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शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

सालों बाद खोपड़ी के संस्कार के बाद लड़की की आत्मा को मिली मुक्ति!

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सच्ची कहानी पार्ट-5: खोपड़ी के संस्कार के बाद लड़की की आत्मा को मिली मुक्ति!


वाराणसी. एक ऐसी कहानी जिसका राज मृत लड़की की खोपड़ी से जुड़ा था। बड़े-बड़े तंत्र साधक मृत इंसानों की खोपड़ियों को रखकर आत्माओं का आह्वान करते थे। एक ऐसी ही लड़की की सच्ची दास्तां जिसने एक तांत्रिक के चक्कर में आकर आत्महत्या कर ली थी।
 
कोलकाता की इस लड़की का रहस्य बनारस के शमशान घाट पर मिली खोपड़ी के बाद खुला। महेश बाबू (बदला हुआ नाम) 1950 के आस-पास पुनर्जन्म और मृत आत्माओं की सच्चाई पर तांत्रिकों के साथ रिसर्च में जुटे थे। उन्होंने देखा कि ऐसे तांत्रिक हैं जो मनुष्य की मृत खोपड़ी को रखकर क्रिया द्वारा आत्मा को बुला लेते हैं। 
 कोलकाता की मृत लड़की की खोपड़ी कैसे पहुंची काशी 
 
तांत्रिक की साधना को कोई झुठला नहीं सकता। इसी को लेकर महेश बाबू अपने शोष कार्य में लगे थे। कई सालों तक महेश और साधक महेंद्र बाबू (बदला हुआ नाम) अलग-अलग खोपड़ियों की आत्माओं से संपर्क साधते रहे। इन दिन शमशान घाट पर विचरण के दौरान दोनों लोगों को एक खोपड़ी मिली। इसके बाद बंद कमरे में रात को साधना शुरू हुई। एक लड़की की रोने की आवाज आने लगी, तभी सामने एक परछाई दिखती प्रतीत हुई। 

सच्ची कहानी पार्ट-5: खोपड़ी के संस्कार के बाद लड़की की आत्मा को मिली मुक्ति!

 
आगे जानिए सुमन की आत्मा को कैसे मिली मुक्ति

महेंद्र बाबू ने लोहबान को आग में डालते हुए, आत्मा से पूछा कौन हो तुम, बनारस कैसे आई? क्या नाम है तुम्हारा? सिसकती लड़की ने मानो जबाब दिया, 'सुमन (बदला हुआ नाम) नाम है मेरा। मैं कोलकाता की रहने वाली थी। मैं बीमार रहती थी तो मुझे परिवार वाले एक तांत्रिक के पास लेकर गए थे। मेरे ऊपर साया बताकर उसने मुझपर बहुत जुल्म किया। एक दिन परेशान होकर चौबीस साल की उम्र में मैंने नदी में छलांग लगाकर आत्महत्या कर ली। मेरी आत्मा भटकती रही। कुछ सालों बाद नदी से मेरे कपाल को एक दूसरे तांत्रिक ने निकाल लिया और साधना करने के लिए काशी पहुंच गया। तांत्रिक गलत सिद्धियां करना चाहता था, मैंने उसको मंसूबे में कामयाब नहीं होने दिया। अपनी शक्ति से कपाल को गंगा के अंदर पहुंचा दिया। वर्षों बाद मेरा कपाल आप लोगों को मिल गया।' 
कैसे मिली सुमन की आत्मा को मुक्ति
 
सुमन की आत्मा ने साधक से प्रार्थना कि उसे साधना के जरिए मुझे मुक्ति दिला दें। साधक महेंद्र बाबू और रिसर्च कर रहे महेश बाबू ने सुमन को मुक्ति दिलाने की ठान ली। दोनों ने मिलकर विधि विधान के साथ शमशान घाट पर कपाल का संस्कार किया। सुमन की आत्मा उस दिन आखरी बार सामने आई और ये कहकर ओझल हो गई कि तंत्र साधना की सिद्धियां सही दिशा में हो तो वर्षों बाद भी मुक्ति मिल सकती है। 

इसीलिए विधि विधान के साथ अकाल मृत्यु के बाद होना चाहिए संस्कार 
 
हर धर्म और जाती में मनुष्य के मृत्यु के बाद उसका संस्कार किया जाता है। जो लोग अकाल मृत्यु से मरते हैं, उनकी आत्माओं को मुक्ति नहीं मिलती। इसीलिए पिंड दान का भी विधान प्राचीन काल से चला आ रहा है। गया और बनारस उन सिद्ध स्थलियों में से है जहां आत्माओं को बैठाया जाता है। पिशाच मोचन में आज भी पितृ पक्ष के दिन हजारों लोग पितरों की मुक्ति के लिए जाते हैं। 

मरने के 10 साल बाद लौटी प्रेमिका की अतृप्त आत्मा
 
वाराणसी. 1952 की यह कहानी बनारस से जुड़ी है। यहां एक अतृप्त प्रेमिका ने मरने के दस साल बाद प्रेमी के साथ चार दिनों तक रही और अत्यधिक कामुक होने के नाते प्रेमी के साथ पत्नी की तरह भोग भी करती रही। हरिशचंद्र शमसान घाट से इस कहानी की नई शुरुआत होती है। 
 नीलम और मानिक (बदला हुआ नाम) एक साथ पढ़ते थे। पढ़ाई के दौरान दोनों में नजदीकियां बढ़ी और प्यार हो गया। दोनों ने शादी की ठान ली। नीलम कश्मीर की रहने वाली थी, उसके माता पिता वहीं रहते थे। नीलम अपने मामा के घर रहकर पढ़ाई करती थी। उसने कश्मीर जाकर घर वालों से मानिक के प्यार का जिक्र किया और शादी की बात कही। घर वालों ने शादी से इंकार के बाद नीलम को बनारस जाने से रोक दिया।
 
एक दिन अपने प्रेमी की याद में उसने ख़ुदकुशी कर ली। मानिक ने नीलम के बारे में बहुत पता करना चाहा, लेकिन उसे कुछ पता नही चला। नीलम के परिवार वालों ने कश्मीर छोड़ दिया। मानिक भी नीलम के प्यार में बदहवास एक तांत्रिक से मिला। तांत्रिक ने एक मंत्र उसको दिया और कहा शमशान पर रोज बैठो वहीं से तुम्हे नीलम का साथ मिलेगा।
 
दस साल बीत गए, एक दिन एक सुन्दर सी युवती मानिक से मिली और पूछा कैसो हो तुम? मानिक समझ नहीं पाया, थोडी देर बाद रूपवती नाम की इस युवती ने तपाक से बोला 'मैं तुम्हारी नीलम हूं, घर ले चलो मुझे।' 
 
 
आगे जानिए आखिर क्यों 10 साल बाद नीलम उससे सिर्फ चार दिनों के लिए मिलने आई...

क्या मानिक नीलम की आत्मा के साथ रहा चार दिनों तक 
 
मानिक ने समझा उसकी नीलम उसे मिल गई। वह उसको लेकर छोटे से घर में आ गया। मानिक ने कमरे में नीलम से ये जानने कि बहुत कोशिश की वह इतने सालों तक कहा रही। उसने जबाब नहीं दिया बल्कि मानिक को बाहो में भरकर प्यार करने लगी। उसने कहा 'पत्नी को पति ही पूरा कर सकता है और मैं भी पूरी होने तुम्हारे पास आई हूं।' इतना कहकर दोनों वासना में मुद्रित हो गए। चार दिनों तक यह सिलसिला लगातार चलता रहा। अगले दिन मानिक जब बिस्तर से उठा तो देखा कि नीलम गायब थी। कई दिनों तक उसने नीलम को काशी की गलियों और तमाम जगहों पर ढूंढा, लेकिन वह नहीं मिली। मानिक तांत्रिक बाबा के पास पहुंचा और उसने सारी बाते बताई। तांत्रिक बाबा ने चौंकाने वाला सच मानिक को बताया। 

जानिए क्या बताया तांत्रिक बाबा ने 
 
बाबा ने बताया कि मानिक तुम और नीलम एक दूसरे को दस वर्षों पहले पति पत्नी मान चुके थे। तुमसे शादी न होने के कारण नीलम ने आत्महत्या कर ली थी, लेकिन नीलम ने तुमको पति मान लिया था और अपने शरीर को भी सिर्फ तुमको ही सौंपना चाहती थी। मरने की वजह से उसकी आत्मा अतृप्त रह गई। वह पति के रूप में अपने शरीर को तुमको सौंपना चाहती थी। ऐसी अतृप्त आत्माएं स्थूल शरीर को ग्रहण किए भटकती रहती हैं। इनको सुक्ष्म शरीरधारी प्रेतात्माएं कहते हैं। जो इच्छा अनुसार विचरण करती हैं। तांत्रिक बाबा ने बताया कि 'मैंने जो मन्त्र दिया था उसकी शक्ति ने नीलम को तुमसे मिला दिया। नीलम की आत्मा भी पति के रूप में तुमसे शरीर के साथ सहवास कर तृप्त हो गई। अब उसके अगले जन्म का मार्ग खुल गया। जब तक आत्मा तृप्त नहीं होती वह भटकती रहती।' 
क्या यही सच है
 
जीवात्मा अपने स्थूल शरीर को छोड़कर दूसरे स्थूल शरीर में अपनी भोग, वासना, लालसा और अतृप्त इच्छाओं को पूर्ण करने के लिए प्रवेश करती है। यही पर वह सूक्ष्म शरीर के साथ हो जाती हैं। मृत्यु के बाद भी वैसी ही अनुभूति को पाना चाहती हैं। इसी स्थिति में भोग वासना के लिए नीलम की आत्मा भी सूक्ष्म शरीर के साथ आई थी। भोग वासना से तृप्त होकर वह आत्मा फिर चली गई।  
sabhar :bhaskar.com







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