रविवार, 31 अगस्त 2014

300 से ज्यादा खोज कर चुका ये संस्थान, शहर को दे रहा नई पहचान


300 से ज्यादा खोज कर चुका ये संस्थान, शहर को दे रहा नई पहचान

जमशेदपुर. लौहनगरी जमशेदपुर की पहचान साइंस सिटी के रूप में भी बन चुकी है। कई ऐसी वस्तुएं हैं, जिनका उपयोग हम घर या बाहर कर रहे हैं, वह कैसे बना? कहां अनुसंधान हुआ है? शायद नहीं पता है। कई चीजें शहर में बनी हैं। इसे बनाने में एनएमएल का योदान रहा है। शहर को नई पहचान देने और देश को विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी बनाने में राष्ट्रीय धातुकर्म प्रयोगशाला (एनएमएल) का अहम योगदान रहा है। साठ वर्षों के सफर में एनएमएल 300 खोज कर चुका है। विज्ञान के क्षेत्र में यहां के वैज्ञानिकों की उपलब्धियों को शब्दों में समेटना कठिन है। दैनिक भास्कर एनएमएल की नई खोज व कुछ ऐसे अनुसंधान को सामने लाने का प्रयास कर रहा है, जिसका उपयोग आप करते हैं, लेकिन नहीं जानते कि इसका इन्वेंशन शहर में हुआ है। आज राष्ट्रीय विज्ञान दिवस है। इस साल का थीम है क्रफोस्टरिंग साइंस्टिफिक टेंपर (वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देना)। प्रस्तुत है भास्कर की विशेष रिपोर्ट।
क्यों मनाया जाता है विज्ञान दिवस
28 फरवरी 1928 को सर सीवी रमन ने प्रकाश की गति पर खोज की थी। इस खोज के लिए उन्हें 1930 मेें नोबेल पुरस्कार दिया गया था। इसके बाद से देश ने विज्ञान के क्षेत्र में पीछे मुड़ कर नहीं देखा। 28 फरवरी को मिली सफलता पर राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद् और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय की ओर से प्रतिवर्ष इस दिन राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाया जाता है।
इन्वेंशन- अब स्प्रे से जोड़ी जाएंगी टूटी हड्डियां
अब टूटी हड्डियों को स्प्रे मारकर जोड़ा जा सकेगा। एनएमएल के वैज्ञानिक डॉ अरविंद सिन्हा ने वर्ष 2003 में ऐसे केमिकल की खोज की है, जिसके स्प्रे मात्र से ही टूटी हड्डियां जुड़ जाएंगी।  यह इतना प्रभावशाली है कि हड्डी जुडऩे के बाद बिल्कुल पहले की तरह हो जाती है। हड्डी के सॉफ्ट पार्ट को जोडऩे के लिए स्प्रे का उपयोग किया जा रहा है।
अब तक क्या : गंभीर रूप से टूटी हड्डियों को स्टील प्लेट लगाकर जोड़ा जाता है। हड्डियां जुडऩे के बाद दोबारा ऑपरेशन कर प्लेट निकालना पड़ता था। इस पूरी प्रक्रिया में मरीज को काफी कष्ट होता था।
आगे क्या : डॉ सिन्हा ने बताया कि थ्री डायमेन्शन स्ट्रक्चर ब्लॉक पर रिसर्च चल रहा है। प्रारंभिक दौर में सफलता मिल गई है। पांच तकनीक अलग-अलग कंपनियों को उपलब्ध कराई गई हैं। ये कंपनियां स्प्रे बना रही हैं।
मशीन की उम्र बताएगा उपकरण
अब किसी मशीन की उम्र कितनी है, यह लाइफ एसेसमेंट मशीन बताएगी। मशीन के जीवन को जांचने के लिए बनाया गया सबसे ज्यादा क्षमता वाला उपकरण एशिया में एनएमएल के पास है। इस मशीन को एनएमएल में पहली बार १९७० के दशक में बनाया गया था। एनएमएल में ऐसी मशीन की सौ यूनिट हैं। एक यूनिट की लागत चार करोड़ रुपए है। देश समेत दुनिया की कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपनी मशीन व यंत्रों की जांच के लिए सैंपल भेजती हैं।
इनकी उम्र का पता चलेगा : किसी भी प्रकार की मशीन, रेलवे का ओवरहेड वायर, ऑयल कंपनी के संयंत्र, पुल, रेल लाइन व अन्य संयंत्र।
इन्सपीरेशन- हावड़ा ब्रिज को दिया जीवन
आप जानते हैं हावड़ा ब्रिज को अंग्रेजों ने बनवाया था। 705 मीटर लंबे लोहे के इस पुल में पिलर नहीं है। शायद यह नहीं पता कि लोहे में जंग क्यों नहीं लगती? यह एनएमएल की देन है। एनएमएल के वैज्ञानिकों ने हावड़ा ब्रिज को इस समस्या से बचाने व उसके रख-रखाव के लिए एक केमिकलयुक्त पेंट का खोज की। इस खास तरह के पेंट से लोहे की उम्र सौ साल बढ़ जाती है। एनएमएल ने एमटी कोलोसोम कोर्टिंग नामक केमिकल वर्ष 1985 में लगाया। इससे ब्रिज की लाइफ बढ़ गई है। एनएमएल के वैज्ञानिक हावड़ा ब्रिज की जानकारी लेते रहते हैं।
देश को दिया एल्युमीनियम वायर
1960 दशक के पहले बिजली आपूर्ति के लिए तांबे के तार का उपयोग होता था। यह न केवल महंगा होता था, बल्कि हमेशा कार्बन लगने से बिजली आपूर्ति में बाधा होती थी। इस समस्या को दूर करने के लिए एनएमएल ने १९६५-६८ में रिसर्च किया और एल्युमीनियम तार बनाया। इससे भारत को एक नई तकनीक मिली। अब देश में बिजली आपूर्ति के साथ रेल के इलेक्ट्रिक इंजन को चलाने में इसी वायर का उपयोग किया जा रहा है।
स्टेनलेस स्टील की खोज
स्टील से बनने वाले बर्तनों में निकेल का उपयोग किया जाता था। इसे विदेश से मंगाना पड़ता था। इससे स्टील बर्तनों की कीमत ज्यादा होती थी। एनएमएल ने स्टेनलेस स्टील की खोज की। निकेल की जगह एल्युमीनियम का उपयोग किया। इसलिए आज देश में स्टेनलेस स्टील के बर्तन सस्ते मिलते हैं।
क्राउन इन द क्राउड- चाईबासा की छात्रा को नेशनल अवार्ड
चाईबासा की 10वीं क्लास की छात्रा अनीशा परवीन विज्ञान के क्षेत्र में जूनियर रिसर्चर के रूप में पहचान बना चुकी है। कम लोग जानते हैं कि बड़ाजामदा के राजकीयकृत स्कूल में पढऩे वाली इस नन्ही छात्रा को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार ने नई खोज के लिए राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार इंस्पायर अवार्ड-२०१३ से नवाजा है। अनीशा राज्य की एकमात्र प्रतिभागी थी।
खोज, जिसके लिए मिला सम्मान : केले के थंब व गोबर को मिलाकर आर्गेनिक कम्पोस्ट (खाद) की खोज की है। इस खाद से जमीन की उर्वरा शक्ति 300 गुणा बढ़ जाती है। अनीशा ने बताया कि केले के थंब से निकलने वाले फाइबर टिश्यू से सिल्क ग्रेड का धागा बनाया जा सकता है। इन धागों से वस्त्र पेपर, ग्रीटिंग, फोटो फ्रेम व अन्य वस्तुएं बनाई जा सकती है।
परसुडीह के छात्र का राष्ट्रीय प्रतियोगिता में चयन
परसुडीह के खासमहल निवासी निलाद्री दासगुप्ता को भी इंस्पायर अवार्ड के लिए चुना गया है। निलाद्री केंद्रीय विद्यालय, जमशेदपुर के आठवीं कक्षा के छात्र हैं। भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्यौगिकी मंत्रालय ने वर्ष २०१४ की प्रतियोगिता के लिए निलाद्री का चयन किया है। उसे मंत्रालय की ओर से पांच हजार रुपए फेलोशिप के रूप में दी गई है। इससे वह प्रोजेक्ट मॉडल तैयार करेंगे। निलाद्री जिला व राज्यस्तरीय प्रतियोगिता में शामिल होंगे। इसके बाद उन्हें राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में मॉडल प्रदर्शित करने का मौका मिलेगा।
क्या आप जानते हैं
भारत में ई-वेस्ट (कचरा) की समस्या लगातार बढ़ रही है। पर्यावरण संरक्षण में आज ई-वेस्ट सबसे बड़ी रुकावट है। मुंबई, बेंगलुरु, कोलकाता, सूरत, पुणे व नागपुर में सबसे ज्यादा ई-वेस्ट होता है।
क्या है ई-वेस्ट : टीवी, मोबाइल, कंप्यूटर, लैपटॉप, फ्रिज, एयर कंडिशन मशीन व ऐसी वस्तु, जो पूरी तरह से नष्ट नहीं होती हैं। इसके अंदर पर्यावरण को प्रभावित करने वाले खतरनाक केमिकल होते हैं। इन्हें जलाने से वायु प्रदूषण और जमीन में दबाने से उर्वरा शक्ति प्रभावित होती है।

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