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भगवान श्रीकृष्ण ने क्यों कहा है कि 'हर वस्तु में होता है आश्चर्य'



स्वामी सुखबोधानंद
'भारतीय दर्शन कहता है कि सफलता ही सब कुछ नहीं है बल्कि व्यक्ति को संतुष्टि भी चाहिए। सफलता के बावजूद जीवन में असफलता का एहसास बना रहेगा क्योंकि जीवन में संतुष्टि से ही आनंद आता है।'
हम जो भी करते हैं वह क्रिया होना चाहिए, उसमें किसी काम को करने की इच्छा झलकनी चाहिए। अगर हम कोई काम प्रतिक्रिया स्वरूप करते हैं तो जीवन को नरक बना लेते हैं। छोटा सा उदाहरण देखिए, हम गुड इवनिंग क्यों कहते हैं? इसलिए कि आते-जाते हम मिलते हैं तो एकदूसरे का अभिवादन करते हैं। तो क्या यह औपचारिक है? शायद नहीं, क्योंकि इसका मतलब होता है।
मतलब है कि यह शाम सुंदर है और अगर सुंदर नहीं है तो हम इसे सुंदर बना सकते हैं। लेकिन अगर हम शब्दों के बारे में सोचते नहीं हैं और उन्हें बस यंत्रवत उच्चारते जाते हैं तो जीवन में आश्चर्य और आनंद नहीं रहता। हम बस गुड इवनिंग, गुड मार्निंग कहते हैं लेकिन हमारा आशय सुबह-शाम को सुंदर बनाने का नहीं होता। तब हम सुबह-शाम को महसूस नहीं कर रहे हैं। हम प्रतिक्रिया स्वरूप गुड मार्निंग कह रहे हैं लेकिन गुड मार्निंग का अर्थ हमें पता नहीं है। इस तरह के यंत्रवत जीवन में हमें कभी भी आश्चर्य की अनुभूति नहीं हो सकती है।
जीवन में अगर आनंद पाना है तो सावधान भाव से, जागरूक भाव से, चैतन्य भाव से चीजों को ग्रहण करना होगा, तो ही जीवन की उन्नति होगी। हर छोटी चीजों में आनंद को महसूस करना होगा, अनुभव करना होगा। अनुभव से ही ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है। कभी विचार किया आपने कि हमारे देश में तलाक की दर सबसे ज्यादा किस प्रोफेशन के लोगों में है। मैं बताता हूं, तलाक की सबसे ज्यादा दर सॉफ्टवेयर इंजीनियरों में है और सबसे कम है मार्केटिंग क्षेत्र में कार्यरत प्रोफेशनल में। इसकी वजह भी है।
देखिए, मार्केटिंग के लोगों को आदत रहती कि कोई भी प्रॉडक्ट 16-18 बार जब तक रिजेक्ट न हो उसे स्वीकार नहीं किया जाएगा। मार्केटिंग वाले हर बार अस्वीकार किए जाने पर अपना कार्ड आगे बढ़ा देते हैं, कि सर जब भी जरूरत हो तब याद कीजिएगा।
जीवन में जब पत्नी से विवाद होता है तो यह अनुभव काम आता है और हर बार बात बिगड़ने से बच जाती है। लेकिन जब सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल्स के बीच झगड़ा होता है तो वे इंटरनेट पर नए विकल्प सर्च करने लगते हैं। इस उदाहरण को सच मानिए या कल्पना जो भी, लेकिन सीख यही है कि हम अपने अनुभवों से ही समृद्ध होते हैं। अनुभव ही हमारे जीवन का अर्थ है।
जीवन एक आश्चर्य है। लेकिन बहुत सारे लोग जीवन के आश्चर्य का आनंद ही नहीं उठाते। जब हम अनुभव नहीं करते तो हम किसी भी चीज का आनंद नहीं ले पाते हैं। किसी को नियाग्रा फाल भेजिए और अगर वह अनुभव नहीं करता तो कहेगा अरे मेरे गांव में पानी नहीं है और यहां पानी बरबाद हो रहा है।
जीवन में अगर अनुभव नहीं है तो जीवन यंत्रवत है। यंत्रवत जीवन में ही तनाव नजर आता है। प्रसन्न्ता का अभाव वहीं है जहां जीवन यंत्रवत हो गया है और उसमें अनुभव के लिए जगह नहीं बची है। चीजों को समझने में जानकारी (नॉलेज) आपकी मदद नहीं कर सकती है बल्कि आपका ज्ञान (अनुभव) ही मदद कर सकता है।
भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्‌गीता में कहा 'हर चीज में आश्चर्य है।' लेकिन तभी, जब हम आश्चर्य का अनुभव करें। अपने दिल को खोलकर रहो तो हर पल आनंद है। जब सूर्य उगता है तो आश्चर्य है, फूल खिलना आश्चर्य है, बारिश आश्चर्य है। हर छोटी-छोटी घटना में आश्चर्य और आनंद है। चीजों को समझने से आश्चर्य है और न समझो तो भी आश्चर्य है!
कई बार जब मैं युवाओं से बात करता हूं तो उन्हें मर्लिन मुनरो का उदाहरण देता हूं। बताता हूं कि किस तरह जीवन में बाह्य सफलता के साथ आंतरिक प्रसन्न्ता भी महत्व रखती है। मर्लिन मुनरो हॉलीवुड की सबसे सुंदर नायिका थी। उसके पास बहुत पैसा था और उसके कई प्रेम प्रसंग भी थे, लेकिन उसने आत्महत्या कर ली। तो जीवन में सफलता सबकुछ नहीं है।
वह जीवन की परिपूर्णता नहीं है। सफलता के बावजूद भी जीवन में असफलता का एहसास बना रहेगा। भारतीय दर्शन यही कहता है कि सफलता ही सब कुछ नहीं है बल्कि आपको संतुष्टि भी चाहिए। संसार में बाहरी जीत सफलता है लेकिन आंतरिक जीत संतुष्टि है। इसलिए जीवन का लक्ष्य पता होना चाहिए।
पता होना चाहिए कि हम क्या पाना चाहते है। सफलता और संतुष्टि के बीच संतुलन साधना हर किसी को आना चाहिए। यह आ गया तो ही जीवन सुंदर है।

( स्वामी जी के व्याख्यान पर आधारित) sabhar :http://naidunia.jagran.com/

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