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शुक्रवार, 25 अप्रैल 2014

गुजरात में मिला समुद्र मंथन का पर्वत, यहीं किया था शिव ने विषपान

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गुजरात में मिला समुद्र मंथन का पर्वत, यहीं किया था शिव ने विषपान

सूरत। दक्षिण गुजरात के समुद्र में समुद्रमंथन वाला पवर्त मिला है। वैज्ञानिक परीक्षण के आधार पर इसकी पुष्टि भी की जा रही है। पिंजरत गांव के समुद्र में मिला पर्वत बिहार के भागलपुर में विराजित मूल मांधार शिखर जैसा ही है। गुजरात-बिहार का पर्वत एक जैसा ही है। दोनों ही पर्वत में घ्ग्रेनाइट– की बहुलता है। 
 
सामान्यत: समुद्र की गोद में मिलने वाले पर्वत ऐसे नहीं होते। सूरत के आॉर्कियोलॉजिस्ट मितुल त्रिवेदी ने कॉर्बन टेस्ट के परीक्षण के बाद यह निष्कर्ष निकाला है। उन्होंने दावा किया है कि यह समुद्रमंथन वाला ही पर्वत है। इसके समर्थन में अब प्रमाण भी मिलने लगे हैं।  ओशनोलॉजी ने अपनी वेबसाइट पर इस तथ्य की आधिकारिक रूप से पुष्टि भी की है।
गुजरात में मिला समुद्र मंथन का पर्वत, यहीं किया था शिव ने विषपान

द्वारकानगरी की खोज, मिला मांधार शिखर:
 
सूरत के ओलपाड से लगे पिंजरत गांव के समुद्र में 1988 में प्राचीन द्वारकानगरी के अवशेष मिले थे। डॉ. एस.आर.राव इस साइट पर शोधकार्य कर रहे थे। सूरत के मितुल त्रिवेदी भी उनके साथ थे। विशेष कैघ्सूल में डॉ. राव के साथ मितुल त्रिवेदी भी समुद्र के अंदर 800 मीटर की गहराई तक गए थे। तब समुद्र के गर्भ में एक पर्वत मिला था। इस पर्वत पर घिसाव के निशान नजर आए। ओशनोलॉजी डिपार्टमेंट ने पर्वत के बाबत गहन अध्ययन शुरू किया। पहले माना गया कि घिसाव के निशान जलतरंगों के  हो सकते हैं। विशेष कॉर्बन टेस्ट किए जाने के बाद पता चला कि यह पर्वत मांधार पर्वत है। पौराणिक काल में समुद्रमंथन के लिए इस्तेमाल हुआ पर्वत है। दो वर्ष पहले यह जानकारी सामने आई, किन्तु प्रमाण अब मिल रहे हैं।

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अब आगे क्या:
पिंजरत के पास खोजकार्य फिलहाल बंद है। दूसरे शब्दों में सभी शोधकार्य लटके हुए हैं। सरकार ने इजाजत दी तो इन पर पुनघ् काम शुरू हो सकेगा।
 
वीडियो-आर्टिकल में भी पुष्टि:
ओशनोलॉजी डिपार्टमेंट ने वेबसाइट पर लगभग 50 मिनट का एक वीडियो जारी किया है। इसमें पिंजरत गांव के समुद्र से दक्षिण में 125 किलोमीटर दूर 800 की गहराई में समुद्रमंथन के पर्वत मिलने की बात भी कही है। वीडियो में द्वारकानगरी के अवशेष की भी जानकारी है। इसके अलावा वेबसाइट पर एशियन्ट द्वारका के आलेख में ओशनोलॉजी डिपार्टमेंट द्वारा भी इस तथ्य की पुष्टि की गई है।

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ऐसे हुई तस्दीक, ये टेस्ट भी:
 
ऑर्कियोलॉजी डिपार्टमेंट ने सबसे पहले अलग-अलग टेस्ट किए। इनसे साफ हुआ कि पर्वत पर नजर आ रहे निशान जलतरंगों के कारण नहीं पड़े हैं। तत्पश्चात, एब्स्यूलूट मैथड,रिलेटिव मैथड, रिटन मॉर्कर्स, एईज इक्वीवेलन्ट स्ट्रेटग्राफिक मॉर्कर्स एवं  स्ट्रेटीग्राफिक रिलेशनशिघ्स मैथड तथा लिटरेचर व रेफरन्सिस का भी सहारा लिया गया।


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विभाग ने कर दी है पुष्टि :
 
आर्कियोलॉजिस्ट मितुल त्रिवेदी के बताए अनुसार यू-ट्यूब पर ओशनोलॉजिस्ट विभाग ने 50 मिनट का एक वीडियो अपलोड किया है। इसमें विभाग ने पिंजरत के पास 125 किमी दूर समुद्र में 800 फुट नीचे द्वारका नगरी के अवशेषों के साथ मन्दराचल पर्वत की भी खोज की है। ओशनोलॉजिस्ट वेबसाइट पर आर्टिकल में विभाग द्वारा इस बात की पुष्टि कर दी गई है।

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पुराण कथाओं के अनुसार :
 
द्वारका नगरी के पास ही देवताओं और राक्षसों ने अमृत की प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन किया था। इस मंथन के लिए मन्दराचल पर्वत का उपयोग किया था। समुद्र मंथन के दौरान विष भी निकला था, जिसे महादेव शिव ने ग्रहण कर लिया था। 

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मितुल त्रिवेदी 42 भाषएं और 9 लिपि जानते हैं:
 
आर्कियोलॉजिस्ट मितुल त्रिवेदी 42 भाषाएं और 8 लिपियों के जानकार हैं। वे नासा, आर्कियोलॉजिस्ट विभाग और इसरो से भी जुड़े हुए हैं। हडप्पा-मोहेंजोदडो की भाषा का उन्हीं ने अनुवाद किया था।

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sabhar :bhaskar.com





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