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शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

कुछ मठ, मंदिर, चर्च और संत क्यों सदियों से रहस्य बने हैं

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जानें, क्यों सदियों से रहस्य बने हैं ये कुछ मठ, मंदिर, चर्च और संत

विज्ञान के युग में भी विश्व के विभिन्न धर्मों के लोगों का मंदिर, चर्च, मठ और संतों में  आस्था-विश्वास बरकार है। ये रहस्य और अलौकिक शक्तियों से संपन्न माने जा रहे हैं।विभिन्न धर्मों में कुछ बड़े संतों संतों की मौत के बाद लोग उनके शरीर की पूजा कर रहे हैं। वे इन धार्मिक स्थलों और संतों के चमत्कार के अनुभव का भी दावा करते हैं।
यह थाइलैंड के कोह सामुई द्वीप में स्थित यह वात खुनारम नाम का बौद्ध मंदिर है। श्राइन के अंदर स्थित मंदिर में एक बौद्ध संन्यासी लुआंग पारे डैइंग का ममीफाइड शव रखा है। 1973 में उनकी मौत के बाद से यह बॉडी रखी हुई है। इसे बहुत सुरक्षित ढंग से रखा गया है। बौद्ध संन्यासी की इच्छा थी कि मृत्यु के बाद उनके शरीर को सुरक्षित रखा जाए। इससे जीवन, मृत्यु और बुद्ध के मध्यम मार्ग की शिक्षा दी जा सके। वह अपने जीवन में ध्यान साधना के लिए विख्यात थे।
शरीर की आंखों को ढंकने के लिए एक चश्मा भी लगाया गया है। खास बात यह हैं कि उनका शरीर बहुत हद तक सुरक्षित है फिर भी एक गिरगिट उनके शरीर के अंगों पर घूमता रहता है। उसके अंडे बॉडी में दिखते हैं। बॉडी अब पहले जैसी स्थिति में नहीं है, फिर काफी हद तक यह सुरक्षित है।

जानें, क्यों सदियों से रहस्य बने हैं ये कुछ मठ, मंदिर, चर्च और संत

1- सेंट रॉच चैपेल, न्यू ओरलेआन्स, अमेरिका :
सेंट रॉच का जन्म 13 वीं शताब्दी के अंत में फ्रांस के समीप हुआ था। जब वह जन्मे तो उनकी सीने पर क्रास का चिन्ह था।20 वर्ष की उम्र में ही उनके मां-बाप की मौत हो गई थी। लोगों की सेवा के लिए वे कई देशों में गए थे।

सेवा : वह प्लेग पीडि़तों की सेवा करते करते स्वयं इससे पीडि़त हो गए थे। लेकिन वह प्लेग पीडि़तों की सेवा से पीछे नहीं हटे।
चमत्कार : अमेरिका की खाड़ी का इलाका वर्ष 1,800 में  पीले ज्वर से प्रभावित था। लोगों ने सेंट रॉच से बीमारी के प्रकोप से बचाने प्रेयर करने के लिए कहा था। इसके बाद इलाके में बीमारी तो आई, लेकिन एक भी मौत नहीं हुई।
जनआस्था : लोगों ने संत सेंट रॉच के चमत्कारों को देखते हुए उनके सम्मान में एक कैथेड्रल निर्मित करवाया। लोग आज भी यहां आकर अपने स्वस्थ होने की कामना करते हैं। जो भी व्यक्ति यहां आकर प्रार्थना करता है, उसे बीमारी से राहत मिलती है

जानें, क्यों सदियों से रहस्य बने हैं ये कुछ मठ, मंदिर, चर्च और संत

2-एमिएन्स कैथेड्रल फ्रांस:  13 वीं शताब्दी में बने इस कैथेड्रल में यहां सेंट जॉन का सिर रखा गया है। हेरोइडस ने उनकी हत्या कर दी थी और सिर में छेद भी कर दिया था। कहानी के अनुसार उन्हें कई साल तक यातनाएं दी गई थीं। कुछ समय के लिए उनका सिर खो गया था।
चमत्कार : बताया जाता है कि जब बैप्टिस्ट सेंट जॉन का सिर खो गया था तो उन्होंने किसी स्वप्न दिया। वह व्यक्ति मारासेलस था और उसने जहां बताया, वहां से उनका सिर की हड्डी मिल गई। इसे फिर चर्च में रखा गया लेकिन यह फिर खो गई। बताया जाता है कि फिर सेंट जॉन स्वप्न में आए और उन्होंने संकेत दिया। यह सिर कांस्टैंटनोपल में कई सदियों तक सुरक्षित रहा। इसे एक धर्मयोद्धा ने खोजा और फ्रांस के शहर एमिएन्स ले आया था। उसका नाम वॉलोन डी सार्टन था।
जानें, क्यों सदियों से रहस्य बने हैं ये कुछ मठ, मंदिर, चर्च और संत

3- जापान में नारा सिटी के बुद्ध की मूर्ति की नाक : जापान के नारा शहर में भगवान बुद्ध का यह मंदिर 752 में निर्मित किया गया था। इसका मुख्य हॉल दुनिया का सबसे विशाल लकड़ी से बनी बिल्डिंग है। इसका पुनर्निर्माण 1692 में किया गया था। भगवान बुद्ध की मूर्ति कांस्य से बनी हुई है। 15 मीटर ऊंची मूर्ति 129 किलो सोना और 437 टन कांस्य से बनी है।
लोक मान्यता: मूर्ति के पीछे एक विशाल लकड़ी का पोल है और इसके अंदर छेद है। यहां मान्यता है कि यहां मंदिर आपसे संवाद करने लगता है। पिलर का छेद मूर्ति की नाक की साइज का है। कहा जाता है कि इसे सही ढंग से फिट करने वाले को आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है। sabhar : bhaskar.com

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परग्रही सभ्यताओं के साथ संपर्क 20 साल के बाद

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परग्रही सभ्यताओं के साथ संपर्क 20 साल के बाद


अमरीका में परग्रही सभ्यता अनुसंधान एजेंसी के एक वैज्ञानिक सेट शोस्ताक ने कहा है कि परग्रही सभ्यताओं के प्रतिनिधि वर्ष 2040 में पृथ्वी के निवासियों के साथ संपर्क स्थापित करेंगे।

अमरीका के वैज्ञानिक ने बताया है कि हर पांचवें सितारे के चारों ओर कम से कम एक ऐसा ग्रह घूमता है जिस पर जीवन के लिए उपयुक्त वातावरण मौजूद हो सकता है। इसका मतलब यह है कि आकाशगंगा में हमारी पृथ्वी जैसे अरबों ग्रह मौजूद हो सकते हैं।
वैज्ञानिक के मुताबिक, अगर इन में से एक भी ग्रह पर हमारी पृथ्वी जैसा जीवन मौजूद है और वहां भी विकास का स्तर हम जैसा ही है तो उस ग्रह के निवासी धरती से रेडियो संकेत प्राप्त कर सकते हैं और इन संकेतों का जवाब भी दे सकते हैं।

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मनुष्यों और पशुओं के बीच संकरण: एक भावी ख़तरा

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मनुष्यों और पशुओं के बीच संकरण: एक भावी ख़तरा

कई देशों के वैज्ञानिक मनुष्यों और जानवरों के विचित्र संकर तैयार कर रहे हैं, इस प्रकार से तैयार किये गए संकर समाज पर कहर बरपा सकते हैं| पिछले दस वर्षों के दौरान जेनेटिक इंजीनियरिंग में हुई प्रगति ने वैज्ञानिकों और आम आदमी को स्तब्ध कर छोड़ा है|

छात्रों के लिये भी नए जीवन रूपों का सृजन आज घर बैठे करना संभव है| अफ़सोस यह है कि क़ानून वैज्ञानिकों के साथ तालमेल रखने में पिछड़ जाता है|
जीवन के यह नए रूप वैसे तो गैरकानूनी नहीं हैं, लेकिन उनसे समाज के लिये खतरा हो सकता है| इन नए रूपों की नस्ल पैदा होने की स्थिति में क्या होगा विषय पर आज कोई कुछ नहीं बता सकता है, लेकिन इसके बावजूद भी सारी दुनिया के वैज्ञानिक दुनिया के लिये अपनी नई रचनाएँ प्रस्तुत करने की जल्दी में लगे हुए हैं; ऐसी रचनाएँ जिनकी कल्पना करना भी कुछ समय पहले तक असंभव था|
वैज्ञानिकों द्वारा कृत्रिम मानव गुणसूत्र से बनाए गए चूहे इसका एक उदाहरण हैं| इस रचना को एक बड़ी सफलता माना जा रहा है, क्योंकि आशा की जा रही है कि इनसे कई बीमारियों के इलाज के लिये नए रूपों को जन्म दिया जा सकेगा| Lifenews.com के अनुसार विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक चूहों के दिमाग में मानव भ्रूण की कोशिकाओं की रोपाई में बड़ी सफलता हासिल कर चुके हैं| इन कोशिकाओं का विकास होने पर चूहों की बुद्धिक्षमता में विकास नज़र आया है| यह चूहे भूलभुलैया में भी रास्ता ढूंढ सकते हैं और पहले की तुलना में अधिक जल्दी संकेतों को सीख सकते हैं|
यहाँ यह प्रश्न उठता है: मानव ऊतकों के जानवरों में प्रत्यारोपण से लाभ ज़्यादा हैं या हानि? अभी ही यह स्पष्ट हो चुका है कि पशुओं में मानव अंगों का विकास अब कोई विज्ञान-कथा नहीं बल्कि शुद्ध वास्तविकता है| जापान के वैज्ञानिक मानव अंगों के विकास के लिये सुअरों का उपयोग कर रहे हैं; इस प्रक्रिया में लगभग एक साल लगता है| Infowars.com के अनुसार इस अभ्यास का मुख्य लक्ष्य चिकित्सा प्रयोजनों के लिये मानव अंगों की संख्या में वृद्धि करना है| लेकिन जापान की सरकार के उद्देश्य बिलकुल अलग हैं; वर्तमान में वह भ्रूण से सम्बंधित अनुसंधान को संभव बनाने के लिये नियम बना रही है|
Thetruthwins.com का कहना है कि जिन सूअरों के भीतर मानव अंगों का विकास किया जाता है, वह सूअर शत प्रतिशत सूअर नहीं रह जाते हैं| वैसे ही सुअरों में विकसित अंग शत प्रतिशत मानव अंग नहीं होते हैं| इस प्रकार के अंगों के प्राप्तकर्ताओं को संकरित अंगों के आरोपण की सहमति देनी होगी|
संकरित रूपों की रचना मानवजाति के लिये ख़तरा हो सकती है| ऐसे संकरों पर नियंत्रण खोने से होने वाले परिणामों की भविष्यवाणी में असमर्थता भी एक बहुत बड़ा ख़तरा है|
सबसे अधिक चौंकाने वाली बात यह है कि अधिकतर देशों में इस प्रकार के नए रूपों के निर्माण पर प्रतिबन्ध नहीं हैं| इस प्रकार से बनाए गए जीव के कारण किसी दूसरे प्राणी को पहुँचने वाली हानि के लिये किसी भी प्रकार की सज़ा के प्राविधान भी नहीं हैं|
दुनिया में ऐसी धारणा भी प्रबल है कि मानव अंगों के विकास के लिये जानवरों का इस्तेमाल प्रकृति की संरचना को नष्ट करने का एक और तरीका है| वर्ष 2011 में डेलीमेल में ब्रिटेन के उन वैज्ञानिकों के बारे में खबर छपी थी, जिन्होंने मनुष्यों और पशुओं के संकरण से 150 से अधिक भ्रूण तैयार किये थे| उस समय इस खबर ने किसी को विचलित नहीं किया था|
पत्रिका स्लेट ने ऐसे दूसरे अनुसंधानों के बारे में लिखा था| मनुष्य का दूध देने वाली बकरी और वैज्ञानिकों द्वारा जानवरों के लिये मानव प्रतिरक्षा तंत्र विकसित करने की ख़बरें कुछ ऐसी ख़बरें थीं| यह मात्र वह परियोजनाएं हैं जिनके बारे में हमें पता है| संभव है कि ऐसी और परियोजनाएं भी हैं, जिनके बारे में हमें कुछ पता नहीं है| मानुष और पशु का संकरण संभव है| इस प्रकार के संकरण से होने वाले लाभ और उससे संभावित खतरों के बारे में व्यापक पैमाने पर बहस जारी रहनी चाहिए| sabhar :http://hindi.ruvr.ru/

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आपकी आत्मा का रंग कैसा है

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what is colour of atma


यह दुनिया रंग-बिरंगी या कहें कि सतरंगी है। सतरंगी अर्थात सात रंगों वाली। लेकिन आत्मा का कोई रंग पता नहीं चला है।

ध्यान, धारणा, समाधि और पूजापाठ से लेकर मृत्यु के बाद वापस शरीर में लौटे लोगों तक आत्मा और परलोक के अनुभव बताते हैं पर उसका रंग कोई नहीं बताता।

अध्यात्म विज्ञान की दिशा में शोध प्रयोग कर रहे कुछ अनुसंधान करने वालों ने इस दिशा में काम शुरु किया है। इस तरह के प्रयोगों में लगे पांडीचेरी के प्रो. के सुंदरम ने कहा है कि आत्मा का भी रंग होता है।

रंगों का विश्लेषण करते हुए प्रो. सुंदरम का कहना है कि मूलत: पांच तरह के रंग ही होते हैं, जैसे काला, सफेद, लाल, नीला और पीला। इनमें भी काला और सफेद कोई रंग नहीं है। रंगों की अनुपस्थिति काला रंग बनता है और सभी रंगों की उपस्थिति सफेद रंग का आभास कराता है।

इस तरह तीन ही रंग प्रमुख हो जाते हैं- लाल, पीला और नीला। अध्ययन और प्रयोगों को आगे बढ़ाते हुए प्रो, सुंदरम और उनके सहयोगियों ने शरीर में मौजूद सात चक्रों का रंग रुप भी खंगाला। चक्रों पर किए प्रयोग के बाद उन्होंने कहा है कि आत्मा का रंग या तो नीला होता है अथवा आसमानी।

नीले रंग को वे थोड़ा निरस्त भी करते हैं क्योकि प्रकाश के रुप में आत्मा ही दिखाई पड़ती है और पीले रंग का प्रकाश आत्मा की उपस्थिति को सूचित करता है। धरती पर पचहत्तर प्रतिशत जल ही फैला है और जहां भी वह घनीभूत होता है वहां आकाश का रंग प्रतिबिंबित होने के कारण पानी का रंग नीला दिखाई देता है।

ध्यान में हुए अनुभवों और सपनों में दिखाई देने वाले उदास रंगों के आधार पर उन्होंने कहा है कि आत्मा का रंग आसमानी है। कुछ मनीषी मानते हैं कि नीला रंग आज्ञा चक्र का और आत्मा का रंग है।

आज्ञाचक्र शरीर का आखिरी चक्र है। यह सात में से छठा है, सातवां सहस्रार चक्र शरीर और आत्मा के बीच सेतु का काम करता है। उसका अपना कोई रंग नहीं है। इसलिए नीला और आसमानी रंग ही आत्मा का रंग कहा जा सकता है। sabhar :http://www.amarujala.com/

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ह्यूमन लंग्स लैब में

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लैब में ह्यूमन लंग्स तैयार, लेकिन करना होगा सालों इंतजार

वैज्ञानिकों ने पहली बार लैब में ह्यूमन लंग्स बनाने में सफलता हासिल की है। मानव शरीर के अंगों के तैयार करने की दिशा में यह एक उत्साहजनक कदम है। हालांकि, इसे इंसान के शरीर में प्रत्यारोपित करने में कई साल का वक्त लगेगा। अनुमान है कि इसमें 12 साल तक का वक्त और लग सकता है। अमेरिकी वैज्ञानिकों ने मेडिकल के क्षेत्र में यह बड़ी कामयाबी हासिल की है।
लैब में ह्यूमन लंग्स तैयार, लेकिन करना होगा सालों इंतजार
यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास मेडिकल ब्रांच की जोआन निकोलस ने कहा कि यह अभी तक एक साइंस फिक्शन रहा है, लेकिन वे इसे वैज्ञानिक तथ्य बनाने की ओर आगे बढ़ रहें हैं। यदि लंग्स काम करने लगें, तो यह बड़ी उपलब्धि होगी। इससे लंग्स ट्रांसप्लांट का इंतजार कर रहे 1,600 अमेरिकियों को बहुत मदद मिलेगी। लैब में तैयार किया गया नया मानव अंग फेफड़ा भी है। इससे पहले श्वांस नली और लीवर तैयार किए जा चुके हैं।
लैब में ह्यमून लंग्स ऐसे तैयार:
डॉक्टर निकोलस ने बताया कि दो बच्चे जो कार एक्सीडेंट में मारे गए थे। उनके लंग्स भी क्षतिग्रस्त हो गए थे, लेकिन इनमें कुछ स्वस्थ ट्श्यिू भी थे। इनका उपयोग ट्रांसप्लांट किया जाना था। उन्होंने बताया कि लंग्स से सारी सेल्स अलग की और उसके ढांचे को अलग कर दिया। अब इसमें कोई भी सेल्स नहीं बची थी। इसके बाद उन्होंने दूसरी बॉडी के फेफड़ों से कुछ सेल्स लेकर इस ढांचे से जोड़ दी।
तकनीक से मिली मदद :
इन लंग्स के तैयार होने में कई महीने का वक्त लग सकता था, लेकिन यूटीएमबी मेडिकल के छात्र डॉक्टर माइकल रिडल ने एक ऐसा उपकरण तैयार किया, जिससे लंग्स के तैयार होने की प्रक्रिया तेज हो गई। मेडिकल टीम ने बताया कि सेल्स को लंग्स के ढांचे में विकसित करने में चार माह तक का समय लगता, लेकिन सिर्फ तीन दिन में इस प्रक्रिया में परिणाम आ गए।
डॉक्टर जोआन निकोलस ने बताया कि उन्हें दुनिया को इस बारे में बताने में एक साल का समय लगा कि वास्तव में एक अच्छा काम किया है।
डॉक्टर निकोलस ने बताया कि लैब में तैयार किए गए फेफड़ों को सबसे पहले सूअर को प्रत्यारोपित किया जाएगा। इस पर कम से कम दो साल तक काम किया जाएगा।

यूनिवसिर्टी ऑफ पिट्सबर्ग के मैकगोवेन इंस्टिट्यूट फॉर रिजनरेटिव मेडिसिन के निदेशक डॉक्टर स्टीफन बैडलाक ने कहा कि यह संपूर्ण अंग की इंजीनियरिंग अंग दानदाता की कमी को दूर करने का काम कर रही है। sabhar : bhaskar.com

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शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

ईरान की राष्ट्रीय महिला फुटबॉल टीम में महिलाओं के रूप में अब तक चार पुरुष खिलाड़ी खेल रहे थे

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महिला जैसे दिखने वाले पुरुषों से कहा- पहले सेक्स चेंज करो तभी खेलोगे टीम में


ईरान में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहां की राष्ट्रीय महिला फुटबॉल टीम में महिलाओं के रूप में अब तक चार पुरुष खिलाड़ी खेल रहे थे। मामले के खुलासे के बाद अब इन चारों खिलाड़ियों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। इतना ही नहीं, टीम में वापसी के लिए इनसे एक शर्त भी रखी गई है। शर्त के मुताबिक, अगर ये अपना लिंग परिवर्तन करवाते हैं, तभी इन्हें टीम में वापस जगह मिलेगी। 
 
वहीं, सभी महिला खिलाड़ियों को अब क्लब में शामिल होने से पहले लिंग परीक्षण करवाना होगा। अब खेल के मैदान में आकस्मिक जांच कभी भी की जा रही है। इसका नतीजा ये हुआ है कि सात खिलाड़ियों ने अपना अनुबंध रद्द करा दिया है। 
 
प्रतिबंध लगाए गए कुछ खिलाड़ियों में ऐसे हैं, जिनमें कुछ यौन गड़बड़ियां हैं। वहीं, कुछ खिलाड़ियों में महिलाओं और पुरुष दोनों के लक्षण हैं। 

महिला जैसे दिखने वाले पुरुषों से कहा- पहले सेक्स चेंज करो तभी खेलोगे टीम में


ईरानी फुटबॉल फेडरेशन की मेडिकल टीम के प्रमुख अहमद हश्मियां ने बताया कि अगर ये खिलाड़ी सर्जरी के जरिए अपनी परेशानी खत्म कर लेते हैं या जरूरत के मुताबिक, मेडिकल मदद ले लेते हैं, तो वो फिर से उन्हें महिला फुटबॉल टीम में जगह मिल जाएगी। 

महिला जैसे दिखने वाले पुरुषों से कहा- पहले सेक्स चेंज करो तभी खेलोगे टीम में

ईरान में समलैंगिकता और शादी से पहले सेक्स पर पाबंदी है, लेकिन बावजूद इसके खिलाड़ियों को सर्जरी कराने की अनुमति दी गई है।  sabhar : bhaskar.com




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गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

टीना घई एक बेहतरीन कलाकार

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पंजाब मे जन्मी टीना घई एक बेहतरीन अदाकारा है इन्होने हिन्दी , पंजाबी , भोजपुरी , राजस्थानी , तेलुगू , तुलु , कन्नड़ , हरयाणवी , बंगाली और अंग्रेजी जैसी भाषाओं में गाया है विभिन्न प्रिंट और टीवी विज्ञापनों में चित्रित किया गया है . इसके अलावा  दुनिया भर में लगभग 400 शो में लाइव प्रदर्शन करने के बाद का गौरव प्राप्त है |. हिन्दी गाने के कई एल्बम यू  ट्यूब  पे उपलब्ध  है  जल्दी ही इनकी कई  फिल्मे  और एल्बम आने वाली है  इतनी बड़ी कलाकार होने के बाद भी  ये फ़ेसबुक  पे अपने  फैन्स  के बीच सहज  संबाद स्थापित  करती है  |,नीचे कुछ फोटोग्राफ्स  उनकी टीना घई डाट काम वेब  से ली गयी है |



























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बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

(डॉ. सोनल मानसिंह)-प्रतिष्ठित भारतीय शास्त्रीय नर्तक

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(((जिंदगी के सफर में महिलाओं को कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ता है.....

....नृत्यांगना सोनल मानसिंह, जिन्होंने जिंदगी में बहुत मुश्किल फैसले लिए और मुश्किल दौर से दो.चार भी हुईं। 

....नृत्यांगना सोनल मानसिंह ऐसी शख्सियत हैं जिन्होंने नृत्य के लिए घर छोड़ा सफलता कदम चूमने लगी तभी सड़क हादसे से की वजह से कदम थम गए। लेकिन डॉक्टरों की कड़ी मेहनत अपनी जबरदस्त हिम्मत और आत्मविश्वास की वजह से वह जल्द ही मंच पर थिरकती नजर आईं।
.....शादी के बाद सोनल ने नृत्य के ख़ातिर अपना घर छोड़ा और ख़ानाबदोश की ज़िंदगी अपनाई।
......सोनल के अनुसार पुरुषों की दुनिया में एक महिला और वह भी एक डाँसर का जीना कोई आसान बात नहीं हैं। आप जिसके शिकंजे से बचे। उसी व्यक्ति ने आपको नज़रअंदाज़ करना शुरु कर दिया। मगर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपनी पहचान बनार्इ।




डॉ. सोनल मानसिंह पद्म विभूषण, एक मशहूर और प्रतिष्ठित भारतीय शास्त्रीय नर्तक, गुरु, कोरियोग्राफर और एक प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता, शोधकर्ता और प्रेरक वक्ता है ।

Sonal Mansingh: the finest classical Indian dancer

नृत्यांगना सोनल मानसिंह ऐसी शख्सियत हैं जिन्होंने नृत्य के लिए घर छोड़ा, सफलता कदम चूमने लगी, तभी सड़क हादसे से की वजह से कदम थम गए। लेकिन डॉक्टरों की कड़ी मेहनत अपनी जबरदस्त हिम्मत और आत्मविश्वास की वजह से वह जल्द ही मंच पर थिरकती नजर आईं।

Sonal Mansingh: the finest classical Indian dancer

सोनल मानसिंह के दादाजी आज़ादी के आन्दोलन में गाँधी जी के साथ थे। आज़ादी के बाद वह गवर्नर बने। माता जी कस्तूरबा के साथ जेल में रहीं।>>

Sonal Mansingh: the finest classical Indian dancer


सोनल को बचपन से ही नृत्य का शौक था। जब उनके पिताजी पखावज बजाते थे। तो उनके पैर थिरकने लगते थे। अपनी इसी शौक को उन्होंने करियर बना लिया।
Sonal Mansingh: the finest classical Indian dancer

शादी के बाद सोनल ने नृत्य के ख़ातिर अपना घर छोड़ा और ख़ानाबदोश की ज़िंदगी अपनाई।सोनल पांच महाद्वीपों पर दुनिया के 87 देशों में नृत्य किया गया है।

Sonal Mansingh: the finest classical Indian dancer

सोनल के अनुसार पुरुषों की दुनिया में एक महिला और वह भी एक डाँसर का जीना कोई आसान बात नहीं हैं। आप जिसके शिकंजे से बचे। उसी व्यक्ति ने आपको नज़रअंदाज़ करना शुरु कर दिया। मगर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपनी पहचान बनार्इ।

Suchitra Singh

sabhar :http://www.niticentral.com/





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सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

एक गोभी के एक पौधे में एक साथ 12 फूल निकल आए

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कुदरत का करिश्‍मा : गोभी के एक पौधे में उगे 12 फूल

महराजगंज (उप्र) : इसे कुदरत का करिश्मा कहें या रासायनिक खादों का बुरा प्रभाव कि एक गोभी के एक पौधे में एक साथ 12 फूल निकल आए, जिसे देखकर लोग चकित हैं। 

क्षेत्र के बावन बुजुर्ग बल्ला स्थित जवाहर नवोदय विद्यालय के शिक्षक आरके विश्वकर्मा ने अपने घर के पास क्यारी में फूलगोभी की नर्सरी लगाई थी, जिसमें यह अनोखा फूल खिला देख स्कूल के छात्र व अध्यापक चकित रह गए। एक ही तने में एक साथ 12 फूल खिलने की खबर जैसे ही फैली, देखने वालों का तांता लग गया। चर्चा रही कि गोभी के एक पौधे में 12 फूल आना कुदरत का करिश्मा है। (एजेंसी) sabhar :http://zeenews.india.com/

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मुक्ति और ईश्वर की भक्ति

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why you forget me god?


मुक्ति पाने के लिए खुद को अज्ञानी और बुद्घिहीन क्यों कहते हैं भक्त


ऋषि-मुनियों, संत-महात्माओं तथा भक्तों ने भगवान से अपने अवगुणों को अनदेखा कर शरण में लेने की प्रार्थना की है। संत कवि सूरदास प्रभु मेरे अवगुण चित न धरोपंक्तियों में विनयशीलता का परिचय देते हुए शरणागत करने की प्रार्थना करते हैं, तो तुलसीदास प्रभु राम से पूछते हैं, काहे को हरि मोहि बिसारो।

संत पुरंदरदास खुद को दुर्गुणों का दास बताते हुए ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर कहते हैं- कूट-कूटकर मुझमें भरे हुए हैं दुर्गुण, नहीं किया पर तुमने मेरा छिद्रान्वेषण।गुरु नानकदेव जी मात्र भगवान श्रीराम को विपत्ति का साथी बताते हुए कहते हैं- संग सखा सभि तज गए, कोई न निबाहियो साथ, कहु नानक इह विपत्ति में, टेक एक रघुनाथ।
रवींद्रनाथ ठाकुर गीतांजलि में प्रार्थना करते हैं, भगवान अपनी चरण-धूलि के तल में मेरे शरीर को नत कर दो। मेरे समस्त अहंकार को अपने दिव्य नैनों के जल में डुबो दो। मैं चाहता हूं चरम शांति, अपने प्राणों में तुम्हारी परम कांति। तुम मेरे हृदय कमल दल में वास कर जाओ।

महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला निखिल वाणी में प्रभु से याचना करते हैं, दुरित दूर करो नाथ, अशरण हूं गहो हाथ। अर्चना में वह कहते हैं, जब तक शत मोहजाल, घेर रहे हैं कराल, जीवन के विपुल व्याल, मुक्त करो विश्वनाथ।
सभी शास्त्रों में विनयशीलता और अहंकारशून्यता को ईश्वर की भक्ति प्राप्त करने का साधन बताया गया है।

मुक्ति पाना चाहते हैं, रामकृष्ण परमंस की यह बात गांठ बांध लें।


the idea of salvation is abandoned of 'I'

एक सज्जन स्वामी रामकृष्ण परमहंस के पास सत्संग के लिए पहुंचे। बातचीत के दौरान उन्होंने पूछा, महाराज, मुक्ति कब होगी? परमहंस जी ने कहा, जब 'मैं' चला जाएगा। 'मैं' दो तरह का होता है- एक पक्का और दूसरा कच्चा।

स्वामी जी ने आगे कहा, जो कुछ मैं देखता, सुनता या महसूस करता हूं, उसमें कुछ भी मेरा नहीं, यहां तक कि शरीर भी नहीं। मैं ज्ञानस्वरूप हूं, यह पक्का मैं है। यह मेरा मकान है, यह मेरा पुत्र है, यह सब सोचना कच्चा मैं है।

स्वामी जी कहते हैं, जिस दिन यह दृढ़ विश्वास हो जाएगा कि ईश्वर ही सब कुछ कर रहे हैं, वह यंत्री है और मैं यंत्र हूं, तो समझो, यह जीवन मुक्त हो गया। जिस प्रकार धनिकों के घर की सेविका मालिकों के बच्चों को अपने ही बच्चों की तरह पालती-पोसती है, पर मन ही मन जानती है कि उन पर उसका कोई अधिकार नहीं है, उसी प्रकार हम सबको बच्चों की तरह प्रेम से पालन-पोषण करते हुए भी विश्वास रखना चाहिए कि इन पर हमारा कोई अधिकार नहीं है।

हमें कई बार भव्य धर्मशाला में कुछ दिन ठहरने का अवसर मिलता है, किंतु उसके प्रति यह भाव नहीं आता कि यह मेरी है, उसी प्रकार जगत को धर्मशाला मानकर यह सोचना चाहिए कि हम कुछ समय के लिए ही इसमें रहने आए हैं। यहां व्यर्थ की मोह, ममता व लगाव रखने से कोई लाभ नहीं होगा।

जब कृष्ण के भक्त को मंदिर के जूठे बर्तन साफ करने पड़े


Sant ji cleaned utensils

ब्रह्मनिष्ठ संत स्वामी दयानंद गिरि शास्त्रों के प्रकांड ज्ञाता थे। वह अक्सर कहा करते थे कि मनुष्य हर प्रकार के अभिमान से दूर रहकर सदैव विनम्रता का व्यवहार करे। एक बार स्वामी जी नाथद्वारा (राजस्थान) पहुंचे।

श्रीनाथ जी के दर्शन के बाद वह भिक्षा (भोजन) प्राप्त करने मंदिर के भंडारे में पहुंचे। वहां भोजनालय का प्रबंधक किसी से कह रहा था, आज बर्तन साफ करनेवाला कर्मचारी नहीं आ पाया है। ऐसी स्थिति में क्या होगा? स्वामी जी ने जैसे ही यह सुना, तो वह जूठे बर्तन साफ करने में जुट गए। भंडारे का व्यवस्थापक और अन्य संतगण उनकी सेवा भावना से बहुत प्रभावित हुए।

उसी शाम मंदिर के सभागार में विद्वानों के बीच संस्कृत में शास्त्र चर्चा का आयोजन था। इसमें अनेक संत और विद्वान भाग ले रहे थे। स्वामी दयानंद गिरि एक कोने में जा बैठे। उन्होंने चर्चा के बीच में खड़े होकर विनयपूर्वक कहा, आप लोग प्रश्न का उच्चारण ठीक ढंग से नहीं कर रहे। उन्होंने शुद्ध उच्चारण भी बता दिया।

मंदिर समिति के अध्यक्ष ने देखा कि यह तो वही संत है, जो थोड़ी देर पहले जूठे बर्तन साफ कर रहा था, तो वह हतप्रभ रह गया। जब उसे पता चला कि वह स्वामी दयानंद गिरि महाराज हैं, तो वह उनके चरणों में गिरकर क्षमा मांगने लगा। स्वामी जी ने कहा, श्रीनाथ जी के भक्तों के जूठे बर्तन धोकर मैंने पूर्व जन्म के संचित पापों को ही धोया है। साधु के लिए कोई भी काम बड़ा या छोटा नहीं होता।




शिवकुमार गोयल
 sabhar :http://www.amarujala.com/

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दर्द से कामुकता का रिश्ता

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हाथों को बांधकर शरीर को पूरे नियंत्रण में ले आना और फिर जो चाहे करना, मारना कभी चांटों से, कभी चाबुक से, कभी चमड़े की बेल्ट से, यहां तक की पॉलिथीन से मुंह को ऐसे दबाना कि सांस ना आए, लेकिन पम्मी को, ये सब कामोत्तेजक लगता है.
पम्मी के मुताबिक संभोग के दौरान उत्तेजित करने जैसे अनुभव से ये कहीं आगे है, क्योंकि ये दर्द के लेन-देन और ताकत की अभिव्यक्ति का अनोखा खेल है जो कामुकता को एक नए मुकाम तक ले जाता है.

दिल्ली की एक निजी कंपनी में काम कर रहीं, 28 वर्षीय पम्मी कहती हैं, “हम अधीन रहना पसंद करते हैं, इस तरह के बर्ताव से हमें दर्द नहीं होता, बल्कि हम आनंद लेते हैं और हमारे पार्टनर को हर वक्त ज़िम्मेदारी से सोचना होता है कि कहीं हद पार ना हो जाए और मुझे चोट ना लगे.”इस जीवनशैली में एक शख्स ‘डॉमिनेन्ट’ यानि प्रधान है और दूसरा ‘सबमिसिव’ यानि अधीन है. पहले का हक है अपना ज़ोर आज़माना और दूसरे की ज़िम्मेदारी है उस शक्ति प्रदर्शन को बर्दाश्त करना.
इस जीवनशैली के बारे में जानकारी बढ़ाने के लिए पम्मी 'द किंकी कलेक्टिव' नाम की संस्था से जुड़ीं है. ये संस्था भारत के विभिन्न हिस्सों में जाकर लोगों के बीच इस विषय पर जागरुकता बढ़ा रहा है.
इसके अलावा पिछले दिनो इस जीवन शैली पर आधारित किताब "फिफ्टी शेड्स आफ ग्रे" ने पूरी दुनिया में चर्चा बटोरी और दिल्ली में इस किताब को एक ग्रुप ने मंचित भी किया. यौन व्यवहार पर जहां खुल कर बात तक नहीं होती वहां ऐसे विषय को मंचित करना और ऐसी संस्था का गठित होना क्या भारत में एक नई धारा का सूचक है ?

शक्ति इतनी की रोमांच हो पर चोट ना लगे

‘बीडीएसएम’ के नाम से जानी जाने वाली ये जीवनशैली, पम्मी की ही पसंद नहीं है, 48 वर्षीय जया भी दो साल से अपने जीवन को ऐसे ही जी रही हैं.
जया पिछले 28 वर्षों से महिलाओं के मुद्दों पर काम कर रही हैं और यौन हिंसा के खिलाफ हैं, लेकिन अपने जीवन में ऐसे हिंसा को गलत नहीं मानती.

क्या है बीडीएसएम?

  • बॉन्डेज एंड डॉमिनेशन - बन्धन और प्रभुत्व
  • डिसिप्लिन एंड सबमिशन - अनुशासन और आत्मसमर्पण
  • सेडोमैसोकिज़म - दर्द देकर खुशी पाना
जया कहती हैं, “ये हिंसक नहीं है, बल्कि ये जीवनशैली बहुत अलग है, क्योंकि इसका नियम तय है - ज़ोर-आज़माइश आप तभी कर सकते हैं जब दोनों की रज़ामंदी हो - यानि शक्ति का इस्तेमाल उतना जो रोमांच दे पर चोट ना पहुंचाए.”
पम्मी के मुताबिक जिस्मानी रिश्ते का ये रोमांच उनकी रूहानी ज़रूरतें भी पूरी करता है.
दरअसल पम्मी समलैंगिक हैं और खुद को मर्दाना मानती हैं, लेकिन अपने रिश्ते में वो ‘नाचीज़’ होना पसंद करती हैं, “दुनिया मुझे एक मर्द की तरह हमेशा ताकतवर देखना चाहती है, लेकिन जब अपने रिश्ते में मैं खुलकर अपनी पार्टनर को मुझपर हावी होने देती हूं तो ये मुझे अपनी कोमल स्त्रीयोचित भावना को ज़ाहिर करने की आज़ादी देता है.”
पम्मी की जीवनसाथी सारा बताती हैं कि शक्ति का प्रदर्शन सिर्फ संभोग के समय ही काम नहीं करता, अगर युगल चाहे तो ये चौबीसों घंटे झलक सकता है.
उदाहरण के तौर पर सारा कहती हैं, “पैर धोना, पैरों पर गिरकर पूजा करना, कपड़े मेरी पसंद के ही पहनना, खाना खाने से पहले या शौचालय तक जाने से पहले अनुमति लेना, औरों के सामने उसे नीचा दिखाना ये भी इस जीवनशैली का हिस्सा है.”
"ये हिंसक नहीं है, क्योंकि इसका नियम तय है - ज़ोर-आज़माइश आप तभी कर सकते हैं जब दोनों की रज़ामंदी हो - यानि शक्ति का इस्तेमाल उतना जो रोमांच दे पर चोट ना पहुंचाए."
जया, 'द किंकी कलेक्टिव'
ज़ोर-ज़बरदस्ती या रज़ामंदी?
भारत के जाने-माने सेक्सोलॉजिस्ट डॉक्टर नारायण रेड्डी बताते हैं कि इस जीवनशैली से जुड़े लोग उनके पास भी आते रहे हैं, हालांकि ये पिछले 20 सालों में उनके पास आए कुल लोगों का एक फीसदी ही होंगे.
उन्होंने कहा कि उनके पास आए मरीज़ों में से ज़्यादातर की उम्र 30 से 50 वर्ष के बीच रही है और ये मध्यम या उच्च वर्ग के परिवारों से थे.
डॉ. रेड्डी के मुताबिक उनके पास जो लोग आए, वो तो अपने पार्टनर की यौन हिंसा की शिकायत लेकर आए - सिगरेट से जलाना, दांत से काटना, सुंई चुभोना, चेन से बांधना, कुत्ते का पट्टा बांधकर घुमाना, नीचा दिखाना - यानि एक व्यक्ति इस तरह की जीवनशैली की चाहत रखता था, और दूसरे को ये नापसंद थी, और इसलिए वो उनके पास मदद मांगने आए.
डॉ रेड्डी कहते हैं, “किसी रिश्ते में काम उत्तेजना अगर सिर्फ चोट या दर्द पहुंचाने से ही पैदा हो तो उसे ‘सेक्सुअली प्रोब्लमाटिक बिहेवियर’ कहेंगे, क्योंकि ये लंबे दौर में परेशानी पैदा कर सकता है, शुरू में इसका नयापन रोमांच पैदा कर सकता है लेकिन कुछ समय में ये शारीरिक दर्द पैदा कर सकता है और मानसिक तौर पर भी चोटिल कर सकता है.”

ब्रितानी लेखिका ई एल जेम्स की ये किताब भारत में भी बहुत लोकप्रिय हुई है.
डॉ रेड्डी ये भी सवाल पूछते हैं कि असल ज़िन्दगी में अपने जीवनसाथी की ऐसी चाहत हां या ना कहने की स्वतंत्रता असल मायने में कितने लोगों को होती है?
पम्मी, सारा, जया और उनके दोस्तों के मुताबिक वो इन शंकाओं से भली-भांति वाकिफ़ हैं, इसीलिए करीब एक साल पहले उन्होंने इस जीवनशैली के बारे में जानकारी बढ़ाने के लिए एक संगठन बनाया – ‘द किंकी कलेक्टिव’.

‘द किंकी कलेक्टिव’

बीडीएसएम जीवनशैली दुनिया के कई देशों में अब कोई छिपी बात नहीं है, लेकिन भारत में इसकी जानकारी इंटरनेट के माध्यम से ही फैली है. इस विचारधारा के लोग और साथियों को ढूंढने में सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों का प्रयोग करते हैं.
भारत में ऐसी जीवनशैली को आज़माने वाले लोगों की संख्या का अंदाज़ा लगाना बहुत मुश्किल है, क्योंकि उनकी सोच को अक्सर ग़लत या मानसिक तौर पर बीमार तक समझा जाता है.
जया बताती हैं कि इंटरनेट बिना पहचान ज़ाहिर किए मिलने का एक बेहतरीन तरीका बनकर उभरा है और दिल्ली में ही एक सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट पर बने ग्रुप के करीब 2,600 सदस्य हैं. ऐसी कई वेबसाइट और ग्रुप हैं जिन्हें गूगल और फेसबुक के ज़रिए आसानी से ढूंढा जा सकता है.
इस जीवनशैली पर बहस और जानकारी के लिए ना कोई आम चर्चा का मंच है ना ही माहौल. जया के मुताबिक इसी कमी को दूर करने के लिए उन्होंने ये संगठन बनाने फैसला किया.
"किसी रिश्ते में काम उत्तेजना अगर सिर्फ चोट या दर्द पहुंचाने से ही पैदा हो तो उसे ‘सेक्सुअली प्रोब्लमाटिक बिहेवियर’ कहेंगे, क्योंकि ये लंबे दौर में परेशानी पैदा कर सकता है,"
डॉ. नारायण रेड्डी, सेक्सोलॉजिस्ट
इसके ज़रिए वो मानसिक रोगों की पढ़ाई कर रहे छात्रों, मानवाधिकार सम्मेलन, महिलाओं के मुद्दों पर काम कर रहे आंदोलनकारियों वगैरह के बीच अपनी बात रख चुके हैं.
सारा बताती हैं, “हमारा मकसद ये भी है कि इस जीवनशैली को अपना रहे लोगों को बता सकें कि इसके अपने कायदे-कानून हैं, मसलन, रज़ामंदी कितनी ज़रूरी है और ताकतवर को ज़िम्मेदार होना आवश्यक है.”
कामसूत्र समेत भारत के पौराणिक ग्रंथों में कामुकता का अध्ययन कर कई किताबें लिख चुकी संध्या मूलचंदानी इस जीवनशैली से परिचित हैं.
वो कहती हैं, “हमारे ग्रंथों में तो ऐसी जीवनशैली का कोई विशिष्ट उल्लेख नहीं है, लेकिन इनका लहज़ा आलोचनात्मक नहीं है, बल्कि इन ग्रंथों की विचारधारा बहुत उदारवादी है यानि मानव व्यवहार में हर तरह की आज़ादी देनेवाली.”
हाल ही में छपी बीडीएसएम जीवनशैली पर आधारित किताब, ‘फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे’ का उल्लेख देते हुए संध्या कहती हैं कि इस किताब को पढ़ने को लेकर उत्सुकता इस बात का सूचक है कि इस बारे में जानने और परखने की चाहत है, जिसे रोकना नहीं चाहिए.
‘द किंकी कलेक्टिव’ के सदस्यों का मानना है कि जैसे महिलाओं के समान अधिकारों या समलैंगिकों की पहचान से जुड़े मुद्दे शुरुआत में असहज लगते थे, उसी तरह इस जीवनशैली के बारे में भी लोगों के मन में संवेदनशीलता आने में समय लगेगा.
लेकिन क्या भारत के परिवेश में समाज इन सभी मुद्दों को एक तराज़ू पर रख पाएगा?
(कुछ लोगों के नाम बदले गए हैं.)

दिव्या आर्य
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
sabhar :http://www.bbc.co.uk/

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टोपी से तैयार कीजिए धुन

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ब्रेन म्यूज़िक

शास्त्रीय संगीत की शिक्षा के दौरान मैं ख़ाली पन्ने को घूरती रहती और उम्मीद करती कि कोई शॉर्टकट हो जिससे मैं "सोच" कर संगीत को पेज पर उतार सकूँ.
अब मैं कंप्यूटर पर संगीत तैयार करती हूं और पिक्सल्स के ऊपर पेंसिल घुमाती रहती हूं.

तो प्लीमथ विश्वविद्यालय में एक लैपटॉप को घूरते हुए मैं एक ऐसी तकनीक की जांच करने जा रही हूं जो मेरे संगीत के सपने को हक़ीक़त बनाने का वादा करता है.लेकिन मैं हमेशी ही सोचती थी कि एक दिन मैं सीधे अपने दिमाग से अपने संगीतमय विचारों को रिकॉर्ड कर पाउंगी.
यह परियोजना प्रोफ़ेसर एडुआर्डो मिरांडा के दिमाग़ की उपज है. वह एक संगीतकार हैं जिनकी जीविका का साधन संगीत न्यूरोटेक्नॉलॉजी है.

दिमाग से कंप्यूटर में

एक ब्रेन कैप के माध्यम से उनका उपकरण दिमाग में चल रहे विचारों को पढ़ता है और उन्हें संगीत में बदल देता है.
उनकी योजना चार लोगों के दिमाग से विचार लेकर उन्हें एक साथ पिरोने की है. इसी के आधार पर उनकी नवीनतम संगीत रचना तैयार होगी - जिसका नाम, एक्टिवेटिंग मेमोरी है.
इस संगीत रचना को इसी हफ़्ते के अंत में प्लीमथ में होने वाले साल 2014 पेनिसुला आर्ट्स कंटप्रेरी म्यूज़िक फ़ेस्टिवल में पेश किया जाएगा.
वह मुझे भी अपनी मशीन का इस्तेमाल करने देने को तैयार हो गए और मैं इसके लिए उत्सुक थी.
शोधकर्ता और अभियंता जोएल ईटोन ने मुझे ब्रेन कैप पहनने में मदद की जिसमें से तार और एलेक्ट्रॉड्स निकल रहे थे. उन्होंने मुझे समझाया कि न्यूरोटेक्नॉलॉजी कैसे काम करती है.
जोएल ने मुझे बताया कि दिमाग के पीछे लगा मुख्य इलेक्ट्रॉड मेरे विज़ुअल कॉरटेक्स से दिमाग की तरंगों को चुनेगा जबकि अन्य इलेक्ट्रॉड्स पीछे के शोर को कम करने में मदद करेंगे.
इस उपकरण के काम करने के लिए उपयोगकर्ता को चार रंग बिरंगे आकारों में से किसी एक पर ध्यान केंद्रित करना होता है. यह सब अलग-अलग गति से टिमटिमाते हैं और हर आकार से विद्युत तरंग पैदा होती है.
इस सिग्नल को ब्रेन कैप पकड़ लेता है और कंप्यूटर में भेज देता है. यह उपकरण सही ढंग से तभी काम करता है जब बाक़ी का दिमाग शांत हो. इसलिए लोगों से कहा जाता है कि "दिमाग़ को शांत रखें."
दिमाग़ के इलेक्ट्रिक सिग्नलों को बढ़ाया जाता है और फिर लैपटॉप में डाला जाता है.
ब्रेन म्यूज़िक
जोएल मुझे उत्साहित करते हैं कि मैं आकार को एक ख़ास ढंग से घूरूं - ध्यान केंद्रित और विकेंद्रित करने की तरह. कई बार मुझे स्क्रीन से नज़र हटाकर, फिर वापस देखना होता है - ताकि दिमाग़ ताज़ा हो जाए.
आप इसे सही ढंग से समझ गए तो चयनित आकार जेन के सामने रखी स्क्रीन पर एक संगीत का टुकड़ा भेज देता है. जेन एक व्यावसायिक सेलोवादक हैं, जो उसके बाद मेरे द्वारा भेजे गए संगीत के टुकड़े को बजाती हैं.
शुरू-शुरू में तो यह बहुत मुश्किल था - ध्यान केंद्रित करना, विकेंद्रित करना और आराम करना. जब यह हो गया तो मैं बहुत उत्साहित नहीं हो सकती थी क्योंकि यह मेरे दिमाग़ को सिग्नल पैदा करने की स्थिति से बाहर कर देता.
यह बहुत मुश्किल काम था क्योंकि मुझे यह सारा विचार ही बहुत उत्साहजनक लग रहा था.

अन्य फ़ायदे

यकीनन मैं चाहती थी कि यह सिस्टम सीधे मेरे दिमाग से ही संगीत तैयार कर देता लेकिन ऐसा नहीं था.
सीधे धुन बनाने के बजाय यह पूर्व-निर्मित धुनों में से ही एक चुनता है. आप कह सकते हैं मैं धुन बनाने के बजाए उसे बजाने वाली थी, जहां मेरा दिमाग जेन के सेलो की तरह एक उपकरण बन गया था. लेकिन यह उपकरण इसी काम के लिए तैयार किया गया था.
जब मैंने प्रोफ़ेसर मिरांडा से सीधे धुन बनाने की अपनी इच्छा के बारे में बात की तो उनका कहना था कि शुरुआत में यह बहुत अच्छा लग सकता है लेकिन उन्हें लगता है कि कुछ समय बाद यह उकताहट भरा हो जाएगा.
वह चार चार लोगों के दिमाग से विचार लेंगी और फिर उन्हें मिलाकर संगीत तैयार करेंगी. उन्हें अपूर्ण समाधान की चुनौतियां पसंद हैं.
ब्रेन म्यूज़िक
वह कहते हैं, "इंसान चीजों में हेर-फेर करना पसंद करते हैं - मैं इसे ख़त्म नहीं करना चाहता, मैं संगीतकारों के लिए ज़्यादा परिष्कृत उपकरण बनाना चाहता हूं."
जिन लोगों को चलने-फिरने में दिक्क़त होती है उन लोगों को इस उपकरण से काफ़ी फ़ायदे हैं, इस शुरुआती स्तर पर भी.
कंप्यूटर संगीत शोध के बहुविषयक केंद्र (आईसीसीएमआर) में लॉक्ड-इन सिंड्रॉम (ऐसी समस्या जिसमें मरीज़ होश में रहते हुए भी आंखों के सिवा कोई और अंग नहीं हिला पाता) के मरीज़ों के साथ किए गए प्रयोग में उत्सावहवर्धक नतीजे सामने आए हैं.
फिर भी मेरी उम्मीद के विपरीत इसके आम-आदमी के इस्तेमाल में आने की बात अभी दूर है.
उधर प्रयोगशाला में इस तकनीक पर महारथ हासिल करना बेहद मुश्किल नज़र आ रहा थ. इस प्रक्रिया के दौरान मेरे दिमागी तरंगे तब उल्लेखनीय रूप से कम हो गईं जब सेलो बज रहा था.
दो घंटे की मुश्किल के बाद मैं ठीक ढंग से तरंगें पैदा करने में कामयाब हो गई. जोएल और एडुआर्डो दोनों ने मुझे बताया कि दो घंटे का समय कम है - अक्सर इसमें कुछ दिन लग जाते हैं.
तमाम चुनौतियों और सीमाओं के बावजूद मौजूदा दिमाग-कंप्यूटर-संगीत इंटरफ़ेस से अपने दिमाग के भीतर झांकना मुझे बेहद आदी करने वाला लगा. और मैं यकीनन इस तकनीक के विकास पर नज़र रखूंगी.
हालांकि इतना ज़्यादा ध्यान केंद्रित करने से हुई थकान के बावजूद मैं ख़ुशी-ख़ुशी कई घंटे और स्क्रीन को घूर सकती हूं.

लेकिन संगीतकारों का खाना तैयार था और उन्हें निकलना था इसलिए मैंने अपनी ब्रेन कैप निकाली और चल दी वापस पुराने ढंग से धुन तैयार करने के लिए. sabhar :http://www.bbc.co.uk/

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'कामसूत्र' का विवादास्पद शूटिंग का वीडियो

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making of kamsutra 3 d

शर्लिन चोपड़ा की नई फिल्‍म कामसूत्र कितनी बोल्ड है इस बात का अंदाजा इस वीडियो से लगता है। 

रुपेश पॉल निर्देशित फिल्‍म कामसूत्र 3डी फिल्म इसी साल मई में रिलीज होने जा रही है। 

यह फिल्म अपने विषय और प्रजेंटेशन दोनों में ही बोल्ड है। फिल्‍म के दो ट्रेलर आ चुके हैं। ट्रेलर से इस बात की झलक मिल चुकी है कि यह फिल्‍म कैसी होगी। 



लेकिन हम आपको इस फिल्‍म की मेकिंग दिखा रहे हैं। मेकिंग देखकर आप चौंक जाएंगे। इस मेकिंग में शर्लिन चोपड़ा बिल्कुल बोल्ड अंदाज में दिख रही हैं। साथ ही बेडरूम दृश्यों को फिल्‍माना भी दिखाया गया है। 

यह फिल्‍म अपनी रिलीज के पहले ही विवादों में है। इस फिल्‍म से जुड़ी पिक्स लीक करने के आरोप में फिल्‍म के निर्देशक रूपेश पॉल शर्लिन को बाहर का रास्ता दिखा चुके हैं। 
saabhar : amarujala.com
देखिए कामसूत्र की मेकिंग 

http://www.youtube.com/watch?feature=player_embedded&v=heVknCvJqyc#t=19

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मिल गया असली भूत माही गिल को

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know about mahie gill's spooky experience


अभिनेत्री माही गिल को असली का भूत मिल गया। यह मामला एक फिल्‍म की शूटिंग का है। 

कई बार अच्छे कलाकार फिल्‍म के पात्र में इतनी गहराई से उतर जाते हैं कि उन्हें हर वक्त उस पात्र में ही खोए रहने का भ्रम बना रहता है। 

लगता है कि कुछ ऐसा ही अभिनेत्री माही गिल के साथ हुआ। माही गिल इन दिनों एक भुतही फिल्‍म की शूटिंग कर रही हैं। 

'गैंग्स ऑफ घोस्ट' नाम वाली इस फिल्‍म की इन दिनों आऊटडोर शूटिंग हो रही है। फिल्‍म का निर्देशन सतीश कौशिक कर रहे हैं। 

हुआ यूं कि एक रात माही गिल को एहसास हुआ कि उन्हें प्रेत की कोई छाया दिखाई दी। फिर क्या वह जोर-जोर से चीख उठीं। 

रात के सन्नाटे में माही की इस चीख से हड़कंप मच गया। लोग वहां पहुंचे तो पता चला कि माही को वहां कोई भूत दिख गया। 

इसके पहले कुछ ऐसा ही किस्सा बिपाशा बसु के साथ ऊटी में हो चुका है। वह उस समय 'आत्मा' फिल्म की शूटिंग कर रहीं ‌थीं। sabhar:http://www.amarujala.com/

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सत्यवादी को मृत्यु भी नहीं डराती

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Nation depend on truth

जाबालि मुनि ने भगवान श्रीराम से एक बार प्रश्न किया, राष्ट्र किस तत्व पर आधारित है?

प्रभु श्रीराम ने कहा, तस्मांत सत्यात्मकं राज्यं सत्ये लोकः प्रतिष्ठितः। अर्थात राष्ट्र सत्य पर आश्रित रहता है। सत्य में ही संसार प्रतिष्ठित है। हे मुनि, जिस राष्ट्र की नींव सत्य और संयम पर आश्रित है, उसका शासक व प्रजा हमेशा सुखी रहते हैं। असत्य-कपट का सहारा लेने वाले कभी संतुष्ट व सुखी नहीं रह सकते।

भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को सत्य का स्वरूप समझाते हुए कहा था, सत्य सनातन धर्म है, सत्य सनातन ब्रह्म है। चारों वेदों का सार रहस्य सत्य है।

ऋग्वेद में कहा गया है कि सत्कर्मशील व्यक्ति को सत्य की नौका पार लगाती है। दुष्कर्मी, संयमहीन व छल-कपट करने वाले व्यक्ति की नौका मझधार में डूबकर उसके जीवन को निरर्थक कर देती है।

टॉलस्टाय ने लिखा है, जिसने सत्य का संकल्प ले लिया और सदाचार का मार्ग अपना लिया, वही हर प्रकार के भय, कष्टों से मुक्त रहकर ईश्वर व मनुष्यों का प्रिय बन सकता है। सत्यवादी को मृत्यु भी नहीं डराती।

महर्षि चरक ने आचार रसायन में कहा है, सत्यवादी, क्रोध रहित, मन, कर्म व वचन से अहिंसक तथा विनय के पालन से मानव शारीरिक, मानसिक व आत्मिक रोगों से मुक्त रहता है। उन्होंने इसे सदाचार रसायन कहा है। सत्य-सदाचार जैसे तत्वों को त्यागने के कारण ही मानव अनेक रोगों का शिकार बनता है sabhar ; http://www.amarujala.com/

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श्रद्धा से मनुष्य को प्रेम, रस और आनंद मिलता है

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with trust worship is fruitful

सभी धर्मशास्त्रों में श्रद्धा का महत्व प्रतिपादित किया गया है। कहा गया है कि श्रद्धा-निष्ठा के साथ किया गया प्रत्येक सत्कर्म फलदायक होता है। इसलिए कहा गया है कि श्रद्धां देवा यजमाना वायुगोपा उपासते। श्रद्धां हृदस्य याकूत्या श्रद्धया विन्दते वसु। अर्थात देवता, संतजन, विद्वान, यजमान, दानशील, बलिदानी सब श्रद्धा से कर्म की उपासना करते हैं, इसलिए सुरक्षित रहते हैं।

श्रद्धा को सुमतिदायिनी, कामायनी, कात्यायनी बताकर उसकी उपासना की गई है। वैदिक ऋचा में कहा गया है, हे परमप्रिये श्रद्धे, तेरी कृपा से मैं ऐसा व्यवहार करूं, जिससे संसार का उपकार हो सके। हे सुमतिदायिनी श्रद्धे, मैं जो कुछ आहुति, दान व बलिदान करूं, उसे उपयोगी और सर्वहितकारिणी बना।

हे कामायनी श्रद्धे, मेरी अनासक्त कामना है कि मेरे कृत्यों से दान और बलिदान की प्रेरणा उदित होती रहे। हृदय से जब श्रद्धा की उपासना होती है, तब अनंत ऐश्वर्य अनायास ही प्राप्त होने लगते हैं।

ऋग्वेद में कहा गया है, श्रद्धया अग्निः समिध्यते। यानी श्रद्धा से ऐसी अग्नि प्रदीप्त होती है, जो मनुष्य को प्रेम, रस, आनंद और अमृत प्रदान कर उसका लोक-परलोक सफल बनाती है। श्रद्धा ही वृद्धजनों, माता-पिता, गुरु के प्रति कर्तव्यपालन करने, मातृभूमि के लिए प्राणोत्सर्ग करने, समाज व धर्म की सेवा में संलग्न होने की प्रेरणा का स्रोत है। sabhar :http://www.amarujala.com/

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कृष्ण ने ऐसा काम किया कि राधा और गोपियां कृष्ण से दूर-दूर रहने लगी

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krishna kund govardhan radha krishna


भगवान श्री कृष्ण और राधा का प्रेम अनोखा है। दोनों एक दूसरे के हृदय में रहते हैं। लेकिन एक बार श्री कृष्ण ने ऐसा काम किया कि राधा और गोपियां कृष्ण से दूर-दूर रहने लगी। राधा ने कृष्ण से यह भी कहा कि मत छूना मुझे।

इस घटना के बाद कृष्ण ने जो किया उसकी निशानी आज भी गोवर्धन पर्वत की तलहटी में कृष्ण कुंड के रुप में मौजूद है। इस कुंड के निर्माण का कारण राधा कृष्ण यह संवाद माना जाता है जब राधा ने कृष्ण को अपना स्पर्श करने से मना कर दिया था।

इसकी वजह यह थी कि, भगवान श्री कृष्ण ने कंश के भेजे हुए असुर अरिष्टासुर का वध कर दिया था। अरिष्टासुर बैल के रुप में व्रजवासियों को कष्ट देने आया था। बैल की हत्या करने के कारण राधा और गोपियां कृष्ण को गौ का हत्यारा मान रही थी।

कृष्ण ने राधा को खूब समझाने का प्रयास किया कि उसने बैल की नहीं बल्कि असुर का वध किया है। कृष्ण के समझाने के बाद भी जब राधा नहीं मानी तो श्री कृष्ण ने अपनी ऐड़ी जमीन पर पटकी और वहां जल की धारा बहने लगी।

इस जलधारा से एक कुंड बन गया। श्री कृष्ण ने तीर्थों से कहा कि आप सभी यहां आइए। कृष्ण के आदेश से सभी तीर्थ राधा कृष्ण के सामने उपस्थिति हो गए। इसके बाद सभी कुंड में प्रवेश कर गए। श्री कृष्ण ने इस कुंड में स्नान किया और कहा कि इस कुंड में स्नान करने वाले को एक ही स्थान पर सभी तीर्थों में स्नान करने का पुण्य प्राप्त हो जाएगा। sabhar :http://www.amarujala.com/

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कृष्णन आज देश इन्हें हीरो कहता है

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जब कृष्णन है तो कोई भूखे पेट क्यों सोए,कलियुग का 'कृष्ण'...

नई दिल्ली. क्या कोई ऐश्वर्य भरी जिंदगी छोड़ सड़क की धूल छानने की चाहत रखना चाहेगा? क्या कोई अपने सपनों को रौंदना चाहेगा? अधिकांश जवाब 'ना' ही मिलेगा। मगर, ऐसा हुआ है। नारायण कृष्णन। जी हां, आज के समय का बड़ा चेहरा। ये वही शख्सियत हैं, जिन्होंने ऐश्वर्य भरी जिंदगी छोड़कर कांटों भरी राह को गले लगाया है।
 
2002 में हुए एक वाकये ने मदुरई (तमिलनाडु) निवासी कृष्णन की जिंदगी हमेशा के लिए बदल कर रख दी। आज देश इन्हें हीरो कहता है
 
2003 में कृष्णन ने 'अक्षय' नाम से मुनाफा न कमाने वाले ट्रस्ट की शुरुआत की। अब उनके जीवन का एक ही मकसद है, गरीब भूखे पेट न सोए। कृष्णन के मेहमानों की लिस्ट में गरीब, बेसहारा और बेघर लोग शामिल हैं। 34 वर्षीय कृष्णन अब तक मदुरई के एक करोड़ से भी ज्यादा लोगों को सुबह का नाश्ता, दोपहर का भोजन और रात का खाना खिला चुके हैं। वह नि:स्वार्थ भाव से जनसेवा में लगे हुए हैं। पूरे देश को उनपर गर्व है। लेकिन उनकी यही जनसेवा अब मुद्दा बन चुकी है। मुद्दा, गरीबी-अमीरी के बीच के खाई का। मुद्दा, देश में लगातार बढ़ रहे रईसों और उसी अनुपात में बढ़ती गरीबी का। क्योंकि भारत को अरबपतियों का देश भी कहा जाता है। बानगी के तौर पर दुनिया का सबसे महंगा घर भी भारत में ही है।  

जब कृष्णन है तो कोई भूखे पेट क्यों सोए,कलियुग का 'कृष्ण'...

ऐसे बदल गई कृष्णन की जिंदगी
 
कृष्णन एक बेहतरीन शेफ हैं। वह इसके लिए अवार्ड तक जीत चुके हैं। उन्हें स्विट्जरलैंड के फाइव स्टार होटल ने शानदार नौकरी ऑफर की। लेकिन यूरोप जाने से पहले ही एक ऐसा वाकया हुआ, जिसने उनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल कर रख दी। कृष्णन बताते हैं 'मैंने सड़क किनारे एक बूढ़े इंसान को कचरे में खाना ढूंढते देखा। वह भूख से तड़प रहा था। उस इंसान को इतनी जोरों की भूख लगी थी कि उसने कचरा तक खा लिया। यह देख मुझे बेहद तकलीफ हुई। मैं फौरन पास के होटल गया और वहां से इडली खरीद कर लाया। फिर उन्हें खाने को दिया। मैंने आज तक इतनी तेजी से किसी को खाते नहीं देखा। खाते समय उसकी आंखों से आंसू झरने लगे। मगर वह खुशी के आंसू थे। यही मेरे जीवन का निर्णायक मोड़ था।'
 जब कृष्णन है तो कोई भूखे पेट क्यों सोए,कलियुग का 'कृष्ण'...
कृष्णन बेसहारा और निशक्तों के लिये आशियाना भी बनवा रहे हैं ताकि इन लोगों को सड़कों पर न भटकना पड़े। आइए एक नजर डालते हैं उनके रोजमर्रा के खर्चों पर...
 
- 400 लोगों का भोजन (खुद के हाथों        बना शाकाहारी भोजन खिलाते हैं)
- दिन में तीन बार
- अगर भूखा व्यक्ति कमजोर है तो अपने हाथों से उसे खाना खिलाते हैं
- औसतन 200 किमी रोज का आनेजाने का खर्च 
(एक बार के भोजन का औसत व्यय 5000 रुपये, मतलब प्रतिदिन 15,000 रुपये)

जब कृष्णन है तो कोई भूखे पेट क्यों सोए,कलियुग का 'कृष्ण'...


देश में केवल 27 करोड़ गरीब: सरकार
 
देश में गरीबी और अमीरी के बीच खाई लगातार बढ़ती जा रही है। मगर सरकार का ध्यान सिर्फ आंकड़ों की बाजीगरी पर है। हाल ही में गुजरात सरकार द्वारा जारी गरीबी के आंकड़ों पर सियासत गरमा गई थी। खूब चला आरोप-प्रत्यारोप का दौर। लेकिन कैसे घटेगी गरीबी इस पर किसी ने चर्चा नहीं की। सरकार ने गरीबों का मखौल उड़ाने के अलावा और कुछ नहीं किया है।गरीबी के आंकड़ों पर नजर डालें तो केंद्र सरकार का कहना है कि देश में गरीबों की संख्या 2004-05 के 40.74 करोड़ लोगों से घटकर 2011-12 में 27 करोड़ ही रह गई है। मतलब, देश में केवल 27 करोड़ लोग ही गरीब हैं। अगर ऐसा है तो सड़कों पर जो बेसहारा और निशक्तजन भटकने को मजबूर हैं उनकी कौन सुध लेगा। ये बड़ा सवाल है। खैर गरीबी को मापने के लिए सरकार के पास कौन सा पैमाना है हम उसकी बात नहीं करेंगे। गरीबी को लेकर जो ताजा आंकड़ा सामने है, वो एनएसएसओ की ओर से कराए गए सर्वे के 68वें दौर में सामने आया है। 

sabhar : bhaskar.com



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