Loading...

शनिवार, 8 मार्च 2014

आखिर उस पुरुष के प्यार में क्यों पागल है नागिन

0


mystery love nagin mathura

यह घटना किसी बॉलीवुड फिल्म की तरह है जिसे पढ़कर आप सोचने पर मजबूर हो सकते हैं कि, क्या कोई किसी से इतना प्यार कर सकता है। प्यार भी कैसा तो एक नागिन का इंसान से, जो आमतौर पर एक दूसरे के जानी दुश्मन माने जाते हैं।

यह प्रेम कहानी मथुरा जिले के अगरयाला गांव की है। यह हर साल नागपंचमी के दिन एक नागिन लक्ष्मण नाम के व्यक्ति से आकर लिपट जाती है। लगभग तीन दिनों तक लक्ष्मण के साथ रहने के बाद यह नागिन कहीं चली जाती है।

नागिन कहां से आती है, कहां चली जाती है और लक्ष्मण नाम के व्यक्ति से क्यों लिपट जाती है यह रहस्य बना हुआ है। लोग इसे पूर्वजन्म की प्रेम कहानी मानते हैं। यह प्रेम कहानी लगभग ग्यारह साल पहले नागपंचमी के दिन लोगों की नजरों में आयी।

लक्ष्मण के परिवार वालों का कहना है कि जब यह सात महीने का था तब नागिन आकर लक्ष्मण के सीने पर बैठ गयी लेकिन काटी नहीं। उस समय तक किसी को नागिन के प्रेम का अंदाजा नहीं था।

जब लक्ष्मण की शादी गंगा नाम की लड़की से हो गयी तब से नागिन ने लक्ष्मण को काटना शुरु कर दिया। लेकिन हर बार लक्ष्मण को बचा लिया जाता। परिवार वालों ने जब इस घटना को जानने के लिए ढाक बजवाया तो पता चला कि नागिन लक्ष्मण की पूर्वजन्म की पत्नी है, यह हमेशा लक्ष्मण के पास रहना चाहती है। sabhar :http://www.amarujala.com/

Read more

मोबाइल से शरीर में पहुंचा 11000 वोल्ट का करंट

0

मोबाइल ब्लास्ट से चेहरा और शरीर जला


मोबाइल ब्लास्ट से चेहरा और शरीर जला


आपको यह जानकर आश्चर्य जरूर होगा कि बिजली के तार के नजदीक मोबाइल फोन से बात करने पर एक युवक के शरीर में 11 हजार वोल्ट का करंट पहुंच गया। इससे उसके शरीर के अंदर इतना बड़ा ब्लास्ट होगा।

ब्लास्ट की वजह से मरीज का चेहरा, आंख और शरीर के कई महत्वपूर्ण अंग बुरी तरीके से जल गए। मरीज का इलाज करने वाले डॉक्टर भी इस घटना से आश्चर्य में हैं।

मरीज की अभी तक 11 सर्जरी की जा चुकी है और करीब आधा दर्जन सर्जरी और होनी है। मरीज को मध्य प्रदेश के ग्वालियर से दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

करंट कान से होते हुए शरीर में पहुंचा

करंट कान से होते हुए शरीर में पहुंचा

एक अगस्त-2013 को 23 वर्षीय एमबीए ग्रैजुएट युवक छत पर मोबाइल फोन से बात करने गया, छत के पास से 11 हजार वोल्ट बिजली का तार गुजर रहा था। तार में करंट था।

डॉक्टरों का कहना है कि मोबाइल से मैगनेटिक फिल्ड और बिजली की तार से इलेक्ट्रिक फिल्ड निकला। इसकी वजह से करंट युवक के कान से होते हुए शरीर में प्रवेश किया और ब्लास्ट हुआ।

ब्लास्ट के बाद युवक अचेत होकर 45 मिनट तक पड़ा रहा। इसके बाद उसे होश आया। उस दिन उसे ग्वालियर के ही एक अस्पताल में भर्ती कराया गया। दो दिन बाद तीन अगस्त-2013 को मरीज को सर गंगा राम अस्पताल में भर्ती कराया गया। 

ग्वालियर का रहने वाला, दिल्ली में हो रहा है ईलाज

ब्लास्ट के बाद गंभीर अवस्था में 23 वर्षीय युवक रवि (परिवर्तित नाम) को तीन अगस्त-2013 को ग्वालियर से सर गंगा राम अस्पताल लाया गया।

डॉक्टरों की टीम ने मरीज को देखा इसके बाद उसे प्लास्टिक और रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी विभाग रेफर कर दिया गया। मरीज की दाहिनी आंख पूरी तरह से खराब हो चुकी थी। कॉर्निया तक जल चुका था। चेहरा बुरी तरह से जल चुका था।

कान, जांघ और निजी अंगों के अलावा कई अन्य प्रभावित थे। चेहरे की हड्डी तक जल चुकी थी। ऐसे में चिकित्सकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती मरीज के घाव में फैल रहे संक्रमण को रोकना था।

10 सर्जरी के बाद हो रहा है सुधार

प्लास्टिक और रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी विभाग के एसोसिएट कंसलटेंट डॉ. स्वरूप सिंह गंभीर ने बताया कि अभी तक मरीज की 10 सर्जरी की जा चुकी है और 11वीं सर्जरी की तैयारी की जा रही है।

मरीज की कई दिक्कतों को दूर कर दिया गया है। वह अब सुन सकता है और चेहरे की भी रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी की जा चुकी है। भौं (आई ब्रो) सहित कुछ अन्य रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी भी की जानी है। डॉ. स्वरूप का कहना था कि ऐसा केस उन्होंने अपने चिकित्सीय जीवन में नहीं देखा, लेकिन मरीज में हो रहे सुधार से वे काफी खुश हैं।

sabhar :http://www.delhincr.amarujala.com/



Read more

उफ! क्या थीं ये फिल्में जो दुनिया भर में तहलका मचा बैन हो गईं

0

आखिर क्यों बैन हुई ये फिल्में

आखिर क्यों बैन हुई ये फिल्में


दुनिया भर में कई ऐसी फिल्में बनी जो अपनी विषय वस्तु और कथानक को लेकर आलोचनाओं में रहीं। इन्होंने दुनिया भर में विवाद पैदा कर दिया।

इनमें से कईयों को बैन कर दिया गया तो कुछ एक के निर्माता को अपनी जान तक से हाथ धोना पड़ा। ऐसी ही फिल्मों और इनसे जुड़ी पूरी जानकारियां हम आपको दे रहे हैं। 

 निर्माता की ही जान ले गई  'सालो/द 120 डेज ऑफ सोडम'

निर्माता की ही जान ले गई 'सालो/द 120 डेज ऑफ सोडम'

इटली की ये फिल्म 1975 में आई और मोस्ट कंट्रोवर्सल फिल्मों की सरताज बन गई। फिल्म में बच्चों के एक ग्रुप का अपहरण कर लिया जाता है जो नाजी के हाथों की कठपुतलियां बन जाते हैं।

बच्चों के साथ रेप, मर्डर के अलावा कई वीभत्स टार्चर दिखाए गए। जिसमें ऐनल रेप जैसी कई गंदी हरकतें भी शामिल थीं। फिल्म आस्ट्रेलिया में 1993 तक बेन रही इसके बाद 1998 में इसको फिर से बेन कर दिया गया।

यही नहीं फिल्म बनाने वाले पॉयर पाओलो पासोलोनी के पास तो अपनी फिल्म की सफाई देने का भी वक्त नहीं बचा क्योंकि फिल्म रिलीज के बाद ही उनकी बेहद निर्ममतापूर्ण हत्या भी कर दी गई।

'लॉस्ट हाउस ऑन द लेफ्ट: शूटिंग में घबरा गई हीरोइन ही

लॉस्ट हाउस ऑन द लेफ्ट: शूटिंग में घबरा गई हीरोइन ही

1972 में आई ये फिल्म सेक्सअुल टार्चर पर आधारित थी। जिसमें दो टीनेज फ्रेंड्स का किडनेप कर लिया जाता है। इसके बाद इन दोनों को एक दूसरे के साथ सेक्स के लिए बाध्य किया जाता है। फिल्म में सेक्स हिंसा के कई सीन थे।

बताया जाता है कि फिल्म की हीरोइन सांड्रा पीबॉडी खुद शूटिंग के दौरान इतना विचलित हो गई थीं कि वह सैट ही छोड़ कर चली गईं। 

डायरेक्टर को ही जेल में ले गई 'लॉस्ट टेंगो इन पेरिस'

1972 में बनी ये फिल्म अपने कथानक और विषयवस्तु के कारण विवादों में आ गई। फिल्म के डॉयरेक्टर बर्नाडो को तो ‌चार महीने जेल की हवा भी खानी पड़ी।

फिल्म में सेक्स की खुशी पाने के लिए की गई हरकतें लोगों को जरा भी रास नहीं आईं। कई देशों में फिल्म को पूरी तरह से बेन कर दिया गया। इटली, पुर्तगाल और चिली में फिल्म पर 30 साल तक रोक लग गई।
वहशियाना हरकतों से भी आगे निकल गए ये 'किड्स'

वहशियाना हरकतों से भी आगे निकल गए ये 'किड्स'

अमेरिका में 1995 में आई फिल्म किड्स अपने नाम के एकदम विपरीत निकली। फिल्म में सेक्स एडिक्ट टीनेजर्स को दिखाया गया था। एचआईवी पीड़ित लड़के के ग्रुप द्वारा लड़की के साथ रेप जैसे तमाम विवादास्पद सीन थे।

सेक्स, नशा और वहशियाना हरकतों से भरपूर थी ये फिल्म। जिसने दर्शकों और क्रिटिक्स को चौंका कर रख दिया। फिल्म की खूब आलोचना हुई।

'एंटीक्रिस्ट' देख बेहोश हो गए थे चार लोग

डेनमार्क में बनी ये फिल्म इतनी वीभत्स और अजीब थी जिसे देख कान फिल्म फेस्टिवल में हुई स्क्रीनिंग के दौरान चार लोग बेहोश हो गए थे। टेलीग्रॉफ फिल्म क्रिटिक्स ने इस फिल्म को टार्चर पोर्न को लेबल दिया था।

फिल्म में एक कपल्स के सेक्स मूमेंट के दौरान उनके बेटे की खिड़की से गिरकर मौत हो जाती है। निराशा में ये पति-पत्नी एक दूसरे को ही टार्चर करने लगते हैं। फिल्म में पत्नी द्वारा पति के पैर में ड्रिल मशीन से छेद कर लकड़ी डालने जैसे भयंकर दृश्य थे।

बेसी-मोईः सताई महिलाओं ने जब लोगों को सताया

बेसी-मोईः सताई महिलाओं ने जब लोगों को सताया

बेसी-मोई दो ऐसी महिलाओं की कहानी थी जो काफी वॉयलेंस झेल चुकी थीं। ये दोनों मिलती हैं और कुछ नया एक्साइटिंग करने की चाह में एक रोड ट्रिप पर निकल जाती हैं। इसी ट्रिप के बाद शुरु होती है सेक्स और हत्याओं की सिलसिलेवार कहानी।

जिसकी जिम्मेदार ये दोनों महिलाएं होती है। दोनों को देश की मोस्ट वांटेड नॉटीरिअस घोषित कर दिया जाता है। फिल्म की दोनों हीरोइनें पूर्व पोर्न स्टार थीं। फिल्म इतनी वॉयलेंटेड थी कि फ्रांस में इसकी जमकर आलोचना हुई।

ब्रिटेन में फिल्म में 10 सेकेंड के कट के बाद 18 सार्टिफिकेट के साथ रिलीज की इजाजत मिली। फिल्म का पोस्टर लंडन में पूरी तरह बेन कर दिया गया। फ्रांस की ये फिल्म 2000 में आई थी।

रिलीज न हो सकी'द एक्सोरिस्ट'

अमेरिका की ये फिल्म 1973 में बनाई गई थी। जिसे आलोचकों ने रिलीजियस पोर्न बताते हुए बेहद विवादास्पद करार दिया।1984 वीडियो रिकार्डिंग एक्ट के तहत फिल्म को रिलीज करने से साफ मना कर दिया गया साथ ही इस फिल्म की कोई भी वीडियो कॉपी यूके में बिक्री के लिए प्रतिबंधित कर दी गई।

बैन ही रही 'ए क्लोकवाइज ऑरेंज'

यूके की ये फिल्म बनी तो 1971 में थी लेकिन बाद में ये पर्दे पर नहीं दिख सकी। फिल्म में डर्टी रेप सीन्स और वीभत्स हिंसा के कई दृश्य थे। मीडिया ने फिल्म की खूब आलोचना की।
यही नहीं डायरेक्टर और उसके परिवार को जान से मारने की धम‌कियां भी मिलती रहीं। आखिरकार ये फिल्म बैन कर दी गई।

धार्मिक भावनाओं को हिला गई'लाइफ ऑफ ब्रॉयन'

1979 में आई ब्रिटेन की ये फिल्म आते ही विवादों में छा गई। फिल्म को धार्मिक आस्‍थाओं पर प्रहार करने वाली माना गया। चर्च और धार्मिक संगठनों ने इस फिल्म को पूरी तरह से बेन करने की मांग कर दी। 
स्पिट ऑन योर ग्रेव

स्पिट ऑन योर ग्रेव

1978 में आई अमेरिका‌ निर्मित ये फिल्म बदले और बलात्कार पर आधारित थी। फिल्म में रेप सीन के अलावा भयंकर वीभत्स दृश्य भी थे। जिसमें रेप और टार्चर को बहुत ही गंदे ढंग से दिखाया गया।

फिल्म को रिलीज से पहले ही अमेरिका में सेंसर्ड कर दिया गया। बाद में युरोप के कई देशा में फिल्म पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया। क्रिटिक्स का मानना था कि ये फिल्म क्रिमिलन दिमाग वाले लोगों को और अधिक क्राइम करने के लिए प्रेरित करेगी। sabhar :http://www.amarujala.com/

Read more

एक अकेली औरत

0

सुरुचि शर्मा

सुरुचि शर्मा की उम्र 28 साल है, वह मुंबई में एक अच्छे पद पर कार्यरत हैं और उनकी अभी तक शादी नहीं हुई है. वह कहती हैं कि पुरुष हो या महिला, अगर आपको अच्छी शिक्षा मिली हो और थोड़ी चतुराई का इस्तेमाल करें तो भारत में मौकों की कमी नहीं है और आपको एक बढ़िया वेतन वाली नौकरी मिलने की संभावना रहती है.
लेकिन अगर आप महिला हैं तो इन हालात में भी ये ज़रूरी है कि 20 की उम्र पार करने के कुछ साल के अंदर आपकी शादी हो जानी चाहिए.

भारत में इस आयु वर्ग की हर अविवाहित महिला को इस तरह के सवालों और बातचीत का सामना लगभग हर वक़्त करना पड़ता है.अगर 30 साल के क़रीब पहुंचते-पहुंचते भी आपकी शादी नहीं हुई है, तो लोग आपसे सहानुभूति जताते हैं, सवाल करते हैं, आपसे पूछा जाता है कि क्या आपको कोई मिला नहीं और आपको एक नाक़ामयाब इंसान समझा जाता है.
मैं एक शहरी मध्यम वर्ग परिवार से हूं. मेरा बचपन वडोदरा में बीता, कॉलेज की पढ़ाई वडोदरा और दिल्ली में हुई और अब मुंबई में एक बड़ी कंपनी में डिजीटल कम्युनिकेशन विभाग की प्रमुख हूं.
मेरी ज़िंदगी उन बहुत सी युवतियों की तरह है जो काम के लिए घर से दूर रहती हैं. अकेले रहना एक ग़ज़ब का अनुभव है.

शादी का दबाव

मैं आत्मनिर्भर हूं और मेरी जीवनशैली ऐसी है जिसका मैं हमेशा सपना देखती थी. भारतीय महिलाओं को अपनी प्रतिभा दिखाने और आगे बढ़ने के मौका मिल रहा है. हमें हर क़दम पर लैंगिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है लेकिन हम फिर भी रास्ता ढूंढ लेती हैं और आगे बढ़ जाती हैं.
"अगर 30 साल के करीब पहुंचते-पहुंचते भी आपकी शादी नहीं हुई है, तो लोग आपसे सहानुभूति जताते हैं, सवाल करते हैं, आपसे पूछा जाता है कि क्या आपको कोई मिला नहीं और आपको एक नाक़ामयाब इंसान समझा जाता है."
सुरुचि शर्मा
लेकिन फिर भी भारत में लड़कियों पर शादी दबाव हमेशा रहता है. हमसे हमेशा पूछा जाता कि हम कब शादी करेंगे. भारत में एक लड़की की पहचान और व्यक्तित्व शादी के इर्द-गिर्द घूमता है और बचपन से ही हमें समझाया जाता है कि बड़े होकर हमें शादी करनी होगी और दूसरे परिवार में बहू बन कर जाना होगा.
हम जो भी सीखते हैं, वो भविष्य में एक पत्नी और बहू की भूमिका को ध्यान में रखकर सिखाया जाता है. हमें खाना बनाना, घर के काम करना, अच्छा बर्ताव करना और सही छवि बनाना सिखाया जाता है.
अगर आप शादी की किसी वेबसाइट पर नज़र डालें तो उपयुक्त वधू के लिए 'फैमिली-ओरिएंटेड', 'घरेलू' और 'बहुत ज़्यादा नौकरी या करियर में दिलचस्पी नहीं लेने वाली' जैसे गुण पाएंगे. हर कोई ऐसी पत्नी चाहता है जिसकी करियर से पहले गृहस्थी में दिलचस्पी हो.
किसी भी पुरुष की ज़िंदगी में आदर्श महिला बनने के लिए ज़रूरी है कि उसे अच्छी शिक्षा मिली हो, वह देखने में आकर्षक हो, उसका एक बढ़िया करियर हो और इसके बावजूद वह इस सबको ठंडे बस्ते में डालने के लिए भी तैयार हो.
हिंदू विवाह
भारत में लड़कियों पर शादी दबाव हमेशा रहता है. एक लड़की की पहचान और व्यक्तित्व शादी के इर्द-गिर्द घूमता है.

सही साथी का इंतज़ार

मैंने शादी इसलिए नहीं की क्योंकि मुझे अब तक उन्हें अपने लिए सही साथी नहीं मिला है. सुनने में शायद ऐसा लगे कि मैं शादी के ख़िलाफ़ हूं लेकिन ऐसा नहीं है.
भारतीय मान्यताओं के मुताबिक तो अब तक मेरी शादी हो जानी चाहिए थी और इस मामले में अब देर हो गई है. शादी के लिए योग्य महिलाओं की सूची में मैं शायद काफ़ी नीचे हूं. लेकिन मैं फिर भी 'सिर्फ़ घर बसाने' के लिए कोई समझौता नहीं करना चाहतीं और किसी से भी शादी नहीं करना चाहती.
"मैंने शादी इसलिए नहीं की क्योंकि मुझे अब तक उन्हें अपने लिए सही साथी नहीं मिला है. लेकिन मैं फिर भी ''सिर्फ़ घर बसाने'' के लिए किसी से भी शादी नहीं करना चाहती."
सुरुचि शर्मा
मेरे लिए कौन सा व्यक्ति सही या उपयुक्त है, इसका फ़ैसला दूसरों को नहीं बल्कि मुझे करना है.
भारत में आज भी एक महिला के लिए अविवाहित होना एक धब्बा है. अगर कोई महिला अपनी मर्ज़ी से शादी नहीं करती, तो ये मान लिया जाता है कि वह इज़्ज़तदार नहीं है.

मुश्किलें

सुरुचि बताती हैं कि कई बार उन्होंने किसी बढ़िया इलाक़े में किराए पर मकान लेने की कोशिश की लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली.
अकेली, कामकाजी महिला को लोग मकान किराए पर नहीं देना चाहते. उन्हें डर होता है कि मुझ जैसी महिला का बर्ताव अनैतिक होगा, मेरे घर में पार्टियां होंगी, रात भर पुरुष रहेंगे और मैं आस-पास के परिवारों पर बुरा असर डालूंगी. कोई ये सोच भी नहीं सकता कि मैं एक सामान्य इंसान हो सकती हूं जो एक सामान्य जीवन बिता रही है.
मकान मालिक अकेली महिला किराएदारों को निकालने का मौका हमेशा तलाशते रहते हैं. थोड़ी सी भी कमी या भूल होने पर उन्हें मकान खाली करने के लिए कहा जाता है. अकेली महिला के लिए हर जगह क़ायदे-क़ानून हैं और हम सामान्य जीवन नहीं बिता सकतीं.
दूसरे शब्दों में, ये मान लिया जाता है कि अपने परिवार से दूर, एक स्वतंत्र जीवन बिता रहीं अकेली महिला चरित्रहीन होगी.
जितना ज़्यादा समय मैं इस तरह की ज़िंदगी बिताउंगी, उतना ही एक प्रतिष्ठित परिवार में मेरी शादी होनी की संभावना कम होगी. कई बार मैं सोचती हूं कि अपने माता-पिता को लोगों की बातें सुनने से बचाने के लिए क्या मैं समझौता कर लूं और किसी ठीक-ठाक इंसान से शादी कर लूं.
मैं ख़ुशकिस्मत हूं क्योंकि मेरे माता-पिता मेरा पूरा साथ देते हैं.
सुरुचि शर्मा का परिवार
सुरुचि शर्मा ख़ुद को ख़ुशकिस्मत मानती हैं कि उनका परिवार उनका पूरा साथ दे रहा है.

परिवार का सहयोग

जब मैं सही इंसान के लिए इंतज़ार करने की बात करती हूं तो मेरे माता-पिता मेरा साथ देते हैं. लेकिन उन पर भी रिश्तेदारों और जान-पहचान के लोगों का बहुत ज़्यादा दबाव है. उनसे हर रोज़ पूछा जाता है, 'सुरुचि कब शादी कर रही है?' और इस तरह के सवालों से वे परेशान हो जाते हैं.
"जब तक मैं इस समाज का हिस्सा हूं, तब तक मुझ पर शादी करने का दबाव बढ़ता रहेगा. सच कहूं तो अगर मैं अगले एक-दो साल में शादी नहीं करती, तो मैंने विदेश जाने के बारे में भी सोचा है."
सुरुचि शर्मा
वे सोचने लगते हैं कि अपनी बेटी को ख़ुद फ़ैसले करने की छूट देकर वे कहीं कुछ ग़लत तो नहीं कर रहे. उन्हें नहीं लगता कि अगर मैंने शादी नहीं की तो भारतीय समाज मुझे ख़ुशहाल ज़िंदगी बिताने देगा.
इन दबावों से जूझने के लिए मैं अपनी मां-बाप की शुक्रगुज़ार हूं. मुझे अपने बारे में इतनी चिंता नहीं है लेकिन मैं हमेशा सोचती हूं कि अपने मां-बाप के लिए कैसे हालात कैसे आसान बना सकती हूं.
जब तक मैं इस समाज का हिस्सा हूं, तब तक मुझ पर शादी करने का दबाव बढ़ता रहेगा. सच कहूं तो अगर मैं अगले एक-दो साल में शादी नहीं करती, तो मैंने विदेश जाने के बारे में भी सोचा है.
समाज की ताक-झांक और दखलअंदाज़ी से बचने और एक शांत ज़़िंदगी बिताने का एकमात्र तरीक़ा भारत से चले जाना ही है. अगर मैं किसी दूसरे देश में रहूंगी तो लोग मुझसे मेरी शादी की योजना के बारे में नहीं पूछेंगे. मुझे लगता है कि विदेश में शादी करने का दबाव इतना नहीं होता.

28 साल की उम्र में अविवाहित होना आसान नहीं है. मैं इस दबाव को 24 घंटे सहती हूं. मैंने इसके साथ रहने का फ़ैसला किया है. sabhar :http://www.bbc.co.uk/

Read more

अब लैब में भी उगाए जा सकेंगे कान और नाक

0

अब लैब में भी उगाए जा सकेंगे कान और नाक

लंदन के ग्रेट अरमंड स्ट्रीट अस्पताल के डॉक्टरों ने इंसान के शरीर की वसा (फैट) से स्टेम सेल निकालकर उससे चेहरा विकसित करने की योजना बनाई है। डॉक्टरों की एक टीम ने प्रयोगशाला में कार्टिलेज यानी नरम हड्डी विकसित कर ली है। माना जा रहा है कि इसका उपयोग कान और नाक बनाने में किया जा सकता है। 
 
नैनोमेडिसिन नाम की विज्ञान पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन में डॉक्टरों ने कहा है कि यह तकनीक इलाज के क्षेत्र में क्रांतिकारी कदम साबित हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस क्षेत्र में अभी और काम करने की जरूरत है। डॉक्टर इसके जरिए माइक्रोटिया जैसी समस्या का इलाज करना चाहते हैं, जिसमें इंसान के कान का बाहरी हिस्सा ठीक से विकसित नहीं हो पाता है। 
 
अभी माइक्रोटिया के इलाज के लिए बच्चों की पसलियों से कार्टिलेज लेकर डॉक्टर कोमलता से उससे कान बनाते हैं और उसे बच्चे में प्रत्यारोपित करते हैं। इसके लिए कई तरह के ऑपरेशन की जरूरत होती है, जो सीने पर घाव के स्थायी निशान छोड़ जाते हैं। वहीं पसलियों से निकाले गए कार्टिलेज की कभी भरपाई भी नहीं हो पाती है। 
 
इस नई तकनीक का प्रयोग नाक जैसे अंगों के लिए टिश्यू तैयार करने के लिए कार्टिलेज बनाने में किया जा सकता है, जो कैंसर के ऑपरेशन के दौरान क्षतिग्रस्त हो सकती है। डॉक्टरों ने कहा है कि वो इसी तरह की शुरुआती सामग्री की मदद से हड्डी भी बना सकते हैं। 
 
पैट्रिजिया फेरेटी कहते हैं कि ज़ाहिर है कि हम इसकी शुरुआत में हैं। अगला कदम सामग्री के चयन का होगा और इसे विकसित करेंगे। इस अध्ययन में लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज के प्रोफेसर मार्टिन बिरचाल भी प्रयोगशाला में विकसित की गई श्वासनली के प्रत्यारोपण के लिए हुए ऑपरेशन में शामिल थे। 

अब लैब में भी उगाए जा सकेंगे कान और नाक


ऐसे बनेगी कोशिका 
 
डॉक्टरों का कहना है कि वसा का एक छोटा सा टुकड़ा बच्चे के शरीर से निकाला जा सकता है। इस टुकड़े से स्टेम सेल निकालकर उसे विकसित किया जा सकता है। कान के आकार के एक ढांचे को स्टेम सेल के घोल में रखा जाएगा। इससे कोशिका ठीक उसी प्रकार का आकार लेगी, जैसा ढांचा डाला गया है। 
 
प्रक्रिया में रसायनों का उपयोग स्टेम सेल को कार्टिलेज सेल में विकसित करने में किया जाएगा। ढांचे में कार्टिलेज विकसित करने में सफलता तो मिली, लेकिन इसे मरीज में प्रत्यारोपित करने पर वह कितना कारगर होगा, इस पर काम कर रहे हैं। 
 
इस तकनीक से 15 साल के सैमुअल क्लॉम्पस जैसे रोगियों को फायदा मिल सकता है, जिनका कान सुधारने के लिए ऑपरेशन करना पड़ा है। उनकी मां सू ने कहा कि उनका परिवार इस तकनीक का स्वागत करता है। 
 
(तस्वीर में- ऑपरेशन से पहले सैमुअल)

अब लैब में भी उगाए जा सकेंगे कान और नाक

डॉक्टरों की नई योजना पर प्रतिक्रिया ? 
 
''यह वास्तव में रोमांचक है कि हमारे पास इस तरह की कोशिकाएं हैं जिससे ट्यूमर होने की संभावना न हो, जिन्हें उसी मरीज में डाला जा सकता है, इसलिए हम वह काम कर सकते हैं, जो करना चाहते हैं।''
 
डॉक्टर पार्तिजिया फेरिटि, शोधकर्ता 
 
''बच्चे के कान को आकार देने के लिए इसे त्वचा के नीचे प्रत्यारोपित किया जा सकता है। अगर आपके पास कुछ है, जो वास्तव में पुनरोत्पादक है, तो वह परिवर्तनकारी होगा। तकनीक को अपनी अंतिम अवस्था में पहुंचने के लिए और सुरक्षा परीक्षणों की जरूरत होगी।'' sabhar : bhaskar.com


Read more

शुक्रवार, 7 मार्च 2014

एलियन के रहस्‍य से अब उठेगा पर्दा!

0


एलियंस

इंसान का पाला तमाम रहस्यों से पड़ता है, लेकिन एलियन एक ऐसा रहस्य है, जिसकी गुत्थी सुलझाने के लिए इंसान पिछले 64 सालों से माथापच्ची कर रहा है. फिर भी उड़नतश्तरी से आने वाला वो मेहमान कभी हकीकत लगता है तो कभी हौवा. इस हौवे को तोड़ने के लिए अमेरिका के वैज्ञानिकों और खगोलशास्त्रियों ने सबसे बड़ी खोज शुरू कर दी है.रूस के एक एयर ट्राफिक कंट्रोलर ने दावा किया है कि उसने एलियन को देखा है. उसने रडार की स्क्रीन पर तेजी से घूमता हुआ यूएफओ देखा और उससे संपर्क साधने की कोशिश की. उड़नतश्तरी से आने वाले मेहमानों की तमाम कहानियों से लोग वाकिफ हो चुके हैं. कैसे एलियन चुपके से इस धरती पर आते हैं और कैसे वो कुछ जगहों पर अपनी निशानी छोड़ जाते हैं. दुनिया का कोई ऐसा मुल्क नहीं जहां एलियन्स के वजूद को लेकर चर्चा गर्म नहीं है. नासा के कंट्रोल रूम से लेकर जापान की संसद तक औऱ इंगलैंड के खुफिया विभाग से लेकर रोमानिया की सरकार तक. हर तरफ दूसरे ग्रहों से आने वाले प्राणियों की हकीकत को लेकर उठ रहे हैं सवाल. क्या सचमुच पृथ्वी से परे भी है जिंदगी की सुगबुगाहट? क्या सचमुच वो छिप-छिप कर आते हैं हमारी धरती पर, हमारी टोह लेने ? क्या वाकई विज्ञान और तकनीक के मामले में हमसे काफी आगे हैं? जाने ऐसे कितने सवाल हैं जो एलिएन्स का नाम सुनते ही एकबारगी आपके जेहन में उठ खड़ा होते हैं? और जिसका कोई ठोस जवाब अबतक किसी के पास नहीं है. दुनिया में उडनतस्तरियों और दूसरे ग्रहों के लोगों को देखे जाने की बातें कई बार सामने आ चुकी है.  कई बार लोगों ने इसके सबूत भी पेश किए. एलियंस कभी तस्वीरों में दिखे तो कभी एलियन का चेहरा वीडियो में भी दिखा. वैसे इस बात से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता है कि यूएफओ जैसी चीज़ कोई है ही नहीं.
एक रूसी अखबार ने अपने देश के एक चैनल पर दिखाई खबर के हवाले से छापा है कि अमेरिका के अंतरिक्ष यात्री जब चाँद पर पहुँचे थे तो उन्हें वहाँ एलियन दिखाई दिए थे, जिन्होंने अमेरिकियों को वहाँ से भाग जाने की चेतावनी दी थी. चैनल ने एक वीडियो जारी किया है, जिसमें दावा किया गया है कि चंद्रमा पर एलियन के कदमों के निशान हैं.

1969 से लेकर 1972 तक अमेरिका के छः अपोलो मिशन चाँद पर गए थे. रूसी अखबार प्रवादा ने शक जताया है कि चाँद पर गए सभी मिशन के दौरान वैज्ञानिकों का वास्ता एलियन से पड़ा था और नासा इस सच को लगातार छिपाता रहा है. वैसे चाँद पर एलियन होने और नासा की तरफ से इसे छुपाए जाने की खबरें पहले उड़ती रही हैं.

एलियन की मौजूदगी पर यकीन करने वालों ने इसके पक्ष में इंटरनेट पर अपनी तरफ से तमाम सबूत भी रखे हैं, लेकिन स्पूतनिक की 50वीं सालगिरह मना रहे रूस के सबसे चर्चित अखबार प्रावदा ने इसे पहली बार प्रकाशित किया है. चाँद पर अमेरिका ने 1969 से 1972 तक 12 अंतरिक्ष यात्री भेजे जबकि रूस अभी तक एक भी अंतरिक्ष यात्री चाँद पर नहीं भेज पाया है. वैसे 1972 के बाद से चाँद पर मानव के कदम नहीं प़ड़े हैं.

आरटीआर चैनल ने एलियन और यूएफओ जैसे मामलों के दो विशेषज्ञों को इस बारे में खुलासा करते दिखाया है. नासा का कहना है कि अपोलो मिशन से जु़ड़े कई दस्तावेज, तस्वीरें और फुटेज खो गई हैं जबकि चैनल ने कहा कि असलियत कुछ और है. दस्तावेज खोने की बात सीआईए का महज बहाना है. इसके मुताबिक अमेरिकी अंतरिक्ष यात्रियों ने अपने सेंटर को जो मैसेज भेजे थे उनमें यूएफओ देखे जाने और चाँद पर कुछ उजड़ी हुई बस्तियाँ नजर आने की बात कही थी.


... http://aajtak.intoday.in/



तो क्या क्यूरियोसिटी ने मंगल पर देखा एलियन!


नासा के क्यूरियोसिटी रोवर को मंगल के आकाश में एक अजीब सी सफेद रोशनी नाचती हुई दिखी है। इसके अलावा क्यूरियोसिटी द्वारा भेजी गई तस्वीरों में आकाश में दिखने वाले चार धब्बे भी दिखाई पड़े हैं।यूएफओ को पहचानने वाले लोगों का दावा है कि ये धब्बे दरअसल एलियन्स (दूसरे ग्रह के वासी) के अंतरिक्षयान हैं, जो अंतरिक्ष में मानव के कदमों पर नजर रख रहे हैं।
   
नासा के क्यूरियोसिटी द्वारा मंगल की सतह से भेजी गई ये तस्वीरें फिलहाल एक पहेली बनी हुई हैं। हालांकि नासा और फोटोग्राफी के विशेषज्ञों का कहना है कि यह और कुछ नहीं कैमरे के लेंस पर लगे कुछ दाग ही हैं। 
   
डेली मेल की रिपोर्ट के अनुसार, नासा ने तो अब तक इन संदिग्ध दृश्यों पर कोई टिप्पणी नहीं की है। क्यूरियोसिटी द्वारा भेजी गई तस्वीरों में इन संदिग्ध धब्बों की पहचान यूट्यूब के यूजर स्टीफन हैनर्ड ने की।
हैनर्ड एलियन डिस्कलोजर यूके नामक समूह के सदस्य हैं। नासा की वेबसाइट पर ये तस्वीरें सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं। हैनर्ड ने इस रोशनी का रहस्य सुलझाने के लिए तस्वीरों पर कई फिल्टरों का इस्तेमाल किया। 
लियन और उनकी कहानियां पूरी दुनिया में दशकों से कही और सुनी जा रही हैं। कोई उड़ान तश्तरी देखता है तो किसी चित्र में एलियन जैसी आकृति दिखने का दावा किया जाता है। हालांकि अब तक कोई दावा या व्यक्ति दूसरी दुनिया के इन निवासियों के बारे में कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर पाया है। 


रूस में मिला एलियन का शव

एक ऐसा सबूत जो पूरी दुनिया को ये मानने पर मजबूर कर दे कि वास्तविकता में एलियन हैं और कहां हैं। हालांकि बुधवार को कुछ ऐसा दावा किया गया जिससे एलियन के होने मुहर लगती हुई दिख रही है।

एक रूसी महिला मार्ता येगोरोवनेम के फ्रिज से अधिकारियों को एलियन का शव मिला है। मार्ता ने अधिकारियों को बताया है कि वह पिछले दो साल से इस शव को फ्रिज में रखे हुई थी। 

एलियन का शव
ND
मार्ता के अनुसार यह विचित्र शव उसे पश्चिमी रूस के पेत्रोजावोदस्क शहर में मिला था। महिला ने इसके पांच चित्र खींचे हैं। इस मृत एलियन की लम्बाई दो फीट है। ऐसा माना जा रहा है कि 2009 में देखे गए यूएफओ से ये उतरा था। इसका सिर हॉलीवुड फिल्मों में दिखाए गए एलियन की तरह है। इसकी आंखें बिल्कुल बल्ब जैसी हैं। इस एलियन को बिल्कुल पतली लकड़ी जैसा एक हाथ भी है। 

पिछले कुछ महीनों में रूस में एलियन देखे या पाए जाने का यह तीसरा दावा है। मार्ता को यह एलियन अपने समर हाउस के पास 2009 में मिला था।

मार्ता ने बताया कि उन्हें एक जलती हुई चीज दिखाई दी। वह उसके पास गई और धातु की उस गर्म चीज को हटाया तो उसके नीच ये एलियन मिला। इसका शव किसी मछली जैसा है। कुछ दिनों पहले साइबेरिया के सुदूर इर्कटस्क क्षेत्र में उतरे एक यूएफओ की तस्वीर जारी की गई थी। इसमें साफ दिख रहा था कि चमकदार यूएफओ में से पांच लोग निकले। इनमें से चार साथ थे और एक अलग खड़ा था। 

मिस मार्ता ने इसे वहां से उठा लिया और फ्रिज में स्टोर करके रख दिया। मार्ता ने डेली मेल को बताया कि कुछ दिनों पहले दो लोग आए उन्होंने कहा कि यह चीज रूस विज्ञान अकादमी के कारेलियन रिसर्च सेंटर की है और उसे ले गए। पैरानॉर्मल गतिवधियों के विशेषज्ञ माइकल कोहेन ने कहा कि यह असली एलियन हो सकता है। 

उन्होंने कहा कि ऐसा लग रहा है जैसे रूस एलियन की गतिविधियों का केंद्र बनता जा रहा है। पिछले कुछ महीनों में ऐसी कई घटनाएं घट चुकी हैं। हो सकता है कि सैन्य और नागरिक एजेंसियों ने भी इन गतिविधियों को ट्रैक किया है।
sabhar :
http://hindi.webduniya.com/

Read more

जानिए ओशो की फिलास्फी, जो ले जाती है "संभोग से समाधि की ओर!"

0




भोपाल। ओशो यानी दुनिया वालों को सेक्स से जुड़ी भ्रांतियों से उबारने वाले एक संत! ओशो एक ऐसे आध्यात्मिक गुरु, जिन्होंने जीवन को आनंद से जीने के गुर सिखाए!

11 दिसंबर 1931 में मध्यप्रदेश के रायसेन जिले के कुचवाड़ा गांव के एक साधारण से कपड़ा व्यापारी के घर में जन्में एक बालक की चेतना ने उसे लोगों के बीच लोकप्रिय बनाया। अपने 11 भाई-बहनों में से ओशो से सबसे बड़े थे। उनको लोग कई नामों से जानते है बचपन में उनका नाम चंद्रमोहन जैन फिर रजनीश जैन, आचार्य श्री और गुरु ओशो शामिल है।

दुनिया को मेडिटेशन, योग, सेक्स, जीवन की सार्थकता और जीवन का रहस्य समझाने वाले ओशो का निधन 19 जनवरी 1990 को (58 वर्ष) पुणे महाराष्ट्र में हुआ था।

साहित्य से मिली लोकप्रियता : ओशो ने स्कूली शिक्षा के बाद जबलपुर से बीए फिलोस्पी एवं रायपुर से एमए किया। बीए ओशो साहित्य की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि ओशो की आत्मकथा नामक पुस्तक के पहले संस्करण की दस हजार प्रतियां इटली में केवल एक महीने में ही बिक गई। कई राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं में ओशो की किताबें आज भी काफी प्रचलित है। इसी तरह स्पेनिश भाषा में ओशो की पुस्तकों की सालाना बिक्री ढाई लाख से भी अधिक है।

कई भाषाओं में है किताबें: ओशो की पुस्तक जीवन की अभिनव अंतदृष्टि का पेपर बैंक संस्करण सारी दुनिया में बेस्ट सेलर साबित हुआ है। वियतनामी, थाई और इंडोनेशियाई समेत 18 भाषाओं में इसकी दस लाख से अधिक प्रतियां बिक चुकी हैं। भारतीय भाषाओं में हिन्दी के साथ ही तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मराठी, गुजराती, गुरुमुखी, बंगाली, सिंधी तथा उर्दू में ओशो की सैकड़ों पुस्तकें अनुवादित हो चुकी है। हिन्दी और अंग्रेजी में एक साल में ओशो की करीब 50 हजार पुस्तकें बिकती हैं।

उनकी चर्चित किताबें : ओशो ने हर विषय पर खुल कर अपने विचार लोगों के सामने रखें, जिन्हें लोगों ने माना भी और नकारा भी। फिर चाहे विषय राजनीति, धर्म, शांति, सेक्स, ध्यान, योग, जीवन और मृत्यु का ही क्यूं न हो। यूं तो ओशो के हर साहित्य को लोगों ने खूब सराहा, जो विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित होते आ रहे हैं। लेकिन इनमें भी कुछ खास है जिनमें अंनत से अंत तक, मैं मृत्यू सीखाता हूं, धर्म और राजनीति, ओशो युद्ध और शांति, ध्यान की कला, संभोग से समाधि की ओर जैसे कई साहित्य शामिल है।

विवादों से भी रहा है गहरा संबंध : आधुनिक संत के रूप में जाने जाने वाले ओशो को कम समय में ही काफी सफलता मिली। देखते ही देखते समाज में इनके अनुयाईयों के साथ ही आलोचकों की संख्या भी तेजी से बढ़ी।

अमेरिका जाना प्रतिबंधित: लोगों के सामने खुलकर अपने विचार रखने के लिए कई बार इन्हें लोंगों की आलोचनाएं भी सहनी पड़ी। राजनीति, धर्म और सेक्स पर दिए उपद्देश्यों के लिए अक्सर विवादों में रहे ओशो का अमेरिका में भी काफी विरोध हुआ और उनका अमेरिका जाना प्रतिबंधित हो गया।

इनके जीवन पर बनी हैं फिल्में : ओशो की जीवनशैली से प्रभावित होकर कई अमेरिकन, ब्रिटिश, जर्मनी के प्रोड्यूसर एवं डॉयरेक्टर्स ने फिल्में भी बनाई है। कुछ डॉक्यूमेंट्री फिल्में भी इनके जीवन और उपद्देश्यों पर बनाई गई। जिन्हें काफी सफलता मिली। कीताबों के साथ ही इनके उपद्देश्य के कई ऑडियों एवं विडियों भी बनाए गए। जो हर वर्ग के लोगों में प्रसिध्द रहे हैं और आज भी इनकी डिमांड लोगों में बरकरार है।





sabhar :http://www.bhaskarhindi.com/

Read more

एक मुल्क ऐसा, जहां हर औरत के पास है एक पुरुष गुलाम

4

यहां है लेडीज रूल का दबदबा

यहां है लेडीज रूल का दबदबा


महिलाओं के सशक्तिकरण और उन्हें पुरुषों के बराबर ला खड़ा करने से जुडे कई अभियान चलते रहते हैं, लेकिन इसी दुनिया का एक मुल्क ऐसा है, जहां सिर्फ महिलाओं की चलती है।

लेडीज रूल का जोर कुछ इस कदर है कि पुरुषों को उनका हर हुक्म मानना होता है। जानकर हैरानी हो सकती है, लेकिन इस खबर में पूरा दम है।

आज जब महिलाओं के खिलाफ सारी दुनिया में अपराध बढ़ते जा रहे हैं, ऐसे में आपको जानकर आश्चर्य होगा कि एक ऐसा देश है, जहां महिलाएं सबसे ऊपर हैं और पुरुष उनके लिए गुलाम से बढ़कर कुछ भी नहीं।

पुरुषों की स्थिति जानवरों जैसी?

अदर वर्ल्ड किंगडम। जी हां, यही नाम है उस छोटे से देश का जहां महिलाएं राज करती हैं और पुरुष गुलामी। यहां रानी पैट्रिसिया-1 का एकमुश्त राज है।

चेक रिपब्लिक से 1996 में अलग होकर बने इस देश को अन्य राष्ट्रों ने देश का दर्जा नहीं दिया है, लेकिन इनकी खुद की करेंसी, पासपोर्ट, झंडा और पुलिस दल है।

इस देश में बाहर से आने वाले पुरुषों को रानी के लिए सौफा या कुर्सी बनना पड़ता है। इतना ही नहीं, उन्हें मारा-पीटा भी जाता है। पुरुषों को यहां पालतू जानवर के समान समझा जाता है।

नागरिकता चाहिए, तो पुरुष गुलाम चाहिए

नागरिकता चाहिए, तो पुरुष गुलाम चाहिए

यदि कोई महिला यहां की नागरिकता प्राप्त करना चाहती है, तो ये जरूरी है कि उसके पास एक पुरुष गुलाम हो और उसे कम से कम चार दिन रानी के म‌हल में गुजारने पड़ेंगे।

इसीलिए यहां लगभग सभी महिलाओं के पास एक पुरुष गुलाम के तौर पर है। इन गुलामों को कोई भी अधिकार नहीं है। इनके साथ वे जब चाहें, जैसा चाहें, वैसा व्यवहार करने के लिए स्वतंत्र हैं।

इस देश का लक्ष्य ही यही है कि रानी के अधिकार में ज्यादा से ज्यादा पुरुषों को गुलाम बनाया जाए। जिसके लिए हर संभव प्रयास किया जाता है।

सिर्फ चंद पुरुषों को है कुछ सीमित अधिकार

देश में सर्वोच्च पद पर रानी काबिज है। वह कोई भी निर्णय लेने के लिए आजाद है। इसके बाद विशिष्ट महिला व महिला नागरिक होती हैं। जिनके पास रानी के बनाए गए कानून के अंतर्गत सभी अधिकार होते हैं।

दूसरे स्तर पर वे पुरुष होते हैं, जिन्हें रानी चुनती है। ये रानी को टैक्स चुकाते हैं। इन्हें घूमने, काम करने, शादी करने व प्रॉपर्टी खरीदने जैसे अधिकार रानी से प्राप्त होते हैं। सबसे निचले स्तर पर होते हैं, गुलाम वर्ग।

इन गुलाम पुरुषों को सभी अधिकारों से वंचित रखा जाता है और इनकी मालकिन इन्हें जैसा चाहें, वैसे उपयोग करती हैं। SABHAR :http://www.amarujala.com/


Read more

गुरुवार, 6 मार्च 2014

इंसानों जैसे रोबोट, गाना-बजाना, हंसना-रोना और पढ़ना भी आता है इन्हें!

0








अभी तक मशीनी कामकाज करने वाले रोबोटों के बारे में ही सुना जाता था लेकिन अब ऐसा रोबोट भी आ गया है जो न केवल चलेगा, बातें करेगा, गाना गाएगा, किताब और समाचार पत्र पढ़ेगा, मौसम का हाल बताएगा, इंटरनेट शॉपिंग करेगा बल्कि इंसानों की भावनाओं को भी पढ़ सकेगा. ये है चार्ल्स या चार्ली जो दुनिया का सर्वाधिक आधुनिक रोबोट है और जिसे इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टैक्नोलोजी के पूर्व छात्र और ऑस्ट्रेलिया के ला त्रोब यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर राजीव खोसला ने तैयार किया है. चार्ली ऊपर बतायी गयी सारी विशेषताओं से लैस है. मात्र 20 सेंटीमीटर का चार्ली ‘पार्टनर पर्सनल रोबोट’ है जिसे ऐसे बच्चों और बुजुर्गों की मदद के लिए डिजाइन किया गया है जो डिमेंशिया, ऑटिज्म, सेरेबर्ल पाल्सी, दिमाग में चोट और ऐसी अन्य बीमारियों के शिकार हैं. दिल्ली में ऑस्ट्रेलियाई उच्चायोग द्वारा आयोजित एक समारोह में खोसला ने इस रोबोट का प्रदर्शन करते हुए बताया, ‘‘डिमेंशिया से पीड़ित बच्चे अक्सर बाथरूम में हाथ धोना भूल जाते हैं. यह रोबोट लगातार बच्चे पर नजर रखेगा और उसे याद दिलाएगा कि उसने हाथ नहीं धोए हैं और उसे हाथ धोने की जरूरत है.’6.5 किलोग्राम वजनी इस रोबोट को खोसला ने जापानी इलैक्ट्रोनिक कंपनी एनईसी कोर के साथ मिलकर बनाया है और यह माता-पिता को बच्चे की देखभाल तक में मदद कर सकता है.इन रोबोट को एक-दूसरे से बातचीत के लिए बनाया गया है लेकिन अगर अचानक इसके सामने कई चेहरे आ जाते हैं तो यह अपने डाटाबेस में उन सब का अलग अलग प्रोफाइल तैयार कर लेता है और उन सभी की पसंद नापसंद के आधार पर उनके साथ बर्ताव करता चार्ली और अन्य रोबोट मेटिल्डा, जेक, लूसी और सोफी के साथ ऑस्ट्रेलिया में 20 से अधिक परीक्षण किए गए हैं. रोबोट के साथ परीक्षण किए तरीके से किया जाता है जिनमें उन्हें बोलकर निर्देश देना, छूकर समझाना और चेहरे के भावों से समझाना भी शामिल है. ये रोबोट पता लगाते हैं कि कोई व्यक्ति किस प्रकार महसूस करता है और उसके अनुसार वे अपनी सेवाओं को आकार देते हैं.



6.5 किलोग्राम वजनी इस रोबोट को खोसला ने जापानी इलैक्ट्रोनिक कंपनी एनईसी कोर के साथ मिलकर बनाया है और यह माता-पिता को बच्चे की देखभाल तक में मदद कर सकता है. sabhar :http://www.samaylive.com/

Read more

बूढ़ी दिखना चाहती है जवान दिखने वाली दादी

0



सैंतालीस वर्षीय एन बोल्टन का सबसे बड़ा दु:ख यह है कि वे 47 वर्ष की हो चुकी हैं लेकिन अपनी उम्र से आधी की दिखती हैं। वे अपने चेहरे को बूढ़ा दिखाने के लिए कॉस्मेटिक सर्जरी भी कराना चाहती हैं। उनकी अपनी उम्र से कम दिखने की हालत के चलते उनके दोस्तों और बॉयफ्रेंड्‍स ने उन्हें छोड़ दिया है। उनका कहना है कि कभी-कभी तो लोग गलती से उन्हें उनके बेटे की गर्लफ्रेंड समझ लेते हैं। 

ब्रिटेन में लाखों लोग खुद को जवान दिखने के लिए करोड़ों खर्च करते हैं लेकिन एक नानी एन बोल्टन का कहना है कि वे कॉस्मेटिक सर्जरी करा कर अपनी उम्र को अधिक बड़ा दिखाना चाहती हैं। चार बच्चों की मां एन को लोग समझ लेते हैं कि उनकी उम्र तीस से तीस वर्ष के बीच में है। पर वे इस स्थिति को सुखद नहीं वरन् अपने लिए अभिशाप समझती हैं। 

उनका कहना है कि उनके कम उम्र दिखने के बाद एक विवाह टूट गया है और दो लम्बे समय से चले आ रहे रिश्ते खत्म हो गए क्योंकि उनसे हमेशा ही कम उम्र के युवा बातचीत करने में दिलचस्पी दिखाते हैं। 

उनके ईष्यालु साथियों ने उन्हें छोड़ दिया क्योंकि बोल्टन के साथ होने पर वे लोगों को अधिक उम्र के दिखते हैं। उनका सबसे बड़ा लड़का अभी पिता बना है, उसे भी अपनी मां के साथ दिखने से नफरत है क्योंकि लोग उसकी मां को उसकी गर्लफ्रेंड समझते हैं। वे कहती है कि अपने चेहरे पर झ‍ुर्रियां लाने के लिए मैं कुछ भी करने को तैयार हूं।

ब्रिस्टल में एक मार्केट स्टाल पर काम करने वाली एन का विवाह संगीत निर्देशक क्रिस्टोफर बोल्टन से हुआ था। उस समय दोनों की ही उम्र 24 की थी। कुछेक वर्षों बाद दोनों में दिखने को लेकर झगड़ा होने लगा। उस समय वे करीब तीस वर्ष की थी लेकिन उनके पति ने देखा कि युवा लोग उनमें ज्यादा दिलचस्पी ले रहे हैं। कई वर्षों के बाद बोल्टन युवा ही दिखती रहीं जबकि उसके पति अधिक उम्र के दिखने लगे। इससे दोनों के बीच झगड़े और बढ़ने लगे। 

आखिरकार दोनों अलग हो गए जबकि उनके आर्थर (25) और केल्विन (19) दो बेटे थे। बोल्टन का कहना है कि हम दोनों ही एक ही उम्र के थे लेकिन क्रिस्टोफर को इस बात से नफरत थी कि लोग सोचें कि उन्होंने एक युवा महिला से शादी की है इसलिए मैं कोशिश करती थी कि ऐसी ड्रेस पहनूं कि अधिक बूढ़ी दिखूं। तब बोल्टन 32 वर्ष की थीं और एक टीवी एक्सट्रा के तौर पर भी काम करती थी। 

चार वर्ष बाद उन्होंने रॉयल मेल के लिए काम करने वाले ब्रायन ग्राहम से संबंध बनाया। ब्रायन उनसे मात्र दो वर्ष अधिक बड़ा था और तब एन भी 36 की थी लेकिन लगती 25-26 क‍ी थी। दोनों के दो बेटे, जोशुआ (13) और जैकब (7), हुए। 

हालांकि वह चार वच्चों की मां थी लेकिन इसके बाद भी उसकी उम्र पर इसका कोई असर नहीं दिखा। ग्राहम जब 42 का था, तब बोल्टन 22 की दिखती थी। लोगों को विश्वास नहीं होता था कि मैं चार बच्चों की मां हूं। 

अब ब्रायन को लोगों द्वारा यह बात पूछने से चिढ़ पैदा होती थी कि ग्राहम उनका भाई या पिता था। उनकी भी समझ में आने लगा कि चीजें किस दिशा में आगे जा रही थीं। बोल्टन का कहना है कि अगर इन बातों में कोई बदलाव संभव होता तो मैं कर सकती थी लेकिन अधिक उम्र की दिखना उसके लिए संभव नहीं था। पांच वर्ष बाद दोनों अलग हो गए। 

बोल्टन कहती हैं कि उनसे ज्यादातर नौजवान लड़के बात करते थे। शुरू में यह अच्छा लगा लेकिन बाद में मैं इससे बोर हो गई। आखिरकार 42 वर्ष की उम्र में बोल्टन को एक 32 वर्षीय इलेक्ट्रीशियन पॉल स्मिथ मिला। पॉल काफी परिपक्व था और बोल्टन को लगा कि उसके जवान दिखने से उसे किसी प्रकार की ईर्ष्या नहीं होगी। लेकिन कुछ समय के बाद पुरानी समस्याएं फिर सिर उठाने लगीं। 

जब दोनों साथ निकलते तो लोग हमें घूरने लगते और वे पॉल को डर्टी ओल्डमैन कहते। 'कोई भी इस बात पर विश्वास नहीं करता कि मैं पॉल की तुलना में 10 वर्ष अधिक बड़ी हूं। और जब वे पॉल के साथ भी होतीं तब भी लोग सोचते थे कि मैं पॉल की साथी नहीं हो सकती। मुझ पर लोग यह आरोप भी लगाने लगे कि मैंने पैसा कमाने के लिए 
बूढे मर्दों से शादी करती हूं।' इस वर्ष की शुरुआत में पांच वर्ष साथ बिताने के बाद दोनों अलग हो गए। 

बोल्टन का कहना है कि एक बार मैं फिर अकेली हूं और वह भी इस कारण से क्योंकि मैं जवान दिखती हूं। इसके बाद से उन्होंने अपनी उम्र के लोगों से विवाह की बात करनी चाही लेकिन उन्हें ऐसे लोगों से प्रस्ताव मिले जोकि उनसे बीस साल तक छोटे हैं। लोग सोचते होंगे कि यह बहुत अच्छी बात है लेकिन उन्हें यह बात भी पता होना चाहिए कि मैं चार बच्चों की मां हूं और अब किसी बच्चे के साथ डेट पर नहीं जाना चाहती हूं। 

न केवल उनकी लव लाइफ वरन उनका पारिवारिक जीवन भी इससे बुरी तरह प्रभावित हुआ है। वे अपने सबसे बड़े बेटे आर्थर के साथ शॉपिंग पर जाना पसंद करती थीं लेकिन वह इस स्थिति से आजिज आ गया कि लोग मुझे उसकी गर्लफ्रेंड समझने लगते। 

लोग यह मानते कि उसने मुझे फांस लिया है। लोगों को यह समझाना मुश्किल होता कि मैं उसकी मां हूं। मैं इस बात पर विश्वास नहीं कर सकी कि मेरे युवा दिखने से यह बात पैदा हो गई कि मैं और मेरा बेटा किसी से भी मिल नहीं सकता था। 

अब उसका एक बच्चा भी हो गया है ‍और जब वे आर्थर के बच्चे को खिलाने के लिए बाहर जाती हैं तो लोग सोचने लगते हैं कि मैं और मेरा बेटा बच्चे के माता-पिता हैं। जब मैं लोगों से कहती हूं कि मैं एक बच्चे की दादी हूं। उनके लिए मित्रता करना मुश्किल हो गया है। 

मेरी उम्र की औरतें जब मेरे पास खड़ी होती हैं तो ईर्ष्यालु होने लगती हैं। वे मुझे ऊपर से नीचे तक देखती हैं और वे मुझे बिच (कुतिया) तक कह देती हैं, इसलिए मजबूरी में मुझे उन औरतों के साथ घूमना फिरना पड़ता है जोकि मेरे बेटे से भी कम उम्र की होती हैं लेकिन इस मामले में मैं क्या कर सकती हूं? sabhar :http://hindi.webdunia.com/

Read more

हर तरफ मातम, उठकर बैठा मुर्दा बोला मै जिंदा हूं

0

जब मुर्दा अचानक बोल पड़ा

जब मुर्दा अचानक बोल पड़ा

कहते हैं शरीर से एक बार आत्मा निकल जाए तो वापस उस शरीर में लौटकर नहीं आती। आत्मा के शरीर छोड़ते ही यह माना लिया जाता है कि व्यक्ति अब जिंदा नहीं है।

लोग मुर्दे को जलाने या दफनाने की तैयारी में लग जाते हैं। लेकिन कई बार कुदरत ऐसे चमत्कार भी कर देती है कि आंखों पर यकीन नहीं होता। ऐसे ही चमत्कारों में शामिल है मुर्दे का अचानक बोल पड़ना या अचानक मुर्दे की सांस चलने लगना।

हो रही थी अंतिम संस्कार की तैयारी उठकर बैठ गया वह

यह घटना अमरीका के मिसीसिपी का है। 78 वर्षीय विलियम्स को लेक्जिंगटन में उनके घर में ही नब्ज़ नहीं चलने पर मृत घोषित किया गया।

होम्स काउंटी के शव जांच विशेषज्ञ डेक्सटर हावर्ड ने बताया कि उन्होंने सामान्य तरीके से ही विलियम्स की जांच की थी। उन्हें विलियम्स जीवित होने का कोई संकेत नहीं मिला।

वॉल्टर विलियम्स नामक शख्स के शव को जब अंतिम संस्कार के लिए ले जाया गया। विलियम्स को पॉर्टर ऐंड संस फ्यूनरल होम ले जाया गया। जब उनके शरीर पर लेप लगाने की तैयारी हो रही थी ठीक उसी वक्त उनके शरीर में हरकत होने लगी।

विलियम्स उठकर बैठ गए। यह अब कब तक जीवित रहेंग और इनके मृत्यु के समय के अनुभव कैसे थे। यह तो विलियम्स ने नहीं कहा है लेकिन इनके पुनर्जीवित होने से परिवार के लोग खुश हैं।
मरने के 6 दिन बाद वह ताबूत पर जिंदा मिली

मरने के 6 दिन बाद वह ताबूत पर जिंदा मिली

मामला चीन का है। यहां गुआंक्सी प्रांत में 95 वर्षीय एक महीला जिसका नाम ली जियूफैंग था। एक दिन अचानक ही इसकी सांस रुक गयी। शरीर में कोई हरकत भी नहीं रही।

ली के पोते ने दादी को मरा हुआ जानकर ताबूत में डाल दिया। लोगों के अंतिम दर्शन के लिए ताबूत को दफनाया नहीं गया था। छह दिनों बाद लोगों ने देखा कि ली अपने ताबूत पर बैठी हुई है।

पहले तो लोग ली की भूत समझकर डर गए लेकिन, बाद में पता चला वह भूत नहीं बल्कि जिंदा ली जियूफैंग थी।

मरकर जिंदा हुआ, फिर दो दिनों बाद हुई यह घटना

यह घटना 2009 की है, विलकिंसन नाम के एक व्यक्ति को रॉयल प्रेस्टन अस्पताल के डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया।

लेकिन 30 मिनट के बाद ही डॉक्टरों ने ये महसूस किया कि उसकी नब्ज चल रही है। विलकिंसन उठकर बैठ गया। सभी लोग इसके जीवित होने से खुश हो गए।

लेकिन महज दो दिनों बाद विलकिंसन शराब पीकर अचानक गिर पड़ा और फिर हमेशा के लिए सो गया। डॉक्टरों ने जांच में इस बात से इंकार किया कि इसकी मौत शराब पीने से हुई है। सभी जांच सामान्य थे, इसलिए सामान्य मृत्यु घोषित कर दिया गया। sabhar :http://www.amarujala.com/

Read more

नहीं खाया अन्न का एक भी दाना

0

इनसे मिलिए, ये हैं सुभाष, जिन्होंने 11 सालों से नहीं खाया अन्न का एक भी दाना

सिरसा. गाय को राष्ट्रीय प्राणी घोषित करवाने व अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की मांग को लेकर एक साधु ने 11 साल से अन्न का एक दाना भी ग्रहण नहीं किया। साधु का प्रण है कि जब तक सरकार उसकी दोनों मांगों को पूरा नहीं करती वह अन्न ग्रहण नहीं करेगा।
 
इसी मांग को लेकर हिसार जिले के टोक्स गांव के दादा केसराराम धाम में रहने वाले सुभाष मुनि ने सोमवार को सिरसा में धरना दिया। उन्होंने गाय को राष्ट्रीय प्राणी घोषित करने की मांग का लेकर डीसी को ज्ञापन भी दिया। मुनि का कहना है कि देश में गाय की हालत बहुत बुरी है। बुचडख़ानों में गो वध हो रहा है। गाय भूखी प्यासी व बेसहारा भटक रही है। गाय को हिंदू धर्म में तो इसको माता का दर्जा दिया गया है।
 
केवल हरी सब्जी खा रहे हैं...
 
65 वर्षीय सुभाष मुनि ने बताया कि वे पिछले 11 साल से अन्न ग्रहण नहीं कर रहे हैं। वे केवल हरी सब्जी पर सेंधा नमक मिलाकर खाते हैं। उनका प्रण है कि जब तक दोनों प्रमुख मांगों में से उनकी एक भी मांग पूरी हो गई तो वे अन्न ग्रहण नहीं करेंगे। सुभाष मुनि भारत भ्रमण कर चुके हैं।
 
उन्होंने जगह जगह जाकर यह मांग जोर शोर से उठाई है। वे अब तक 38 बार धरना दे चुके हैं। जिनमें दिल्ली के इंडिया गेट, संसदीय भवन व जंतर मंतर पर भी धरना शामिल है। इसके अलावा जहां भी गोरक्षा से जुड़ा मामला हो मुनि तुरंत वहां पहुंच जाते हैं। इसके अलावा अयोध्या में राममंदिर निमार्ण को लेकर भी वे अग्रणी भूमिका निभाते नजर आते हैं।
 
वैसे हम आपको बता दें कि ये अपनी तरह का कोई इकलौता मामला नहीं है। इससे पहले भी देश-विदेश में इस तरह के कई मामले आ चुके हैं, जिसमें लोग या तो खाना खाते ही नहीं है और अगर खाते भी हैं, तो कोई निश्चित चीज। हरियाणा की ही एक लड़की ने पिछले 25 सालों से अन्न नहीं खाया है। इतनी उम्र तक वो सिर्फ दूध पी कर जिंदा है।
इनसे मिलिए, ये हैं सुभाष, जिन्होंने 11 सालों से नहीं खाया अन्न का एक भी दाना

हो सकता है आपको ऐसा लगे कि ये लड़की कोई साध्वी या पुजारिन है, लेकिन हम आपको बता दें कि ऐसा कुछ नहीं है और ये एक बिल्कुल सामान्य लड़की है। साथ ही इस लड़की का केस किसी तरह के अंधविश्वास पर भी आधारित नहीं है। हरियाणा के सोनीपत में रहने वाली 25 वर्षीया मंजू ने अपनी पूरी जिंदगी में कुछ भी नहीं खाया है।
 
दरअसल, ये मामला मेडिकल साइंस से जुड़ा हुआ है। मंजू को एकालासिया नाम की एक बीमारी है, जिसके चलते ये दूध या इससे बनी चीजों के अलावा कुछ नहीं खा सकती है। अगर मंजू अन्न या कुछ और खाती है, तो इसे तुरंत उल्टी होने लगती है। इसी वजह से उसने अपनी पूरी जिंदगी में दूध, बटर मिल्क, चाय और पानी ही पिया है। परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है, लेकिन मंजू की खातिर एक भैंस रखनी पड़ती है।
 
मंजू दिन में 4 से 5 लीटर दूध पी जाती है। उसकी मां का कहना है कि अगर वो कुछ भी ठोस खाती है, तो उसकी तबीयत बिगड़ जाती है। हालांकि, मंजू को देखकर उसकी इस बीमारी के बारे में पता नहीं चलता है। वो पूरी तरह स्वस्थ दिखती है। वैसे इस बीमारी के बारे में हम आपको बता दें कि इसका इलाज संभव है। वैसे मंजू सिलाई वगैरह काम भी करती है और अपने भविष्य के लिए पैसे एकत्र कर रही है।
 
डेली मेल के मुताबिक, इस बीमारी में भोजन नली अपना काम करना बंद कर देती है। ऐसे में खाना नहीं खाया जा सकता। खाना पेट तक पहुंचेगा ही नहीं और आहार नाल में ही फंसा रहेगा। ऐसे में पीड़ित को उल्टी हो जाती है।
इनसे मिलिए, ये हैं सुभाष, जिन्होंने 11 सालों से नहीं खाया अन्न का एक भी दाना


सिर्फ हमारे देश में ही नहीं, विदेशों में भी ऐसे उदाहरण देखने को मिल जाते हैं। ये कोई बार्बी डॉल नहीं, बल्कि जीती-जागती एक लड़की है। वैसे कोई भी इसकी फोटो देखकर यही सोचता है कि ये कोई बार्बी डॉल है। ये लड़की अपने जीरो फिगर के कारण इन दिनों सनसनी बनी हुई है।
 
हू-ब-हू बार्बी डॉल जैसी दिखने वाली यह लड़की यूक्रेन की वालेरिया लूक्यानोवा है, जिसे देखने वाला हर शख्स एक बार तो दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर हो जाता है। 23 वर्षीय ल्यूकानोवा की खूबसूरत का रहस्य दुनिया के सामने आ चुका है।
 
आज तक नहीं खाया खाना
 
बेहद खूबसूरत बॉडी और बार्बी डॉल जैसे फिगर वाली ल्यूकानोवा का कहना है कि उसने अभी तक खाना नहीं खाया। वह हवा, पानी और रोशनी पर जिंदा है। ल्यूकानोवा कहती है कि वह आध्यात्मिक गुरु है जो हर समय यात्रा करती है। उनका कहना है वह दुनिया में बढ़ रही नकारात्मकता को कम करने के लिए ही आईं है।

इनसे मिलिए, ये हैं सुभाष, जिन्होंने 11 सालों से नहीं खाया अन्न का एक भी दाना

इसके अलावा गुजरात के प्रहलाद जानी का किस्सा भी खूब चर्चित है। अहमदाबाद के प्रहलाद जानी 84 वर्ष के हो चुके हैं, लेकिन पिछले 70 सालों से उन्होंने ना कुछ खाया है और ना ही कुछ पिया है। उन्हें ना भूख लगती है और ना ही प्यास। मेडिकल साइंस के लिए प्रहलाद एक बहुत बड़ी चुनौती हैं।
 
जाहिर सी बात है कि कोई इंसान बिना खाए-पिए 10 दिन से ज्यादा नहीं रह सकता, लेकिन प्रहलाद जानी का दावा है कि पिछले 70 सालों से उन्होंने कुछ नहीं खाया है। उनके इस दावे का परीक्षण करने के लिए 300 डॉक्टरों की एक टीम ने उन पर रिसर्च भी किया, लेकिन उन्हें कुछ नहीं मिला। डीआरडीओ के डॉक्टरों ने प्रहलाद को एक कमरे में लगातार 15 दिनों तक सीसीटीवी कैमरे की निगरानी में रखा गया।
 
इन 15 दिनों में उन्होंने कुछ भी खाया-पिया नहीं, फिर भी वो बिल्कुल सामान्य थे। पेट के अल्ट्रासाउंड में भी किसी तरह का बदलाव देखने को नहीं मिला। रोचक बात ये है कि प्रहलाद मल-मूत्र भी नहीं त्यागते हैं। प्रहलाद के बारे में जानकर सिर्फ भारतीय मीडिया ही नहीं, बल्कि विदेशी मीडिया भी हैरान थी। कई विदेशी मीडिया संस्थानों ने भी प्रहलाद भाई के बारे में खबर छापी थी और सभी उनकी इस क्षमता से हैरान दिखे।
 
हां, अगर उनके शरीर में कुछ अलग है, तो वो है कीटोन। मानव शरीर में पाया जाने वाला ये घटक जहां एक आम इन्सान में 3mg/डेसीलीटर होती है, जबकि प्रहलाद के शरीर में ये 40mg/डेसीलीटर है। कीटोन एक ऑर्गेनिक कंपाउंड होता है। जब शरीर में चर्बी टूट कर ऊर्जा बनती है, तो कीटोन भी बनते हैं। वैसे जो भी हो, प्रहलाद वैज्ञानिकों और डॉक्टरों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं हैं। sabhar : bhaskar.com


Read more

बुधवार, 5 मार्च 2014

जीती-जागती बार्बी डॉल, आज तक नहीं खाया खाना, तब पाया ऐसा फिगर

0

जीती-जागती बार्बी डॉल, आज तक नहीं खाया खाना, तब पाया ऐसा फिगर



कीव। ये कोई बार्बी डॉल नहीं, बल्कि जीती-जागती एक लड़की है। वैसे कोई भी इसकी फोटो देखकर यही सोचता है कि ये कोई बार्बी डॉल है। ये लड़की अपने जीरो फिगर के कारण इन दिनों सनसनी बनी हुई है।
 
हू-ब-हू बार्बी डॉल जैसी दिखने वाली यह लड़की यूक्रेन की वालेरिया लूक्यानोवा है, जिसे देखने वाला हर शख्स एक बार तो दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर हो जाता है। 23 वर्षीय ल्यूकानोवा की खूबसूरत का रहस्य दुनिया के सामने आ चुका है। जीती-जागती बार्बी डॉल, आज तक नहीं खाया खाना, तब पाया ऐसा फिगर
 
आज तक नहीं खाया खााना
 
बेहद खूबसूरत बॉडी और बार्बी डॉल जैसे फिगर वाली ल्यूकानोवा का कहना है कि उसने अभी तक खाना नहीं खाया। वह हवा, पानी और रोशनी पर जिंदा है। ल्यूकानोवा कहती है कि वह आध्यात्मिक गुरु है जो हर समय यात्रा करती है। उनका कहना है वह दुनिया में बढ़ रही नकारात्मकता को कम करने के लिए ही आईं है। 
जीती-जागती बार्बी डॉल, आज तक नहीं खाया खाना, तब पाया ऐसा फिगर

जीती-जागती बार्बी डॉल, आज तक नहीं खाया खाना, तब पाया ऐसा फिगर
जीती-जागती बार्बी डॉल, आज तक नहीं खाया खाना, तब पाया ऐसा फिगर


जीती-जागती बार्बी डॉल, आज तक नहीं खाया खाना, तब पाया ऐसा फिगर

जीती-जागती बार्बी डॉल, आज तक नहीं खाया खाना, तब पाया ऐसा फिगर
जीती-जागती बार्बी डॉल, आज तक नहीं खाया खाना, तब पाया ऐसा फिगर

जीती-जागती बार्बी डॉल, आज तक नहीं खाया खाना, तब पाया ऐसा फिगर


जीती-जागती बार्बी डॉल, आज तक नहीं खाया खाना, तब पाया ऐसा फिगर

जीती-जागती बार्बी डॉल, आज तक नहीं खाया खाना, तब पाया ऐसा फिगर

sabhar : bhaskar.com

Read more

देखिए अमेरिकी फोटोग्राफर की नजर से कैसे जिंदगी जीते हैं भारत के साधु-संत

0

कैसे जिंदगी जीते हैं भारत के साधु-संत, देखिए अमेरिकी फोटोग्राफर की नजर से


आधुनिकता की ओर तेज़ी से भागते समाज के लिए इस बात का अंदाजा लगाना मुश्किल है कि आखिर कोई इंसान साधुत्व की ओर क्यों चला जाता है। सभी सांसारिक मोह छोड़कर इंसान समाज से बाहर जिंदगी क्यों जीने लगता है। ऐसे ही सवालों का जवाब तलाशने के लिए न्यूयॉर्क के ब्रूकलिन नगर के फोटोग्राफर ज्वॉय एल पुट्स ने दुनिया के तमाम देशों का दौरा किया और उन्होंने ऐसे साधु-संतों से मुलाकात की, जिन्होंने अपनी जिंदगी आध्यात्मिक मुक्ति की तलाश में लगा दी। 
 
भिक्षुओं और आध्यात्मवादियों की तलाश में निकले ज्वॉय ने  उत्तरी इथियोपिया से यात्रा की शुरुआत की। इस दौरान तमाम देशों की यात्रा करते हुए वो हाल ही में भारत पहुंचे, जहां वाराणसी में उन्होंने साधु-संतों और आध्यात्मवादियों से मुलाकात की। पूरी दुनिया में धर्म को लेकर साधु-संतों की अपनी अलग राय है, लेकिन भारत में हिंदू धर्म में विश्वास करने वाले साधु-संत को उनके आत्मत्याग के लिए जाना जाता है। साधु-संत अकेले एक हाथ पर तपस्या कर महीनों और बरसों बिता देते हैं।
 
फोटोग्राफर ज्वॉय ने वाराणसी में ऐसे ही कुछ साधु-संतों से ना सिर्फ मुलाकात की, बल्कि साधना के दौरान की उनकी तरह-तरह की तस्वीरें भी खींची। ज्यादातर तस्वीरें अघोड़ी बाबाओं की हैं, जो शव के अंतिम संस्कार के बाद निकली राख को अपने शरीर पर लपेटे रहते हैं, शव पर तपस्या करते हैं और मानव कंकाल की हड्डियों को अपने शरीर पर पहनते हैं। 
 
ज्वॉय ने बताया कि अघोड़ी बाबाओं का मौत के साथ गहरा संबंध होता है। उनके लिए मौत कोई डरावनी अवधारणा नहीं, बल्कि आत्मा का भ्रम की दुनिया से बाहर निकल जाना है। फोटोग्राफर ज्वॉय के साथ यात्रा पर निकले फिल्म मेकर केल ग्लेंडिंग ने साधु-संतों को लेकर 'बिऑन्ड' नाम की एक डॉक्यूमेंट्री भी बनाई है। 

कैसे जिंदगी जीते हैं भारत के साधु-संत, देखिए अमेरिकी फोटोग्राफर की नजर से

(तस्वीर में बाएं) हाथों में मानव खोपड़ी लिए एक अघोड़ी, जिसके लिए मौत भ्रम की दुनिया से बाहर जाना है।
 
तस्वीर में दाएं) ये बिहार के सीवान के लाल बाबा हैं, जो अपने भविष्य की अनिश्चितता के चलते अपनी शादी छोड़कर भाग आए थे। 
कैसे जिंदगी जीते हैं भारत के साधु-संत, देखिए अमेरिकी फोटोग्राफर की नजर से

शव के अंतिम संस्कार से निकली राख अपने शरीर पर लपेटे हुए अघोड़ी बाबा ।

कैसे जिंदगी जीते हैं भारत के साधु-संत, देखिए अमेरिकी फोटोग्राफर की नजर से

लाल बाबा अपनी कई मीटर लंबी जटाओ को खोले हुए। ये जटाएं चालीस साल में इतनी लंबी हुई हैं। 

कैसे जिंदगी जीते हैं भारत के साधु-संत, देखिए अमेरिकी फोटोग्राफर की नजर से

पवित्र गंगा नदी में सुबह की साधना करते साधु विजय नंद ।

कैसे जिंदगी जीते हैं भारत के साधु-संत, देखिए अमेरिकी फोटोग्राफर की नजर से
अघोड़ी पूजा करते हुए बाबा मौनी ।

कैसे जिंदगी जीते हैं भारत के साधु-संत, देखिए अमेरिकी फोटोग्राफर की नजर से

(तस्वीर में दाएं) मघेश ने आईटी क्षेत्र में अच्छी खासी नौकरी छोड़कर साधुत्व ग्रहण कर लिया। पुरानी जिंदगी में लौटने की उनकी कभी कोई इच्छा नहीं हुई। 

कैसे जिंदगी जीते हैं भारत के साधु-संत, देखिए अमेरिकी फोटोग्राफर की नजर से

घाट पर नाव के किनारे खड़े राम दास


कैसे जिंदगी जीते हैं भारत के साधु-संत, देखिए अमेरिकी फोटोग्राफर की नजर से

(तस्वीर में दाएं) 101 वर्ष से ज्यादा का सफर तय कर चुके साधु 

कैसे जिंदगी जीते हैं भारत के साधु-संत, देखिए अमेरिकी फोटोग्राफर की नजर से

गंगा नदी में नाव चलाते बाबा विजय नंद sabhar : bhaskar.com


Read more

 
Design by ThemeShift | Bloggerized by Lasantha - Free Blogger Templates | Best Web Hosting