी का टुकड़ा होता है। इसमें पीछे की ओर सभी ओर घूमने वाले पहिये लगे होते हैं। इसकी नोक की तरफ एक छेद होता है जिसमें एक पेंसिल लगा दी जाती है।

मेज पर एक सादा कागज रखकर उसके ऊपर इस यंत्र को रखा जाता है। इसके बाद जिस आत्मा को बुलाना होता है उसका एकाग्रता पूर्वक ध्यान किया जाता है।

जैसे ही आत्मा आ जाती है यंत्र अपने आप चलने लगता है। आमतौर पर इस यंत्र से अतृप्त आत्माओं को बुलाया जाता है। यंत्र में लगे पेंसिल से आत्मा पूछे गए प्रश्नों के उत्तर देती है।

आत्मा शरीर में प्रवेश करके बात करती है

आत्माओं से संपर्क करने का एक माध्यम यह भी है कि इसमें किसी व्यक्ति को माध्यम के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। इसमें आत्मा का आवाहन किया जाता है और आत्मा माध्यम के शरीर में प्रवेश करके संवाद करती है।

इसके अलावा एक और विधि है जिसमें प्रयोगकर्ता खुद माध्यम बन जाता है। आवाहन करने पर आत्मा आती है और प्रयोगकर्ता के हाथ में रखी पेंसिल खुद ही कागज पर चलनी शुरु होती है और प्रश्नों के उत्तर देती है।

भूतों को बुलाने से पहले यह जरुर जान लें

भूतों को बलाने के जितने भी माध्यम हैं। उनके विषय में यह माना जाता है कि इनसे भूत तो जाते हैं लेकिन जाने में कई बार आनाकानी करने लगते हैं।

इसलिए भूतों को बुलाने से पहले इसके जोखिम का भी ध्यान रखें। दूसरी बात यह ध्यान रखें कि अपने पूरे प्रयोग के दौरान अपने अंदर साहस और आत्मविश्वास बनाए रखें। घबराने या डर जाने पर प्रयोगकर्ता का व्यक्तिगत नुकसान हो सकता है। sabhar :http://www.amarujala.com/


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शुक्रवार, 13 जून 2014

ग़रीबी के चलते यहां बुढ़ापे में जिस्म बेचती हैं औरतें

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उत्सुकता

ऐसा क्यों होता है यहां


किम यून-जो सियोल के जोंगनो-3 सबवे स्टेशन की सीढ़ियों पर बैठी हैं। उनकी उम्र 71 साल है और वो चमकीली लिपस्टिक लगाए हैं और चमकीला लाल कोट पहने हुए हैं।

उनके बड़े बैग से कांच की बोतलों के आपस में टकराने की आवाज़ आ रही है।

किम दक्षिण कोरिया की "बैकस लेडीज़" में एक हैं यानी ऐसी वृद्ध महिला जो पुरुष ग्राहकों को लोकप्रिय बैकस (एक तरह की शराब) एनर्जी ड्रिंक बेचकर अपनी ज़िंदगी चलाती है।

लेकिन अकसर वो सिर्फ़ इन बोतलों को ही नहीं बेचती हैं। एक ऐसी उम्र में जब कोरियाई दादियों को कुल माता के रूप में सम्मानित किया जाना चाहिए, उनमें से कुछ को अपना जिस्म बेचना पड़ रहा है।

उसने मुझसे कहा, "आप वहां खड़ी बैकस महिलाओं को देख रहे हैं? ये महिलाएं बैकस के अलावा भी कुछ बेचती हैं। वो कभी-कभी दादा की उम्र के लोगों के साथ जाती हैं और उनसे पैसे कमाती हैं। लेकिन मैं उस तरह नहीं रहती।"

उन्होंने बताया, "जब मैं गली में खड़ी रहती हूं तो पुरुष प्रस्ताव देते हैं, लेकिन मैं हमेशा कहती हूं, 'नहीं'।"

उत्सुकता

किम कहती हैं कि वो ड्रिंक बेचकर हर दिन क़रीब 5000 वॉन या क़रीब 300 रुपए कमा लेती हैं। वो कहती हैं, "पुलिस हमेशा मुझ पर नज़र रखती है। वो अंतर नहीं कर पाते हैं।"

इस छिपे हुए सेक्स कारोबार का केंद्र राजधानी सियोल के बीचोंबीच स्थित एक पार्क है। जोंगमयो पार्क ही वो जगह है जहां जीवन के ढलान पर पहुंच चुकी ये महिलाएं आती हैं।

पार्क के किनारों पर खड़ी 50 वर्ष से लेकर 70 वर्ष तक की ये महिलाएं पुरुषों को ड्रिंक की पेशकश कर रही हैं। ये उनका पहला क़दम है जो आख़िरकार उन्हें पास के एक सस्ते मोटल तक ले जाएगा।

पार्क में मौजूद पुरुष इन महिलाओं के मुक़ाबले मुझसे बात करने के अधिक इच्छुक हैं।

दादा की उम्र के लोगों का एक दल कोरियाई शतरंज के खेल को ध्यान से देख रहा है। उन्होंने बताया कि क़रीब आधे पुरुष बैकस महिलाओं का इस्तेमाल करते हैं।

साठ साल के किम बताते हैं, "हम पुरुष हैं, इसलिए महिलाओं के प्रति हमें उत्सुकता है।"

वो बताते हैं, "हम एक ड्रिंक लेते हैं और थोड़ा धन उनके हाथों में रख देते हैं, और काम हो जाता है। पुरुष महिलाओं का साथ पसंद करते हैं- चाहें वो बूढ़ी हों या नहीं, यौन रूप से सक्रिय हों या नहीं। ये सीधा सा पुरुष मनोविज्ञान है।"

बुज़ुर्ग गर्लफ्रैंड

एक अन्य 81 वर्षीय पुरुष ने बताया कि "वहां खड़ी महिलाओं में हम गर्लफ़्रेंड तलाश सकते हैं। वो हमसे अपने साथ खेलने के लिए कहेंगी। वो कहेंगी, "ओह! मेरे पास पैसा नहीं है। और फिर वो हमारे साथ चिपक जाएंगी।

उनके साथ सेक्स करने का ख़र्च क़रीब 20000 से 30000 वॉन (क़रीब 1,100 से 1,700 रुपए) तक होता है, लेकिन अगर वो आपको जानती हैं तो कभी-कभी वो आपको छूट भी दे सकती हैं।"

दक्षिण कोरिया के ये बुज़ुर्ग देश की आर्थिक सफलता के शिकार हैं।

उन्होंने अपनी बचत को अगली पीढ़ी में निवेश कर दिया। एक कन्फ्यूशियस समाज में सफल बच्चों को भी पेंशन का सबसे बढ़िया रूप माना जाता है।

लेकिन यहां इस रुख़ में तेज़ी से बदलाव आया है और अब कई युवा लोग कहते हैं कि वो अपना ही ख़र्च नहीं उठा पा रहे हैं।

ऐसे में जोंगमयो पार्क में इन पुरुषों और महिलाओं के पास कोई बचत नहीं है, वास्तविक पेंशन नहीं है और परिवार नहीं है। वो अपने ही शहर में विदेशियों की तरह हैं।

किम कहते हैं, "जो अपने बच्चों पर निर्भर हैं वो मूर्ख हैं। हमारी पीढ़ी अपने माता-पिता के प्रति विनम्र थी। हम उनका सम्मान करते थे। आज की पीढ़ी अधिक शिक्षित और अनुभवी है, इसलिए वो हमारी नहीं सुनते हैं।"
मजबूरी

मजबूरी

बैकस महिलाओं पर शोध करने वाली डॉक्टर ली हो-सुन के मुताबिक़ ज़्यादातर बैकस महिलाओं ने वृद्धावस्था में ग़रीबी के चलते सेक्स का कारोबार शुरू किया।

वो बताती हैं कि एक महिला ने तो 68 साल की उम्र में वेश्यावृत्ति शुरू की। वो बताती हैं, "एक बैकस महिला ने मुझसे कहा कि मैं भूखी हूं, मुझे सम्मान की ज़रूरत नहीं है, मैं सिर्फ़ दिन में तीन वक़्त का खाना चाहती हूं।"

पुलिस यहां गश्त तो करती है, लेकिन कोई गिरफ़्तारी नहीं होती लेकिन समस्या सिर्फ़ क़ानून को लागू करने की नहीं है।

बैकस महिलाएं अपने बैग में छिपी हुई बीमारी को लेकर भी चल रही है। इन महिलाओं के पास यौन उत्तेजना के लिए विशेष इंजेक्शन होता है और 10 से लेकर 20 बार एक ही इंजेक्शन का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में कई तरह की बीमारियां भी फैल रही हैं।

इस तरह दक्षिण कोरिया के हाई-टेक समाज में बुज़ुर्गों के लिए खाना महंगा है, सेक्स सस्ता है और आत्मीयता तो उन्हें किसी भी क़ीमत पर मुश्किल से ही उपलब्ध है। sabhar :http://www.amarujala.com/

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धरती पर होगा मशीनों का राज, यहां कंप्यूटर ने खुद को साबित कर दिया इंसान!

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A compuer that convinced humans that it was a 13 year old boy


मास्को। वो समय जल्द ही आने वाला है जब धरती पर मशीनों का राज होगा और इंसान उनके गुलाम! इसी कड़ी में रूस के एक कम्प्यूटर ने अपने आपको इंसान साबित कर दिखाया जो इस वक्त पूरी दुनिया में चौंकाने वाला विषय बना हुआ है।

दरअसल रूस की एक कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग टीम ने एक ऎसा प्रोग्राम तैयार किया है जिसने इंसानों को यकीन दिला दिया कि वह कोई कम्प्यूटर प्रोग्राम नहीं, बल्कि 13 साल का लड़का है। इस प्रोग्राम ने इंसानों और कम्प्यूटर्स में फर्क करने वाले ट्यूरिंग टेस्ट दिखाया। इससें पहले ऎसा आज तक कोई और कम्प्यूटर नहीं कर सका था।

इसें बनाने वालों के मुताबिक इंसानों और कम्प्यूटर्स बीच का फर्क पहचानने के लिए किए जाने वाले टेस्ट को लैंडमार्क माना जाता है। लेकिन इस तकनीक को इस नए कम्प्यूटर प्रोग्राम फेल कर दिया। दूसरी और बुद्धिजीवियों को डर है कि अब इस तकनीक का इस्तेमाल साइबर की दुनिया में इस्तेमाल न होने लगे। 

हाल ही में एक अंग्रेजी अखबार में छपी खबर के मुताबिक, कम्प्यूटिंग की दुनिया के बड़े जानकार माने जाने वाले ऎलन ट्यूरिंग का कहना है कि अगर कोई भी कम्प्यूटर इस टेस्ट को पास कर लेता है तो माना जा सकता है कि वह खुद की सोच रखता है। इसके लिए 5 मिनट की टेक्स्ट कन्वर्जेशन होती है जिसमें कोई कम्प्यूटर 30 फीसदी सवाल पूछने वाले इंसानों मात दे दे।

रूस की इस कम्प्यूटिंग टीम द्वारा बनाए गए इस यह कम्प्यूटर प्रोग्राम ने यूजीन गूस्टमन लंदन की रॉयल सोसायटी में यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग के शिक्षाविदों द्वारा लिए गए टेस्ट में पास होकर दिखा दिया। इस प्रोग्राम ने 33 फीसदी जजों को यकीन दिला दिया कि यह कम्प्यूटर नहीं बल्कि इंसान है।

इसी के साथ ही माना जा रहा है कि यह दुनिया का पहला ऎसा कम्प्यूटर है जिसने यह टेस्ट पास किया है। यह कम्प्यूटर प्रोग्राम अपने आप को ओडेस्सा का एक 13 वर्षीय लड़का बताता है। इस प्रोग्राम को बनाने वाले ब्लादिमिर वेसेलोव कार क हना है कि "हमारी टीम का मानना था कि यह प्रोग्राम यह दावा करे कि यह सबकुछ जानता है, लेकिन इसकी उम्र ऎसी रखी गई है जिससे इस बात को भी बराबर वजन मिले कि इसे सबकुछ तो नहीं ही आता होगा। जिसके हमने एक ऎसा कै रेक्टर इजाद किया जिसके व्यक्तित्व पर यकीन हो सके।"

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गुरुवार, 12 जून 2014

नाइजेला के साथ वक्त बिता रहे हैं सलमान रश्दी

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नाइजेला के साथ वक्त बिता रहे हैं सलमान रश्दी


लंदन( ब्रिटेन निवासी भारतीय लेखक सलमान रश्दी इस समय ब्रिटिश जर्नलिस्ट और फूड राइटर नाइजेला लॉसन के साथ वक्त बिता रहे हैं। हाल ही में दोनों सेंट्रल लंदन स्थित एक रेस्त्रां में देखे गए। दोनों ने करीब दो घंटे का समय साथ बिताया। 
 
रेस्टॉरेंट में मौजूद एक ग्राहक ने बताया कि लंबे समय बाद रश्दी को इस तरह नाइजेला के साथ देखकर सभी की निगाहें उन पर ठहर गईं। दोनों सेलेब्रिटी खुद को लोगों से छिपाने की कोशिश कर रहे थे। 66 वर्ष के रश्दी और 54 वर्ष की नाइजेला रेस्टॉरेंट में बेहद खुश और खूबसूरत नजर आ रहे थे।
 
दोनों की दोस्ती 20 साल पुरानी है। नाइजेला ने पिछले साल अपने 71 वर्षीय पति चार्लेस साची से तलाक होने के बाद रश्दी से अपनी नजदीकियां बढ़ा ली थीं। रश्दी का भी मॉडल पद्मा लक्ष्मी से 2008 में तलाक हो गया था।
नाइजेला के साथ वक्त बिता रहे हैं सलमान रश्दी

नाइजेला के साथ वक्त बिता रहे हैं सलमान रश्दी

नाइजेला के साथ वक्त बिता रहे हैं सलमान रश्दी

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मां बनने की नहीं होती कोई उम्र

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एक चीनी महिला ने 60 साल की उम्र में दोबारा मां बनकर दुनिया की सबसे वृद्ध मांओं की सूची में जगह बना ली है और दिखा दिया है कि मां बनने के लिए ममता की जरूरत होती, इसका उम्र से कोई लेना देना नहीं.



शेंग हाइलिन अपनी एकलौती बेटी को खोने के बाद फिर से मां बनना चाहती थीं. उनकी बेटी करीब 30 साल की होने वाली थी. तभी 2009 में जहरीली गैस की वजह से हुई एक दुर्घटना में उसने अपनी जान गवां दी. 60 साल की उम्र में इस अरमान को पूरा करने के लिए शेंग को आईवीएफ तकनीक की मदद लेनी पड़ी.
वह बताती हैं, "जीने के लिए और अपने अकेलेपन से छुटकारा पाने के लिए मैंने इस उम्र में एक और बच्चा पैदा करने की ठान ली." चीन के पूर्वी शहर हेफेई के एक सैनिक अस्पताल में 2010 में शेंग ने दो जुड़वा बच्चियों को जन्म दिया.
एक बच्चे की नीति में बदलाव
शेंग का मामला एक और वजह से असाधारण है. चीन में लम्बे समय से एक बच्चे का नियम लागू है. चीन में परिवार नियोजन का यह कानून करीब 30 सालों से है. इस कानून को कई बार माता पिता की इच्छा के विरूद्ध भी बहुत सख्ती से मनवाया जाता है. गांव के किसी परिवार में अगर पहली संतान एक लड़की हो, अल्पसंख्यक समुदायवासी या फिर अगर माता पिता दोनों ही अपने अपने परिवारों की एकलौती संतान हों, तो उन्हें इस कानून में अपवाद बन कर एक से ज्यादा बच्चों की आज्ञा है.
भारत की रज्जो देवी बनीं थीं 69 साल की उम्र में मां
एक अनुमान के मुताबिक 1979 में चीन में इस कानून के आने के बाद से करीब दस लाख लोग अपने वंशज खो चुके हैं और अगले 20 से 30 सालों में इस फेहरिस्त में करीब 40 से 70 लाख लोग और शामिल हो जाएंगे. ऐसे परिवारों में बुजुर्गों की देखभाल और उनकी तबीयत खराब होने पर इलाज का खर्च उठाने के लिए भी कोई नहीं होता. साथ ही वे जीवन में अकेलेपन की समस्या से भी जूझते रहते हैं.
इन सब समस्याओं को ध्यान में रखते हुए चीन की प्रमुख कानूनी समिति 'एक बच्चे की नीति' वाले कानून में कुछ और अपवादों को मान्यता देने जा रही है. इस नए कानून के अंतर्गत वे दंपत्ति भी दो बच्चे पैदा कर सकेंगे जिनमें से कोई एक अपने माता पिता की एकलौती संतान हो.sabhar :http://www.dw.de/

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सोमवार, 9 जून 2014

सिर्फ 16 साल और सूख जाएगी पवित्र गंगा नदी?

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फिर कहां से आएगा गंगा में जल

फिर कहां से आएगा गंगा में जल


करीब ढाई हजार किलोमीटर लंबी गंगा नदी के बारे में संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट पर भरोसा करें तो इसे सदानीरा बनाए रखने वाला हिमनद सिर्फ सोलह साल और किसी न किसी तरह जिंदा रहेगा।

उसके बाद यह पूरी तरह लुप्त हो जाएगा। आशय यह है कि गंगोत्री ही सूख जाएगी तो गंगा में वह पानी कहां से आएगा जिसे बड़े आदर के साथ नीर और जल कहा जाता है।

गंगा जल में अब वह बात नहीं

सीलिसबर्ग स्थित महर्षि वैदिक इंस्टीट्यूट की चिंता दूसरी तरह की है। इंस्टीट्यूट के कराए अध्ययन के मुताबिक गंगा नदी और उसके स्रोत गंगा ग्लेशियर को किसी तरह फिर भी बचा लिया जाए, और गंगा नदी बहती रहे। लेकिन यह जरूरी नहीं है कि उसकी तीर्थवत्ता बनी रहे।

गंगा के पवित्र होने की बात शुरु से प्रचलित है। इसका वैज्ञानिक आधार सिद्ध हुए वर्षों बीत गए। उसके अनुसार नदी के जल में मौजूद बैक्टीरियोफेज नामक जीवाणु गंगाजल में मौजूद हानिकारक सूक्ष्मजीवों को जीवित नहीं रहने देते।

गंगाजल में प्राणवायु की प्रचुरता बनाए रखने की अदभुत क्षमता है। इस कारण पानी से हैजा और पेचिश जैसी बीमारियों का खतरा बहुत ही कम हो जाता है। लेकिन अब वह बात नहीं रही।

गंगा आखिर कैसे बन गई गंदाजल

गंगा में 2 करोड़ 90 लाख लीटर प्रदूषित कचरा प्रतिदिन गिर रहा है। गंगा-जल न पीने के योग्य रहा, न स्नान के योग्य। महर्षि इंस्टीट्यूट के निदेशक डा. अर्जुन गोड़दिया के अनुसार इस संकट का निवारण थोड़ी सी जागरूकता और इंतजामों से हो सकता है।

लेकिन जो विशेषताएं गंगा स्नान कर या उसके किनारे रह चुके लोगों को या वहां के वातावरण को जिस ऊर्जा से भर देती हैं, उन्हें लौटा लाने को कोई उपाय नहीं है।
गंगा किनारे तीर्थ और स्नान के नियम

गंगा किनारे तीर्थ और स्नान के नियम

कम से कम कुछेक वर्षों में तो कतई संभव नहीं है। उनके अनुसार किसी समय ढाई हजार किलोमीटर क्षेत्र में फैली गंगा के किनारे छोटे बड़े आठ सौ तीर्थ हुआ करते थे। इन तीर्थों में रहने, जाने और स्नान आदि करने का अनुशासन था।

अंपायर आफ द मुगल पुस्तक के प्रसिद्ध लेखक अलक्स रदरफोर्ड ने लिखा है कि करीब छह सौ साल के सल्तनत और मुगल काल के शासन में भी इन तीर्थों की आंतरिक संरचना और व्यवस्था में कोई खास छेड़छाड़ नहीं की गई।

लेकिन पिछले साठ वर्ष में बाजारवाद और आधुनिकता अभिमानी तंत्र ने तीर्थों की उस व्यवस्था को तहस नहस कर दिया। अब उस व्यवस्था का न जानकार हैं और न ही उसे ढूंढा व खोज सकने वाला तंत्र। ऐसे में उस व्यवस्थित करने वाली ऊर्जा और ज्ञान का भी अंनुसंधान किया जाना sabhar :http://www.amarujala.com/


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