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शनिवार, 1 मार्च 2014

अजब चमत्‍कार कही दूसरे ग्रह से आई बताने वाली बाबी डाल माडल कही सेक्सी महिला रोबोट

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बार्बी डॉल की तरह दिखने वाली लड़की





वह दिखती है बार्बी डॉल की तरह। उसकी आंखें, उसका शरीर, उसकी स्टाइल आपको चौंका देगी कि इतनी बड़ी, असली लड़की दिखने वाली, सांस लेने वाली बार्बी डॉल कब बन गई? लेकिन सच यह है कि यह बच्चों के खेलने वाली बार्बी डॉल गुडि़या की तरह दिखती जरूर है पर है एक जीती-जागती असली लड़की। जी हां, एक शक्ल वाले दो इंसानों को देखकर आप भगवान के करिश्मे की बात करते हैं। पर दुनिया की सबसे मशहूर गुडि़या बार्बी डॉल की तरह दिखने वाली इस लड़की को देखकर आप शायद कह उठें, भगवान तू भी इंसानों का मॉडल चुराने लगा । इससे भी ज्यादा रोमांचक इस लड़की की बातें हैं जो खुद को समय में घूमने वाली आध्यात्मिक गुरु बताती है और यहां आने का मकसद संसार में पनप रही नकारात्मक सोच को खत्म करना बताती है।
यूक्रेन की मॉडल वलेरिया लुक्यानोवा को पहली बार देखकर शायद आप चकमा खा जाएं कि आपके सामने कोई आदमकद बार्बी डॉल खड़ी है। वलेरिया लुक्यानोवा हूबहू बार्बी डॉल की तरह दिखती हैं। शारीरिक बनावट, कद काठी, चेहरे के भावों से आपको कहीं भी उनके बार्बी डॉल न होने का शक नहीं होता है। पर आप सोचते हैं कि सांस लेने वाली, आदमकद बार्बी डॉल कब बन गई! बार्बी डॉल की तरह दिखने वाले अपने चेहरे और कद-काठी के कारण 21 वर्षीय यह यूक्रेननियन मॉडल आजकल हर तरफ चर्चा का विषय बनी हुई हैं। हालांकि इससे भी अधिक दिलचस्प वलेरिया की बातें हैं। उनके अनुसार वह समय से यात्रा करने वाली आध्यात्मिक गुरु हैं और दुनिया में बढ़ रही नकारात्मकता को कम करने के लिए ही वह आई हैं। sabhar :http://www.jagran.com/
महिलाओं की तरह सेक्स रोबोट

सेक्स रोबोट की मांग को देखते हुए अमेरिका की एक कंपनी ने सेक्‍स रोबोट बनाया है। इस रोबोट का हर हिस्‍सा स्‍त्री शरीर की तरह हैं। स्‍कॉट मैकलीन का कहना है कि 2004 से रोबोट पर कार्य चल रहा था अब यह पूरा हो पाया है। सेक्‍स रोबोट की मांग इतनी है कि दुनिया के कई देशों के लोग रोबोट के निर्माता कंपनी से एडवांस बुकिंग करवा रहे हैं। यूके, रूस और कोरिया के कंज्‍यूमर एडवांस बुकिंग करवा चुके हैं। वे आगे कहते हैं कि लोग मुझसे ऐसे रोबोट बनाने की मांग करते हैं जो हॉलीवुड सेलीब्रिटी एंजेलिना जोली, पामेला एंडसन और माइकल जैक्‍सन से मिलते जुलते हो। लेकिन उनकी हम शक्‍ल रोबोट बनाने के लिए मुझे उनसे इजाजत लेनी पड़ेगी।
48 वर्षीय डगलस हिंस ने रॉकी नाम की यह रोबोट तैयार किया है। यह 5 फीट 6 इंज लंबा है। इसे सिलीकोन से बनाया गया है तथा महिलाओं की तरह बाल लगाए गए हैं। यह बातें भी करती है। साथ ही यह मानव अंगों को उत्‍तेजित करने में भी समर्थ है। इस रोबोट की खासियत यह है कि अगर गर्ल फ्रेंड छोड़कर चली गई हो तो इससे दिल बहलाया जा सकता है। यह कभी आपका दिल नहीं तोड़ेगी। न ही यह कुछ डिमांड करेगी। sabhar :http://dainiktejkhabar.blogspot.in/

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अब ब्रेनटॉप

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प्रीतंभरा प्रकाश
सुनने में भयावह लग सकता है कि आपका हाथ किसी और की इच्छा के हिल-डुल रहा है और उस 'किसी और' को आप देख भी नहीं पा रहे। लेकिन अब यह संभव हो गया है। पिछले दिनों वाशिंगटन यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च में ह्यूमन टु ह्यूमन ब्रेन इंटरफेस को पहली बार दफे सफल पाया गया।

यहां के वैज्ञानिकों ने ऐसा सिस्टम डिवेलप किया है, जिसमें एक व्यक्ति एक खास इंटरफेस का इस्तेमाल करके दूसरे व्यक्ति की सोच को कंट्रोल कर सकता है। यह इंटरफेस इंटरनेट के जरिए दोनों के दिमागों को कनेक्ट करता है। एक और खास बात यह कि इसे डिवेलप करने वाली रिसर्च टीम में एक भारतीय भी शामिल है।

वाशिंगटन यूनिवर्सिटी में प्रफेसर राजेश राव ने इलेक्ट्रिकल ब्रेन रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल करके अपना दिमागी सिग्नल अपने साथी को भेजा। इस सिग्नल की वजह से उनके साथी की कीबोर्ड पर टिकी उंगली में हरकत हुई। राव के असिस्टेंट स्टोको का कहना है कि कंप्यूटरों की तरह ही इंटरनेट दो दिमागों को भी कनेक्ट कर सकता है, और हम दिमाग में बसे ज्ञान को एक इंसान से दूसरे के दिमाग में ट्रांसफर करना चाहते हैं।
इससे पहले ड्यूक यूनिवसिर्टी के रिसर्चरों ने दो चूहों के बीच और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी ने इंसान और चूहे के बीच ब्रेन टु ब्रेन कम्युनिकेशन का प्रयोग किया था। राव का मानना है कि उनका प्रयोग इंसानों के बीच ब्रेन कम्युनिकेशन का पहला साइंटिफिक प्रयोग है।

ब्रेन कंप्यूटर इंटरफेस पर वैज्ञानिक लंबे समय से काम करते रहे हैं। जल्दी ही हम अपने स्मार्टफोन या कंप्यूटर को केवल अपने दिमाग से निर्देशित कर सकेंगे। कुछ सालों में नौबत यहां तक आ सकती है कि आपका रोबोट असिस्टेंट आपके पास नींबू पानी का ग्लास लेकर खड़ा हो, क्योंकि आपके बताए बगैर ही उसे पता चल चुका है कि आपको प्यास लगी है। मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के जर्नल में छपे रिव्यू के मुताबिक, एक जानी-मानी टेक्नोलॉजी कंपनी ऐसे टैबलेट का परीक्षण कर रही है, जिसे दिमाग से ही नियंत्रित किया जा सकेगा। इसके लिए एक हैट पहनने की जरूरत पड़ेगी, जिसमें मॉनिटरिंग इलेक्ट्रोड्स लगे होंगे।

कैलिफोर्निया की कंपनी न्यूरोस्काई ने हाल ही में एक ब्लूटूथ वाला हेडसेट रिलीज किया है, जो ब्रेन वेव्स के हलके-फुलके बदलाव भी मॉनिटर कर सकता है। इससे लोगों को कंप्यूटर और स्मार्टफोन पर कंसंट्रेशन बनाकर रखने वाले गेम्स खेल पाने की सुविधा मिल रही है। इसके सहारे जो गेम्स खेले जा रहे हैं, उनमें दिमाग का रोल जॉयस्टिक वाला है। एक और कंपनी इमोटिव ऐसा हेडसेट बेच रही है, जो एक बड़े से एलियन हाथ की तरह दिखती है।

यह ब्रेन वेव्स को पढ़ सकती है और इसका इस्तेमाल फ्लिकर फोटोज तलाशने के लिए किया जा सकता है। इसके लिए कीवर्ड्स नहीं चाहिए। खुशी या उत्साह जैसे आपके मनोभाव को समझकर उसी के मुताबिक तस्वीरें यह तलाशेगा। एक और लाइटवेट वायरलेस हेडबैंड म्यूज में एक ऐसा ऐप है जो ब्रेन को एक्सरसाइज करने के लिए उकसाता है।

कार बनानेवाली कंपनियां भी ऐसी तकनीकों पर काम कर रही हैँ, जिनसे ड्राइविंग के दौरान झपकी आने पर सीट को ही इसका आभास हो जाए और वह आपको सचेत कर दे। आंख लग जाने पर स्टीयरिंग व्हील खड़खड़ाने लगे तो ड्राइव करने वाले की नींद अपने आप खुल जाए। हालांकि इस बारे में ब्राउन इंस्टीट्यूट के न्यूरोसाइंटिस्ट जॉन डी़ का कहना है कि ऐसी तमाम तकनीकें दिमागी बातचीत को बाहर से सुनने की कोशिश भर हैं, जबकि दिमाग की उथल-पुथल को सही मायनों में जानने के लिए हमें ब्रेन में सेंसर्स इंप्लांट करने की जरूरत पड़ेगी। ये सेंसर चिप के रूप में भी हो सकते हैं।


photo ; googale
ब्रेन कंप्यूटर इंटरफेस नामक तकनीक की कल्पना वैज्ञानिकों ने इसलिए की थी, ताकि पैरालिसिस जैसी बीमारियों से ग्रस्त लोग कंप्यूटर से संवाद बनाकर रोबोट को कंट्रोल कर सकें और तरह अपने छोटे-मोटे काम खुद ही संपन्न करके अपनी असमर्थता पर काबू पा सकें। पिछले दिनों ब्रेनगेट नाम के एक प्रोजेक्ट में टोटल पैरालिसिस से ग्रस्त दो लोगों ने केवल अपने दिमाग के इस्तेमाल से मनचाहे काम किए।

इनमें से एक महिला 15 सालों से अपने हाथ हिलाने में भी असमर्थ थी, लेकिन रोबोटिक आर्म और अपनी ब्रेन एक्टिविटी को रेस्पांड करने वाले कंप्यूटर के सहारे उसने कॉफी की बोतल पकड़ी, अपने लिए कॉफी सर्व की और बोतल को वापस टेबल पर रख दिया। यह सब रोबोटिक आर्म के मूवमेंट्स के बारे में सोचने भर से संभव हो गया।

हालांकि दिमाग के भीतर लगे चिप के लंबे समय तक काम कर सकने के बारे में वैज्ञानिक अभी कुछ खास नहीं कर सके हैं। फिलहाल अमेरिका में जारी ब्रेन एक्टिविटी मैप प्रोजेक्ट में इस समस्या पर गंभीरता से काम किया जा रहा है। उम्मीद है कि इस प्रोजेक्ट के बाद स्मार्टफोन और टैबलेट्स की दुनिया में क्रांतिकारी बदलाव होंगे।

केवल सोचने भर से टीवी चैनल बदल लेने की संभावना भी जताई जा रही है। कुछ फ्यूचरिस्ट वैज्ञानिकों का दावा है कि सन 2045 तक इंसान अपने दिमाग को ही कंप्यूटर पर अपलोड करने में कामयाब हो जाएगा।

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इंसानों के साथ भी शारीरिक रिश्ते बना सकेंगे रोबॉट, पैदा करेंगे बच्चे!

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लंदन
आपने रजनीकांत की रोबॉट फिल्म तो देखी होगी। इसमें रोबॉट बने रजनीकांत का उसके साथी मजाक बनाते हैं कि वह सेक्स नहीं कर सकता, इसलिए वह इंसानों जैसा नहीं है। लेकिन जरा सोचिए क्या हो, अगर रोबॉट भी सेक्स करने लगें और बच्चे पैदा करने लगें। हालांकि इंजीनियर और नोवेलिस्ट जॉर्ज जैरकैडाकिस का मानना है कि अगले 20-30 साल में ऐसा संभव है। जॉर्ज के मुताबिक, भविष्य में रोबॉट न सिर्फ दूसरे रोबॉट के साथ सेक्स कर सकेंगे, बल्कि इंसानों के साथ भी शारीरिक रिश्ते बना सकेंगे।

आर्टिफिशल इंटेलिजेंस इंजीनियर जॉर्ज का मानना है कि ऐसा करने से बेहतर रोबॉट पैदा होंगे। उनके मुताबिक, रोबॉट के इंसानों के साथ संबंध बनाने से हाइब्रिड प्रजाति विकसित होगी। रोबॉट और आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के विशेषज्ञों के अनुसार, यह किसी साइंस फिक्शन फिल्म की कहानी नहीं है बल्कि वर्तमान में ही ऐसे रिसर्च और तकनीक उपलब्ध हैं, जिससे ऐसा संभव हो सकता है। हालांकि, विशेषज्ञों को भी इसके बुरे प्रभाव को लेकर चिंता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर रोबॉट इंसानों से ज्यादा पैदा होने लगे, तो वह समय बुरे सपने से कम नहीं होगा।

बच्चे पैदा नहीं, प्रिंट होंगे: रोबॉट के विकास से जुड़े वैज्ञानिकों की अगर मानें तो यह रोबॉट बच्चे पैदा नहीं प्रिंट करेंगे। शेफील्ड यूनिवर्सिटी के आर्टिफिशल इंटेलिजेंस और रोबॉटिक्स के प्रफेसर नोएल शार्की के अनुसार, रोबॉट 3-डी तकनीक का इस्तेमाल कर बच्चों को जन्म दे सकते हैं। नोएल के अनुसार, रोबॉट अपने सॉफ्टवेयर में बदलाव लाकर सेक्स के दौरान अपनी खूबियों को बढ़ा या एक्सचेंज कर सकते हैं। उनके बच्चों में इन खूबियों का मिश्रण देखने को मिल सकता है। इन रोबॉट के पास कार्बन और सिलिकन से बना डिजिटल दिमाग होगा।


वायरस से भी होगी सुरक्षा: विशेषज्ञों का तो यहां तक मानना है कि रोबॉट द्वारा सेक्स करने से उनके सॉफ्टवेयर वायरस से भी बचे रहेंगे। ठीक उसी तरह जैसे सेक्स करने से मनुष्यों को कई संक्रमित बीमारियां नहीं होतीं।

बुढ़ापे का इलाज: वैज्ञानिकों के अनुसार इन रोबॉट-इंसानों के हाइब्रिड की दिशा में हो रही रिसर्च से बुढ़ापे के बारे में भी और जानकारी मिल सकती है। यह रिसर्च इंसानी शरीर को जानने की दिशा में लाभदायक होगी और यह जाना जा सकेगा कि बुढ़ापे के लिए जिम्मेदार अल्टशाइमर्त्स बीमारी का असर इंसानी दिमाग पर किस तरह और कितना होता है। प्रफेसर वार्विक ने कहा कि रोबॉट का एक दूसरे से सेक्स करना और रोबॉट पैदा करना सामाजिक स्वीकार्यता पर भी निर्भर करेगा। 20 साल के बाद जब यह पूरी तरह से संभव हो जाएगा तब इस तकनीक को स्वीकार करने मे नैतिक दिक्कते आएंगी। वैसे वैज्ञानिकों की इस रिसर्च से काफी उम्मीदें हैं। वैज्ञानिका जॉर्ज डायसन का मानना है कि ऐसे रोबॉट शनि के चांद एनक्लेडस से मंगल ग्रह पर बर्फ लाने में मदद कर सकते हैं। sabhar :http://navbharattimes.indiatimes.com/

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स्किन सेल्स से बन सकेंगे नए ऑर्गन्स

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लंदन 
वैज्ञानिकों ने इंसानी शरीर की त्वचा की कोशिकाओं (स्किन सेल्स) से स्टेम सेल्स तैयार करने से जुड़ी बड़ी उपलब्धि हासिल की है। इन स्टेम स्टेल्स में एंब्रियो या भ्रूण में तब्दील होने की क्षमता है। एक टॉप साइंटिस्ट ने 'द इंडिपेंडेंट' को रविवार को यह जानकारी दी। इस तकनीक का परीक्षण चूहों पर पूरी तरह से कामयाब रहा है और वैज्ञानिक मानते हैं कि यह इंसानों के लिए भी बिलकुल फिट रहेगा। ऐसे में इंसानों में होने वाली असाध्य बीमारियों मसलन पार्किन्सन, हार्ट डिजीज आदि के बेहतर इलाज की संभावनाएं और मजबूत हो चली हैं। दरअसल, इस तकनीक के जरिए बीमारी से ग्रस्त अंगों को मरीज के स्टेम सेल्स के जरिए दोबारा से तैयार किया जा सकता है। 

जर्म सेल्स भी किए जा सकते हैं तैयार 
हालांकि, स्किन सेल्स से इंसानी भ्रूण तैयार करने की फिलहाल कोई मंशा नहीं है, लेकिन वैज्ञानिकों का मत है कि ऐसा किया जाना सैद्धांतिक तौर पर मुमकिन है। प्रयोग के दौरान चूहों के भ्रूण तैयार करने में कामयाबी मिलना इस बात का संकेत देते हैं कि इन भ्रूण से किसी खास तरह के टिशू (ऊतक) तैयार किए जा सकते हैं, जो अंग विकसित करने की दिशा में अहम साबित होगा। यहां तक कि इस तकनीक से जर्म सेल्स भी तैयार किए जा सकते हैं, जिनसे स्पर्म और डिंब (एग्स) बनते हैं। sabhar :http://navbharattimes.indiatimes.com/

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तब इंसानों से भी बुद्धिमान बन जाएगा रोबोट

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तब इंसानों से भी बुद्धिमान बन जाएगा रोबोट...
न्यूयार्क: गूगल के एक विशेषज्ञ का दावा है कि अगले 15 सालों में एक ऐसा रोबोट पेश किया जाएगा जो धरती के सबसे बुद्धिमान मानवों से भी ज्यादा तेज दिमाग वाला होगा। यह न केवल बुद्धिमानी से बात करेगा, सवालों का जवाब देगा बल्कि दिल्लगी भी करेगा। गूगल के आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस (एआई) के विशेषज्ञ ने `द ऑब्जवर्र` को बताया कि हम चाहते हैं कि हमारा कंप्यूटर वेब की पूरी दुनिया और हर एक किताब का एक-एक पन्ना पढ़ डाले और उपयोगकर्ताओं से समझदारी से बात करने और उनके हर सवाल का जवाब देने में सक्षम हो।

उन्होंने कहा कि 2029 तक कंप्यूटर मशीन मानवों से ज्यादा समझदार और तेज दिमाग होगी और अपने निर्माण करने वालों को ही मात देगी। इस दिशा में गूगल ने हाल ही में दुनिया की शीर्ष रोबोटिक कंपनियों को खरीद लिया है, जिसमें बोस्टन डायनामिक्स भी शामिल है। (एजेंसी sabhar ;http://zeenews.india.com/

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सिर हिलाइए और हो गई पेंमेंट गूगल ग्लास से

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भविष्य में लोग सिर्फ़ अपने सिर को हिलाकर ख़रीदी गई किसी चीज़ के लिए भुगतान कर सकेंगे. हालांकि ऐसा करने के लिए आपको गूगल ग्लास पहनना होगा.

गूगल ग्लास
इस सुविधा का फ़ायदा ईज़, ग्लासशोल, गूगल ग्लास एक्सप्लोरर जैसे ऐप की मदद से उठाया जा सकता है. अगर आपने गूगल ग्लास पहना है तो इन ऐप की मदद से आप सिर्फ़ दो बार सिर हिलाकर भुगतान कर सकते हैं.

इसके लिए दुकानदार के पास भी ऐसा ही आईओएस या एंड्राएड ऐप होना चाहिए.

फिलहाल इस तरह की सुविधा केवल वर्चुअल मुद्रा 'बिटकॉइन' के साथ उपलब्ध है, लेकिन इसके साथ काफी दिक्कतें हैं. बहुत कम कारोबारी ही वर्चुअल करेंसी को स्वीकार करते हैं.

क्लिक करें पढें: नए साल के पाँच हॉट गैजेट

चुनौतियाँ

 गूगल ग्लास
हाल में तोक्यो स्थित करेंसी बदलने वाले बाज़ार माउंट गॉक्स के नाकाम होने के कारण और बिटकॉइन का मूल्य गिरने के कारण इस पर भरोसा घटा है.

हालांकि ईज़ को उम्मीद है कि वो अपने "नॉड टू पे" सिस्टम का विस्तार कर उसमें यूरो और डॉलर जैसी परंपरागत मुद्रा प्रणालियों को शामिल कर लेगा.

गूगल अपने ग्लास में लगातार नए संशोशन कर रहा है और ऐप जोड़ रहा है. क्लिक करें तस्वीर खींचने और वीडियो बनाने के लिए वॉयस कमांड के अलावा हाल ही में गूगल ने आंख मारने या पलक झपकाने से भी फ़ोटो खींचने का ऐप गूगल ग्लास में डाला है.

गूगल का कहना है कि यह सुविधा वॉयस कमांड से भी ज़्यादा तेज और सुविधाजनक है.

इस गैजेट की मदद से कोई मैसेज भेजने के लिए उसे टाइप करने की जरूरत नहीं है. बस बोलते जाइए मैसेज टाइप होकर चला जाएगा. गूगल ग्लास आपकी आवाज का किसी दूसरी भाषा में अनुवाद भी कर सकता है.
sabhar : http://www.bbc.co.uk/

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फेसबुक से खड़ा कर लिया अपना बिजनेस, लाखों का है टर्नओवर

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फेसबुक से खड़ा कर लिया अपना बिजनेस, लाखों का है टर्नओवर

पटना. उद्यमी वही नहीं होते हैं जो बड़ी पूंजी के साथ कोई बड़ा व्यवसाय करते हैं। छोटी पूंजी के साथ भी छोटा सार्थक काम किया जा सकता है। पटना की महिला उद्यमियों ने यह सिद्ध किया है। पांच-दस हजार की नौकरी की चाहत रखने वाली ये महिलाएं आज अपना उद्यम चला रही है और समाज की महिलाओं को रोजगार प्रदान कर रही हैं। इनके बेहतर काम ने समाज ने इनको खास पहचान दिया है। बिहार महिला उद्योग संघ की ओर से सिन्हा लाइब्रेरी में शुक्रवार से शुरू महिला उद्योग मेला ऐसे ही उद्यमियों से सजा है।  
वसुंधरा वर्मा
ऑनर- सुदक्ष, सुदक्ष इंटीरियर डिजाइनिंग, सुदक्ष मेइट्स
प्रोडक्ट- होम डेकोर आइटम, डिजाइनर वार्डरोब, कंसल्टेंसी
शुरुआत- 2012
पूंजी- 15 हजार रुपए, सालाना टर्नओवर-तीन लाख
लड़की और खुद का बिजनेस! घरवालों के आगे ये बड़ा प्रश्न हमेशा घूमता था। पटना से बाहर पढऩे जाने तक नहीं मिला। हमेशा अपनी क्रिएटिविटी निखारना चाहती थी। जैसे-तैसे पटना वीमेंस कॉलेज में फैशन में एक साल का डिप्लोमा किया। बाजार जाकर अपने प्रोडक्ट बेच नहीं सकती थी, घरवालों ने मना कर रखा था। फेसबुक मेरा शॉप बना। यहां अपने प्रोडक्ट के फोटो अपलोड करती। देश और विदेश से कई ऑर्डर मिलने लगें। आज मैं एक साथ तीन वेंचर चला रही हूं।

बच्चे की तरह पाला है व्यापार को
सविता जैन
ऑनर- अक्षत नमकीन
शुरुआत- 1999
पूंजी- 500 रुपए, सालाना टर्नओवर-12 लाख
बच्चे छोटेे थे। बिजनेस भी साथ में शुरु कर दिया। बहुत परेशानी होती थी। क्या करती मेरा बिजनेस भी तो मेरे बच्चे की तरह ही था। उसे बीच में कैसे बंद करती। मैंने उसे बच्चे की तरह बढ़ाया। अपने प्रोड्क्ट की क्वालिटी से कोई समझौता नहीं की। चाहती तो बाजार बढ़ाने के लिए मिलावटी सामान बेच सकती थी। पर मैं सोच चुकी थी कि चाहे जितना भी समय लगे, मेरे प्रोडक्ट की क्वालिटी ही इसे प्रसिद्धि दिलाएगी। आज स्थिति ऐसी है कि शहर के सैकड़ों दुकानों के अलावा मेरा प्रोडक्ट बिग बाजार में बेचा जा रहा है।

फेसबुक से खड़ा कर लिया अपना बिजनेस, लाखों का है टर्नओवर

क्रिएटिविटी ने दिलाई पहचान पति का मिला पूरा सपोर्ट
आशा वर्मा
ऑनर- आशा क्रिएशन
प्रोडक्ट- फ्यूजन आर्ट (मधुबनी, काथा, पत्ती वर्क खत्वा) साड़ी, सूट, एक्सक्लूसिव कुर्ते आदि
पूंजी- 10 हजार, सालाना टर्नओवर-15 लाख
शुरुआत- 1998
कुछ अलग करने की चाहत हमेशा से रही है। बच्चे जब छोटे थे तो ज्यादा कुछ नहीं कर पाती थी। जब दरभंगा जाती तो मधुबनी आर्ट सीखती। बच्चे बड़े हुए तो अपना काम शुरु करने की चाहत हुई। मधुवनी आर्ट को लेटेस्ट ट्रेंड से जोड़कर फैशन का नया फ्यूजन तैयार किया। दिल्ली उद्योग मेले में प्रदर्शनी लगाई। एक अलग पहचान मिली।
फेसबुक से खड़ा कर लिया अपना बिजनेस, लाखों का है टर्नओवर

सीएम हाउस तक है मेरे प्रोडक्ट की लोकप्रियता
शोभा श्रीवास्तव
ऑनर- शोभा अचार
शुरुआत-1996
पूंजी- 20 हजार रुपए, सालाना टर्नओवर-18 लाख रुपए
छोटे स्तर से शुरुआत की थी। आज लोकप्रियता ऐसी है कि सीएम हाउस में मेरे प्रोडक्ट की डिमांड है। एक बार जो मेरा अचार खाता है वह सब भूल जाता है। हर तरह के अचार बनाती हूं। शुरुआत में तीन साल घाटे में चली। फिर चार साल नो प्रॉफिट, नो लॉस। आज मेरा बिजनेस सरप्लस में चल रहा है। 66 साल की हो गई हूं, आज भी मार्केटिंग खुद करती हूं।
फेसबुक से खड़ा कर लिया अपना बिजनेस, लाखों का है टर्नओवर
ससुरजी के सहयोग से बिहार में बन पाई मेरी पहचान
सुनीता प्रकाश
ऑनर- बंदिनी
प्रोडक्ट- क्रिएटिव गारमेंट, डेकोर आइटम, ट्रेडिशनल आइटम
शुरुआत- 1993
पूंजी- 15 हजार रुपए, सालाना टर्नओवर-5 लाख
निफ्ट में पढऩा चाहती थी। डॉक्टर और इंजीनियर की पढ़ाई से दूर भागती थी। मुश्किल से टेक्सटाइल डिजाइन में डिप्लोमा कर अपना काम शुरू किया। पहचान बनाने के क्रम में मेरा साथ मेरे ससुर जी ने दिया। वह चाहते थे कि मैं आगे बढूं। नए कॉन्सेप्ट पर प्रोडक्ट बनाना शुरु किया। बिहार उत्सव मेले ने पहचान दी। sabhar :http://www.bhaskar.com/





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शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

ये बच्चा पूर्वाभास से जान जाता है सबकुछ

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छठी इंद्रिय का कमाल

छठी इंद्रिय का कमाल

आपने हॉलीवुड फिल्म sixth sense देखी होगी, जिसमें एक बच्चे की छठी इंद्रिय अति विकसित होती है। लेकिन ये कोई फिल्म नहीं है बल्कि एक चार साल के बच्चे की असलियत है।

इस बात की पुष्टि खुद बच्चे के मां-बाप करते हैं। उनका कहना है कि उनका बच्चा sixth sense मूवी के चरित्र 'कोल' जैसा है।

फ्लोरिडा में रहता है ये परिवार

फ्लोरिडा के नैपल्स में रहने वाले ग्रेग और हिदर होवेल का कहना है कि उन्होंने ध्यान दिया कि उनका बेटा एलिजाह औरों से काफी अलग है। महज दस महीने की उम्र में उसने पूरे-पूरे वाक्य बोलना शुरू कर दिया था।

जब बच्चे के माता-पिता ने मनोचिकित्सक से संपर्क किया तो उसने बताया कि बच्चे के अंदर कुछ सुपरनैचुरल ताकत है।
क्या कहना है मां का?

क्या कहना है मां का?

एलिजाह की मां होवेल का कहना है कि पहले उन्हें लगता था कि उनका बच्चा यूं ही बातें बनाता है लेकिन वो कई बातें होने से पहले ही जान जाता है।

होवेल ने बताया कि एलिजाह को उनके गर्भपात होने का पता पहले ही चल गया था। इतना ही नहीं उसे इस बात का भ पूर्वाभास हो गया था कि वो इसके बाद जुड़वा बच्चों को जन्म देगी।

वो बताती हैं कि जिस समय वो गर्भवती थी उनका बेटा उनसे कहता था कि, 'मां, आपका बेटा भगवान के पास चला जाएगा।'

क्या हुआ उसके बाद?

एलिजाह के ऐसा कहने के दो दिन बाद ही होवेल का गर्भपात हो गया और उनका गर्भ गिर गया। लेकिन उसके बाद एलिजाह ने कहना शुरू कर दिया कि वो जल्दी ही दो बच्चों को जन्म देगी और दोनों ही लड़के होंगे।

महीनेभर बाद उन्हें पता चला कि उनके गर्भ में जुड़वा बच्चे हैं। इसके बाद एलिजाह के मां-बाप ने मनोचिकित्सक को संपर्क किया और ये जानने की कोशिश की, कहीं वाकई उसे भूत-प्रेत तो नहीं दिखते या फिर वो किसी मानसिक बीमारी से तो पीड़ित नहीं।

इतना ही नहीं एलिजाह अपने मृत दादा जी से भी बात कर सकता है।

क्या कहना है परिवार का?

डेली मेल के अनुसार, एलिजाह के मां-बाप का कहना है कि उनका बेटा कई पुरानी बातों का जिक्र करता है और उसका कहना है गर्भ्ज्ञपात वाली बात उसे उसकी मृत नानी ने बताई थी।

मां-बाप अपने बेटे पर पूरा ध्यान दे रहे हैं और चाहते हैं कि उसकी ये क्षमता सही दिशा में विकसित हो।   sabhar :
http://www.amarujala.com/



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झील में पक्षी बन जाते हैं पत्थर इंसानी हड्डियों से बना है यह चर्च

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40 हजार इंसानी हड्डियों से बना है यह चर्च, झील में पक्षी बन जाते हैं पत्थर

लाइफस्टाइल डेस्क. धरती पर जीवन की शुरुआत से ही इंसान यात्राएं कर रहा है। इन यात्राओं की ही बदौलत उसका दुनिया के दूसरे देशों से संपर्क हुआ। उसने अपने यात्रा अनुभवों से लोगों को रोमांचित किया। उन्हें यात्राओं के लिए प्रेरित किया। प्राचीन काल में ये यात्राएं साहित्यक, धार्मिक और वैज्ञानिक खोजों के लिए की गईं और धीरे-धीरे इनका स्वरूप बदलता गया, लेकिन यात्राओं के प्रति लोगों का लगाव हमेशा बरकरार रहा।
दैनिक भास्कर डॉट कॉम ट्रैवलिंग के माध्यम से पाठकों को इस रहस्यमयी दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचा रहा है। पाठकों को बेहतरीन ट्रैवलिंग डेस्टिनेशन के बारे में बता रहा है। इसी क्रम में आज हम यात्रा प्रेमियों को दुनिया के ऐसे चर्च के बारे में बता रहे हैं, जो मानव कंकालों से बना है। साथ ही, एक ऐसी झील के सफर पर ले जा रहे हैं, जिसे छूते ही सब कुछ पत्थर बन जाता है।
सबसे पहले हड्डियों से बने चर्च के बारे में पढ़िए...
क्या है चर्च का नाम
सेडलेक ऑस्युअरी
कहां है स्थित
चेक गणराज्य
क्या है ख़ास
इस चर्च में 40 हजार लोगों की हड्डियों को कलात्मक रूप से सजा कर रखा गया है। इसे The Church of Bones भी कहा जाता है।
क्या है ऑस्युअरी
कंकालों को सहेज कर रखने की जगह को ऑस्युअरी कहते हैं। सबसे पहले शवों की अस्थाई रूप से क्रब बनाई जाती है और उसके बाद उन्हें निकाल कर ऑस्युअरी में रखा जाता है।
40 हजार इंसानी हड्डियों से बना है यह चर्च, झील में पक्षी बन जाते हैं पत्थर

13 वीं शताब्दी में यहां से एक संत हेनरी फिलिस्तीन गए। हेनरी जब वहां से वापस आए तो अपने साथ एक जार में उस जगह की मिट्टी भर के लाए, जहां प्रभु यीशु को सूली पर चढ़ाया गया था। हेनरी ने इस जार की मिट्टी को चेक गणराज्य के सेडलेक चर्च के पास एक जगह डाल दिया। इसके बाद यह स्थान लोगों को दफनाने की जगह बन गई।
14वीं और 15वीं शताब्दी में यहां प्लेग और युद्धों की वजह से बहुत ज्यादा मौतें हुईं। इनमें से ज़्यादातर लोगों को सेडलिक में ही दफनाया गया। एक दिन ऐसा आया कि इस क्रबिस्तान में लोगों को दफनाने के लिए जगह ही नहीं बची। इसके बाद पादरियों को यहां ऑस्युअरी (ossuary) बनाने का ख़्याल आया। इसे बनाने के लिए पादरी कब्र से हड्डियों को निकाल कर ऑस्युअरी में रख देते। सन् 1870 में इस ऑस्युअरी में 40 हज़ार हड्डियों को कलात्मक रूप से सजाया गया। चर्च को हड्डियों से सजाने का यह काम Frantisek Rind ने किया। 1970 में फिल्मकार Jan Svankmajer ने इस चर्च पर 10 मिनट की डॉक्युमेंटरी फिल्म बनाई। हर साल बड़ी तादाद में सैलानी इस चर्च को देखने के लिए आते हैं। 
40 हजार इंसानी हड्डियों से बना है यह चर्च, झील में पक्षी बन जाते हैं पत्थर
आपने बचपन में उस राजा की कहानी तो ज़रूर सुनी होगी जो जिस चीज़ को छूता था, वह सोना बन जाती थी, लेकिन ऐसी झील के बारे में नहीं सुना होगा जिसका पानी हर चीज़ को पत्थर बना देता है।
कहां स्थित है यह झील
उत्तरी तंजानिया
झील का नाम
नेट्रान लेक
फोटोग्राफर निक ब्रांड्ट जब उत्तरी तंजानिया की नेट्रान लेक के किनारे पहुंचे, तो वहां के दृश्य ने उन्हें चौंका दिया। झील के किनारे जगह-जगह पशु-पक्षियों के स्टैचू नजर आए। ये स्टैचू मृत पक्षियों के थे। दरअसल, इस झील में जाने वाले जानवर और पशु-पक्षी कुछ ही देर में जमकर पत्थर बन जाते हैं। ब्रांड्ट ने अपनी किताब 'Across the Ravaged Land' में इस बात का जिक्र किया है।
अपनी किताब में ब्रांड्ट लिखते हैं कि यह कोई नहीं जानता कि ये पक्षी मरे कैसे? हो सकता है कि लेक के रिफ्लेक्टिव नेचर ने इन्हें भ्रमित किया हो और यह पानी में गिर गए हों। वो बताते हैं कि पाना में नमक और सोडा की मात्रा इतनी ज़्यादा है कि इसने मेरी कोडक फिल्म बॉक्स की स्याही को कुछ ही सेकंड में जमा दिया। पानी में नमक और सोडा की ज़्यादा मात्रा ही इन पक्षियों के मृत शरीर को सुरक्षित रखती है।
ब्रांड्स ने अपनी किताब में इन पक्षियों के फोटोज का संकलन किया है। यह किताब उस फोटोग्राफी डाक्युमेंट का तीसरा वॉल्यूम है, जिसे निक ने पूर्वी अफ्रीका में जानवरों के गायब होने पर लिखा है।

40 हजार इंसानी हड्डियों से बना है यह चर्च, झील में पक्षी बन जाते हैं पत्थर
40 हजार इंसानी हड्डियों से बना है यह चर्च, झील में पक्षी बन जाते हैं पत्थर

40 हजार इंसानी हड्डियों से बना है यह चर्च, झील में पक्षी बन जाते हैं पत्थर

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मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

देश-विदेश में रिसर्च के लिए प्राचीन ग्रंथों का अनमोल खजाना है साधु आश्रम

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प्राचीन ग्रंथों का अनमोल खजाना है साधु आश्रम, देश-विदेश में रिसर्च के लिए है प्रसिद्ध


होशियारपुर। पंजाब की पावन धरा होशियारपुर में उना मार्ग स्थित साधु आश्रम में विश्वेश्वरानंद वैदिक रिसर्च इंस्टिट्यूट को समर्पित इस संस्थान का इतिहास गौरवमय रहा है। वैदिक साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए आज भी यह केंद्र देश में ही नहीं विदेशों में भी रिसर्च के लिए प्रसिद्ध है।
 
साधु आश्रम में स्थित इस केंद्र में अनगिनत प्राचीन ग्रंथ व दक्षिण भारतीय लिपि में लिखे संस्कृति के अनेक ग्रंथ पड़े हैं। देश-विदेश से विद्वान, अध्यापक व खोजकर्ता खोज करने के लिए आते रहते हैं। इस संस्था में चारों वेदों के अंग्रेजी व फ्रैंच भाषा में अनुवाद मौजूद हैं। वेदों से संबधित साहित्य भी यहां रखा हुआ है।
 
ज्ञान का विशाल भंडार है यह केंद्र
 
ब्रिटेन के इनसाइक्लोपीडिया विश्व की प्रमुख भाषाओं की डिक्शनरियां व प्रसिद्ध विद्वानों की आत्मकथा सहित यहां पर करीब डेढ़ लाख पुस्तकें मिल जाती है। पंडित जवाहर लाल नेहरु व महात्मा गांधी की आत्मकथा का अंग्रेजी व हिंदी अनुवाद यहां मौजूद है। धर्मसूत्र, ब्राह्मण व आर्य साहित्य यहां उपलब्ध है।
 
उल्लेखनीय है कि पुणे के भंडारा रिसर्च इंस्टीट्यूट के बाद बीबीआरआई भारत का दूसरा ऐसा संस्थान है, जिसके पास ज्ञान का इतना विशाल भंडार है। धार्मिक शास्त्रों के अलावा साहित्य, कला, दर्शन शास्त्र, ज्योतिष, भाषा व लिपि से संबधित हजारों पुस्तकें यहां हैं।
 
गुरमुखी लिपि में लिखा हुआ श्री राम चरित मानस ग्रंथ, संस्कृत में लिखे श्री गुरु ग्रंथ साहिब व बाइबल के एडीशन यहां देखे जा सकते हैं। मुगल बादशाह औरंगजेब की हस्त लिखित कुरान के अंशों के चित्र, कुरान मजीद का हिंदी में अनुवाद, पबूची लिपि में लिखी गई एक पुस्तक, जिसे अब तक पढ़ा नहीं जा सका है व अनेक हस्त लिखित पुस्तकें ऐसी हैं, जिनको कैमिकल ट्रीटमेंट से बचाने की जरुरत है।
 
चरक संहिता व भाव प्रकाश ग्रंथ यहां पड़े हैं, जिनसे आयुर्वेद का असीमित ज्ञान लिया जा सकता है। इन ग्रंथों में बिमारियों व उनके इलाज को चित्रों द्वारा पेश किया गया है। कई प्राचीन सिक्के यहां की अनमोल धरोहर हैं। 
 
इस संस्था के निर्माण के लिए होशियारपुर के गांव बजवाड़ा निवासी धनी राम भल्ला ने पिता की याद में अपने गांव के नजदीक बने साधु आश्रम में जगह दी थी। 1957 में वैदिक संस्था का यहां निर्माण करने वाले आचार्य विश्वबंधु को महाराजा पटियाला, गोपी चंद भार्गव व संस्कृति के प्रति रूचि रखने वाली अनेक शख्सियतों ने धन का सहयोग दिया। 
 विभाजन के समय लाहौर से होशियारपुर आया था यह केंद्र
 
देश के बंटवारे से पहले यह केंद्र लाहौर के डीएवी संस्थान परिसर में स्थापित था। जब देश का विभाजन हुआ तो इस संस्थान के तत्कालीन डायरेक्टर विश्व बंधु जी ने पाकिस्तान सरकार को कहा, "हम इस धरोहर को हिंदुस्तान ले जाते हैं, क्योंकि यहां तो अब इस्लाम धर्म स्थापित हो गया है।" पाकिस्तान सरकार इसके लिए यह कहते हुए राजी नहीं हुआ कि यह तो देश की धरोहर हैं और वे नहीं ले जाने देंगे।
 
कहते हैं कि यह बात सुन विश्वबंधु जी ने योजना के तहत रातोंरात हिंदुस्तान की तरफ आ रहे घोड़ागाड़ी, बैलगाड़ी, ट्रक व रेल में किसी तरह दुर्लभ ग्रंथों को रखते हुए सभी को यही बताया कि इसे हिंदुस्तानी सीमा में किसी सुरक्षित स्थानों पर रखवा देना। 
प्राचीन ग्रंथों का अनमोल खजाना है साधू आश्रम, देश-विदेश में रिसर्च के लिए है प्रसिद्ध
बजवाड़ा के धनीराम भल्ला के सहयोग से साधु आश्रम में बना यह केंद्र
 
साधु आश्रम में आज संस्थान के चेयरमैन प्रोफेसर प्रेमलाल शर्मा के साथ-साथ प्रोफेसर कृष्ण मुरारी शर्मा, पीयू के रजिस्ट्रार सुरजीत सिंह ठाकुर व डॉ. वेदप्रकाश ने बताया कि इस केंद्र के साथ लगते हुए ऐतिहासिक गांव के रहने वाले धनीराम भल्ला, जो कानपुर के बड़े उद्योगपति थे, ने विश्वबंधु जी को यह निमंत्रण दिया,  "आप इस केंद्र का स्थापना होशियारपुर में करें, तो मैं जमीन देने को तैयार हूं।"
 
विश्वबंधु जी, जो तमाम कष्ट व परेशानियों को झेलते हुए लाहौर से इस प्राचीन ग्रंथों को संभालकर लाए थे, ने होशियारपुर में इस केंद्र की नींव रखी। पद्म विभूषण से सम्मानित आचार्य विश्ववंधु के प्रयासों से 1965 में इस संस्था का एक भाग पंजाब यूनीवर्सिटी चंडीगढ़ से जुड़ गया, जिसका नाम विश्वेश्वरानंद विश्व बंधु संस्कृत व भारत भारती अनुशीलन संस्थान रखा गया। इसके तहत शिक्षा विभाग, लाइब्रेरी, वैदिक खोज व निर्माण, शोध व प्रकाश का काम यहां शुरू हुआ।
 
19.42 मीटर लंबी जन्मकुंडली व अश्वफल प्रकाश ग्रंथ है अमूल्य धरोहर
 
शास्त्री, आचार्य व एमए संस्कृत यहां पढ़ाई जाती है। पुरातन धरोहरों को वैज्ञानिक ढंग से बचाने का प्रशिक्षण दिया जाता है। कॉम्प्लेक्स में विद्यार्थियों के लिए होस्टल व खोजकर्ताओं के लिए रेस्ट हाउस तथा कैंटीन की सुविधा है। दूर-दराज व पास से आए शोधकर्ता व विद्यार्थी कई दिन यहां रह कर शोध करते हैं। लाइब्रेरी के साथ ही यहां बना संग्रहालय सैलानियों के लिए आकर्षण का केंद्र है। संग्रहालय का काम पुरातत्व विभाग देखता है। महाराजा पटियाला की पुरानी देवनागरी लिपि में लिखी 19.42 मीटर लंबी जन्म कुंडली व अश्वफल प्रकाश ग्रंथ यहां की अमूल्य धरोहरों में से एक है।


ग्रंथ भारत पहुंचने पर ही आचार्य विश्वबंधु जी ने छोड़ा था पाकिस्तान
 
विशेश्वरानंद वैदिक शोध संस्थान का आगाज सरकारी रुप से इसके संस्थापक स्वर्गीय आचार्य विश्वेश्वरानंद और स्वामी नित्यानंद जी ने शिमला में शांतिकुटि के स्थान पर सन 1903 में किया। सन 1916 में स्वामी नित्यानंद परकोलवासी हुए। स्वामी विश्वेश्वरानंद से सन 1918 तक शिमला में ही इस केंद्र को संचालित किया।
 
होल्कर दरबार की ओर से आर्थिक सहायता का वचन मिलने पर सन 1918 में इस पहले मैसूर और बाद में इंदौर में स्थानांतरित कर दिया गया। पांच वर्ष के बाद इसे लाहौर ले जाया गया। यहां वो अराजकीय रूप में सन 1947 तक बड़ी सफलतापूर्वक चलता रहा।
 
देश विभाजन के समय इस संस्थान का अस्तित्व लाहौर में मिट जाता, यह भांप आचार्य विश्वबंधु जी ने इसे भारत लाने की ठान ली। उन्होंने इस अनमोल धरोहर राष्ट्रीय संपदा को अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय समझकर संगीनों के साये और गोलियों की बौछार में भी छाती से लगाए रखा। इसकी पांडुलिपियों, पुस्तकों, रजिस्टरों तथा अन्य संबधि कागजों को मिलाकर कुल वजन 4000 क्विंटल बनता था। जब तक एक-एक वस्तु भारत नहीं पंहुच गई, तब तक आचार्य जी वहीं बैठे रहे। 
 आचार्य विश्व बंधु का संक्षिप्त परिचय
 
आचार्य विश्वबंधु जी का जन्म 30 सितंबर, 1898 को जिला शाहपुर में हुआ। उन्होंने सन 1918 में पंजाब विश्वविद्यालय लाहौर से बीए व 1919 में एमए शास्त्री की परीक्षाएं विश्वविद्यालय में प्रथम रहकर उत्तीर्ण की। सन 1920 में इटली सरकार की शिक्षा परिषद ने उन्हें नाइट कमांडर का अवॉर्ड प्रदान किया। सन 1950 में फ्रांस की ओर से उन्हें उच्चतम आदरी उपाधि दी गई। सन 1968 में शोध कार्यों के लिए पद्मभूषण से अलंकृत किया गया। एशियेटिक सोसायटी ने वेदों का अध्ययन करने के लिए उन्हें सन 1968 में स्वर्णपदक प्रदान किया। वह जीवन के अंतिम क्षण 1 अगस्त, 1973 तक इस संस्थान के डायरेक्टर पद पर अपनी भूमिका बखूबी निभाते रहे।
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सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

आखिर शिव जी को ही क्यों जल चढ़ाते हैं भक्त?

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mahashivratri shiv jalabheshek shiv puran

भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए भक्त जल और बेलपत्र से शिव जी का अभिषेक करते हैं। इसके पीछे एक बड़ा कारण है जिसका उल्लेख पुराणों में किया गया है।

शिव पुराण में उल्लेख मिलता है कि सागर मंथन के समय जब हालाहल नाम का विष निकलने लग तब विष के प्रभाव से सभी देवता एवं जीव-जंतु व्याकुल होने लगे। ऐसे समय में भगवान शिव ने विष को अपनी अंजुली में लेकर पी लिया।

विष के प्रभाव से स्वयं को बचाने के लिए शिव जी ने इसे अपनी कंठ में रख लिया इससे शिव जी का कंठ नीला पड़ गया और शिव जी नीलकंठ कहलाने लगे।

लेकिन विष के प्रभाव से शिव जी का मस्तिष्क गर्म हो गया। ऐसे समय में देवताओं ने शिव जी के मस्तिष्क पर जल उड़लेना शुरू किया जिससे मस्तिष्क की गर्मी कम हुई।

बेल के पत्तों की तासीर भी ठंढ़ी होती है इसलिए शिव जी को बेलपत्र भी चढ़ाया गया। इसी समय से शिव जी की पूजा जल और बेलपत्र से शुरू हो गयी।

बेलपत्र और जल से शिव जी का मस्तिष्क शीतल रहता और उन्हें शांति मिलती है। इसलिए बेलपत्र और जल से पूजा करने वाले पर शिव जी प्रसन्न होते हैं। sabhar :http://www.amarujala.com/

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पूनम की फेसबुक वॉल न्यूड फिल्म से ज्यादा बोल्ड

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पूनम की फेसबुक वॉल न्यूड फिल्म से ज्यादा बोल्ड हैं।फेसबुक और ट्वीटर उन्हें चर्चा भी देते रहे हैं।
जब-जब पूनम पांडेय चर्चाओं से बाहर होती हैं उनकी कोई तस्वीर आ धमकती है।तस्वीर आते ही पूनम चर्चाओं में आ जाती हैं।पूनम पांडेय के लिए फेसबुक अपने एक्सपोजर का एक ठिकाना बन गया है।अपने फेसबुक और ट्वीटर एकाउंट को पूनम अपने लिए प्रोफशनली बहुत इस्तेमाल करती हैं।पूनम पांडेय अपनी फिल्म नशा का प्रमोशन भी इसी अंदाज में करती रही हैं।फेसबुक और ट्वीटर उन्हें चर्चा भी देते रहे हैं।


तस्वीर आते ही पूनम चर्चाओं में आ जाती हैं।


जबजब-जब पूनम पांडेय चर्चाओं से बाहर होती हैं उनकी कोई तस्वीर आ धमकती है।जब-जब पूनम पांडेय चर्चाओं से बाहर होती हैं उनकी कोई तस्वीर आ धमकती है।ब पूनम पांडेय चर्चाओं से बाहर होती हैं उनकी कोई तस्वीर आ धमकती है।


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रविवार, 23 फ़रवरी 2014

टीनएज गर्ल से 6 घंटे में 30 मर्दों ने किया बलात्कार!

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बर्मिंगम : एक टीनएज गर्ल से कम से कम 30 एशियाई मर्दों ने बलात्कार किया। रिपोर्ट के मुताबिक बलात्कार करने वालों में एक पिता और स्कूली छात्र उसका बेटा भी शामिल था। यह सब करीब छह घंटे तक चला और महत्वपूर्ण बात यह है कि सब लड़की को बड़ी करने के नाम पर किया गया। ब्रिटेन के एक अखबार में इस बारे में रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। 

मुस्लिम समाज में काम कर रहीं ब्रिटेन की कार्यकर्ता शाइस्ता गोहिर ने दावा किया है कि ऐसा बहुत सारी लड़कियों के साथ हो चुका है। गोहिर का दावा है कि एशियाई समाज की कुछ खास नस्लों में लड़कियों के साथ दुर्दांत सेक्स क्राइम हो रहे हैं, जिन्हें पुलिस अधिकारी जानबूझ कर नजर अंदाज कर देते हैं। इन अपराधों को समुदायों के नेता, स्कूल और परिवार तक नजर अंदाज कर रहे हैं।

अपनी रिपोर्ट में गोहिर ने ब्रिटेन के बर्मिंगम का एक केस स्टडी पेश किया है। इस केस में एक टीनएज गर्ल के साथ 6 घंटे तक 20 से 30 पुरुषों ने बलात्कार किया। बर्मिंगम की सिटी काउंसिल को सौंपी गई रिपोर्ट 35 पीड़ितों के साथ की गई बातचीत पर आधारित है। इस रिपोर्ट में सेक्स क्राइम करने वाले मर्दों का भी साक्षात्कार किया गया है।

रिपोर्ट के बहाने शाइस्ता गोहिर ने संबंधित अधिकारियों से अपील की है कि कुछ विशेष समुदायों में हो रहे इन अपराधों को उनका निजी मुद्दा मानकर नजरअंदाज न किया जाए बल्कि ऐसे मामलों में गंभीर कार्रवाई की जाना चाहिए। (एजेंसियां) sabhar :http://zeenews.india.com/

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देखिए, ‌कैसे दर्शकों को घर बैठे उत्तेजित करेगी ये लड़की

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Supermodel Helena Christensen 'seduces the a

डैनिश सुपर मॉडल हेलेना क्रिस्टेंसेन इस महीने वीएस मैग्जीन के कवर पेज पर दिखाई दी थी साथ ही इस मैग्जीन की वे गेस्ट एडिटर भी बनी थी। फोटोः डेली मेल



Supermodel Helena Christensen 'seduces the a

अब जल्द ही हेलेना दर्शकों को घर बैठे उत्तेजित करती नजर आएंगी।
अब जल्द ही हेलेना दर्शकों को घर बैठे उत्तेजित करती नजर आएंगी।

Supermodel Helena Christensen 'seduces the a


45 वर्षीय हेलेना एक शॉर्ट फिल्म में मादक अंदाज में लोगों को उकसाएंगी।हेलेना कहती हैं कि इस शॉर्ट फिल्म को बयां करने के लिए उनके पास शब्द नहीं हैं लेकिन फिर भी लोग उन्हें देखते ही एक्साइटेड हो जाएंगे।


Supermodel Helena Christensen 'seduces the a



इस फिल्म में हेलेना ने काफी उल्टे-सीधे पोज दिए हैं जो लोगों की इच्छाओं को जाग्रत करेंगे।

Supermodel Helena Christensen 'seduces the a


हेलेना ने इस शॉर्ट फिल्म का एक वीडियो भी जारी किया है। जिसमें वे किसी कॉल गर्ल से कम नहीं लग रही

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45 वर्षीय हे45 वर्षीय हेइस फिल्म में हेलेना ने काफी उल्टे-सीधे पोज दिए हैं जो


 लोगों की इच्छाओं को जाग्रत करेंगे।लेना एक शॉर्ट फिल्म में मादक अंदाज में लोगों को उकसाएंगी।


लेना एक शॉर्ट फिल्म में मादक अंदाज में लोगों को उकसाएंगी।



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दुनिया का सबसे खतरनाक पेड़ मौत का छोटा सेब

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दुनिया का सबसे खतरनाक पेड़, इसके पास जाना है मना
यह मैंचीनील नाम का पेड़ है और इसे दुनिया के सबसे जहरीले वृक्ष के तौर पर गिनीज ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज किया गया है। मैंचीनील इतना जहरीला है कि इसके पास भी जाना मना है।
सबसे खतरनाक माने जाने वाले पेड़ पर या उसके आसपास चेतावनी वाले बोर्ड और तख्तियां नजर आती हैं। बेहतर है कि लोग यह पढ़कर इससे दूरी बनाकर रखते हैं। इसके सेब जैसे दिखने वाले फल को यदि किसी ने खाया, तो यह उसे मौत की नींद जल्द सुला सकता है।
 इस विषैले पेड़ का नाम कैसे पड़ा मैंचीनील :
विज्ञान में आधिकारिक रूप से इसे Hippomane mancinella कहा जाता है। मैंचीनील (Manchineel) शब्द स्पेनिश के  Manzanilla से बना है। Manzanilla का अर्थ 'little apple' होता है।
कोलंबस ने मैंचीनील के फल को बताया था मौत का छोटा सेब :
माना जाता है कि क्रिस्टोफर कोलंबस ने मैंचीनील के सेब जैसे फल को 'manzanilla de l muerte' (मौत का छोटा सेब) का नाम दिया था।
वैज्ञानिक चख चुके हैं इसका स्वाद : एक रेडियोलॉजिस्ट निकोला एच स्ट्रिकलैंड ने ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित लेख में मैंचीनील के बारे में बताया है। उन्होंने इसके फल का स्वाद भी चखा था। स्ट्रिकलैंड ने बताया है कि टोबैगो के कैरेबियन द्वीप के बीच पर उन्हें एक गोलाकार फल पड़ा मिला था। यह एक काफी लंबे पेड़ से गिरा था। इसमें सिल्वर कलर तिरछी की लाइनें थीं। उन्होंने इसे उठाया और जरा सा खाया। उनके दोस्तों ने भी इसे थोड़ा खाया। बस, कुछ पलों के बाद मुंह में विचित्र ढंग का स्वाद महसूस हुआ और भारी जलन होने लगी। काटने वाली संवेदना हो रही थी और गला बुरी तरह अकडऩे लगा। दो घंटे तक उनकी स्थिति अधिक खराब रही। 8 घंटे बाद सूजन कम हुई। गले में सूजन के कारण वह दूध के अलावा कुछ भी नहीं ले पा रहे थे।
 
दुनिया का सबसे खतरनाक पेड़, इसके पास जाना है मना

दुनिया का सबसे खतरनाक पेड़, इसके पास जाना है मना

कितना है जहरीला : मैंचीनील के फल का रस भयंकर जहरीला औरकास्टिक (जलन पैदा करने वाला) होता है। यदि इसकी एक बंदू भी त्वचा पर गिर जाए तो यह बुरी तरह फट जाती है। स्किन में भारी सूजन और भयंकर जलन होती है। इसे जलाने पर निकला धुआं किसी को हमेशा के लिए अंधा कर सकता है। मतलब, यह पेड़ आपको हर तरह से नुकसान पहुंचा सकता है।किंवदंती  : स्पेन ने 16वीं शताब्दी में मैक्सिको और पेरू के इलाके जीत लिए थे। विश्व के सबसे जहरीले पेड़ मैंचीनील के बारे में यह किंवदंती प्रचलित है। स्पेन का जुआन पोन्स डी लियोन 1521 में फ्लोरिडा आया और दावा किया कि यहां उसने सोने के बड़े भंडार वाले इलाके की तलाश कर ली है। किंतु, यहां के लोग उसे यह जमीन देने के लिए तैयार नहीं थे। इसको लेकर स्थानीय लोगों और पोन्स डी लियोन के बीच संघर्ष हुआ। इसमें उसकी मौत एक जहरीले तीर से हुई थी। कहा जाता है कि इस तीर में मैंचीनील के विषैले रस का प्रयोग किया गया था। यह तीर उसके पैर में लगा था।
दुनिया का सबसे खतरनाक पेड़, इसके पास जाना है मना

सा होता है मैंचीनील : यह पेड़ करीब 50 फीट तक ऊंचा होता है। यह चमकदार दिखाई देता है। इसकी पत्तियां अंडाकार होती हैं। यह पेड़ लोगों को छाया और शुरुआती मिठास से ललचता है, लेकिन इसके परिणाम भयंकर हैं। सौभाग्य से इस सबसे खतरनाक पेड़ से कोई बड़ी दुर्घटना या मौत दर्ज नहीं हुई है।

कहां पाया जाता है : दुनिया का सबसे जहरीला पेड़ मैंचीनील फ्लोरिडा, कैरेबियन सागर के आसपास और बहमास में पाया जाता है। sabhar : bhaskar.com


 

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