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जीवन की भौतिकवादी दृष्टि


जीवन की भौतिकवादी दृष्टि

अपनी परकाष्ठा पर पहुंचे दो जीवन-दर्शनों के कारण मनुष्य का मन भी विभाजित और खंडित है. दोनों दर्शनों में अतिरंजना है, दोनों दो तार्किक छोरों पर हैं.
कभी लोग इस दर्शन को-‘खाओ, पियो और मौज करो’ के नाम से पुकारते हैं, जो संयोगवश जीवन का भौतिकवादी दृष्टिकोण है. यह कहीं नहीं पहुंचाता और न कुछ घटने जा रहा है, इसलिए तुम उस क्षण में छोड़ दिए गए हो, जिससे अधिकतम अपना बना लो. मृत्यु पूरी तरह से सब कुछ नष्ट कर कर देगी इसलिए परमात्मा, सत्य, मुक्ति, मोक्ष या निर्वाण प्राप्ति के रूप में दूसरे किनारे की फिक्र ही मत करो. ये सभी मात्र भ्रम हैं, इनका कोई अस्तित्व है ही नहीं. इसलिए उस क्षण से तुम जितना भी रस निचोड़ सकते हो, निचोड़ लो.
बहुत अधिक लोग इसी तरह जीते हैं, और बहुत कुछ से चूक जाते हैं- क्योंकि जीवन मात्र संयोग नहीं है. वहां उसका कुछ कारण और उद्देश्य है, क्योंकि जीवन एक फैलाव या विस्तार है. भविष्य बंजर नहीं है. उसमें कुछ सृजित होने जा रहा है. एक तैयारी की जरूरत है, जिससे तुम विस्तीर्ण हो सको, जिससे तुम्हारा बीज अपना उद्देश्य प्रकट कर सके, जिससे तुम जान सको कि तुम कौन हो और यह अस्तित्व है क्या? जीवन पूरा ब्रह्माण्ड है. हो सकता है तुम परिधि पर शरीर के सिवा और कुछ अधिक न देख सको. उसी तरह जैसे सागर तट पर खड़े हुए तुम सागर की गहराई नहीं देख सकते, केवल उसकी लहरें ही देखते हो. लेकिन सागर मात्र लहरें ही नहीं है. लहरें तो सागर का आलोड़न मात्र हैं और सागर में बहुत गहराई है. लेकिन उसकी गहराई जानने के लिए किसी व्यक्ति को गहरे में गोता लगाना होगा.
भौतिकवादी दृष्टिकोण ने जीवन को पूरी तरह अर्थहीन बना दिया है. जीवन और मृत्यु दोनों एक जैसे हैं. जीवन और कुछ भी नहीं, बल्कि मरने का एक ढंग है. तुम मरने जा रहे हो, तुम कैसे मरते हो इससे कोई भी फर्क नहीं पड़ता. जब तुम मर जाते हो, तो उससे भी कोई अंतर नहीं पड़ता. इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम कितनी अवधि तक जीये और फिर मर गये. यह दृष्टिकोण एक अर्धसत्य है-और आधा सच बहुत खतरनाक होता है, झूठ से भी कहीं अधिक खतरनाक, क्योंकि उसमें थोड़ा सा सत्य होता है. किसी चीज का थोड़ा सा होना बहुत बहुत धोखा दे सकता है. पूरा झूठ इतना खतरनाक नहीं होता, क्योंकि वह अधिक समय तक धोखा नहीं दे सकता. देर-सवेर तुम जानोगे ही कि वह झूठ है. आधे सच या अर्धसत्य बहुत खतरनाक होते हैं.
साभार : ओशो वर्ल्ड फाउंडेशन
स्रोत :http://www.samaylive.com/

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