मंगलवार, 19 अगस्त 2014

लाइफस्टाइल बदलने से बढ़ती है उम्र


photo : googal



मुकुल व्यास



जीवनशैली में परिवर्तन करके वृद्धावस्था की घड़ी को पीछे किया सकता है। एक नए अध्ययन से इस बात के समुचित सबूत मिले हैं कि जीवनशैली में फेरबदल करके हमारे डीएनए को सुरक्षा देने वाले टेलोमियर्स को लंबा किया जा सकता है। टेलोमियर्स कोशिका के नाभिक में पाए जाने वाले डीएनए के गुच्छे क्रोमोसोम (गुणसूत्र) के सिरों की टोपियां हैं। इधर कुछ समय से दुनिया में टेलोमियर पर गहन अनुसंधान चल रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि उम्र के साथ टेलोमियर की लंबाई घटती जाती है। किसी भी उम्र में छोटे टेलोमियर का होना खतरे की घंटी है। लेकिन उम्र के साथ टेलोमियर की लंबाई का घटना हर मामले में अलग-अलग होता है।

टेलोमियर डीएनए को जीर्ण-शीर्ण होने से बचाता है। इसकी तुलना शूलेस के सिरों पर लगे कवर से की जा सकती है। जिस तरह इस सिरे के अलग होने पर शूलेस बिखरने लगता है, ठीक उसी तरह टेलोमियर के कमजोर पड़ने पर हमारी कोशिकाओं के क्षतिग्रस्त होने का खतरा बढ़ जाता है। हमारी कोशिकाएं हर समय विभाजित होती रहती हैं। हर विभाजन के बाद टेलोमियर की लंबाई कम होती जाती है और डीएनए का कुछ हिस्सा कम हो जाता है। यह प्रक्रिया जीवन भर चलती रहती है। वैज्ञानिक अनुसंधानों से पता चला है कि श्वेत रक्त कोशिकाओं में छोटे टेलोमियर का संबंध वृद्धावस्था से जुड़ी बीमारियों से है जिनमें कई तरह के कैंसर शामिल हैं। इसके अलावा जीवनशैली से जुड़ी आदतें भी टेलोमियर की लंबाई को प्रभावित करती हैं।


यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के प्रिवेंटिव मेडिसिन रिसर्च इंस्टिटयूट के रिसर्चरों का कहना है कि खानपान और जीवनशैली में सकारात्मक परिवर्तन करके टेलोमियर को लंबा होने के लिए उकसाया जा सकता है। रिसर्चरों ने अपने अध्ययन के लिए 35 लोगों को चुना जो कम रिस्क वाले प्रोस्टेट कैंसर से पीड़ित थे। इनमें 25 लोगों को अपनी जीवनशैली और खानपान सुधारने को कहा गया। इन लोगों ने अशोधित अनाज, फल व सब्जियों पर आधारित शाकाहारी भोजन लेना शुरू किया और हर रोज तीस मिनट की साधारण कसरत को अपने शेड्यूल में शामिल किया। थकान व तनाव से मुक्ति के लिए इन लोगों को ध्यान और योगाभ्यास करने को कहा गया। सोशल सपोर्ट के लिए उनकी काउंसलिंग भी की गई। दस लोगों के दूसरे ग्रुप को सामान्य ढंग से जीने को कहा गया। पांच साल बाद दोनों ग्रुपों के रक्त के नमूनों के विश्लेषण से पता चला कि बदली जीवनशैली वाले लोगों की कोशिकाएं ज्यादा युवा थीं। उनके टेलोमियर की लंबाई में दस प्रतिशत की वृद्धि हुई। जबकि पुराने अंदाज में जीने वाले लोगों में टेलोमियर की लंबाई तीन प्रतिशत कम हो गई।

इस अध्ययन से जुड़े प्रमुख रिसर्चर डीन ओर्निश का कहना है कि हमारे जीन और टेलोमियर हमारे शरीर की प्रकृति को दर्शाते है लेकिन यह जरुरी नहीं है कि वे हमारी नियति भी तय करें। हमारे शरीर के अंदर खुद को ठीकठाक करने की अद्भुत क्षमता है और यदि हम अपने स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले कारणों को दूर करने के लिए जीवनशैली में परिवर्तन करें तो शरीर को चुस्त-दुरुस्त रहने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। वैज्ञानिकों को चिरयौवन की कोई जादुई गोली तो नहीं मिली है लेकिन यह खोज सही दिशा में बढ़ रही है। अभी तक हम यही सोचते थे कि टेलोमियर की लंबाई उम्र के साथ घटती जाती है। अब हमें पता चला है कि इसकी लंबाई बढ़ाई भी जा सकती है।
कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि ओर्निश की टीम के अध्ययन से हमें जल्दबाजी में कोई निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए क्योंकि अध्ययन में शामिल दोनों ग्रुपों की निगरानी सिर्फ पांच साल ही की गई थी। एजिंग पर रिसर्च करने वाले कुछ अन्य विशेषज्ञों ने टेलोमियर की लंबाई से निकाले जा रहे निष्कर्षों से ही असहमति जताई है। न्यू यॉर्क सिटी में एल्बर्ट आइंस्टीन कॉलेज ऑफ मेडिसिन के प्रफेसर डॉ. नीर बर्जलाई का कहना है कि इस बात से सभी सहमत हैं कि टेलोमियर की लंबाई कुछ कह रही है लेकिन इसका अर्थ अभी तक स्पष्ट नहीं है। ओर्निश की रिसर्च से भी इस प्रश्न का कोई जवाब नहीं मिलता। हो सकता है लंबे टेलोमियर की वजह से आप स्वस्थ हैं, लेकिन यह भी हो सकता है कि आपके स्वस्थ होने की वजह से आपके टेलोमियर लंबे है। बर्जलाई के अनुसार शतायु लोगों में 85 साल के लोगों की तुलना में लंबे टेलोमियर देखे गए हैं लेकिन उनका मानना है कि लंबे टेलोमियर उनके अच्छे स्वास्थ्य की वजह से हैं।
अमेरिका के नेशनल इंस्टिटयूट ऑन एजिंग के डॉ. नान-पिंग वेंग का कहना है कि यह सही है कि टेलोमियर छोटा होने से शरीर की प्रतिरोधी कोशिकाओं पर असर पड़ता है लेकिन बुढ़ापे की प्रक्रिया सिर्फ टेलोमियर पर नहीं, कई और चीजों पर भी निर्भर करती है। लंबे या छोटे टेलोमियर की भूमिका को लेकर वैज्ञानिकों के बीच असहमति तो है ही, साथ में इससे जुड़ी एक चीज उन्हें विचलित भी कर रही है। वह यह कि कैंसर कोशिकाओं में भी लंबे टेलोमियर देखे गए हैं। कुछ रिसर्चरों को डर है कि टेलोमियर की लंबाई बढ़ाने वाली दवाएं कैंसर को बढ़ावा दे सकती हैं। इसके बावजूद कुछ अमेरिकी कंपनियां ऐसी दवाओं के विकास में जुटी हुई हैं। 
sabhar :http://navbharattimes.indiatimes.com/

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