Loading...

शनिवार, 5 अप्रैल 2014

अतीन्द्रिय ज्ञान से दिखाई देती हैं भविष्य की घटनाएं

0

see future like movie


आप भविष्य को दर्पण की तरह देख सकते हैं


हम सभी की चाहत रहती है कि जीवन में आने वाली घटनाओं को जान सकें। इसके लिए ज्योतिषी एवं भविष्यवक्ता से संपर्क करते हैं। लेकिन विज्ञान कहता है कि हम सभी भविष्य और भूत की घटनाओं को दर्पण की तरह देख सकते हैं। मानव के अंदर एक ऐसा जीन छुपा रहता है, जिससे उसे भावी घटनाओं का पता चल सकता है।

लेकिन व्यावहारिक रूप से वह पता नहीं कर पाता। अब वैज्ञानिकों ने यह रहस्य खोल लिया है। मानव अपने मस्तिष्क के जरिये भविष्य की घटनाओं का पता आसानी से लगा सकता है। आम तौर पर हमें आज और अभी या अपने आसपास की घटनाओं की ही जानकारी होती है। आने वाले या बीत गए समय की अथवा दूरदराज की घटनाओं का पता नहीं चलता, लेकिन कोई विलक्षण शक्ति है, जो व्यक्ति को समय और दूरी की सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए उपयोगी सूचनाएं देती है।

विल्हेम वॉन लिवनीज नामक वैज्ञानिक का कहना है हर व्यक्ति में यह संभावना छिपी पड़ी है कि वह कभी-कभार चमक उठने वाली इस क्षमता को विकसित कर पूर्वाभास को सामान्य बुद्धि की तरह अपने व्यक्तित्व का हिस्सा बना लेता है। इस तरह की क्षमता अर्जित कर सकता है, जब चाहे दर्पण की तरह अतीत या भविष्य को देख सके। 

अतीन्द्रिय ज्ञान को वैज्ञानिक आधार देते हुए कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में भौतिकी के विद्वान एड्रियन डॉन्स ने कहा है कि भविष्य में होने वाली हलचलें मनुष्य के मस्तिष्क में एक प्रकार की तरंगें पैदा करती हैं। इन तरंगों को साइट्रॉनिक वेवफ्रंट कहा गया है। ये तरंगे मस्तिष्क के स्नायुकोष पकड़ लेते हैं।

डरहम विश्वविद्यालय इंग्लैंड के गणितज्ञ एवं भौतिकीविद् डॉ. गेरहार्ट डीटरीख वांसरमैन का कहना है कि भविष्य का आभास या अतीत की घटनाओं का ज्ञान इसलिए होता रहता है, क्योंकि इनके संकेत समय-सीमा से परे मेंटल पैटर्न चिंतन क्षेत्र में मौजूद रहते हैं।

ब्रह्माण्ड का हर घटक इन घटना तरंगों से जुड़ा होता है। 'एक्सप्लोरिंग साइकिक फिनॉमिना बियांड मैटर नामक अपनी चर्चित पुस्तक में डी स्कॉट रोगो लिखते हैं, विचार धाराएं तथा भावनाएं प्राणशक्ति का उत्सर्जन (डिस्चार्ज ऑफ वाइटल फोर्स) हैं। यही उत्सर्जन अंत:करण में कभी-कभी स्फुरण बनकर प्रकट होते हैं। उत्सर्जन दो व्यक्तियों के बीच हो तो टेलीपैथी कहा जाता है और समय-सीमा से परे हो तो पूर्वाभास

चलचित्र की तरह दिखाई देती हैं भविष्य की घटनाएं

आपने अगर स्टीवेन स्पिलबर्ग की चर्चित फिल्म मॉइनॉरिटी रिपोर्ट देखी हो तो आपको याद होगा कि कैसे उस फिल्म में एक विशेष सेल के सदस्य भविष्य में होने वाले अपराध को पता करके उसे घटित होने से पहले ही रोक देते थे। यह मजह एक फिल्मी कहानी नहीं है।

अतीन्द्रिय ज्ञान को वैज्ञानिक आधार पर प्रमाणित करने वाले विद्वानों का मानना है कि यदि कोई तत्व प्रकाश की गति से भी तीव्र गति करे तो उसके लिए समय रुक जाता है। दूसरे शब्दों में, वहां बीते कल, आज और आने वाले कल में कोई अंतर न रहेगा। अपने चित्त में यह गति साध ली जाए तो अतीत और भविष्य की घटनाएं चलचित्र की तरह देखी जा सकती हैं।

अधिकतर दार्शनिकों का मत है कि घटनाओं के पूर्वाभास जीवन बचाने के लिए होते हैं और यह बात भी सच है कि यदि हम कमजोर मन इंसान से इस तरह के पूर्वाभासों का जिक्र करते है, तो वे किसी की मौत का कारण भी बन सकते हैं। अनेक बार पूर्वाभास स्पष्ट नहीं होते और न उनकी व्याख्या की जा सकती है।

प्रिमोनीशन एक्स्टां सॅन्सरी परसॅप्शन्स का वह रूप है, जिसे हम इन्स्टिंक्ट या भावी घटना का एक तीव्र आभास कह सकते हैं। ये एक तरह की 'इन्ट्यूटिव वॉर्निंग होती है, जो अवचेतन मन पर अंकित हो जाती है और कभी-कभी व्यक्ति को नियोजित कार्योँ को करने से मनोवैज्ञानिक तरह से रोकती हैं।

इसे बहुत से चिन्तक विशिष्ट घटनाओं की 'भविष्यवाणी भी कहते हैं। साइंस इसके स्टेट्स को अस्वीकार करता है। लेकिन दार्शनिकों का मानना है कि प्रिमोनीशन और प्रौफॅसी को व्यर्थ की चीज मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। क्योंकि घटनाओं के पूर्वाभास की जानकारी और उनका सही घटना प्रमाणित करता है कि 'प्रिमोनीशन में तथ्य है, इसकी अर्थवत्ता है।इस तरह से यह साइंस के लिए एक चेतावनी है, क्योंकि यह सृष्टि की गतिविधियों के साथ मानव मन के सघन संबंध का संकेत देती है। यह आन्तरिक शक्तियों और सृष्टि में स्पन्दित अलौकिक शक्तियों व उसके चक्र के अन्तर्संबंध का विज्ञान है। कहा जाता है कि नॉस्टेंडम ने अपनी मृत्यु की 'पूर्व घोषणा कर दी थी।

जुलाई 1, 1566 जब एक पुरोहित उनसे मिलने आया और जाने लगा तो नॉस्टेंडम ने उससे अपने बारे में कहा कि 'वह कल सूर्योदय होने तक मर चुका होगा। इसी तरह अब्राहम लिंकन ने अपनी मौत का सपना देखा और अपनी पत्नी व अंगरक्षक को अपने कत्ल से कुछ घंटे पहले इस बारे में बताया। sabhar :http://www.amarujala.com/


Read more

लव हार्मोन' लेने से सेक्स लाइफ में स्पाइस आ जाता है

0

'love hormone' oxytocin can give people more intense orgasms

अक्सर लोग सेक्स संतुष्टि पाने के लिए कई उपाय अपनाते हैं लेकिन एक नई रिसर्च के मुताबिक, अब आप आराम से सेक्स के दौरान ऑर्गेज्म पा सकते हैँ।प्रका‌शित शोध के अनुसार, 'लव हार्मोन' लेने से सेक्स लाइफ में स्पाइस आ जाता है। एक जर्मन शोध के मुताबिक, ऑक्सीटोसिन का डोस न केवल पुरुषों बल्कि महिलाओं की सेक्स लाइफ में भी जान डाल देता करता है।लाइव साइंस में छपी रिपोर्ट के अनुसार, शोध के दौरा 29 जोड़ों को ऑक्सीटोसिन या प्लेसिबो का स्प्रे दिया। बाद में उन्हें उनसे कई सवाल पूछे गए। जिसमें उन्हें अपनी सेक्सुअल डिजायर और अपने पार्टनर के प्रति अपनी सेक्स इच्छाओं के बारे में में बताना था।सर्वे के नतीजे के अनुसार जिन लोगों ने सेक्स के पहले ऑक्सीटोन लिया था उनका ऑर्गेज्म ज्यादा सुखद था। सेक्‍स के बाद वे ज्यादा खुश और संतुष्ट थे।यह असर पुरुषों और महिलाओं दोनों पर बराबर पाया गया। कुछ महिलाओं ने यहां तक कहा कि उन्हें अपने पार्टनर से ज्यादा सहानुभूति हो गई थी।सर्वे के परिणाम वैसे तो दिलचस्प थे लेकिन शोधकर्ताओं के अनुसार, हार्मोन का प्रभाव उम्मीद से कम था क्योंकि सेक्स के दौरान ऑक्सीटोन का निर्माण वैसे भी होता है। sabhar :http://www.amarujala.com/

Read more

मजाक नहीं हकीकत! दंपति का दावा, आधे घंटे तक दिखा यूएफओ

0

शूट कर रहे थे जानवर

शूट कर रहे थे जानवर


देर रात बॉर्डर के पास स्थित जंगलों में एक दंपति जिन्हें जानवरों को रात में शूट करना पसंद है, दूर जंगलों में गए थे।

जानवरों को रात में कैमरे के अंदर कैद करने के लिए निकले दंपति उस जंगल के मशहूर जानवरों को रात को घूमते हुए शूट करने पहुंचे थे।

तस्वीरों के अलावा उन्होंने जानवरों की गतिविधियों को भी वीडियो शूट करने का सोचा। वहां पहुंचकर उन्होंने कैमरे और वीडियो कैमरे को एक जगह पर सेट कर दिया।

दिखा एक हिरन और..

दिखा एक हिरन और..

रात में जंगलों में अकेला घूमना घातक हो सकता है। इसकी वजह कुछ और नहीं ‌बल्कि जंगलों के घातक जानवर होते हैं।

इसलिए शैटल दंपति ने खुद को एक सुरक्षित जगह बंद करके कैमरों को एक ‌जगह सेट कर दिया।

तभी उन्होंने देखा कि कैमरे के पास एक हिरन टहलता हुआ चला आ रहा था। शैटल दंपति को लगा कि कहीं हिरन कैमरे के साथ कोई छेड़-छाड़ न करे और तभी पीछे कहीं से लाइट आनी शुरू हो गई।

धीरे- धीरे यही लाइट बढ़ती चली गई और किसी बड़ी चीज का आकार लेने लगी। उसके बाद तो शैटील दंपति को कुछ ऐसा दिखा जिसका उन्हें भरोसा ही नहीं था।


यूएफओ ही था वो

यूएफओ ही था वो

शैटल दंपति का कहना है कि दोनों को किसी कार की हेडलाइट जैसी दो लाइटें आसमान से उतरती हुई दिखीं और जमीन पर रूकने के बाद वो थोड़ी देर तक जंगल के चारों तरफ लाइट मारती रहीं।

दंपति ने ये सारी घटना अपने वीडियो में रिकॉर्ड कर ली थी।

पति-पत्नी का कहना था कि वो यूएफओ जमीन पर लगभग आधे घंटे के लिए रुका था और� उसके बाद वहां से चला भी गया

हमनें देखा है यूएफओ

मामले को अपनी आंखों से देखने वाले इन पति-पत्नी का ये दावा है कि उन्होंने यूएफओ को देखा है।

इस बात का गवाह उनका रिकॉर्ड किया गया वीडियो भी है। मामला मिसिसिपी के जैक्सन काउंटी जंगल का है।

यूएफओ को देखने और उसके होने का दावा करने वाले इस दंपति ने कहा कि उन्होंने यान में से किसी उतरते हुए एलियन को तो नहीं देखा लेकिन यान देखकर ही उन्हें भरोसा हो गया एलियंस भी हैं। 
sabhar :http://www.amarujala.com/

Read more

शुक्रवार, 4 अप्रैल 2014

दीवार करेगी बात

0



वाशिंगटन। इंटरनेट के आदी लोगों के लिए अब नई तकनीक किसी वरदान से कम नहीं। दिन-रात ऑनलाइन रहने वाले लोगों के लिए अब घर की सारी दीवारें ही किसी स्क्त्रीन की तरह काम करेंगी। इन दीवारों पर आप ऑनलाइन स्क्त्रीन की तरह काम कर सकते हैं। इस वॉल पर फेसबुक अपडेट से लेकर आदमकद आकार में मित्रों से लाइव चैटिंग भी होगी।
एक स्पैनिश डिजाइन एजेंसी थिंक बिग फैक्टरी के निदेशक क्यूरस मॉन्स ने बताया कि इस ओपनआर्च प्रणाली का हार्डवेयर पूरी तरह से बनकर तैयार है लेकिन सॉफ्टवेयर पर चालीस फीसद काम ही पूरा हुआ है। यह स्पेनिश एजेंसी ही इस पूरे प्रोजेक्ट पर काम कर रही है। अपने घर की इस डिजिटल दीवार को ऑनलाइन गतिविधियों के लिए आप कहीं से भी नियंत्रित कर सकते हैं। बोल कर या किसी शारीरिक गतिविधि से आप अपने निर्देशों को नियंत्रित कर सकते हैं। घर की हर चीज को संचार माध्यम के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि इस सबको चलाने के लिए घर में एक व्यक्ति की मौजूदगी जरूरी होगी। घर के किसी भी कोने से स्काइप को शुरू करते ही आप इस तकनीक की मदद से हाथ के इशारे से घर की बत्तियां जला-बुझा सकते हैं। किसी घरेलू उपकरण को ऑन कर सकते हैं और संगीत भी सुन सकते हैं। क्यूरस का कहना है कि ऐसा घर दिखने में कुछ अलग नहीं होगा। लेकिन तकनीक की मदद से दीवारें वो काम करेंगी जो आप अपने लैपटॉप, कंप्यूटर या मोबाइल स्क्त्रीन पर करते हैं। आप अपने लिविंग रूम में दीवारों पर सोशल नेटवर्किग साइट से लेकर मैग्जीन सर्फ करने से लेकर वीडियो गेम तक खेल सकते हैं। माइक्त्रोसाफ्ट के किनेक्ट कैमरे के जरिए प्रोटोटाइप तकनीक व्यक्ति की गतिविधियों को कैद करती है और उसके हिसाब से ही घर के अंदर दिशा-निर्देशों का संचार करती है। इस प्रणाली में प्रोजेक्टरों और सेंसरों की मदद से दीवार को स्क्त्रीन में परिवर्तित किया जाएगा। sabhar :http://www.jagran.com/

Read more

पेड़ देंगे रोशनी और दीवारों पर होंगे बगीचे

0



लंदन। शोधकर्ताओं ने भविष्य के शहरों की परिकल्पना कुछ इस तरह की है। ये शहर रात के अंधेरे में खुद ब खुद जगमगाने लगेंगे। पेड़ स्ट्रीट लाइट्स का काम करेंगे और घरों की दीवारों पर बगीचे तैयार किए जा सकेंगे। लंदन के गार्डन ब्रिज प्रोजेक्ट पर काम कर रही एक कंपनी ने अपनी रिपोर्ट में यह बात कही है। इंजीनियरिंग और डिजाइन परामर्श कंपनी अरुप के विशेषाों के मुताबिक, भविष्य के शहरों में सर्दी के मौसम में फुटपाथ गर्म हो जाएंगे। सड़कों पर जाम लगने की सूरत में ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्टम (जीपीएस) खुद ब खुद लोगों को नया रास्ता सुझाने लगेगा। कंपनी ने अपनी रिपोर्ट सिटीज अलाइव में भविष्य के शहरों का डिजाइन तैयार किया है।
लंदन के गार्डन ब्रिज प्रोजेक्ट के तहत यह कंपनी टेम्स नदी के आर-पार एक फुटपाथ बनाएगी, जिसपर घास और पेड़ उगाए जाएंगे। रिपोर्ट के मुताबिक, इन शहरों में नागरिकों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए हरियाली को ज्यादा महत्व दिया जाएगा। मौजूदा बुनियादी ढांचों का बड़ी सूझबूझ से इस्तेमाल किया जाएगा। अखबार द टाइम्स के मुताबिक, रिपोर्ट में अनुवांशिक रूप से परिवर्तित पेड़ों के इस्तेमाल की बात कही गई है जो रात में स्ट्रीट लाइट की तरह काम कर सकेंगे। पेड़ दिन में सूर्य से ग्रहण की गई ऊर्जा को रात में छोड़ेंगे। स्टारपाथ नाम के जल प्रतिरोधी स्प्रे से सड़कों को रंग दिया जाएगा जो रात में जगमगाएंगी। ब्रिटेन की कंपनी प्रो टेक द्वारा निर्मित यह दिन में पराबैंगनी किरणों को संग्रहित करती हैं और रात में उसे परावर्तित करती हैं। इस सुविधा से सड़कों के कारण स्ट्रीट लाइट लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। भविष्य में इससे ना सिर्फ ऊर्जा की व्यापक बचत होगी बल्कि ग्लोबल वार्मिग को भी सीमित किया जा सकेगा। sabhar :http://www.jagran.com/

Read more

नताशा सिक्का का हॉट फोटोशूट

0








मॉडल और अभिनेत्री नताशा सिक्का का फैशन एंड लाइफस्टाइल एशिया मैगजीन के लिए फोटोशूट Photo Credits: newz66















sabhar :http://www.samaylive.com/



Read more

भविष्य की पीढ़ियां जिस दुनिया में रहेंगी वे हर लिहाज़ से ज़्यादा कनेक्टेड होंगी

0

भविष्य की पीढ़ियां जिस दुनिया में रहेंगी वे हर लिहाज़ से ज़्यादा कनेक्टेड (जुड़ी हुई) होंगी. लेखक टेड विलियम्स पूछते हैं कि क्या ये एक जुड़ी हुई दुनिया यानी कनेक्टेड वर्ल्ड कैसे हमारे समाज और हमें बदल देगी.
"तर्कशील व्यक्ति दुनिया के हिसाब से खुद को ढाल लेता है जबकि अविवेकी व्यक्ति दुनिया को अपने हिसाब से ढालने की कोशिश करता है. इसलिए जितनी भी तरक्की है वह अविवेकी मनुष्य पर निर्भर है." जॉर्ज बर्नार्ड शॉ

भले ही हम उन्हें तब महसूस नहीं कर पाते हैं जब वे घटित हो रहे होते हैं.तकनीक के हर बड़े क़दम ने मानव समाज को व्यापक रूप में बदला है. इसलिए ही हम जानते हैं कि वे बड़े तकनीकी बदलाव थे.

निजी विचार और समूह

जेबीएस हेल्डेन के ब्रह्मांड के बारे में दिए गए प्रसिद्ध वक्तव्य में कहा जाए तो, 'भविष्य आपकी कल्पना से अलग नहीं होगा बल्कि जितनी आप कल्पना कर सकते हैं उससे बहुत अलग होगा.'
हम सामाजिक प्राणी हैं लेकिन भिन्न होने के ख़तरे तब से कम हुए हैं जब से व्यक्तिवाद हमारे समाज और स्वयं हम में बड़ी ताक़त बनता चला गया है.
फ़्यूचर सिटी
भविष्य की दुनिया ज़्यादा कनेक्टेड होगी
नवीन तकनीक एक बड़ा कारण है. दो शक्तिशाली बल अब तेज़ी से समाज और व्यक्ति के बीच के समीकरण बदल रहे हैं.
व्यक्तिवाद का केंद्रीकरण और एक बंटे हुए समाज से अस्थिर और समस्तरीय समाज के प्रति निष्ठा का हस्तांतरण.
अपने शानदार उपन्यास 'केट्स क्रेडल' में कर्न वोनॉट ने एक ऐसे धर्म की खोज की जो मानवीय रिश्तों को 'कारासेज़' या फ़िर 'ग्रेनफॉलूंस' में परिभाषित करता है.
कारासेज़ का मतलब है लोगों के बीच में सच्चा संपर्क जो स्वतः स्थापित होता है और ग्रेनफॉलूंस ऐसे रिश्ते हैं जो अधिकतर असत्य होते हैं यानि जन्म, रंग, स्थान आदि के आधार पर बनते हैं.
बहुत से धर्म और राष्ट्र, जैसे कि सच्चे समस्तरीय सामाजिक समूह, साझा विचारों के रूप में शुरु हुए लेकिन जैसे-जैसे ये संस्थाएं बढ़ी और बदली लोगों के बीच की सहमतियाँ धूमिल होती चली गईं.
अमरीका में उदार ईसाई, कट्टर ईसाइयों के मुकाबले उदार नास्तिकों से ज़्यादा मिलते-जुलते हैं.
तो फ़िर अमरीकी ईसाई कौन हैं? लेकिन ब्लूग्रास का एक प्रशंसक हमेसा ब्लूग्रास का ही संगीत पसंद करेगा भले ही वो टैनेसी में रहता है या ट्यूनीसिया में.
जो विचार आधिकारिक सीमाओं में क़ैद नहीं होते वे ही अपने अनुयायियों की उम्मीदों पर खरे उतरते हैं. जबकि राष्ट्र और धर्म बहुत ही कम लचीले होते हैं.
लेकिन यदि हम अपनी निष्ठाओं को अधिक व्यक्तिकत रुचियों जैसे कि पर्यावरण की राजनीति, बंदूकों पर मालिकाना हक़, पुराने फर्नीचर को ख़रीदना या फिर अंतरराष्ट्रीय मामलों पर नज़र रखना आदि की ओर करेंगे तो हम देशीय या अन्य सीमाओं में नया राजनीतिक गठबंधन बना लेंगे.

स्वास्थ्य क्रांति

लोग भविष्य कनेक्टेड, संचार, तकनीक
तकनीक की दुनिया में हो रहे तीव्र बदलाव हमें सिर्फ़ जानकारियाँ साझा करने से और भी बहुत कुछ ज़्यादा करने का मौका देते हैं.
ज़ल्द ही हम लोगों के विचार, सोच और उनकी आवाज़ को सुन पाएंगे. बिना बोले संवाद की तकनीक (वर्चुल टच) में होने वाले सुधारों की मदद में से हम चीजों की छु्अन का अहसास भी साझा कर पाएंगे.
अगर आपकी पर्वतारोहण में रुचि है तो इस तकनीक के ज़रिए माउंट एवरेस्ट पर चढ़ रहे किसी शेरपा के बूट में आप अपना पाँवों को महसूस कर पाएंगे और जान पाएंगे कि उसे कैसा लग रहा है.
आप स्काई डाइवर के साथ छलाँग लगा सकेंगे और अमेजन नदी के किनारे बसे लोगों से ऐसे बात कर पाएँगे जैसे आप वहीं हो.
यही नहीं किसी सड़क पर हो रहे विरोध प्रदर्शन में आप हज़ारों किलोमीटर दूर होते हुए भी शामिल हो पाएंगे.
लेकिन नज़रिए में बदलाव सिर्फ़ यहीं नहीं रुकेगा. तकनीक की दुनिया में हो रहे बदलाव हमारी स्वयं की भौतिकी में भी बदलावों के संकेत दे रहे हैं.
स्मार्टफ़ोन सिर्फ़ एक तकनीकी पड़ाव हैं, हालाँकि वे इस सदी में ताज़ा रहेंगे और दुनिया के कम विकसित इलाक़ों में उनके कई अप्रत्याशित इस्तेमाल भी होंगे, लेकिन विकसित देशों में इक्कीसवीं सदी के मध्य तक पहुँचते-पहुँचते हम अपने कंप्यूटर डिवाइस को अपने साथ रखने के कई व्यक्तिगत तरीकों की ओर जाने लगेंगे.
भले ही हम तब तक सीधे स्थापित होने वाले 'साइबरपंक' हासिल न कर पाएं, स्मार्ट गॉगल या शरीर में फिट होने वाले बेहद छोटे आकार के इनपुट-आउटपुट डिवाइस फोन का स्थान ले लेंगे.
लेकिन सिर्फ़ इतना ही नहीं, न सिर्फ़ आपका पूरा सहकर्मी समूह आपगे दिमाग़ में होगा बल्कि आपको अपनी सेहत के प्रति भी अतिचिंतित नहीं होना पड़ेगा.
हृद्यगति, अंगों की सक्रियता, ब्लड शुगर, यहाँ तक की दिमाग़ी हालत की भी जानकारी आपको पल-पल मिलती रहेगी.
हीट सिग्नेचर (शरीर या गति से निकलने वाली गर्मी) से हमें पता चल जाएगा कि क्या हम किसी तेज़ रफ़्तार से आती कार के रास्ते में तो नहीं है या आगे कोई लुटेरा हमारा इंतज़ार तो नहीं कर रहा है.

बदलेंगे विचार

लोग भविष्य कनेक्टेड, संचार, तकनीक
किराने की दुकान से ख़रीदारी करते वक़्त हम हर सामान को स्कैन कर उसके बारे में अतिरिक्त जानकारी और बाकी लोगों की राय तुरंत हासिल कर सकेंगे.
अगर आपको किसी ख़ास पदार्थ से एलर्जी है या फ़िर आपके भोजन की कुछ ख़ास ज़रूरतें हैं तो किसी भी पदार्थ को चखने से पहले ही आपको उसके बारे में समस्त जानकारी मिल सकेगी और आप तय कर सकेंगे कि आपको यह सामान ख़रीदना है या नहीं.
महत्वपूर्ण जानकारियों को किसी भी वक्त हासिल करने की इस क्षमता के रास्ते में क़ानून और राजनीति भी आएंगे.
यदि ऐसी सेवाएं उपलब्ध होंगी तो ज़्यादातर लोग इन्हें हासिल करना चाहेंगे, भले ही वे इनकी क़ीमत चुकाने में सक्षम हो या न हों.
ख़ासकर उन सेवाओं की माँग बढ़ेगी जो जीवन को बढ़ाने में मदद करेंगी.
इन जानकारियों को सभी लोगों को उपलब्ध करवाने का दवाब ऐसा ही होगा जैसा किसी अन्य स्वास्थ्य संबंधी सेवा पर होता है.
सिर्फ़ अमीर लोगों के पास ही हृद्यघात के वक़्त जान बचाने वाले शरीर में फिट गए मॉनिटर या फिब्रिलेटर क्यों हों?
जब आपके तमाम मित्र आपके दिमाग़ के भीतर या फिर हर समय आपसे जुड़े हुए हो और आप व्लादिवोस्क में बैठे किसी व्यक्ति से उस खेल के बारे में चर्चा कर रहे हो जिसे आप दोनों खेल रहे हैं, या फिर आप अपने जैसी सोच रखने वाले दमिश्क में बैठे किसी व्यक्ति से बात कर रहे हों तो निश्चित रूप से आपके इस बारे में विचार बदलेंगे कि 'हम' क्या हैं और 'वे' क्या हैं.
राजनीतिक एवं अन्य विभाजन खत्म नहीं होंगे, लेकिन वे हमें अलग लगने लगेंगें.

नए तरीके खोजने होंगे

क्या अधिक निजी स्वतंत्रता और निजी निवेश की इस दुनिया का कोई स्याह पहलू भी है?
जाहिर तौर पर हैं. जैसे-जैसे हम लगातार अपडेट होती जानकारियों से घिरे हुए स्वयं के निर्मित विश्व में अधिक समय बिताएँगे और अपने और अपने जैसी सोच रखने वाले लोगों के बारे में बेहद सूक्ष्म जानकारियाँ रखेंगे, हम एक अलग किस्म के मानव समाज में परिवर्तित होते जाएंगे.
कुछ लोगों का कहना है कि डरने के लिए सिर्फ अधिकाधिक अत्यधिक आत्म भागीदारी ही नहीं बल्कि अन्य कारण भी हैं.
सामाजिक आलोचकों को लगता है कि हम इंटरनेट युग से पहले भी एक जैसी सोच वाले लोगों के समूहों की ओर अग्रसर हो रहे थे.
साइबर जगत में ध्रवीकरण पर हुए ताज़ा शोध बताते हैं कि जन संपर्क के इस दौर में हालात और भी बदतर हुए हैं, यानि व्यक्तिगत की तुलना में एक जैसी सोच वाले समूहों में हम ज़्यादा कट्टर हो जाते हैं.
व्यक्तिगत होने के मुकाबले जब हम समूह में होते हैं तब अलग दृष्टिकोण के प्रति तिरस्कार की भावना भी रखते हैं.
आने वाली सदी में हमारी चुनौती इन अपनी सोच के दायरे में सीमित रहने से खुद को रोकने की भी होगी.

हमें सिर्फ़ अपने बारे में ही नहीं बल्कि दूसरे लोगों के बारे में भी सोचना होगा. वास्तव में, जब पुराने तरीके विलुप्त हो जाएंगे तब हम मनुष्यों को पड़ोसी होने के नए तरीके खोजने होंगे.sabhar :http://www.bbc.co.uk/

Read more

गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

हैरी पॉटर की अदृश्य घड़ी बनेगी हकीकत और पढ़ें

0

हैरी पॉटर की अदृश्य घड़ी बनेगी हकीकत

भारतीय मूल के एक वैज्ञानिक ने हैरी पॉटर फिल्मों की शैली की अदृश्य घड़ी को साकार रूप देने में महत्वपूर्ण कदम उठाया है।

उन्होंने धातु की एक ऐसी पट्टी तैयार की है जो प्रकाश को नई दिशा में मोड़ देती है।
काल्पनिक अदृश्य घड़ियों के पीछे वह सिद्धांत काम करता है कि किसी वस्तु के आसपास प्रकाश को रोकने और उसे नई दिशा में मोड़ देने से वह वस्तु आंखों के लिए अदृश्य हो जाती है। हॉलीवुड फिल्मों में यह काफी आसान तकनीक लग सकती है लेकिन असल जिंदगी में इसे तैयार करना काफी मुश्किल है क्योंकि प्रकृति में मौजूद किसी भी पदार्थ में वह गुण मौजूद नहीं है, जो प्रकाश को एक विशेष दिशा में मोड़ दे।
यूनिवर्सिटी ऑफ सेंट्रल फ्लोरिडा में सहायक प्रोफेसर देबाशीष चंद्रा ने इसे सच कर दिखाया है। उन्होंने इस काम को पूरा करने के लिए एक कृत्रिम नैनो ढांचा तैयार किया है जिसे मेटामटीरियल्स नाम दिया गया है। चंद्रा और अन्य नैनो तकनीक विशेषज्ञों ने धातु की कई परतों वाली एक 3डी पट्टी तैयार की है। उन्होंने इस काम को नैनो ट्रांसफर प्रिंटिंग से पूरा किया है जिसका इस्तेमाल प्रकाश के प्रसार को रोकने के लिए किया जाता है।
चंद्रा ने बताया कि हमें उम्मीद है, नैनो ट्रांसफर प्रिंटिंग तकनीक के इस्तेमाल से हम प्रकाश को विशेष दिशा में मोड़ देने वाले धातु का बड़ा टुकड़ा तैयार कर सकते हैं। जिससे काल्पनिक उपकरणों को हकीकत में ढाला जा सकेगा। यह शोध 'जर्नल एडवांस्ड ऑप्टिकल मटेरियल्स' में प्रकाशित हुआ है। SABHAR :http://hindi.ruvr.ru/
और पढ़ें: http://hindi.ruvr.ru/news/2014_04_03/270685465/

Read more

तस्वीरों में देखें रूसी प्रधानमंत्री व्लादिमीर पुतिन का जिंदादिल अंदाज

0

तस्वीरों में देखें रूसी प्रधानमंत्री व्लादिमीर पुतिन का जिंदादिल अंदाज

मॉस्को. आखिरकार रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन और उनकी पत्नी ल्यूदमिला एलेक्सांद्रोव्ना पुतिना के बीच तलाक हो गया। दोनों का विवाह 30 साल पहले हुआ था। उनकी दो बड़ी बेटियां हैं। क्रेमलिन ने तलाक की आधिकारिक पुष्टि कर दी है। पुतिन की आधिकारिक जीवनी में 27 मार्च को ‘विवाहित’ और पत्नी का नाम लिखा था। अब फर्स्ट लेडी का कोई जिक्र नहीं है। केवल दो बेटियों का उल्लेख है। 
 
पुतिन ने पिछले साल जून में टीवी पर एक बयान में यह कह कर चौंका दिया था कि वे तलाक देने वाले हैं। उस समय शादी टूटने का कारण पुतिन की लवर सांसद एलिना कबायेवा को माना जा रहा था।
 
भले ही रूस के शीर्ष नेता पुतिन की उम्र 60 वर्ष हो, लेकिन उनमें आज भी 25 साल के नवजावान-सा जोश दिखाई देता है। वे हमेशा मीडिया में अपने हैरतअंगेज कारनामों के कारण चर्चा में बने रहते हैं। वे कभी ताइक्वांडो में अपने से कई गुना कम उम्र के खिलाड़ियों को पछाड़ते हुए दिखाई देते हैं तो कभी खुले बदन घोड़े पर बैठ कर हवा से भी तेज बातें करते हैं। तलाक होने के बाद मीडिया उन्हें दुनिया का मोस्ट एलिजिबल बैचलर मान रहा है।
 
हम आपको यहां राष्ट्रपति पुतिन की कुछ तस्वीरें दिखा रहे हैं, जिन्हें देख कर आप भी कहेंगे कि भले पुतिन ने जिंदगी के 60 वंसत देख लिए हों, लेकिन उनकी उम्र पर इसका प्रभाव बिल्कुल नहीं है। समय मानो उनके लिए ठहर-सा गया है।

तस्वीरों में देखें रूसी प्रधानमंत्री व्लादिमीर पुतिन का जिंदादिल अंदाज

फरवरी 2010 में साईबेरियन खाकसिया प्रांत के दौरे पर गर्म कॉफी का प्याला थामे हुए रूस के प्रधानमंत्री व्लादिमीर पुतिन।

तस्वीरों में देखें रूसी प्रधानमंत्री व्लादिमीर पुतिन का जिंदादिल अंदाज

पुतिन रूसी खुफिया एजेंसी केजीबी के लिए काम कर चुके हैं। 1991 में एजेंसी से रिटायर्ड होने के बाद उन्हें तेजी रूसी राजनीति में अपनी पैठ जमा ली। वे जल्द दुनिया सबसे बड़े देश शीर्ष नेता बन गए। तस्वीर: मास्को में शूटिंग गैलरी में हाथों में बंदूक थामे हुए पुतिन

तस्वीरों में देखें रूसी प्रधानमंत्री व्लादिमीर पुतिन का जिंदादिल अंदाज

प्रधानमंत्री बनने से पहले वे राष्ट्रपति भी थे। वे शार्प शूटर भी माने जाते है और अक्सर नई-नई बंदूकों को भी शौक रखते हैं। तस्वीर: मास्को में नेशनल रेलवे कंपनी रशियन रेलवे के दौरे पर आए पुतिन इलेक्ट्रॉनिक शूटिंग रेंज पर हमलावर रायफल सिम्युलेटर पर हाथ आजमाते हुए।

तस्वीरों में देखें रूसी प्रधानमंत्री व्लादिमीर पुतिन का जिंदादिल अंदाज

2010 में यूक्रेन के क्रिमिया में हुई बाइकिंग प्रतियोगिता में हर्ले डैविडसन को हवा से बाते कराते पुतिन। 

तस्वीरों में देखें रूसी प्रधानमंत्री व्लादिमीर पुतिन का जिंदादिल अंदाज

रूस की बाइकर्स की शीर्ष संस्था ने एक वोटिंग के जरिए पुतिन को हेल्स एंजिल रैंक से नवाजा था। इसके साथ उन्हें निकनेम अबाड्डन दिया। यह हिब्रू भाषा का शब्द है, अर्थ होता है डिस्ट्रॉयर (विनाशक)।

तस्वीरों में देखें रूसी प्रधानमंत्री व्लादिमीर पुतिन का जिंदादिल अंदाज

पुतिन को स्पीड पसंद हैं। उन्होंने कभी भी थमना नहीं जाना, यही कारण है कि वे अक्सर हवा पर सवार रहते हैं। 2010 में पुतिन लेनिनग्रेड में हुई रेनो फॉर्मूला वन में रेसिंग कार को ट्रैक पर भगाने से भी नहीं चूके। उनका अधिकतम गति थी 240 किमी. प्रतिघंटा

तस्वीरों में देखें रूसी प्रधानमंत्री व्लादिमीर पुतिन का जिंदादिल अंदाज

पुतिन को खेलों के लिए जान देने वाला माना जाता है। खेल कोई सा भी हो, वे हमेशा हाजिर रहते हैं। जून 2012 में फिनलैंड के साथ दोस्ताना आइस हॉकी मैच खेल रही टीम का हौंसला बढ़ाने पहुंचे पुतिन। लेकिन उन्होंने खुद भी मैदान में उतरने का फैसला किया। उनका साथ दिया फिनलैंड के राष्ट्रपति साउली निनित्सो ने। 

तस्वीरों में देखें रूसी प्रधानमंत्री व्लादिमीर पुतिन का जिंदादिल अंदाज

2011 में पुरुष जूनियर आइस हॉकी टूर्नामेंट से पहले पुतिन ने अभ्यास सत्र में हॉकी किट के साथ उतरकर गोल मारने के प्रयास भी किया।

तस्वीरों में देखें रूसी प्रधानमंत्री व्लादिमीर पुतिन का जिंदादिल अंदाज
अगर पुतिन को संपूर्ण आदमी कहा जाए तो कुछ गलत नहीं होगा। उनके पास सिक्स डिग्री जूडो ब्लैक बेल्ट है। इसके अलावा वे सेकंड ब्लैक बेल्ट के चैम्पियन भी हैं।
तस्वीरों में देखें रूसी प्रधानमंत्री व्लादिमीर पुतिन का जिंदादिल अंदाज

यही कारण है कि उन्होंने जूडो खेल में अपने कई गुना कम उम्र के खिलाड़ी को चुटकियों में ही धूल चटा दी। उन्होंने इस पर एक किताब भी लिखी है, जिसका नाम फॉर्म ऑफ कॉम्बैट है। SABHAR :http://www.bhaskar.com/



Read more

प्रेमियों की आवाज बुंलद करने के इरादे से चुनाव लड़ रही हैं सुनीता

0

प्रेमियों की आवाज बुंलद करने के इरादे से चुनाव लड़ रही हैं सुनीता

नई दिल्ली : दिल्ली संसदीय क्षेत्र से पैंथर्स पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रही सुनीता चौधरी अपने अनोखे चुनावी ‘घोषणा पत्र’ को लेकर लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। सुनीता का कहना है कि वे अगर चुनाव जीतकर संसद में पहुंचती हैं तो संसद में प्रेमियों की आवाज को बुंलद करेंगी। सुनीता चौधरी दिल्ली की पहली ऑटो चालक के तौर पर भी पहचानी जाती हैं। इससे पहले वे 2012 में उप-राष्ट्रपति के चुनाव में भी नामांकन कर चर्चा में आई थी।
‘लव कमांडोज’ नामक हेल्‍प लाइन भी
सुनीता चौधरी प्रेमी जोड़ों को सुरक्षा देने के लिए ‘लव कमांडोज’ नामक हेल्‍प लाइन भी चलाती है।  वह वादा करते हुए कहती हैं कि अगर वह संसद में पहुंची तो शिक्षा में प्रेम का पाठ शामिल करवाएगी ।
प्रेमियों की आवाज बुंलद करने के इरादे से चुनाव लड़ रही हैं सुनीता

घोषणा पत्र में 14 में से 9 वादे प्रेमियों के लिए
दिल्ली के प्रेमियों के लिए संसद में आवाज बुलंद करने का इरादा रखने वाली सुनीता चौधरी ने अपना जो चुनावी घोषणा पत्र बनाया है उसमें 14 में से 9 वादे प्रेमी जोड़ों को ध्‍यान में रखकर बनाए हैं ।
क्‍या खास : 
1 प्रेम को कुदरती मानते हुए उसकी रक्षा के लिए ‘राष्ट्रीय प्रेमी अधिकार रक्षा आयोग’ की सथापना की मांग करेंगी।
2 हर थाने में प्रेमी -प्रेमिका रक्षा हेल्‍प डेस्‍क बनवाने के लिए प्रयास करेंगी ।

3 प्रेम शहीदों की याद में स्‍मारक बनवाएंगी ।

4 लड़का-लड़की की शादी की उम्र एक समान 18 साल करने की मांग वह संसद में करेंगी।

प्रेमियों की आवाज बुंलद करने के इरादे से चुनाव लड़ रही हैं सुनीता
कुछ ऐसी है सुनीता की कहानी
दिल्ली में लगभग 55000 ऑटो चालकों के बीच पहली महिला ऑटोचालक के रूप में अपनी पहचान बनाने वाली सुनीता चौधरी ने 2006 से दिल्ली की सड़कों पर ऑटो चला रही हैं। पैसे की कमी और पारिवारिक जीवन में उथल -पुथल के बीच वे उप्र से दिल्ली आई और यहां उन्‍होंने किराए पर ऑटो चलाकर अपना जीवन यापन शुरु किया।पहले किराए का ऑटो चलाती थी और कुछ सालों बाद सरकारी लोन की मदद मिलने के साथ ही उन्‍होंने अपना ऑटो ले लिया जिसके बाद वह कुछ पैसे ज्‍यादा कमाने लगी । उनकी जिंदगी में एक समय ऐसा भी था जब उनका ऑटो ही उनका अपना घर था,दिन भर वह ऑटो चलाती और रात ऑटो में ही सोकर गुजारती थी, रेलवे स्‍टेशन के जनता टॉयलेट का उपयोग वह कर अपने कपड़े बदलती थी। एक समय ऐसा भी  दिल्ली जैसे शहर में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध पर वह कहती हैं कि काम तो काम होता है और इसे करते हुए अगर आपके साथ कुछ गलत होता हैं तो इस बात की गारंटी भी तो नहीं है कि जब आप घर में रहोगे तो वहां सुरक्षित ही रहोगे। खतरा तो हर जगह है। SABHAR :http://www.bhaskar.com/




Read more

वृद्धावस्था को रोकने आजीवन युवा रहने के लिए कुछ रिसर्च

0


cells

स्किन सेल्स से बन सकेंगे नए ऑर्गन्स


लंदन 
वैज्ञानिकों ने इंसानी शरीर की त्वचा की कोशिकाओं (स्किन सेल्स) से स्टेम सेल्स तैयार करने से जुड़ी बड़ी उपलब्धि हासिल की है। इन स्टेम स्टेल्स में एंब्रियो या भ्रूण में तब्दील होने की क्षमता है। एक टॉप साइंटिस्ट ने 'द इंडिपेंडेंट' को रविवार को यह जानकारी दी। इस तकनीक का परीक्षण चूहों पर पूरी तरह से कामयाब रहा है और वैज्ञानिक मानते हैं कि यह इंसानों के लिए भी बिलकुल फिट रहेगा। ऐसे में इंसानों में होने वाली असाध्य बीमारियों मसलन पार्किन्सन, हार्ट डिजीज आदि के बेहतर इलाज की संभावनाएं और मजबूत हो चली हैं। दरअसल, इस तकनीक के जरिए बीमारी से ग्रस्त अंगों को मरीज के स्टेम सेल्स के जरिए दोबारा से तैयार किया जा सकता है।

जर्म सेल्स भी किए जा सकते हैं तैयार 
हालांकि, स्किन सेल्स से इंसानी भ्रूण तैयार करने की फिलहाल कोई मंशा नहीं है, लेकिन वैज्ञानिकों का मत है कि ऐसा किया जाना सैद्धांतिक तौर पर मुमकिन है। प्रयोग के दौरान चूहों के भ्रूण तैयार करने में कामयाबी मिलना इस बात का संकेत देते हैं कि इन भ्रूण से किसी खास तरह के टिशू (ऊतक) तैयार किए जा सकते हैं, जो अंग विकसित करने की दिशा में अहम साबित होगा। यहां तक कि इस तकनीक से जर्म सेल्स भी तैयार किए जा सकते हैं, जिनसे स्पर्म और डिंब (एग्स) बनते हैं।



मशीनी अवतार से अमर बनेगा मनुष्य


मुकुल व्यास

मनुष्य अनंतकाल से अमृत की तलाश कर रहा है और अब विज्ञान भी अमरत्व के नुस्खे खोजने में जुट गया है। वृद्धावस्था को रोकने या आजीवन युवा रहने के लिए कुछ रिसर्च वैज्ञानिक आधार पर हो रही हैं और कुछ बातें कल्पना लोक में तैर रही हैं। एक रूसी धनकुबेर द्मित्री इत्स्कोव अपने अति महत्वाकांक्षी 'अवतार' प्रोजेक्ट के जरिए मनुष्य को टर्मिनेटर जैसे साइबोर्ग के रूप में अमर बनाने का सपना देख रहे हैं। उनका इरादा 2045 तक मनुष्य की चेतना को एक मशीन में हस्तांतरित करने का है, जहां उसकी पर्सनैलिटी और यादें हमेशा जिंदा रहेंगी। इस अवतार का कोई भौतिक रूप नहीं होगा।

इसका अस्तित्व सिर्फ इंटरनेट जैसे नेटवर्क में होगा। इस तरह के साइबोर्ग होलोग्राम के माध्यम से अपने माहौल के साथ संवाद करेंगे। इत्स्कोव के प्रोजेक्ट में इस समय साइंस कम और साइंस-फिक्शन ज्यादा दिखता है, लेकिन वह अपने इरादों के प्रति गंभीर हैं और इसके लिए वैज्ञानिकों की भर्ती कर रहे हैं। समाज को 'नव-मानवता' की ओर ले जाने के लिए वह संयुक्त राष्ट्र महासचिव की मदद भी मांग रहे हैं।यह तो वक्त ही बताएगा कि इत्स्कोव अपनी योजना को कितना आगे बढ़ा पाएंगे, लेकिन भविष्य में एजिंग के दुष्प्रभावों को रोकना संभव हो सकता है। बहुत मुमकिन है कि मनुष्य का जीवनकाल बढ़ाने का कोई कारगर तरीका भी हाथ लग जाए। वैज्ञानिक एजिंग की प्रक्रिया के पीछे आणविक और आनुवंशिक कारणों को समझने की कोशिश कर रहे हैं। बर्कली स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया (यूसी) में किए गए एक अध्ययन को इस दिशा में महत्वपूर्ण सफलता मिली है, साथ ही इससे बुढ़ापे से जुड़ी बीमारियों के इलाज के नए तरीके विकसित करने की उम्मीद भी जग गई है। यूसी के रिसर्चरों ने अपने एक प्रयोग में एक बूढ़े चूहे की रक्त स्टेम कोशिका में एक दीर्घायु जीन मिला कर उसकी आणविक घड़ी को पीछे खिसका दिया। इससे बूढ़ी स्टेम कोशिकाओं में नई जान आ गई और वे फिर से नई ब्लड स्टेम कोशिकाएं उत्पन्न करने में समर्थ हो गईं।

दीर्घायु जीन का नाम 'सर्ट-3' है। यह दरअसल 'सर्ट' समूह का प्रोटीन है, जो ब्लड स्टेम कोशिकाओं को स्ट्रेस से निपटने में मदद करता है। प्रमुख रिसर्चर डेनिका चेन के अनुसार यह खोज बहुत रोमांचक है और इससे बुढ़ापे से जुड़ी बीमारियों के इलाज के तरीके विकसित करने का रास्ता खुल गया है। पिछले 10-20 वर्षों में वैज्ञानिकों को बुढ़ापे की प्रक्रिया को समझने में कई सफलताएं मिली हैं। वृद्धावस्था को अब अनियंत्रित और बेतरतीब प्रक्रिया नहीं माना जाता। यह बहुत ही नियंत्रित प्रक्रिया है, लेकिन इसमें फेरबदल की गुंजाइश है। चेन के मुताबिक एक अकेले जीन के म्यूटेशन या परिवर्तन से जीवनकाल बढ़ाया जा सकता है। प्रश्न यह है कि क्या हम इस प्रक्रिया को समझ कर वृद्धावस्था को सचमुच पलट सकते हैं?

रिसर्चरों ने सबसे पहले ऐसे चूहों के ब्लड सिस्टम का अध्ययन कियाजिनमें सर्ट-3 प्रोटीन के जीन को निष्क्रियकर दिया गया था। रिसर्च से पता चलता है कि युवा कोशिकाओं में ब्लड स्टेम कोशिकाएं अच्छे ढंग से काम करतीहैं और उन्हें बहुत कम 'ऑक्सीडेटिव स्ट्रेसका सामना करना पड़ता है। आक्सीडेटिव स्ट्रेस शरीर के भीतरमेटाबोलिज्म अथवा कोशिकाओं में कुदरती रासायनिक प्रक्रियाओं का एक नुकसानदायक बायप्राडक्ट है। इससेशरीर पर बोझ बढ़ता है। मेटाबोलिज्म के दौरान ऑक्सीजन का एक स्वतंत्र अणु निकलता हैजिसे फ्री रेडिकलभी कहा जाता है। इसमें इलेक्ट्रिकल चार्ज होता है। यदि इस अणु को किसी एंटी ऑक्सीडेंट से तुरंत न्यूट्रलाइजनहीं किया जाता तो यह और ज्यादा फ्री रेडिकल उत्पन्न करता है। इससे कोशिका की दीवार के प्रोटीन और यहांतक कि कोशिका के डीएनए को भी नुकसान पहुंचता है। फ्री रेडिकलों का एक्शन एक कटे हुए सेब के भूरा पड़नेया लोहे के जंग खाने जैसा ही है। शरीर पर दिखने वाले बुढ़ापे के लक्षण ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस के कारण ही होते हैं।वृद्धावस्था की कई बीमारियां भी इसी वजह से होती हैं।

युवावस्था में शरीर की एंटी-ऑक्सीडेंट प्रणाली कम स्ट्रेस को आसानी से झेल सकती हैलेकिन उम्र बढ़ने के साथहमारा सिस्टम ठीक से काम नहीं करता क्योंकि हम या तो ज्यादा ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस उत्पन्न करते हैं या उसे हटानहीं पाते। इन स्थितियों में हमारी सामान्य एंटी-ऑक्सीडेंट प्रणाली काम नहीं करती और हमें सर्ट-3 की जरूरतपड़ती हैलेकिन उम्र के साथ सर्ट-3 का लेवल भी कम हो जाता है। एंटी-एजिंग उपायों के लिए कुछ जीव-जंतुओंमें पाए जाने दीर्घायु संबंधी गुणों का भी अध्ययन किया जा रहा है। अमेरिकी और इस्राइली रिसर्चर यह पतालगाने की कोशिश कर रहे हैं कि पूर्वी अफ्रीका में पाए जाने वाले नेकेड मोल रैट के लंबे और सक्रिय जीवन काराज क्या है। चूहे के इस अनोखे रिश्तेदार में एनआरजी-1 नामक प्रोटीन की मात्रा बहुत ज्यादा पाई गई हैजोकिअसामान्य बात है। मानव शरीर की तुलना में इस चूहे के शरीर पर एजिंग का प्रतिकूल प्रभाव बहुत कम पड़ताहै। 10 से 30 साल तक जीने वाला यह जंतु अंत-अंत तक अपनी बौद्धिक क्षमताप्रजनन शक्ति और बोन हेल्थ कोबनाए रखता हैजबकि सामान्य चूहा औसतन तीन साल में जर्जर बूढ़ा होकर मर जाता है।

कुछ वैज्ञानिक मनुष्यों को ज्यादा समय तक युवा बनाए रखने और उनके जीवन को लंबा करने के लिए फ्रूटफ्लाइज का अध्ययन कर रहे हैं। फ्रूट फ्लाइज और मनुष्यों के जीनों में करीब 60 प्रतिशत तक समानता होती है।दोनों में एजिंग की प्रक्रिया भी लगभग एक जैसी है। यूनिवर्सिटी कालेज लंदन स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ एजिंगके वैज्ञानिक बुढ़ापे से निपटने के मकसद से आनुवंशिकी और लाइफ स्टाइल फैक्टरों का अध्ययन कर रहे हैं।इंस्टीट्यूट में रिसर्च टीम से जुड़े प्रमुख वैज्ञानिक मैथ्यू पाइपर का कहना है कि यदि हमें एजिंग से जुड़े जीन मिलजाते हैं तो एजिंग की घड़ी को हम आगे खिसका सकते हैं। डॉपाइपर के मुताबिक फू्रट फ्लाइज मनुष्यों की तरहही बूढ़ी होती हैं। प्रयोगशाला में जीनों के म्यूटेशन से भी कुछ जीव-जंतुओं का जीवन बढ़ाने में सफलता मिली है।जीवन को लंबा करने का एक और तरीका है आहार पर नियंत्रण। डॉपाइपर का कहना है कि यदि आप किसी चूहेके आहार में 40 प्रतिशत की कमी कर दें तो वह 20 या 30 प्रतिशत ज्यादा जीवित रहेगा। वैज्ञानिकों का दावा हैकि आहार पर नियंत्रण से मनुष्य का जीवन काल भी बढ़ाया जा सकता है।

 

हो रहा है बुढ़ापा रोकने का इंतजाम

भविष्य में एजिंग (बुढ़ापा) के इफेक्ट्स को रोकना संभव हो सकता है और बहुत मुमकिन है कि मनुष्य का जीवनकाल बढ़ाने का कोई कारगर तरीका भी हाथ लग जाए। वैज्ञानिक एजिंग की प्रक्रिया के पीछे मौजूद आणविक कारणों को समझने की कोशिश कर रहे हैं।

बर्कली स्थित युनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया (यूसी) में किए गए एक अध्ययन में इस दिशा में महत्वपूर्ण सफलता दर्ज की गई है और इससे बुढ़ापे से जुड़ी बीमारियों के इलाज के नए तरीके विकसित करने की उम्मीद जग गई है। यूसी के रिसर्चरों ने अपने एक प्रयोग में एक बूढ़े चूहे की रक्त स्टेम कोशिका में एक दीर्घायु जीन मिला कर उसकी आणविक घड़ी को पीछे खिसका दिया। इससे बूढ़ी स्टेम कोशिकाओं में नई जान आ गई और वे फिर से नई ब्लड स्टेम कोशिकाएं उत्पन्न करने में समर्थ हो गईं। दीर्घायु जीन का नाम 'सर्ट 3' है।

यह दरअसल 'सर्ट' समूह का प्रोटीन है, जो ब्लड स्टेम कोशिकाओं को स्ट्रेस से निपटने में मदद करता है। रिसर्चरों ने जब बूढ़े चूहे की ब्लड स्टेम कोशिकाओं में 'सर्ट 3' मिलाया तो नई ब्लड स्टेम कोशिका बनने लगी। यह इस बात का सबूत था कि बूढ़ी ब्लड स्टेम कोशिका के फंक्शन में वृद्धावस्था से जुड़ी गिरावट न सिर्फ रुक गई, बल्कि उसमें पुनर्जीवित होने की क्षमता भी उत्पन्न हो गई। जीव वैज्ञानिकों को पहले से इस बात की जानकारी थी कि सर्ट ग्रुप के प्रोटीन बुढ़ापे की प्रक्रिया को नियंत्रित करते हैं, लेकिन यूसी टीम के अध्ययन में पहली बार यह साबित हुआ कि यह प्रोटीन स्वास्थ्य में आने वाली बुढ़ापे से जुड़ी गिरावट को भी पलट सकता है।
प्रमुख रिसर्चर डेनिका चेन के अनुसार यह खोज बहुत रोमांचक है और इससे बुढ़ापे से जुड़ी बीमारियों के इलाज के तरीके विकसित करने का रास्ता खुल गया है। पिछले 10-20 वर्षों में वैज्ञानिकों को बुढ़ापे की प्रक्रिया को समझने में कई सफलताएं मिली हैं। वृद्धावस्था को अब अनियंत्रित और बेतरतीब प्रक्रिया नहीं माना जाता। यह बहुत ही नियंत्रित प्रक्रिया है, लेकिन इसमें फेरबदल की गुंजाइश मौजूद है। चेन के मुताबिक एक अकेले जीन के म्यूटेशन या परिवर्तन से जीवनकाल बढ़ाया जा सकता है। प्रश्न यह है कि क्या हम इस प्रक्रिया को समझ कर वृद्धावस्था को सचमुच पलट सकते हैं?

बुढ़ापे की प्रक्रिया में सर्ट ग्रुप के प्रोटीन की भूमिका स्पष्ट होने के बाद वैज्ञानिक इसे और ज्यादा गहराई से समझने की कोशिश कर रहे हैं। सर्ट 3 प्रोटीन कोशिका के माइटोकॉन्ड्रिया में पाया जाता है। कोशिका का यह हिस्सा उसका पावरहाउस कहलाता है और यह उसके विकास और मृत्यु को नियंत्रित करने में मदद करता है। पिछले अध्ययनों में पता चला था कि सट र्3 जीन कैलोरी में कटौती के दौरान सक्रिय होता है। प्रयोगों के दौरान एक बात यह भी सामने आई कि कैलोरी में कटौती अनेक प्रजातियों में जीवन काल बढ़ाने में सहायक होती है।

एजिंग के प्रभावों को समझने के लिए रिसर्चरों ने वयस्क स्टेम कोशिकाओं के काम का अध्ययन किया। वयस्कस्टेम कोशिकाएं टिशूज के रखरखाव और उनकी मरम्मत के लिए जिम्मेदार होती हैं। उम्र बढ़ने के साथ स्टेमकोशिकाओं के इस फंक्शन में कमी आने लगती है। रिसर्चरों ने अपने अध्ययन के लिए रक्त स्टेम कोशिकाओं कोचुना क्योंकि वे ब्लड सिस्टम को पूरी तरह से पुनर्गठित करने की क्षमता रखती हैं।

रिसर्चरों ने सबसे पहले ऐसे चूहों के ब्लड सिस्टम का अध्ययन किया, जिनमंे सर्ट 3 प्रोटीन के जीन को निष्क्रियकर दिया गया था। हैरानी की बात यह थी कि युवा चूहों में सर्ट 3 की गैरमौजूदगी से कोई फर्क नहीं पड़ा। लेकिनजैसे-जैसे इन चूहों की उम्र बढ़ी, सर्ट 3 से युक्त सामान्य चूहों की तुलना में उनमें रक्त स्टेम कोशिकाओं की संख्याघटती गई और नई ब्लड कोशिकाओं को पुनर्जीवित करने की उनकी क्षमता भी कम हो गई। इससे पता चलता हैकि युवा कोशिकाओं में ब्लड स्टेम कोशिकाएं ठीकठाक ढंग से काम करती हैं और उन्हें बहुत कम 'ऑक्सीडेटिवस्ट्रेस' का सामना करना पड़ता है।

ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस शरीर के भीतर मेटाबोलिज्म अथवा कोशिकाओं में कुदरती रासायनिक प्रक्रियाओं का एकनुकसानदायक बायप्रॉडक्ट है। इससे शरीर पर बोझ बढ़ता है। मेटाबोलिज्म के दौरान ऑक्सीजन का एक स्वतंत्रअणु निकलता है, जिसे फ्री रेडिकल भी कहा जाता है। इसमें इलेक्ट्रिकल चार्ज होता है। यदि इस अणु को किसीएंटी ऑक्सीडेंट से तुरंत न्यूट्रलाइज नहीं किया जाता है तो यह और ज्यादा फ्री रेडिकल उत्पन्न करता है। इससेकोशिका की दीवार बनाने वाले प्रोटीन और यहां तक कि कोशिका के डीएनए को भी नुकसान पहुंचता है। फ्रीरेडिकलों का एक्शन एक कटे हुए सेब के भूरा पड़ने या लोहे के जंग खाने जैसा ही है। शरीर पर दिखने वालेबुढ़ापे के लक्षण ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस के कारण होते हैं और वृद्धावस्था से जुड़ी कई बीमारियां भी इसी वजह से होतीहैं।

युवावस्था में शरीर की एंटी-ऑक्सीडेंट प्रणाली थोड़े-बहुत स्ट्रेस को आसानी से झेल सकती है, लेकिन उम्र बढ़नेके साथ हमारा सिस्टम ठीक से काम नहीं करता क्योंकि हम या तो ज्यादा ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस उत्पन्न करते हैं याउसे हटा नहीं पाते। इन स्थितियों में हमारी सामान्य एंटी-ऑक्सीडेंट प्रणाली काम नहीं करती और हमें सर्ट 3 कीजरूरत पड़ती है, लेकिन उम्र के साथ सर्ट 3 का लेवल भी कम हो जाता है। रिसर्चरों ने जब बूढ़े चूहों में सर्ट3 कालेवल बढ़ाया तो उनकी रक्त स्टेम कोशिकाएं पुनर्जीवित होने लगीं। इसके चलते उनकी ब्लड कोशिकाओं काउत्पादन बढ़ गया।

अभी यह देखना बाकी है कि सर्ट 3 की अत्यधिक अभिव्यक्ति क्या सचमुच में किसी की उम्र बढ़ा सकती है। लेकिनवैज्ञानिकों का कहना है कि जीवन काल बढ़ाना ही इस रिसर्च का एकमात्र लक्ष्य नहीं है। आनुवंशिक नियंत्रण केज्ञान का उपयोग वृद्धावस्था से जुड़ी बीमारियों के लिए किया जाएगा और यह एजिंग से संबंधित रिसर्च का एकप्रमुख लक्ष्य है। यूसी बर्कली में चेन की लैब में काम करने वाली एक अन्य वैज्ञानिक कैथरीन ब्राउन का कहना हैकि इस रिसर्च में सर्ट 3 से काफी उम्मीदें हैं। हमें इसमें काफी संभावनाएं दिखाई देती हैं। कुछ अन्य रिसर्चर इसप्रोटीन में ट्यूमर को दबाने के गुण को पहले ही उजागर कर चुके हैं। 

मानव क्लोनिंग अचानक करीब

वैज्ञानिकों ने त्वचा की स्टेम कोशिकाओं को प्रारंभिक भ्रूणों में बदल कर मानव क्लोनिंग में एक बहुत बड़ी सफलता प्राप्त की है। स्टेम कोशिकाएं वे कोशिकाएं होती हैं, जो विभाजित होने के बाद शरीर की किसी भी विशिष्ट कोशिका के रूप में विकसित हो सकती हैं। नई तकनीक से उत्पन्न भ्रूणों का इस्तेमाल प्रत्यारोपण ऑपरेशनों के लिए विशिष्ट मानव टिशू उत्पन्न करने में किया गया है। क्लोनिंग तकनीक में यह सफलता डॉली नामक भेड़ के जन्म के 17 के बाद हासिल हुई है और इससे हृदय रोग और पार्किंसन जैसे बीमारियों के बेहतर इलाज की उम्मीदें जग गई हैं। लेकिन इस सफलता से कुछ नए विवाद खड़े हो सकते हैं। कुछ लोग मेडिकल उद्देश्यों के लिए मानव भ्रूण उत्पन्न करने पर नैतिक सवाल उठाएंगे। सबसे बड़ा खतरा यह है कि शिशु क्लोन चाहने वाले दंपतियों के लिए इसी तकनीक से परखनली भ्रूण उत्पन्न किए जा सकते हैं। बहरहाल, नई तकनीक विकसित करने वाले वैज्ञानिकों का दावा है कि उनकी रिसर्च का मुख्य उद्देश्य मरीज की अपनी स्टेम कोशिकाओं से ऐसे विशिष्ट टिशू उत्पन्न करने का है, जिन्हें प्रत्यारोपण के लिए इस्तेमाल किया जा सके। उनका यह भी कहना है कि इस तकनीक का प्रजनन से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन दूसरे वैज्ञानिकों का मानना है कि इस उपलब्धि से हम शिशु क्लोन की दिशा में एक कदम और आगे बढ़ गए हैं।
मरीज की स्टेम कोशिकाओं से समुचित मात्रा में भ्रूणीय स्टेम कोशिकाएं उत्पन्न करना चिकित्सा विज्ञान के लिए एक बड़ी चुनौती थी। अमेरिका में पोर्टलैंड स्थित ओरेगन हेल्थ एंड साइंस यूनिवर्सिटी के प्रमुख रिसर्चर शोहरत मितालिपोव ने बताया कि उन्होंने बहुत कम मात्रा में मानव अंडाणुओं से भ्रूणीय स्टेम कोशिकाएं उत्पन्न करने के लिए सेल के कल्चर में कैफीन मिलाई थी। पहले यह सोचा गया था कि ऐसा करने के लिए हजारों मानव अंडाणुओं की जरूरत पड़ेगी। लेकिन मितालिपोव की टीम ने सिर्फ दो मानव अंडाणुओं से एक भ्रूण स्टेम कोशिका उत्पन्न करने में सफलता प्राप्त की। डॉ. मितालिपोव का कहना है कि यह तरीका मेडिकल इस्तेमाल के लिए ज्यादा कारगर और व्यावहारिक है। इस विधि से उन मरीजों के लिए स्टेम कोशिकाएं उत्पन्न की जा सकती हैं, जिनके अंग बेकार या अशक्त हो चुके हैं। इससे उन रोगों से छुटकारा पाने मदद मिलेगी, जो दुनिया में लाखों लोगों को प्रभावित करते हैं।
रिसर्चरों ने अपनी नई तकनीक में आनुवांशिक रोग वाले शिशु की स्किन कोशिकाएं निकाल कर उन्हें डोनेट किए गए मानव अंडाणुओं में प्रत्यारोपित कर दिया। इस विधि से उत्पन्न मानव भ्रूण आनुवंशिक दृष्टि से आठ महीने के भ्रूण से मिलते जुलते थे। भ्रूण से उत्पन्न कोशिकाओं में मरीज का ही डीएनए था, लिहाजा इन्हें बेहिचक मरीज के शरीर में प्रत्यारोपित किया जा सकता था। शरीर की प्रतिरोधी प्रणाली द्वारा उन्हें ठुकराने का कोई खतरा नहीं था। प्रयोगशाला में चूहों और बंदरों जैसे जानवरों में इस तकनीक से भ्रूण स्टेम कोशिकाएं उत्पन्न करने में सफलता मिल गई थी, लेकिन मनुष्यों में इसको दोहराने के प्रयास विफल हो रहे थे क्योंकि मानव अंडाणु कोशिकाएं बेहद नाजुक होती हैं।

सेल पत्रिका में प्रकाशित रिसर्च में वैज्ञानिकों ने अंडाणु के विकास में आने वाली समस्याओं से बचने के तरीके बताए और सिद्ध किया कि इस तकनीक से दिल, लिवर और स्नायु कोशिकाएं विकसित की जा सकती हैं। रिसर्चरों का विचार है कि पिछली क्लोनिंग तकनीकों की तुलना में नई विधि नैतिक दृष्टि से ज्यादा स्वीकार्य है क्योंकि इसमें निषेचित भ्रूणों का प्रयोग नहीं किया जाता। जापानी रिसर्चरों ने कुछ समय पहले मानव त्वचा से स्टेम सेल निकालने का तरीका विकसित किया था, लेकिन इसमें उन्होंने रसायनों का इस्तेमाल किया था। कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि इस तरीके से जीनों में हानिकारक बदलाव हो सकते हैं।दक्षिण कोरिया की सोल नेशनल यूनिवर्सिटी के वू सुक ह्वांग के नेतृत्व में कुछ वैज्ञानिकों ने 2004 में क्लोनिंग से मानव भ्रूण उत्पन्न करने का दावा किया था। बाद में उन्होंने इन भ्रूणों से भ्रूण स्टेम कोशिकाएं भी निकालने का दावा किया था। लेकिन अनैतिक आचरण और धोखाधड़ी के आरोपों के बाद उन्हें रिसर्च के नतीजों को वापस लेना पड़ा। इस प्रकरण से ह्वांग की काफी बदनामी भी हुई। कुछ अन्य रिसर्चरों ने भी क्लोनिंग से मानव भ्रूण उत्पन्न करने का दावा किया, लेकिन इनमें कोई भी यह साबित नहीं कर सका कि इन भ्रूणों से समुचित मात्रा में ऐसी भ्रूणीय कोशिकाएं उत्पन्न करना संभव है, जिन्हें प्रयोगशाला में विशिष्ट टिशू में बदला जा सके। डॉ. मितालिपोव की तकनीक की खास बात यह यह है कि क्लोन किए गए मानव भ्रूण 150 कोशिकाओं वाली अवस्था तक जीवित रह सकते हैं। इस अवस्था को ब्लास्टोसिस्ट भी कहते हैं। इस अवस्था से भ्रूण स्टेम कोशिकाएं निकाली जा सकती हैं, जिन्हें बाद में स्नायु कोशिकाओं, हृदय कोशिकाओं या जिगर की कोशिकाओं के रूप में विकसित किया जा सकता है। प्रत्यारोपण के दौरान मरीज द्वारा इन्हें खारिज किए जाने की कोई आशंका नहीं है क्योंकि इन कोशिकाओं को मरीज की अपनी आनुवंशिक सामग्री से ही उत्पन्न किया गया है।
इस क्लोनिंग तकनीक का दुरुपयोग संभव है। ह्यूमन जेनेटिक्स अलर्ट के निदेशक डेविड किंग का कहना है कि वैज्ञानिकों ने अंतत: वह रास्ता दिखा दिया है, जिसका मानव क्लोन बनाने में जुटे रिसर्चरों को बेसब्री से इंतजार था। उन्होंने कहा कि नई रिसर्च को प्रकाशित करना एक गैरजिम्मेदाराना कदम है। इस संबंध में और आगे रिसर्च शुरू होने से पहले ही हमें मानव क्लोनिंग पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगाने पर शीघ्र विचार करना चाहिए। कमेंट ऑन रीप्रॉडक्शन एथिक्स की जोसेफीन क्विंटावाल ने इस रिसर्च के औचित्य पर ही सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि स्टेम कोशिका उत्पन्न करने के गैरविवादित तरीके पहले से उपलब्ध हैं। ऐसे में इस रिसर्च की जरूरत क्या थी।

हमें उम्मीद करनी चाहिए कि इस रिसर्च को प्रजनन क्लोनिंग की तरफ मोड़ने की कोशिश नहीं की जाएगी। डॉ. मितालिपोव का कहना है कि वह क्लोनिंग के जरिए बंदर शिशु उत्पन्न करने में असफल रहे हैं। अत: इस बात की संभावना बहुत कम है कि इस तकनीक का प्रयोग मनुष्य के क्लोन उत्पन्न करने के लिए किया जाएगा। ब्रिटेन की न्यू कैसल यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर मैरी हर्बर्ट का मानना है कि नई तकनीक शरीर को अशक्त बनाने वाली बीमारियों के इलाज के लिए मरीज की जरूरत के हिसाब से स्टेम कोशिकाएं उत्पन्न करने में मदद कर सकती है। एडिनबरा विश्वविद्यालय के डॉ. पॉल डि सूजा का मानना है कि महिलाओं के अंडाणुओं के बारे में हमारी बेहतर समझदारी से इनफर्टिलिटी के नए इलाज खोजे जा सकते हैं। sabhar :http://navbharattimes.indiatimes.com/

Read more

 
Design by ThemeShift | Bloggerized by Lasantha - Free Blogger Templates | Best Web Hosting