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शनिवार, 19 अप्रैल 2014

अब खाना भी छपा करेगा

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3डी प्रिंटर जब पहली बार मेलों में दिखाई दिए, तो लोग हैरान रह गए. कि किस तरह से घर पर ही लोग खिलौने, मूर्तियां घर ही प्रिंट हो सकेंगी. अब आया है डिजाइनर खाना बनाने वाला प्रिंटर.स्पेन की कंपनी ने एक ऐसी मशीन बनाई है, जिससे खाना भी खिलौने की तरह प्रिंट होगा. चाहे पिज्जा हो, बर्गर हो या फिर बिस्किट. कच्चा माल सूखने के बाद बस आप चाहें तो उसे बेक कर लें या फिर खाने को तरह तरह से डिजाइन दे दें.स्पेन की फूडिनी कंपनी के प्रिंटर को आने वाले दिनों में चीन में बनाया जाएगा. अमेरिका और यूरोप के कई देश इस प्रिंटर की 400 यूनिट पहले ऑर्डर कर चुके हैं.
3डी क्रांति
त्रिआयामी प्रिंटिंग में क्रांति तब आई जब घर में इस्तेमाल किए जा सकने वाले प्रिंटर को पहली बार पेश किया गया. साथ ही रंग बिरंगी मूर्तियों, बर्तनों की छपाई शुरू हुई.खिलौने, और अपनी इमेज छापने की मासूम कोशिशों के बाद जब अमेरिका में एक व्यक्ति ने 3डी प्रिंटर से बंदूक छाप ली तब दुनिया के कान खड़े हुए. इसके बाद समझ में आया कि इस तकनीकी प्रगति के नुकसान भी हो सकते हैं.इस प्रिंटर से तीन तरीके से 3डी वस्तुएं छप सकेंगी. या तो सॉफ्टवेयर से कंप्यूटर में 3डी मॉडल बना कर, 3डी कैमरे से या फिर 3डी स्कैनर से स्कैन कर तस्वीरें सीधे प्रिंट करना.महंगे हैं
फिलहाल 3डी प्रिंटर की कीमत 70 हजार रुपये से सवा लाख रुपये की बीच है. लेकिन इससे जुड़े सपोर्ट सिस्टम में एक मुश्किल बनी हुई है. 3डी कैमरे और स्कैनर बहुत महंगे हैं. सॉफ्टवेयर इस्तेमाल करना हर किसी के बस की बात नहीं
3D-Kugelschreiber von David Paskevic

पेन भी 3डी
पेन का आकार और वजन किसी छोटे हाथ के पंखे जितना है. 3डी सिमो पेन में इस्तेमाल किया जाने वाला पदार्थ तरल स्याही में तब्दील हो जाता है, जैसे ही यह हवा के संपर्क में आता है, सूख जाता है. इससे प्लास्टिक मॉडल तैयार किए जा सकते हैं.


एक से एक डिजाइन
दुनिया भर में तीन 3डी पेन अस्तित्व में हैं. दुनिया का पहला 3डी पेन 3डूडलर है, जिसे बोस्टन में विकसित किया गया है. चीन में एक स्पिनऑफ बनाया गया था और अब 3डी सिमो. sabhar :http://www.dw.de/


René Bohne 3D Drucker Fab Lab in Aachen Porträt
Universität Würzburg CEDIFA 3D-Drucker Vase

3D-Drucker Foodini

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ध्यान से बड़े फायदे

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Symbolbild Meditation


ध्यान करने से उत्तेजना पैदा करने वाले जीन्स की क्रियाशीलता दबाई जा सकती है. एक ताजा रिसर्च में सामने आया है कि इससे तनाव पर काबू पाया जा सकता है. कैंसर से निपटने में भी ध्यान से मदद मिलने की उम्मीद की जा रही है.
 Symbolbild Meditation
स्पेन, फ्रांस और अमेरिकी वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस शोध में सामने आया है कि ध्यान की मदद से इंसान के शरीर में उन जीन्स को दबाया जा सकता है जो उत्तेजना पैदा करते हैं. ये जीन्स हैं RIPK2 और COX2 हैं. इनके अलावा हिस्टोन डीएक्टिलेज जीन्स भी हैं जिनकी सक्रियता पर ध्यान करने से असर पड़ता है.
इस शोध में पता चलता है कि लोग ध्यान की मदद से अपने शरीर में जेनेटिक गतिविधियों को नियंत्रित कर सकते हैं, जिसमें गुस्से को काबू करना, सोच, आदतें या सेहत को सुधारना भी शामिल है. इस शोध का मोलिक्यूलर बायोलॉजी के क्षेत्र 'एपिजेनेटिक्स' से भी सीधा संबंध है, जिसके अनुसार आसपास के माहौल का जीन के मॉलिक्यूलर स्तर पर स्थायी प्रभाव पड़ सकता है.
1990 में जब 'एपिजेनेटिक्स' मोलिक्यूलर बायोलॉजी के एक क्षेत्र के रूप में उभर कर सामने आई तो इसने उन मान्यताओं को हिला दिया जिनके अनुसार मनुष्य के जीन्स उनका भाग्य निर्धारित करते हैं. कोशिका नाभिक में मौजूद अणुओं की जांच कर एपिजेनेटिक्स में यह समझा जा सका कि डीएनए सीक्वेंस में परिवर्तन किए बगैर भी जीन्स को दबाया या उत्तेजित किया जा सकता है.
 ध्यान की मदद से जेनेटिक गतिविधियों को नियंत्रित किया जा सकता है
ध्यान की मदद से जेनेटिक गतिविधियों को नियंत्रित किया जा सकता है



ध्यान से उत्तेजना में कमी
जर्मनी के माक्स प्लांक इंस्टीट्यूट फॉर इम्यूनोबायोलॉजी एण्ड एपिजेनेटिक्स में रिसर्च कर रहे समूह के प्रमुख रित्विक सावरकर ने समझाया कि क्रोमैटिन के स्तर पर होने वाले परिवर्तन कैसे स्थायी और वंशानुगत बन जाते हैं. फिर वे मां से बच्चे में या एक ही शरीर के अंदर एक सेल से दूसरे सेल में भी स्थानांतरित हो सकते हैं.
फरवरी में इस शोध पर आधारित रिपोर्ट 'साइकोन्यूरोएंडोक्राइनोलॉजी' पत्रिका में छपने जा रही है. परीक्षण करने पर आठ घंटे ध्यान करने के बाद उत्तेजना पैदा करने वाले जीन्स की क्रियाशीलता के स्तर में कमी पाई गई. इसके अलावा जीन रेग्यूलेटरी मशीनरी में और भी कई परिवर्तन देखे गए. इससे तनावपूर्ण स्थिति से जल्दी उबरने में मदद मिलती है.
सावरकर को इस रिसर्च से काफी उम्मीदें हैं. उन्होंने कहा, "इंसान के बर्ताव और उसकी कोशिका के अंदर क्या हो रहा है, इन दोनों के बीच पहली बार कोई रिसर्च संबंध स्थापित करती है." उन्होंने आगे कहा कि इस बारे में और रिसर्च की जरूरत है. उन्होंने कहा उनकी रिसर्च अभी सिर्फ तीसरे स्तर पर हो रहे परिवर्तनों पर प्रकाश डालती है जिसमें इंसान किसी चीज को महसूस करता है, सिग्नल भेजता है और उसका फिर एक परिणाम होता है जिससे कि परिवर्तन होते हैं. सावरकर ने बताया कि ध्यान से होने वाले परिवर्तन एपिजेनेटिक यानि स्थायी हैं या नहीं इसका पता उनकी रिसर्च में नहीं लग पाया है, जबकि इस बात की संभावना है. उन्होंने कहा, "यह एक अच्छा प्रयोग होगा अगर लोगों के एक समूह को लंबे समय तक ध्यान कराया जाए और फिर उन्हें तनाव दिया जाए और फिर उनकी कंट्रोल ग्रुप (सामान्य लोगों से) तुलना की जाए."
कैंसर पर प्रभाव
हाइडलबर्ग में एसोसिएशन फॉर बायोलॉजिकल रेसिस्टेंस टू कैंसर की निदेशक यॉर्गी इर्मी ने डॉयचे वेले को बताया, "कैंसर की बीमारी कई बार उत्तेजना से जुड़ी होती है." उन्होंने बताया कि वह अपने मरीजों को ध्यान की सलाह देती हैं. उन्होंने कहा, "ठीक होने की प्रक्रिया में मरीज का रवैया बहुत महत्व रखता है."
सावरकर ने कहा कि इस दिशा में अभी आगे और भी रिसर्च की जरूरत है. उन्हें उम्मीद है कि इस तरह के शोध की मदद से हम बीमारियों से निपटने के बेहतर तरीके ढूंढ सकते हैं.
एपिजेनेटिक्स के मशहूर वैज्ञानिक ब्रूस लिप्टन भी मानते हैं कि हम अपने आपको विश्वास और अपने रवैये से ठीक कर सकते हैं. उन्होंने 2008 में हुई उस रिसर्च की याद दिलाई जिसमें कहा गया था कि पोषण और जीवनशैली में परिवर्तन से कैंसर के लिए जिम्मेदार जीन्स को दबाया जा सकता है.
लिप्टन कहते हैं, "दिमाग कुछ देखता है और उसे रसायनशास्त्र में परिवर्तित कर देता है, रसायन शरीर की कोशिकाओं तक पहुंचते हैं और एपिजेनेटिक्स के लिए जिम्मेदार होते हैं." उन्होंने अंत में कहा कि लोगों को इस बारे में और जानकारी हासिल करने की जरूरत है. सेहत का ख्याल रखना सीधे तौर पर जीवनशैली से जुड़ा है, और जीवनशैली बदलना हमारे हाथ में है.
रिपोर्ट: एस डीन/एसएफ
संपादन: महेश झा
sabhar :http://www.dw.de/

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भारत को वैज्ञानिक शक्ति बनने से रोक रहा है भ्रष्टाचार: नोबेल विजेता

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वंदना
 
हाल ही में लंदन में हुए एशियाई पुरस्कार कार्यक्रम में जाना हुआ. समारोह देर तक चला, रात के करीब 11 बज चुके थे और मैंने निकलने के लिए अपना सामान बाँध लिया था. लेकिन तभी मेरी नज़र कोने में गेरुए रंग का कुर्ता पहने चश्मे वाले एक व्यक्ति पर गई. उनके चेहरे पर धीमी सी मुस्कान थी. भीड़ में होते हुए भी वे अकेले से ही थे.
अचानक अख़बारों में देखी उनकी तस्वीर दिमाग़ में कौंधी और सामान वहीं गिरा मैं जा पहुँची उनसे बात करने. मेरे सामने नोबेल पुरस्कार विजेता वेंटकरमन रामाकृष्णन खड़े थे.

आज जहाँ भारत को उभरती हुई आर्थिक महाशक्ति माना जाता है वहीं विज्ञान में भारत का नाम ज़्यादा नहीं लिया जाता.
करीब पाँच साले पहले भारतीय मूल के अमरीकी नागरिक वेंटकरमन रामाकृष्णन को संयुक्त रूप से 'मॉलिक्यूलर बायोलॉजी' में काम के लिए नोबेल पुरस्कार पुरस्कार मिला था. प्यार से लोग उन्हें वेंकी बुलाते हैं. उन्होंने बीबीसी से विशेष बात की.
विज्ञान और शोध के क्षेत्र में आप तभी तरक्की कर सकते हैं जब आर्थिक आधार बहुत मज़बूत हो. आप सोचिए कि अमरीका भी आर्थिक महाशक्ति बनने के बाद ही वैज्ञानिक शक्ति बना. अगर पैसा न हो, आधारभूत ढाँचा न हो तो वैज्ञानिक शोध पीछे छूट जाता है. साथ ही इसके लिए वैज्ञानिक उद्यमशीलता की परपंरा की ज़रूरत होती है जो ब्रिटेन जैसे देशों में हैं. इस सबमें वक्त लगता है. भारत को भी लगेगा. हाँ मैं ये ज़रूर मानता हूँ कि भारत में पिछले 20 सालों में पहले के मुकाबले वैज्ञानिक तरक्की हुई है. मैं काफ़ी आशावान हूँ.
लेकिन वजह क्या है भारत के पीछे छूटने की.
भारत के लिए सबसे बड़ी समस्या है भ्रष्टाचार. लोगों को भर्ती करने तक में भ्रष्टाचार है. चंद उच्च वैज्ञानिक संस्थानों में ऐसा नहीं होता है लेकिन नीचे की ओर जाएँ तो ये समस्या दिखती है. इसे सुलझाना होगा. दूसरी बड़ी समस्या है आधारभूत ढाँचा. अगर रहने को घर नहीं है, बच्चों के लिए अच्छे स्कूल नहीं है तो अच्छे हुनरमंद लोगों को देश में रख पाना मुश्किल हो जाता है. ऐसे कई भारतीय होंगे जो विदेशों से वापस भारत आना चाहेंगे और विज्ञान के क्षेत्र में काम करना चाहेंगे. लेकिन अगर रोज़मर्रा की ज़िंदगी में इतनी दिक्कते होंगी तो वे शायद भारत नहीं आएँगे.
चीन कहाँ खड़ा दिखता है भारत के मुकाबले ?
चीन भारत से मीलों आगे निकल चुका है. मैं एक ही बार चीन गया हूँ लेकिन वहाँ की सुविधाओं, प्लानिंग को देखकर मैं हैरान रहा गया. लेकिन भारत के पक्ष में एक बात ज़रूर जाती है और वो है यहाँ की ओपन सोसाइटी. यहाँ सबको अपनी बात रखने का हक़ है, बहस करने का हक़ है और लोगों को इसके नकारात्मक नतीजे नहीं भुगतने पड़ते. ऐसे खुले माहौल में आप सृजनात्मक होकर काम कर सकते हैं. अगर भारत अपनी कुछ समस्याओं को सुलझा ले तो बहुत आगे तक जा सकता है.
नोबेल पुरस्कार के बाद आपकी ज़िंदगी कैसे बदली है ?
आप चाहें तो शोहरत और अवॉर्ड आपकी ज़िंदगी बदल सकते हैं. लेकिन मैं तो वैसा ही हूँ. मैं आज भी अपनी प्रयोगशाला चलाता हूँ. मेरे पास आज भी गाड़ी नहीं है. हम पहले की तरह आज भी अच्छे शोधपत्र छापते रहते हैं. ज़िंदगी पहले जैसी ही है.
(रामाकृष्णन का जन्म तमिलनाडु के चिदंबरम में हुआ था. उन्होंने बड़ौदा विश्वविद्यालय और फ़िर ओहायो, कैलिफ़ोर्निया और सैन डियागो के विश्वविद्यालयों में पढ़ाई की. उन्हें 2010 में पद्म विभूषण की उपाधि से भी सम्मानित किया गया था)

sabhar :http://www.bbc.co.uk/

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गजब, शादी शुदा औरत का आशिक बन बैठा काला नाग

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पुराने प्यार को निभाना चाहते हैं

पुराने प्यार को निभाना चाहते हैं

इंसान का सांपों से पुराना नाता रहा है। इंसानों ने इन्हें विष के डर से भगवान बना दिया और पूजा करने लगे।

लेकिन यहां तो मामला ही दूसरा है सांपों को इंसानों में अपने पूर्व जन्म के साथी नजर आ रहे हैं और इस जन्म में भी पुराने प्यार को निभाना चाहते हैं।

बेशर्म नाग, परवाह ही नहीं महिला शादी शुदा है


 मामला है उत्तर पश्चिमी श्रीलंका का। अंग्रेजी साप्ताहिक समाचार पत्र न्यूज लंका में बताया गया है कि यहां 30 साल की एक महिला का नाग दीवाना है। शादी शुदा इस महीला के बच्चे भी हैं। लेकिन सांप को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता वह तो अपने पूर्वजन्म की प्रेम कहानी को आज भी जीना चाहता है।

इसलिए सांप महिला को बिना कोई नुकसान पहुंचाए हर समय साथ-साथ रहता है। लेकिन इसे गुस्सा तब आता है जब महिला अपने कमरे में सोने जाती है। इस समय यह महिला के पति और बच्चों को भी उसके पास आने नहीं देता है। इस समस्या का हल यह निकाला गया है कि, शयन कक्ष में एक स्थान बना दिया गया है जहां यह सांप आराम करता है। sabhar :http://www.amarujala.com/

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भारत के 6 अनसुलझे रहस्य...रात को इस मंदिर में रुकने वाले जीवित नहीं बचते !

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भारत के 6 अनसुलझे रहस्य...रात को इस मंदिर में रुकने वाले जीवित नहीं बचते !

भोपाल। भारत यूं तो विविधताओं का देश है, लेकिन इस धरा पर भी कई ऐसी जगह हैं, जो आश्चर्यचकित करने के साथ-साथ डराती भी हैं। इन जगहों में छिपे रहस्यों का अभी तक खुलासा नहीं हो सका है। रहस्य भी ऐसे, जिस पर एकबारगी विश्वास करना मुश्किल होता है। इनमें कई स्थान ऐसे हैं जो विज्ञान को भी चुनौती देते हैं। 
 
पौराणिक मान्यताएं हों या प्रकृति के अनूठी रचना, इन स्थानों को देश के रहस्यमयी इलाकों में गिना जाता है। समय-समय पर इनकी चर्चाएं भी होती हैं, लेकिन आखिरकार नतीजा कुछ नहीं निकल पाता। वास्तविक सच अनसुलझा ही रहता है। आइए जाने कुछ ऐसी ही जगहों के बारे में- 
 
तिब्बत का यमद्वार- जहां रात में रुकने वाला नहीं मिलता जिंदा
 
चीन के स्वायत्त क्षेत्र तिब्बत में दारचेन से 30 मिनट की दूरी पर है यह यम का द्वार। ये पवित्र कैलाश पर्वत के रास्ते में पड़ता है। हिंदू मान्यता अनुसार, इसे मृत्यु के देवता यमराज के घर का प्रवेश द्वार माना जाता है। यह कैलाश पर्वत की परिक्रमा यात्रा के शुरुआती प्वाइंट पर है। तिब्बती लोग इसे चोरटेन कांग नग्यी के नाम से जानते हैं, जिसका मतलब होता है दो पैर वाले स्तूप।
 
ऐसा कहा जाता है कि यहां रात में रुकने वाला जीवित नहीं रह पाता। ऐसी कई घटनाएं हो भी चुकी हैं, लेकिन इसके पीछे के कारणों का खुलासा आज तक नहीं हो पाया है। साथ ही यह मंदिर नुमा द्वार किसने और कब बनाया, इसका कोई प्रमाण नहीं है। ढेरों शोध हुए, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकल सका। 

भारत के 6 अनसुलझे रहस्य...रात को इस मंदिर में रुकने वाले जीवित नहीं बचते !

अंधेरा होते ही खुद-ब-खुद बंद हो जाता है यह मंदिर-
 
वृंदावन का यह मंदिर अपने आप में आज भी रहस्य समेटे हुए हैं। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण एवं श्रीराधा आज भी आधी रात के बाद रास रचाते हैं। रास के बाद निधिवन परिसर में स्थापित रंग महल में शयन करते हैं। रंग महल में आज भी प्रसाद के तौर पर माखन मिश्री रोजाना रखा जाता है। सोने के लिए पलंग भी लगाया जाता है। सुबह जब आप इन बिस्तरों को देखें, तो साफ पता चलेगा कि रात में यहां जरूर कोई सोया है और प्रसाद भी ग्रहण कर चुका है। इतना ही नहीं, अंधेरा होते ही इस मंदिर के दरवाजे अपने आप बंद हो जाते हैं। इसलिए मंदिर के पुजारी अंधेरा होने से पहले ही मंदिर में पलंग और प्रसाद की व्यवस्था कर देते हैं।
 
मान्यता के अनुसार, यहां रात के समय कोई नहीं रहता है, इंसान छोड़िए, पशु-पक्षी भी नहीं। ऐसा बरसों से लोग देखते आए हैं, लेकिन रहस्य के पीछे का सच धार्मिक मान्यताओं के सामने छुप-सा गया है। यहां के लोगों का मानना है कि अगर कोई व्यक्ति इस परिसर में रात में रुक जाता है, तो वह तमाम सासारिक बंधनों से मुक्त होकर मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।

भारत के 6 अनसुलझे रहस्य...रात को इस मंदिर में रुकने वाले जीवित नहीं बचते !

क्या अब भी जिंदा भटक रहे हैं अश्वत्थामा-
 
महाभारत के अश्वत्थामा याद हैं आपको। कहा जाता है कि अश्वत्थामा का वजूद आज भी है। दरअसल, पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने निकले अश्वत्थामा को उनकी एक चूक भारी पड़ी और भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें युगों-युगों तक भटकने का श्राप दे दिया। ऐसा कहा जाता है कि पिछले लगभग पांच हजार वर्षों से अश्वत्थामा भटक रहे हैं। 
मध्यप्रदेश के बुरहानपुर शहर से 20 किमी दूर असीरगढ़ का किला है। कहा जाता है कि इस किले में स्थित शिव मंदिर में अश्वत्थामा आज भी पूजा करने आते हैं। स्थानीय निवासी अश्वत्थामा से जुड़ी कई कहानियां सुनाते हैं। वे बताते हैं कि अश्वत्थामा को जिसने भी देखा, उसकी मानसिक स्थिति हमेशा के लिए खराब हो गई। इसके अलावा कहा जाता है कि अश्वत्थामा पूजा से पहले किले में स्थित तालाब में नहाते भी हैं।
 
बुरहानपुर के अलावा मप्र के ही जबलपुर शहर के गौरीघाट (नर्मदा नदी) के किनारे भी अश्वत्थामा के भटकने का उल्लेख मिलता है। स्थानीय निवासियों के अनुसार, कभी-कभी वे अपने मस्तक के घाव से बहते खून को रोकने के लिए हल्दी और तेल की मांग भी करते हैं। इस संबंध में हालांकि स्पष्ट और प्रमाणिक आज तक कुछ भी नहीं मिला है। 

भारत के 6 अनसुलझे रहस्य...रात को इस मंदिर में रुकने वाले जीवित नहीं बचते !

समुद्र के नीचे श्रीकृष्ण की नगरी द्वारिका-
 
गुजरात के तट पर भगवान श्रीकृष्ण की बसाई हुई नगरी यानी द्वारिका। इस जगह का धार्मिक महत्व तो है ही, रहस्य भी कम नहीं है। कहा जाता है कि कृष्ण की मृत्यु के साथ उनकी बसाई हुई यह नगरी समुद्र में डूब गई। आज भी यहां उस नगरी के अवशेष मौजूद हैं। लेकिन प्रमाण आज तक नहीं मिल सका कि यह क्या है। विज्ञान इसे महाभारतकालीन निर्माण नहीं मानता।
 
काफी समय से जाने-माने शोधकर्ताओं ने यहां पुराणों में वर्णित द्वारिका के रहस्य का पता लगाने का प्रयास किया, लेकिन वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित कोई भी अध्ययन कार्य अभी तक पूरा नहीं किया गया है। 2005 में द्वारिका के रहस्यों से पर्दा उठाने के लिए अभियान शुरू किया गया था। इस अभियान में भारतीय नौसेना ने भी मदद की।अभियान के दौरान समुद्र की गहराई में कटे-छटे पत्थर मिले और यहां से लगभग 200 अन्य नमूने भी एकत्र किए, लेकिन आज तक यह तय नहीं हो पाया कि यह वही नगरी है अथवा नहीं जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने बसाया था। आज भी यहां वैज्ञानिक स्कूबा डायविंग के जरिए समंदर की गहराइयों में कैद इस रहस्य को सुलझाने में लगे हैं। 

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बंगाल में भूतों की रहस्यमयी रोशनी-
 
प.बंगाल के दलदली इलाकों में कई बार रहस्यमयी रोशनी देखे जाने की जानकारी मिली थी। स्थानीय लोगों के मुताबिक, यह उन मछुआरों की आत्माएं हैं, जो मछली पकड़ते वक्त किसी वजह से मर गए थे। लोग इन्हें भूतों की रोशनी भी कहते हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि जिन मछुआरों को यह रोशनी दिखती है, वे या तो रास्ता भटक जाते हैं या ज्यादा दिन जिंदा नहीं रह पाते। इन दलदली क्षेत्रों से कई मछुआरों की लाशें भी मिली हैं, लेकिन स्थानीय प्रशासन यह मानने को तैयार नहीं कि यह भूतों के चलते ऐसा हुआ। उनके मुताबिक, मछुआरों के साथ अक्सर ऐसी दुर्घटनाएं होती रहती हैं। हालांकि अभी तक इस रहस्य से भरी गुत्थी सुलझ नहीं पाई है।
 
वैज्ञानिकों को अंदेशा है कि दलदली क्षेत्रों में अक्सर मीथेन गैस बनती है और वे किसी तत्व के संपर्क में आने से रोशनी पैदा करती हैं।

भारत के 6 अनसुलझे रहस्य...रात को इस मंदिर में रुकने वाले जीवित नहीं बचते !

लेह-लद्दाख का मैग्नेटिक हिल- 
 
लेह-लद्दाख के क्षेत्र में स्थित इस जगह को 'ग्रैविटी हिल' भी कहा जाता है। लेह-कारगिल, श्रीनगर नेशनल हाईवे पर स्थित यह जगह लेह से 50 किमी दूर है और समुद्र तल से 11 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है। मैग्नेटिक हिल लेह आने वाले पर्यटकों के बीच काफी मशहूर है। इस पहाड़ी की खासियत है कि यहां से गुजरने वाली हर कार खुद-ब-खुद रास्ते पर जमी रहती है। सामान्य भाषा में कहें, तो आमतौर पर पहाड़ी रास्तों में हम गाड़ी गियर में खड़ी करते है, लेकिन यहां अगर आप अपनी गाड़ी न्यूट्रल में भी खड़ा कर दें, तो भी गाड़ी घाटी से नीचे नहीं फिसलेगी। 
 
हालांकि यह लोगों का भ्रम है कि पहाड़ी के ऊपर गाड़ियां घूमने लगती हैं, लेकिन वैज्ञानिक रूप से इसके पीछे जो कारण छिपा है, उसके मुताबिक, यह विशुद्ध रूप से 'ऑप्टिकल इफेक्ट' के चलते होता है, जो पहाड़ी की वास्तविक और विशिष्ट बनावट के चलते उत्पन्न होता है।  sabhar :http://www.bhaskar.com/




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मंगलवार, 15 अप्रैल 2014

रोबोटों की दुनिया

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जर्मनी के हनोवर शहर में जारी उद्योग मेले में दिखाए गए रोबोट कारोबारियों के लिए ही नहीं आम दर्शकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं. देखिए एक झलक.
Hannovermesse Roboter Känguru 2014

कुचालें भरता कंगारू
कंगारू ऊर्जा के कुशल उपयोग का रोल मॉडल हैं. फेस्टो नामकी कंपनी ने कंगारू के जैसा दिखने वाला और उसी की तरह छलांगें लगाने वाला एक रोबोट बनाया है जो हाथ के इशारे पर कूदता या रुकता है.



Hannover Messe 08.04.2014 Roboter FROG


टूर गाइड 'फ्रॉग'
ट्विनी यूनिवर्सिटी ने 'फ्रॉग' नामका एक ऐसा रोबोट तैयार किया है जो अपनी मनमोहक बातों, तस्वीरों और वीडियो से पर्यटकों को अपने साथ बांधे रखता है. इसे परखने के लिए इसका इस्तेमाल कुछ चिड़ियाघरों में किया जा चुका है.

टूर गाटूर गाइड 'फ्रॉग'

ट्वHannover Messe 08.04.2014 Roboter Road Runner

ये हैं रोबो 'रोडरनर'
इस 12 पैरों वाले चलते फिरते और दोड़ते रोबोट को बनाया है ब्रेमेन यूनिवर्सिटी के रिसर्चरों ने. केकड़ों, कीड़ों और मकड़ियों जैसे जीवों से प्रेरणा लेकर इस रोबोट को चलाने का तरीका विकसित किया गया



Hannovermesse Vogel-Roboter 2014


ड्यूटी भी निभाते हैं
हॉलैंड में बनी यह खास उड़ने वाली रोबोटिक चिड़िया हवाई अड्डों पर एक खास भूमिका निभाती है. अपनी खतरनाक शक्ल से यह बाकी पक्षियों को डराती है जिससे वे एयरक्राफ्ट के टरबाइन में फंसने से बच जाते हैं और हवाई अड्डों का खर्च भी बचता है.
Hannovermesse Roboter 2014

मुश्किल काम चुटकियों में
कहीं तार लगाना हो या कनेक्शन जोड़ना हो, आपको सिर्फ आदेश देना है और बड़ी बड़ी फैक्ट्रियों में भी रोबोट सही जगह जाकर काम को तुरंत अंजाम दे पाते हैं. इससे उत्पादन की प्रक्रिया तो तेज होनी ही है.


Hannovermesse Roboterarm 2014


हाथी सूंड जैसा रोबोआर्म
फेस्टो कंपनी का बनाया रोबोटिक हाथ, हाथी की सूंड से प्रेरित है. ऐसा हाथ जो चीजों को बड़ी ही मजबूती से पकड़ता है और उतनी ही खूबी से एक जगह से दूसरी जगह तक पहुंचाता भी है.

Hannovermesse Produktionsanlage 2014

तेज और किफायती
बड़ी बड़ी कार फैक्ट्रियों में तेज काम करने के साथ साथ पर्यावरण को नुकसान ना पहुंचाने वाले तरीके अपनाए जा रहे हैं. रोबोटों के इस्तेमाल से इन चीजों के साथ साथ, खर्च भी कम आ रहा है. sabhar :http://www.dw.de/










ड्यूटी भी निभाते हैं

हॉलैंड में बनी यह खास उड़ने वाली रोबोटिक चिड़िया हवाई अड्डों पर एक खास भूमिका निभाती है. अपनी खतरनाक शक्ल

 से यह बाकी पक्षियों को डराती है जिससे वे एयरक्राफ्ट के टरबाइन में फंसने से बच जाते हैं और हवाई अड्डों का खर्च भी बचता है.


ये हैं रोबो 'रोडरनर'

इस 12 पैरों वाले चलते फिरते और दोड़ते रोबोट को बनाया है ब्रेमेन यूनिवर्सिटी के रिसर्चरों ने. केकड़ों, कीड़ों और मकड़ियों जैसे जीवों से प्रेरणा लेकर इस रोबोट को चलाने का तरीका विकसित किया गया

वर्सिटी ने 




'फ्रॉग' नामका एक ऐसा रोबोट तैयार किया है जो अपनी मनमोहक बातों,टूर गाइड 'फ्रॉग'



ट्विनी यूनिवर्सिटी ने 'फ्रॉग' नामका एक ऐसा रोबोट तैयार किया है जो अपनी मनमोहक बातों, तस्वीरों और वीडियो से पर्यटकों को अपने साथ बांधे रखता है. इसे परखने के लिए इसका इस्तेमाल कुछ चिड़ियाघरों में किया जा चुका है. तस्वीरों और वीडियो से पर्यटकों को अपने साथ बांधे रखता है. इसे परखने के लिए इसका इस्तेमाल कुछ चिड़ियाघरों में किया जा चुका है.इड 'फ्रॉग'


ट्विनी यूनिवर्सिटी ने 'फ्रॉग' नामका एक ऐसा रोबोट तैयार किया है जो अपनी मनमोहक बातों, तस्वीरों और वीडियो से पर्यटकों को अपने साथ बांधे रखता है. इसे परखने के लिए इसका इस्तेमाल कुछ चिड़ियाघरों में किया जा चुका है.


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सूरत को 'स्मार्ट सिटी' बनाएगी माइक्रोसॉफ्ट

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सूरत। दुनिया की दिग्गज सॉफ्टवेयर कंपनी माइक्रोसॉफ्ट कॉरपोरेशन ने भारत में पहली 'स्मार्ट सिटी' बनाने के लिए सूरत शहर को चुना है। कंपनी ने 'सिटी नेक्स्ट'़ पहल पिछले साल लांच की थी। सिटी नेक्स्ट पहल के तहत माइक्रोसॉफ्ट क्लाउड टेक्नोलॉजी, मोबाइल एप्लीकेशन, डाटा ऐनालिटिक्स और सोशल नेटवर्क को एक साथ मिलाकर नागरिक सेवाओं को रियल टाइम में डाटा उपलब्ध कराना चाहती है।
सिस्टम को इस तरह विकसित किया जाएगा कि सूचना प्रौद्योगिकी की मदद से प्राकृतिक आपदा के दौरान हालात अच्छे से संभालने का काम कर सके। सूरत नगर निगम के उपायुक्त सीवाय भट्ट ने इसका उदाहरण देते हुए बताया कि अगर किसी को शहर में डॉक्टर का पता लगाना हो तो, वह आसानी से माइक्रोसॉफ्ट द्वारा बनाए गए मोबाइल एप की मदद से यह जानकारी जुटा सकेगा। यह प्रोजेक्ट मई के अंत तक शुरू होगा।
विज्ञान केंद्र में आभासी दुनिया बनाने में भी माइक्रोसॉफ्ट सूरत नगर पालिका की मदद करेगा। इसमें एक आभासी दीवार भी बनाई जाएगी। नगर निगम के आयुक्त मनोज दास का कहना है कि यह प्रोजेक्ट सूरत को देश की पहली स्मार्ट सिटी के रूप में विकसित करने के लिए तैयार किया जाएगा। दास का कहना है कि नगर निकाय आभासी दुनिया और असली दुनिया के बीच सभी पहलुओं को जोड़ने की योजना बना रहा है।
आसान हो जाएंगे काम
माइक्रोसॉफ्ट की टीम सूरत नगर निगम के सभी विभागों में ई-गवर्नेस की स्थिति देखने आ चुकी है, ताकि इस प्रोजेक्ट को ज्यादा उपयोगी बनाया जा सके। स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में टाउन प्लानिंग डिपार्टमेंट का काम और भी आसान हो जाएगा। फिलहाल डेवलपर टीपी डिपार्टमेंट में लगातार आ रहे हैं, ताकि उनका प्लान जल्द मंजूर हो जाए। योजना के डायरेक्टर जीवन पटेल का कहना है कि जब तक नया एप बनता है, एक वास्तुकार ऑनलाइन योजना पेश कर सकता है और प्रगति पर नजर रख सकता है। इससे दोनों तरफ से समय, पैसे और ऊर्जा की बचत होगी। sabhar :http://www.jagran.com/

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मच्छरों को मारेंगे, वाईफाई से चलेंगे ये स्मार्ट एसी

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नई दिल्ली। इन दिनों बाजार इनोवेटिव और हाईटेक एसी से पट गया है। गर्मियों के सीजन का फायदा उठाने के लिए कंपनियों ने एसी के आकर्षक मॉडल उतारे हैं।
वोल्टास, सैमसंग, एलजी और हायर समेत करीब-करीब सभी बड़ी कंपनियों ने स्मार्ट एसी की नई रेंज उतारी है। वोल्टास ने 68 नए मॉडल उतारे हैं। क्लासिक, डीलक्स, ऐलिगेंट, लग्जरी और प्रीमिया की ये खास सीरीज 16,000 से लेकर 45,000 रपए तक की है।
सैमसंग ने डिजिटल इंवर्टर एयरकंडीशनर, वायरस डॉक्टर और ईजी फिल्टर जैसी टेक्नोलॉजी वाली एसी उतारी है। कंपनी का दावा है कि ये एसी में हवा में फैली धूल-मिट्टी को साफ कर देती हैं। कंपनी के मुताबिक, 100 फीसद शुद्ध हवा मिलती है।
ज्यादा कूलिंग, मच्छरों से मुक्ति
सैमसंग के मुताबिक डिजिटल इंवर्टर एसी दूसरे एसी के मुकाबले 26 फीसद ज्यादा कूलिंग करेगी। कंपनी की नॉर्मल स्प्लीट के मुकाबले डिजिटल इंवर्टर एसी की कीमत करीब 12,000 रपए ज्यादा है। इस मुकाबले एलजी ने मॉस्क्यूटो अवे यानी ठंडी हवा के साथ-साथ मच्छरों से छुटकारा दिलाने वाले एयरकंडीशनर पेश किए हैं।
वाई-फाई सुविधा
हायर ने आई कूल विद वाई--फाई फैसिलिटी पेश की है। इसके जरिए एंड्राइड फोन से किसी भी जगह से कमरे की एसी चलाई जा सकती है। इसमें नैनो टेक्नोलॉजी है, जिससे त्वचा को पर्याप्त मात्रा में नमी मिलेगी। इसकी कीमत 45,000 रपए से 60,000 रपए के बीच है। कंपनियों ने उम्मीद जताई है कि नई लांच के सहारे वे इस गर्मी में पिछले साल के मुकाबले 15 प्रतिशत ज्यादा बिक्री कर पाएंगी।
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झुर्रियां दूर भगाना चाहते हैं आपके लिए खुशखबरी है

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wrinkles removal protein supplement

झुर्रियां दूर भगाना चाहते हैं और लंबे समय तरह जवां दिखना चाहते हैं तो आपके लिए खुशखबरी है।

स्किन फार्माकोलॉजी एंड फीजियोलॉजी जर्नल में प्रकाशित दो नए शोधों में नए किस्म के कोलॉजन प्रोटीन सप्लीमेंट की खोज की गई है जिसके सेवन से झुर्रियों को घटाया जा सकता है।शोधकर्ताओं का दावा है कि इस प्रोटीन युक्त सप्लीमेंट के सेवन से झुर्रियों को महन आठ सप्ताह में 20 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है।शोध के दौरान 200 महिलाओं को वेरिजोल नामक कोलाजन सप्लीमेंट की डोज दी गई। पाया गया कि 45 से 65 वर्ष की 114 महिलाओं के चेहरे पर आठ सप्ताह से भीतर झुर्रियां 20 प्रतिशत तक कम हुईं और कुछ महिलाओं की आंखों के नीचे स्थित झुर्रियां 50 प्रतिशत तक कम हुई हैं।

शोधकर्ताओं का मानना है कि कोलाजन पेप्टाइड नामक शरीर में तेजी से प्रवेश करता है इसलिए इस सप्लीमेंट का इस्तेमाल कई एंटीरिंकल उत्पादों में इसका इस्तेमाल होता है और इस नई खोज के बाद इसको अधिक प्रभावी बनाना आसान हो सकता है। sabhar :http://www.amarujala.com/

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कृत्रिम तरीके से विकसित हो सकेंगे महिलाओं के जननांग

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first succesful vagina transplant
अमरीका में डॉक्टरों ने प्रयोगशाला में स्त्री जननांगों को विकसित कर उसे चार महिलाओं में प्रत्यारोपित किया है।

इन चारों महिलाओं के जननांग माँ के गर्भ में पर्याप्त रूप से विकसित नहीं हो पाए थे। यह एक तरह का शारीरिक विकार होता है जिसमें स्त्री जननांग का विकास जन्म से ही अधूरा रहता है।प्रत्येक महिला के लिए सही आकार का स्त्री जननांग विकसित करने के लिए अच्छी तरह से ऊतकों का मिलान करना ज़रूरी था इसके लिए एक ऊतक के नमूने का इस्तेमाल किया गया।प्रत्यारोपण के बाद सभी महिलाओं में "इच्छा, कामोत्तेजना, गीलापन, संभोग सुख, संतुष्टि" और दर्द रहित संभोग के सामान्य लक्षण देखे गए।

इस उपचार में शल्य चिकित्सा की मदद से तैयार किए गए कटोरे की तरह के छेद का इस्तेमाल किया जाता है जो तो आंत की त्वचा से बना था।स्त्री जननांग प्रत्यारोपण
उत्तरी केरोलिना के वेक फॉरेस्ट बैपटिस्ट मेडिकल सेंटर के डॉक्टरों ने इन चारों महिलाओं के स्त्री जननांग के निर्माण में उत्कृष्ट तकनीक का इस्तेमाल किया। ये चारों महिलाएँ किशोरावस्था की थी।

चिकित्सकीय प्रक्रिया के तहत पेड़ू क्षेत्र का स्कैन किया गया और उसका इस्तेमाल प्रत्येक रोगी के लिए 3 डी परत वाली एक ट्यूब डिजाइन करने के लिए किया गया।

एक छोटा सा ऊतक कम विकसित स्त्री जननांग से लिया गया और प्रयोगशाला में कोशिकाओं को बड़े पैमाने पर विकसित किया गया।

मांसपेशियों की कोशिकाएँ बाहर की तरफ से परत के साथ और अंदर की तरफ से स्त्री जननांग की कोशिकाओं के साथ जुड़ी थीं।

स्त्री जननांगों को एक बायोरिएक्टर में बड़े ही सावधानी से उस समय तक विकसित किया गया जब तक वे शल्य चिकित्सा के माध्यम से प्रत्यारोपित करने के लिए लायक नहीं हो गए।

सभी महिलाओं में यौन क्रियाएँ अब समान्य है।

असामान्यताएँ
स्त्री जननांग के विकास में अवरोध प्रजनन अंगों में अन्य असामान्यताएँ पैदा कर सकते हैं। इनमें से दो महिलाओं में स्त्री जननांग गर्भाशय से जुड़ा था।

गर्भधारण का कोई मामला नहीं था लेकिन उन महिलाओं में यह सैद्धांतिक रूप से संभव है।

वेक फॉरेस्ट बैपटिस्ट मेडिकल सेंटर में निदेशक डॉ. एंथोनी एटाला ने बीबीसी समाचार वेबसाइट को बताया, "वास्तव में हमने पहली बार पूरे अंग को बनाया है यह एक चुनौती थी।"

उन्होंने कहा कि एक क्रियाशील स्त्री जननांग इन महिलाओं के जीवन के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण बात है और इससे उनके जीवन में होने वाली तब्दीली देखना "पुरस्कृत होने जैसा" था।

यह पहली दफा है जब प्रत्यारोपण के परिणाम की रिपोर्ट आई है हालांकि, पहला प्रत्यारोपण आठ साल पहले हुआ था। sabhar :http://www.amarujala.com/

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तीन मिनट तक दिखा यूएफओ, लड़की ने कैमरे में किया कैद!

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ये रिंग क्या है?

ये रिंग क्या है?


हर रोज की तरह उस दिन भी 16 साल की जॉर्जीना हीप अपनी मां के साथ अपने घर के बाहर टेनिस खेल रही थी।

टेनिस खेलते हुए कुछ वक्त बीता ही था कि जॉ‌र्जीना को आसमान में एक काले रंग की रिंग जैसी कोई चीज नजर आई।

काले रिंग जैसी दिखने वाली वो चीज क्या थी, ये जॉर्जीना और उसकी मां समझ ही नहीं पा रहे थे।
तीन मिनट तक रहा वो

दोनों ने गौर से देखा कि वो कोई चिड़िया या फिर आमतौर पर दिखने वाली चीज नहीं थी।

वो जो भी कुछ था पूरे तीन मिनट तक रहा और फिर धीरे-धीरे और ऊपर की तरफ जाते-जाते गुम हो गया। 

इस पूरे घटनाक्रम को जॉर्जीना ने अपने कैमरे में कैद किया। जॉर्जिना का कहना है कि उसने यूएफओ को देखा है।
मौसम विभाग हो गया परेशान

मौसम विभाग हो गया परेशान

जॉर्जीना की तस्वीरें देखकर मौसम विभाग भी परेशान हो गया। जॉर्जीना का कहना था कि उस दिन मौसम भी सामान्य था और आस-पास कहीं आग लगने की भी खबर नहीं थी।

इसलिए आसमान में काले धुंए जैसी चीज बनने की वजह क्या थी, ये कहना अभी भी मुश्किल है।

ब्रिटेन के वॉर्कविकशायर के लीमिंगटन स्पा में ही इस यूएफओ जैसी चीज को देखा गया और फिर वो पूरी तरह से गायब ही हो गया। sabhar :http://www.amarujala.com/


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सोमवार, 14 अप्रैल 2014

आप अपनी जेब में रख सकते हैं मोबाइल प्रिंटर

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इसराइल आधारित  Zuta लैब्स एक वायरलेस मुक्त घूम मोबाइल प्रिंटर का अनावरण किया जेब के आकार के रोबोट एक पृष्ठ प्रिंट  करने के लिए एक मिनट के बारे में लेता है  यह  अपने हाथ में फिट करने के लिए काफी छोटा है और यह किसी भी कागज पर मुद्रित कर सकते हैं यह गैजेट जनवरी 2015 में बिक्री  के लिए होगा



Zuta लैब्स अभिनव जेब प्रिंटर आप चाहते हैं जहाँ भी मुद्रित करने के लिए सक्षम हो जाएगा



आप इसे मुद्रित करना चाहते हैं क्या छोटा रोबोट बताने के लिए अपने स्मार्टफोन का उपयोग कर सकते हैं

मिनी प्रिंटर एक रिचार्जेबल बैटरी है और smartphones और पीसी के साथ कनेक्ट कर सकते हैं.
यह भी उपयोगकर्ता कागज के किसी भी आकार पर मुद्रित करने के लिए अनुमति देता है.
डिवाइस के नीचे एक रपट हैच का उपयोग करके काम करता है. प्रिंटर सक्रिय होता है, इस इंकजेट का पता चलता है.

आयाम: उच्च 4 इंच (10 सेमी) और व्यास में 4.5 इंच (11.5 सेमी).
वजन: 300 ग्राम (0.66 पाउंड)
प्रति मिनट 1.2 पृष्ठों: स्पीड प्रिंट.
मुद्रण गुणवत्ता: 96x192 डीपीआई (और अंततः उच्च)
इंक: एक काले कारतूस.
संपर्क: वायरलेस.
इंटरफ़ेस: ब्लूटूथ
बैटरी: 1 घंटा.
ऑपरेटिंग सिस्टम: एंड्रॉयड, आईओएस, लिनक्स, OSX, Windows.

sabhar :
/www.dailymail.co.uk




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दिन भर में 50 बार ऑर्गज़्म फील करती है अमांडा

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फ्लोरिडा. अनेक सेक्स सर्वे ये बता चुके हैं कि हर संभोग के बाद महिला को ऑर्गज़्म (चरम सुख) हासिल हो यह जरूरी नहीं. बल्कि इन सर्वे के मुताबिक बहुसंख्यक महिलाएं जीवन भर इसके लिए तरसती रहती हैं और कई तो जानती तक नहीं कि ये सुख होता क्या है. ऐसे में एक ऐसी लड़की के बारे में जानना दिलचस्प होगा जिसे दिन भर में 50 बार ऑर्गज़्म का अहसास होता है.
यह जानकार अगर कोई ये सोचे कि यह लड़की बेहद कामुक होगी तो ग़लत होगा. यह 24 साल की लड़की एक ऐसे बीमारी से ग्रस्त है जिसके कारण यह एक दिन में 50 बार उत्तेजित हो जाती है और उसे ऑर्गज्म का अहसास होता है.
अमेरिका के फ्लोरिडा की रहने वाली 24 साल की अमांडा ग्रेस बीते एक दशक से पर्सिस्टेंट जेनिटल अरॉउजल डिसऑर्डर (पीजीएडी) से ग्रस्त है. अपनी इस बीमारी से परेशान अमांडा अपनी जिंदगी बदलना चाहती है. इसके लिए अमांडा का ब्वायफ्रेंड उसका साथ दे रहा हैं तथा उसकी चिकित्सीय देखभाल भी करता है. हालांकि, अमांडा और उसके 22 साल के ब्वायफ्रेंड स्टुअर्ट ट्रिपलेट डॉक्टरों की सलाह पर एक-दूसरे से यौन संबंध बनाने से दूर ही रहते हैं.
अपनी बीमारी के बारे में अमांडा कहती हैं कि कई ऐसी बातें हैं जो मेरे पीजीएडी को बढ़ा देते हैं जिनमें वाइब्रेशंस, कार या ट्रेन में सवारी शामिल हैं. अमांडा का कहना है कि यह कभी भी हो सकती है और कभी-कभी तो एक के बाद एक पांच बार मुझे इस समस्या का सामना पड़ता है.
यह कहीं से भी आनंददायक नहीं होता और यह मेरे लिए एक टॉर्चर की तरह होता है. इस संबंध में अमांडा का इलाज कर रहे एक पेल्विक पेन एक्सपर्ट से पूछा गया तो उसने बताया कि बहुत जल्द ही अमांडा अपने ऑर्गज्म पर नियंत्रण पा लेंगी.sabhar :http://www.palpalindia.com/


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रविवार, 13 अप्रैल 2014

कैसे होता है क्वांटम टेलीपोर्टेशन

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टेलीपोर्टेशन एक आदर्श प्रतिरूप कहीं और दिखाई देता है , जबकि एक वस्तु या व्यक्ति एक ही स्थान पर बिखर बनाने के करतब करने के लिए विज्ञान कथा लेखकों द्वारा दिया गया नाम है . कैसे यह आमतौर पर विस्तार से समझाया नहीं है पूरा किया , लेकिन सामान्य विचार मूल उद्देश्य से सभी जानकारी निकालने के लिए इस तरह के रूप में स्कैन किया जाता है कि प्रतीत हो रहा है , तो यह जानकारी प्राप्त स्थान के लिए प्रेषित किया और निर्माण करने के लिए प्रयोग किया जाता है प्रतिकृति , जरूरी नहीं कि मूल के वास्तविक सामग्री है, लेकिन शायद मूल रूप में बिल्कुल एक ही पैटर्न में व्यवस्था की एक ही प्रकार के परमाणुओं से से . एक टेलीपोर्टेशन मशीन यह 3 आयामी वस्तुओं के साथ ही दस्तावेजों पर काम करेगा , सिवाय इसके कि यह एक सटीक प्रतिलिपि बजाय एक अनुमानित प्रतिकृति का उत्पादन होगा , और यह कि यह स्कैनिंग की प्रक्रिया में मूल को नष्ट करेगा , एक फैक्स मशीन की तरह होगा . कुछ विज्ञान कथा लेखकों के मूल को संरक्षित कि teleporters पर विचार , और साजिश जटिल हो जाता है जब एक ही व्यक्ति से मिलने का मूल और teleported संस्करणों ; लेकिन teleporter के अधिक आम प्रकार नहीं आत्मा और शरीर के लिए एक आदर्श प्रतिलिपिकार के रूप में , एक सुपर परिवहन उपकरण के रूप में कार्य कर रहा है, मूल नष्ट कर देता है .
छह वैज्ञानिकों
\Six scientists


1993 में आईबीएम बंदे चार्ल्स एच. बेनेट सहित छह वैज्ञानिकों की एक अंतरराष्ट्रीय समूह , उत्तम टेलीपोर्टेशन सिद्धांत रूप में वास्तव में संभव है कि दिखाकर विज्ञान कथा लेखकों के बहुमत के intuitions की पुष्टि की , लेकिन मूल नष्ट हो जाता है तभी. बाद के वर्षों में , अन्य वैज्ञानिकों फोटॉनों , सुसंगत प्रकाश क्षेत्रों , परमाणु spins, और फंस आयनों सहित प्रणालियों की एक किस्म में प्रयोगात्मक टेलीपोर्टेशन का प्रदर्शन किया है . टेलीपोर्टेशन ( शायद unltimately एक "मात्रा इंटरनेट " के प्रमुख) लंबी दूरी क्वांटम संचार की सुविधा है, और यह बहुत आसान काम कर रहे एक क्वांटम कंप्यूटर का निर्माण कर रही है, आदिम संसाधित करने में कोई जानकारी के रूप में काफी उपयोगी हो वादा किया है . लेकिन विज्ञान कथा प्रशंसकों कोई इसे ऐसा करने के लिए किसी भी मौलिक कानून का उल्लंघन नहीं होता है, भले ही इंजीनियरिंग के कारणों की एक किस्म के लिए , निकट भविष्य में लोगों को या अन्य macroscopic वस्तुओं teleport करने में सक्षम होने की उम्मीद है कि जानने के लिए निराश हो जाएगा .
यह एक परमाणु या अन्य वस्तु में सभी जानकारी निकालने से किसी को मापने या स्कैनिंग प्रक्रिया मनाही जो क्वांटम यांत्रिकी की अनिश्चितता सिद्धांत का उल्लंघन माना गया था क्योंकि अतीत में, टेलीपोर्टेशन का विचार है, वैज्ञानिकों ने बहुत गंभीरता से नहीं लिया गया था . एक वस्तु की मूल स्थिति पूरी तरह से एक आदर्श प्रतिरूप बनाने के लिए पर्याप्त जानकारी निकाले बिना अभी भी बाधित किया गया है , जहां एक बिंदु तक पहुँच जाता है जब तक अनिश्चितता सिद्धांत के अनुसार, अधिक सही एक वस्तु , और यह प्रक्रिया स्कैनिंग से परेशान है , जांच होती है . इस टेलीपोर्टेशन के खिलाफ एक ठोस तर्क की तरह लगता है : एक एक सही प्रतिलिपि बनाने के लिए एक वस्तु से पर्याप्त जानकारी नहीं निकाल सकते हैं, यह एक सही प्रतिलिपि नहीं बनाया जा सकता है कि प्रतीत होता है. लेकिन छह वैज्ञानिकों आइंस्टीन - Podolsky - रोजेन प्रभाव के रूप में जाना जाता है क्वांटम यांत्रिकी के एक मशहूर और उलटी सुविधा का उपयोग कर , इस तर्क के आसपास चलाने के लिए एक अंत करने के लिए एक रास्ता मिल गया. दूसरे में , आइंस्टीन - Podolsky - रोजेन प्रभाव के माध्यम से पारित करने के लिए जानकारी का शेष , unscanned , भाग खड़ी कर रहा है, जबकि संक्षेप में , वे , एक teleport करना चाहती है जो एक वस्तु एक से जानकारी का हिस्सा बाहर स्कैन करने के लिए एक रास्ता मिल गया ए के साथ संपर्क में कभी नहीं किया गया है, जो वस्तु सी
आंकड़ा
figure
बाद में, सी के लिए स्कैन से बाहर जानकारी के आधार पर एक उपचार लागू करने से , यह यह स्कैन किया गया था पहले एक में था के रूप में बिल्कुल एक ही राज्य में सी पैंतरेबाज़ी करने के लिए संभव है . एक ही अच्छी तरह से तो क्या हासिल किया गया है टेलीपोर्टेशन , नहीं प्रतिकृति है , स्कैनिंग से बाधित कर रहा है, उस राज्य में नहीं रह गया है .
चित्रा पता चलता है, जानकारी के unscanned भाग ए क्या साथ फिर सी के साथ पहले सूचना का आदान प्रदान और जो एक मध्यस्थ वस्तु बी , सी के लिए एक से अवगत करा दिया है ? यह वास्तव में "पहले सी के साथ और फिर एक साथ " कहने के लिए सही हो सकता है? निश्चित रूप से, सी के लिए एक से कुछ व्यक्त करने के क्रम में , प्रसव वाहन के आसपास के अन्य रास्ता नहीं , सी से पहले एक का दौरा करना चाहिए . लेकिन किसी भी सामग्री कार्गो के विपरीत , और यहां तक ​​कि साधारण जानकारी के विपरीत , वास्तव में इस तरह के एक पिछड़े फैशन में दिया जा सकता है , कि जानकारी का एक सूक्ष्म , बिना स्कैन योग्य तरह है . यह अल्बर्ट आइंस्टीन , बोरिस Podolsky , और नाथन द्वारा एक प्रसिद्ध अखबार में चर्चा की गई है, जब भी "आइंस्टीन - Podolsky - रोजेन ( EPR ) सहसंबंध " या " उलझन " नामक सूचना के इस सूक्ष्म प्रकार , कम से कम आंशिक रूप से 1930 के दशक के बाद से समझ में आ गया है रोजेन . 1960 में जॉन बेल संपर्क में एक बार किया गया लेकिन बाद में सीधे बातचीत करने के लिए बहुत दूर ले जाने के जो उलझ कण, की एक जोड़ी भी मानना ​​है कि शास्त्रीय आंकड़े से समझाया जा करने के लिए सहसंबद्ध है कि व्यक्तिगत रूप से यादृच्छिक व्यवहार प्रदर्शित कर सकते हैं कि पता चला है . फोटॉनों और अन्य कणों पर प्रयोग बार बार इस तरह बड़े करीने से उन्हें जो बताते हैं कि क्वांटम यांत्रिकी , की वैधता के लिए पुख्ता सबूत उपलब्ध कराने , इन सहसंबंध की पुष्टि की है . EPR सहसंबंध के बारे में एक और अच्छी तरह से ज्ञात तथ्य यह है कि वे खुद के द्वारा एक सार्थक और चलाया संदेश उद्धार नहीं हो सकता है . यह उनकी ही उपयोगिता क्वांटम यांत्रिकी की वैधता साबित करने में लगा था. लेकिन अब यह क्वांटम टेलीपोर्टेशन का घटना के माध्यम से , वे बाहर स्कैन और परंपरागत तरीके से वितरित किया जाना बहुत नाजुक है जो एक वस्तु में जानकारी की है कि वास्तव में हिस्सा वितरित कर सकते हैं , कि जाना जाता है.

आंकड़ा
figure
यह आंकड़ा क्वांटम टेलीपोर्टेशन (ऊपर देखें) के साथ पारंपरिक प्रतिकृति संचरण तुलना . पारंपरिक प्रतिकृति संचरण में मूल इसके बारे में आंशिक जानकारी निकालने , स्कैन , लेकिन कम या ज्यादा अक्षुण्ण स्कैनिंग प्रक्रिया के बाद बनी हुई है . स्कैन किए गए जानकारी यह मूल की एक अनुमानित नकल का उत्पादन करने के लिए कुछ कच्चे माल (जैसे पेपर) पर अंकित है जहां प्राप्त स्टेशन , के लिए भेजा है . इसके विपरीत, क्वांटम टेलीपोर्टेशन में , दो वस्तुओं बी और सी के पहले से संपर्क में लाया जाता है और फिर अलग हो रहे हैं . वस्तु सी प्राप्त स्टेशन पर ले जाया गया है, जबकि वस्तु बी , भेजने के स्टेशन पर ले जाया जाता है . भेजने स्टेशन वस्तु बी पर एक जानकारी यह किसी एक का चयन करने के लिए प्रयोग किया जाता है जहां प्राप्त स्टेशन के लिए भेजा जाता है स्कैन किया पूरी तरह से एक और बीके राज्य में खलल न डालें कुछ जानकारी और उपज , teleport करना चाहती है जो एक मूल वस्तु के साथ एक साथ स्कैन किया जाता है जिससे ए के पूर्व राज्य के एक सटीक प्रतिकृति में सी डाल , सी वस्तु को लागू करने के लिए कई उपचार की

sabhar :http://researcher.watson.ibm.com/

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युवा IAS, कभी कम्प्यूटर गेम बनाते थे, आज संभालते हैं सारा शहर!

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इंटरव्यू: युवा IAS, कभी कम्प्यूटर गेम बनाते थे, आज संभालते हैं सारा शहर!

यह हैं भोपाल म्यूनिसिपल कार्पोरेशन (बीएमसी) के कमिश्नर विशेष गढ़पाले। उम्र 32 वर्ष; और बैच वर्ष 2008! यानी प्रशासनिक अनुभव करीब 6 वर्ष। लेकिन इतने अल्प समय में भी विशेष अपनी विशेषताओं के लिए पहचाने जाने लगे हैं। पढि़ए एक युवा आईएएस की जुबानी; उसके जीवन, संघर्ष और कार्यशैली की कहानी।

भोपाल। यह कोई बहुत पुरानी बात नहीं है। 1984 की गैस त्रासदी ही अब तक भोपाल की अंतरराष्ट्रीय पहचान रही है। लेकिन यह पहचान भोपालियों के लिए कोई गौरव की बात नहीं; बल्कि आजन्म-कष्ट और शताब्दियों तक भोगने वाली जिंदगी का फलसफा भर है।

वर्ष, 2009 में भोपाल में बस रेपिड ट्रांजिट सिस्टम (बीआरटीएस) का सफर शुरू हुआ। तब तक शायद ही किसी को ऐसी उम्मीद रही होगी, कि बीआरटीएस न सिर्फ भोपाल; बल्कि देश में एक नई पहचान स्थापित करेगा। भोपाल शहर की जीवनशैली और स्तर दोनों के लिए यह विशेषताओं भरा साबित होगा।

भोपाल बीआरटीएस तमाम तकनीकी और व्यावहारिक दिक्कतों को सुलझाते हुए भोपाल की एक अलग पहचान बना है। इसे विशेषज्ञों ने तुलनात्मक रूप से अहमदाबाद(गुजरात) से बेहतर माना है।

बीएमसी कमिश्नर विशेष गढ़पाले बगैर लाग-लपेट के स्वीकारते हैं-मैं मानता हूं कि, बीआरटीएस में खामियां रही होंगी या अब भी दिखाई दे रही हों, लेकिन शुरुआत तो कहीं से करनी ही होती है। काम होगा, तभी परेशानियां और त्रुटियां सामने आएंगी। अगर हम रुकें नहीं; थकें नहीं और बगैर निराश हुए बराबर उस कार्य में जुटे रहें, तो सारी समस्याएं एक-एक करके खत्म हो जाती हैं।

विशेष को हाल में मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी ने विधानसभा चुनाव में प्रदेशस्तर पर उल्लेखनीय कार्य के लिए प्रशंसा पत्र से नवाजा है। विशेष कहते हैं, मेरा मानना है कि जिंदगी की तमाम जिम्मेदारियों में 100 प्रतिशत नंबर लाने वाले ही सफल नहीं हैं, 33 प्रतिशत वाले भी उतने ही बेहतर हैं। क्योंकि उन्होंने पास होने का जतन किया और असफलता की लाइन को पार किया। अगर आपको कुछ अच्छा हासिल करना है, तो सबकी सुनो, क्योंकि एक अच्छा श्रोता ही समस्याओं का समाधान ढूंढ पाता है।
मैं सदैव अपने आसपास सबकुछ अच्छा देखना चाहता हूं
मूलत: मैं बालाघाट से हूं। मेरे पापा स्व. आईडी गढ़पाले स्टेट बैंक आफ इंडिया(एसबीआई) में थे। उनका ट्रांसफर होता, तो मेरा भी स्कूल बदल जाता। यानी मेरी स्कूलिंग कई शहरों में हुई। मैं संवेदनशील व्यक्तित्व का हूं। हर चीज मुझे छू जाती है। मैं अपने आसपास एक बेहतर जिंदगी देखना चाहता था। उस वक्त सोचता था कि कलेक्टर ही एक ऐसा व्यक्ति है, जो अपने शहर में सबकुछ करता है। उसके पास वो सारे अधिकार हैं, जो एक शहर को बेहतर बना सकते हैं। साफ-सुथरा बना सकते हैं। वह करप्शन पर कंट्रोल कर सकता है। वो जनता के दु:ख-दर्द और उनकी समस्याओं का समाधान करने की ताकत रखता है, अधिकार रखता है। बस मैं भी कलेक्टर बनने का सपना देखने लगा।
हालांकि उस वक्त तक रास्ता कुछ अलग था। मैं राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय(आरजीपीवी) से कम्प्यूटर साइंस में ग्रेजुएशन कर रहा था। उसी दौरान अहमदाबाद बेस्ड एक इंस्टीट्यूट से कम्प्यूटर ग्राफिक्स का कोर्स भी किया। मैंने एक गेम डिजाइन किया था, जो काफी पसंद किया गया। उस प्रोत्साहन ने ग्राफिक्स डिजाइनर बनने की ओर प्रेरित किया। लेकिन ऐसा नहीं हो सका(हंसते हुए)। यह भी दिलचस्प है कि एक(अपनी ओर इशारा करते हुए) कम्प्यूटर गेम डिजाइनर स्पोट्र्स पर्सन कभी नहीं रहा।
 
मेरे बड़े भाई इच्छित का राज्य प्रशासनिक सेवा में चयन हो चुका था। तब लगा कि अब शायद कलेक्टर बनने का मेरा सपना भी उनकी सहायता से साकार हो सकता है। उन्होंने प्रेरणा दी और मैंने दिल्ली जाकर कोचिंग शुरू कर दी। वर्ष, 2008 में मेरा एक साथ आईएएस और एमपीपीएससी में चयन हुआ। एमपीपीएससी में रैंक 48 थी।
इंटरव्यू: युवा IAS, कभी कम्प्यूटर गेम बनाते थे, आज संभालते हैं सारा शहर!


अधिकार मिलने से सबकुछ संभव नहीं होता...
जब मैं प्रोविशनल पीरियड में पन्ना में सहायक कलेक्टर और एसडीएम था, तब महसूस हुआ कि एक अधिकारी होना कोई गौरव की बात नहीं; बल्कि अपने अधिकारों का लोगों के हितों में ठीक से इस्तेमाल करना ही सही मायने में गौरवान्वित करता है।
 
बुंदेलखंड मप्र के पिछड़े क्षेत्रों में शुमार है। गरीबी, बेरोजगारी और शिक्षा का अभाव ये तमाम चीजें जीवनशैली को बेहतर नहीं होने देतीं। भौगोलिक दृष्टि से भी वो क्षेत्र मेरे लिए एक चुनौती था। 64 प्रतिशत जंगल और बाकी भूमि अस्तव्यस्त। स्कूलों में टायलेट बनवाना भी कोई सरल काम नहीं था। वहां मैंने तीन कलेक्टरों एम सेलवेंद्रम, अजीत कुमार और केसी जैन के अधीनस्थ रहकर बहुत सीखा।
 
संघर्ष कभी खत्म नहीं होते
दो महीने पन्ना जिले की गुनौर जनपद में सीईओ रहा। यहां एक नदी को पुनर्जीवन योजना के तहत फिर से जीवित करना था। यह कार्य मनरेगा के तहत होना था। मैं घंटों धूप में पैदल घूमा, सर्वे किया, कार्य मंजूर कराए। तभी मेरा ट्रांसफर हो गया। अफसोस उस नदी को जीवित नहीं कर पाया। इसने सिखाया कि यह जरूरी नहीं कि; आपका परिश्रम हर बार कामयाब हो, हां; वो आपको एक अनुभव अवश्य दे जाता है कि आगे कोई कार्य कैसे करना है।
यहां मैं नदी को भले ही नहीं जिला पाया, लेकिन अपने प्रोविशनल पीरियड के दौरान मैं यहां का पहला ऐसा अधिकारी था, जो मुख्यालय में ठहरता था। बाकी पन्ना से अपडाउन करते रहे। मुझे संतोष मिला कि मैंने बड़ी संख्या में जनता के प्रकरणों का निपटारा किया।
अड़चनें तो आती रहेंगी...
मैं आपको एक किस्सा सुनाता हूं, जिससे यह साबित होगा कि अधिकारी होना ही सारी समस्याओं की एकमेव चाबी नहीं है। आम पब्लिक की समस्याओं को निपटाने आपको आम आदमी बनकर रहना होगा। जब मैं खजुराहो में पदस्थ था, तब वहां वर्ष, 1978 से कूटनी बांध का कार्य चल रहा था। एनटीपीसी का बिजली प्रोजेक्ट शुरू होने जा रहा था। मेरे कार्यकाल में बांध को भरा जाना था। भू-अर्जन की प्रक्रिया लगातार चल रही थी। पथरिया और एक समीपवर्ती गांव के लोग किसी भी कीमत पर जमीन छोडऩे को राजी नहीं थे। हमने 7 दिन कैंपिंग की। रात-रातभर गांव में जाकर बैठा। लोगों को बांध से मिलने वाले फायदे समझाए।
 
दरअसल, हमने इन गांवों में जाकर पाया कि कुछेक व्यक्ति गांववालों को भड़का रहे हैं। तब मैंने तय किया कि जब तक इन लोगों को नहीं समझाया जाएगा, तब तक वे बांध में अड़चन डालते रहेंगे। वे बात-बात पर बंदूक निकाल लेते थे। कैंपिंग के कुछ महीने पहले गोलियां भी चल चुकी थीं। अधिकारी डरे हुए थे।
 
मेरा गनमैन गन सहित बगैर सूचना दिए छुट्टी पर चला गया। मेरे लिए यह एक बड़ी चुनौती थी। बगैर सुरक्षा के गांववालों के बीच जाना, खासकर तब; जब वे बांध में पानी आता देख उग्र हो रहे थे। हम डरे नहीं। मैं, एक नायब तहसीलदार और ड्राइवर तीनों जन उन्हीं लोगों के घर के सामने चबूतरे पर खटिया बिछाकर बैठे, जो बांध को लेकर लोगों को भड़का रहे थे। सबसे पहले हमने उन्हें समझाया और फिर धीरे-धीरे गांव वालों को राजी किया। आखिरकार गांव खाली हुआ। हमने संतोष की सांस ली।
 
मुझे अच्छी तरह याद है। रात के 12 बजे पानी गिरना शुरू हुआ। मुझे एक सज्जन ने फोन पर सूचना दी कि बांध में पानी भरना शुरू हो गया है। अगले दिन सुबह 7 बजे हम बांध पर खड़े होकर धीरे-धीरे पानी भरने का नजारा देख रहे थे। वो मेरे लिए एक अत्यंत सुखद अनुभव था।


भोपाल मेरे सपनों का शहर...
वर्ष, 2012 में इंदौर ग्लोबल इन्वेस्टर्स मीट के लिए मुझे और मेरे मित्र किरण गोपाल को लाया गया। किरण अभी बालाघाट में कलेक्टर है। तब मैं यहां उद्योग विभाग में डिप्टी सेक्रेट्री था। इस मीट से हमें सीखने को मिला कि, अपने प्रदेश को विकास की ओर ले जाने की दिशा में कौन-कौन से उपाय सार्थक साबित हो सकते हैं। उसके बाद मुझे जनवरी 2013 में नगर निगम कमिश्नर की चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई।
मुश्किलें और चुनौतियां हर जगह पोस्टिंग के दौरान रहीं, लेकिन बीएमसी का कमिश्नर होना इसलिए भी अत्यंत चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि यह सरकारी संस्थान एक पालक की भूमिका निभाता है। सारे शहर की समस्याएं चाहे वो पानी हो, सड़क हो, स्ट्रीट लाइट, ट्रैफिक, साफ-सफाई या इन्फ्रास्ट्रक्चर; सभी को सबकी आवश्यकताओं के अनुसार तैयार करना, व्यवस्थित करना, साकार करना नगर निगम का ही दायित्व है। यहां जरा-सी लापरवाही, गलतियां या चूक एकदम छवि खराब कर देती है।
 
दो अचीवमेंट हमारी टीम के खाते में हैं, लेकिन करना अभी बहुत कुछ बाकी है। जब मैंने बीएमसी कमिश्नर का दायित्व संभाला, तो सबसे पहले मेरे सामने बीआरटीएस को बगैर किसी रुकावट और त्रुटियों के साकार करना था।
 
बीआरटीएस का जिक्र यहां इसलिए भी कर रहा हूं क्योंकि, इसने भोपाल को एक नई गति दी है, दिशा दी है। देश में कई जगह बीआरटी कॉरिडोर में बसें दौड़ रही हैं, सबकी अपनी-अपनी तकनीकी और व्यावहारिक दिक्कतें हैं। भोपाल भी इससे अछूता नहीं हो सकता, बावजूद हमें संतुष्टि है, गर्व है कि भोपाल का बीआरटीएस अहमदाबाद से श्रेष्ठ साबित हुआ है। ऐसा मैं नहीं कहता, तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है। सिर्फ हमारा बीआरटी कॉरिडोर ऐसा है, जिसमें हमने जगह और जरूरतों के हिसाब से एडिशनल फीचर जोड़े हैं। यानी हमारे कॉरिडोर में छोटी-बड़ीं, हर तरह की बस आसानी से संचालित हो सकती है।
भोपाल में 225 बसें संचालित हो रही हैं। इनमें 68 एसी और नॉन एसी बसें बीआरटी कॉरिडोर में चल रही हैं। बैरागढ़ से मिसरोद तक करीब 24 किलोमीटर बीआरटी कॉरिडोर को बनाना अत्यंत टेड़ी खीर रहा। कहीं विरोध हुआ, तो कहीं व्यावहारिक दिक्कतें आईं, लेकिन एक दृढ़ निश्चय था कि इसे करना है बस। मैं खुद सड़कों पर घूमा ताकि, इस योजना से जुड़ा हर व्यक्ति, चाहे वो छोटा कर्मचारी हो या अन्य कोई अफसर; हर रुकावट को पार करते हुए भोपाल को एक सौगात सौंपे।
बीआरटीएस को भोपालवासियों ने सराहा। अब मेरा प्रयास इसे इंटेलिजेंट ट्रांसपोर्ट सिस्टम से जोडऩा है। बोर्ड आफिस बस डिपो पर हमने इसका डेमो किया था, जिसके अच्छे परिणाम निकले। इसके लिए ताइवान से मशीनों के रूप में तकनीकी सहायता ली जा रही है। इस सिस्टम से सारी बसें ऑनलाइन सिस्टम से जुड़ जाएंगी। यानी बस में कितनी सवारी हैं, कितना फेयर कलेक्ट हुआ(रियल टाइम फंड ट्रांसफर), बस की मौजूदा स्थिति आदि सबकी जानकारी मिनटों में सर्वर कम्प्यूटर तक पहुंच जाएगी।
 
इसके अलावा वेंडिंग मशीनें भी लगने जा रही हैं। बसों में स्लाइडिंग गेट, सीसीटीवी कैमरे भी प्रस्तावित हैं। इन सबके बाद भोपाल बीआरटीएस निश्चय ही अर्बन डेवलपमेंट के मामले में इस शहर को एक नई पहचान देगा।
बीएमसी के 100 प्रतिशत कम्प्यूटराइजेशन का जिक्र करना भी चाहूंगा। मैं कम्प्यूटर साइंस ग्रेजुएट हूं, इसलिए बीएमसी को ऑनलाइन करने में बहुत ज्यादा दिक्कतें नहीं आईं। इससे हमें दो तरफा फायदा हुआ। पहला अंदरुनी समस्याओं और गड़बडिय़ों पर अंकुश लगा। दूसरा; बीएमसी के सारे टैक्स की रसीदें कम्प्यूटराइज्ड मिलने से लोगों को सहूलियत हुई। हमने 7 सुविधा केंद्र खोले, जहां जाकर भी लोग बीएमसी की सेवाएं ले सकते हैं। बिल्डिंग परमिशन, नक्शे ऑनलाइन मिलने से पब्लिक को दफ्तर के चक्कर काटने से छुटकारा मिला।
बीएमसी के कम्प्यूटराइजेशन से और भी कई फायदे हुए। करप्शन रुका और हमारा राजस्व 33.8 प्रतिशत बढ़ गया। अब हम मोबाइल एप लाने जा रहे हैं। यानी घर बैठे बीएमसी आपको सेवाएं देगा। हमारा प्रयास बीएमसी को पेपरलेस करना है। इससे पर्यावरण भी बचेगा और कागजों पर होने वाला बेवजह खर्चा भी। हालांकि कुछ दिक्कतें हैं, जैसे विशेषज्ञों की कमी आदि। फिर भी जो होगा, बेहतर होगा।
लोग कहें, वाकई यह नवाबी शहर है...
झीलों के इस शहर को खूबसूरत और व्यवस्थित बनाना अकेले किसी एक व्यक्ति के बस की बात नहीं है। यह तो एक सामूहिक सामाजिक जिम्मेदारी है। बीएमसी ने बोट क्लब संवारा, पार्क संवारे, ट्रैफिक व्यवस्थाएं बेहतर कीं, बैरागढ़, न्यूमार्केट और एमपी नगर में मल्टीलेवल पार्किंग पर कार्य शुरू हो गया है। अब इन्हें और बेहतर बनाने या दुरुस्त रखने की जिम्मेदारी हम सबकी है।
बीएमसी ने 26 जनवरी, 2013 से घरों से कचरा उठाने की योजना शुरू की। 15 अगस्त, 2013 से सॉलिड बेस्ट मैनेजमेंट के तहत अलग-अलग तरह का कचरा उठाने का इंतजाम किया। भानपुर खंती की शिफ्टिंग चल रही है। नई जगह वेस्ट एनर्जी प्लांट लगने जा रहा है। यह सब हमारी टीम के लिए उपलब्धि हैं। मेरी ख्वाहिश है कि हमारा गौरव भोपाल शहर और बेहतर बने।
 INTERVIEW: युवा IAS, कभी कम्प्यूटर गेम बनाते थे, आज संभालते हैं सारा शहर!

व्यक्तिगत जीवनशैली...
निश्चय ही लोगों को लगता होगा कि अफसरों की जीवनशैली शान-ओ-शौकत से भरी होती होगी, लेकिन यह अधूरा सच है। नगर निगम में आकर मेरी रातों की नींद उड़ गई है। न कोई छुट्टी और न कोई तीज-त्यौहार। दिन की फाइलें उसी रात निपटाना कोशिश होती है, ताकि अगले दिन नई चर्चा, नई शुरुआत हो सके। वर्ष, 2011 में मेरी शादी रशिम से हुई। वो बैंक मैनेजर है। दोनों व्यस्त। लेकिन दोनों को इसका कोई मलाल नहीं। क्योंकि हम दोनों ही अपनी नैतिक, पारिवारिक, सामाजिक और प्रशासनिक जिम्मेदारियां समझते हैं।
 
वो जो खिला देती है, बगैर ना-नुकूर खा लेता हूं। मुझे सबकुछ पसंद है। हां, उसके हाथ के छोला-पुलाव की कुछ बात अलग है। शुद्ध शाकाहारी हूं, इसलिए हरी सब्जियां अधिक लेता हूं। घर का खाना पसंद करता हूं। आपको ताज्जुब होगा, शादी या अन्य समारोह में भी घर से खाना खाकर जाता हूं। वहां थोड़ा-बहुत ले लेता हूं। जैसे आइसक्रीम आदि (हंसते हुए)। मैं किसी का दिल नहीं दु:खा सकता, इसलिए आमंत्रण अस्वीकार नहीं करता।
शादी से पहले फिल्में देखता था, लेकिन अब आमतौर पर संभव नहीं हो पाता। शादी के पहले अकेले टॉकीज चला जाता था, लेकिन अब उसके पास समय नहीं है और अब अकेले जा नहीं सकते(हंसते हुए)। वैसे परिणीता चोपड़ा की फिल्म हंसी तो फंसी देखी। शाहरुख का अभिनय अच्छा लगता है। sabhar :http://www.bhaskar.com/

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आध्यात्मिक विकास का मंत्र

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आध्यात्मिक विकास का मंत्र

ज्ञान का अर्थ है-विद्या बुद्धिमत्ता, विवेक दूरदर्शिता, सद्भावना, उदारता, न्याय प्रियता. विज्ञान का अर्थ है- योग्यता, साधन, शक्ति, सम्पन्नता, शीघ्र सफलता प्राप्त करने की सामर्थ्य.
आत्मिक और भौतिक दोनों क्षेत्रों में जब संतुलित उन्नति होती है, तभी उसे वास्तविक विकास माना जाता है.
भारत प्राचीन काल में बुद्धिमान बनने के लिए ज्ञान की और बलवान बनने के लिए विज्ञान की उपासना में संलग्न रहता था. योगी लोग जहां भक्ति भावना द्वारा भगवान में संलग्न होते थे, वहां कष्ट साध्य साधनाओं तथा तपश्चर्याओं द्वारा अपने में अनेक प्रकार की सामथ्र्य भी उत्पन्न करते थे. भावना से भगवान और साधना से शक्ति प्राप्त होती है, यह निर्विवाद है.
आज का ज्ञान प्रत्यक्ष दृश्यों, अनुभवों व विज्ञान मशीनों पर अवलंबित है. वैज्ञानिक भौतिक जानकारी तथा शक्तियां पाने के लिए भौतिक उपकरणों का प्रयोग कर रहे हैं. यह तरीका  खर्चीला, श्रमसाध्य, स्वल्पफलदायक एवं अस्थायी है. जो ज्ञान बड़े-बड़े विद्वानों, प्रोफेसरों, द्वारा उत्पन्न किया जा रहा है, वह भौतिक जानकारी तो काफी बढ़ा देता है, पर उससे अंत:करण में आत्मिक महानता, उदार दृष्टि तथा लोकसेवा के लिए आत्म त्याग की भावना पैदा नहीं होती. प्राचीनकाल में ज्ञान और विज्ञान के आधार आज से भिन्न थे.
आज जिस प्रकार हर वस्तु जड़ जगत और भौतिक परमाणुओं में से खोजी और उपलब्ध की जाती है, उसी प्रकार प्राचीन काल में प्रत्येक प्रत्येक शक्ति आत्मिक जगत में से ढूंढ़ी जाती थी. आज का आधार भौतिकता है, प्राचीनकाल का आधार आध्यात्मिकता था.
ज्ञान-विज्ञान का प्राचीन शोध गायत्री और यज्ञ के आधार पर होता था. यही दोनों अध्यात्म विद्या के माता-पिता हैं. गायत्री ज्ञान रुपिणी है, यज्ञ विज्ञान प्रतीक है. गायत्री मंत्र के 24 अक्षरों में मनुष्य जाति का ठीक प्रकार प्रदर्शन करने वाली शिक्षाएं भरी हैं. इन अक्षरों का गुंथन रहस्यमय विद्या के रहस्यमय आधार पर भी है.
इनकी नियमित उपासना से अलौकिक शक्तियां एवं आध्यात्मिक गुणों की तेजी से अभिवृद्धि होती है, बुद्धि तीव्र होती है, जिसके आधार पर जीवन की समस्या की अनेक गुत्थियों को सरल किया जा सकता है. यज्ञ का विज्ञान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है. सांस्कृतिक पुनर्त्थान ज्ञान-विज्ञान बिना असंभव है. भारतीय संस्कृति के बीज मंत्र गायत्री की शिक्षाओं तथा शक्तियों के आधार पर हमारा सारा ढांचा खड़ा है. यदि हम गायत्री माता और यज्ञ पिता की प्रतिष्ठा और उपासना करें तो और भी उत्तम व महत्त्वपूर्ण वस्तुएं पा सकते हैं.
-गायत्री तीर्थ शांतिकुंज हरिद्वार sabhar :http://www.samaylive.com/

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हर आत्मा में है परमात्मा

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हर आत्मा में है परमात्मा

भौतिक प्रकृति निरन्तर परिवर्तित होती रहती है.
सामान्यत: भौतिक शरीरों को छह अवस्थाओं से निकलना होता है- वे उत्पन्न होते हैं, बढ़ते हैं, कुछ काल तक रहते हैं कुछ गौण पदार्थ उत्पन्न करते हैं, क्षीण होते हैं और अन्त में विलुप्त हो जाते हैं. यह भौतिक प्रकृति अधिभूत कहलाती है. यह किसी निश्चित समय में उत्पन्न की जाती है और किसी निश्चित समय में विनष्ट कर दी जाती है.
परमेश्वर के विराट स्वरूप की धारणा, जिसमें सारे देवता तथा उनके लोक सम्मिलित हैं, अधिदैवत कहलाती है. प्रत्येक शरीर में आत्मा सहित परमात्मा का वास होता है, जो भगवान कृष्ण का अंश स्वरूप है. यह परमात्मा अधियज्ञ कहलाता है और हृदय में स्थित होता है.
परमात्मा प्रत्येक आत्मा के पास आसीन है और आत्मा के कार्यकलापों का साक्षी है तथा आत्मा की विभिन्न चेतनाओं का उद्गम है. यह परमात्मा प्रत्येक आत्मा को मुक्त भाव से कार्य करने की छूट देता है और उसके कार्यों पर निगरानी रखता है. परमेश्वर के इन विविध स्वरूपों के सारे कार्य उस कृष्णभावनाभावित भक्त को स्वत: स्पष्ट हो जाते हैं, जो भगवान की दिव्यसेवा में लगा रहता है.
अधिदैवत नामक भगवान के विराट स्वरूप का चिन्तन उन नवदीक्षितों के लिए है जो भगवान के परमात्म स्वरूप तक नही पहुंच पाते. अत: उन्हें परामर्श दिया जाता है कि वे उस विराट पुरुष का चिन्तन करें जिसके पांव अधोलोक हैं, जिसके नेत्र सूर्य तथा चन्द्र हैं और जिसका सिर उच्चलोक है.
जो कोई भी कृष्णभावनामृत में अपना शरीर छोड़ता है, वह तुरन्त परमेश्वर के दिव्य स्वभाव को प्राप्त होता है. परमेश्वर शुद्धातिशुद्ध है, अत: जो व्यक्ति कृष्णभावनाभावित होता है, वह भी शुद्धातिशुद्ध होता है. श्रीकृष्ण का स्मरण उस अशुद्ध जीव से नहीं हो सकता जिसने भक्ति में रहकर कृष्णभावनामृत का अभ्यास नहीं किया. अत: मनुष्य को चाहिए कि जीवन के प्रारम्भ से ही कृष्णभावनामृत का अभ्यास करे.
(प्रवचन के संपादित अंश श्रीमद्भगवद्गीता से साभार) sabhar :http://www.samaylive.com/

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टीचर का अश्लील MMS बना छात्र कर रहे ब्लैकमेल

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चार छात्रों ने बनाया महिला टीचर का MMS

चार छात्रों ने बनाया महिला टीचर का MMS


ट्यूशन पढऩे वाले छात्रों द्वारा अपनी ही टीचर का अश्लील एमएमएस बनाकर उसे ब्लैकमेल किए जाने का एक मामला प्रकाश में आया है। मामला हरियाणा के जींद का बताया जा रहा है।

पीड़ित टीचर की शिकायत पर पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है और चारों छात्रों को नामजद कर उन्हें गिरफ्तार कर छानबीन शुरू कर दी है।

जानकारी के अनुसार, शहर निवासी चार छात्र तरुण, वरुण, राहुल व धैर्य एक 23 साल की टीचर के पास ट्यूशन पढ़ने आया करते थे

अकेली टीचर के साथ किया यौन शोषण!

टीचर ने शहर थाना पुलिस को दी शिकायत में बताया कि एक दिन जब वह घर पर अकेली थी तो चारों ने लड़के आएं और उसके साथ जोर जबरदस्ती शुरू कर दी।

यहां तक की उसके कपड़े भी फाड़ डाले। इस दौरान उन लड़कों ने उसका मोबाइल से अश्लील एमएमएस भी बनाया।

इसी एमएमएस के आधार पर चारों युवक उसे ब्लैकमेल भी करते रहे। जब उसने चारों का विरोध किया तो उन्होंने उस अश्लील एमएमएस को कई अन्य मोबाइल पर भी भेज दिया।

चारो छात्र गिरफ्तार

युवा टीचर ने जब किसी और के मोबाइल पर अपना एमएमएस देखा तो उसके होश उड़ गए। इस दौरान लड़कों ने उसे जान से मारने की धमकी भी दी।

इस संबंध में थाना प्रभारी कमलदीप ने बताया कि छात्रों द्वारा टीचर का का अश्लील एमएमएस बनाए जाने का मामला उनके संज्ञान में आया है।

उन्होंने पीड़िता के अभिभावकों की शिकायत पर चार युवकों को नामजद किया है। पुलिस ने चारों को गिरफ्तार भी कतर लिया है। आज उन्हें कोर्ट में पेश किया जाएगा।sabhar :http://www.amarujala.com/

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