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रविवार, 13 अप्रैल 2014

आध्यात्मिक विकास का मंत्र

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आध्यात्मिक विकास का मंत्र

ज्ञान का अर्थ है-विद्या बुद्धिमत्ता, विवेक दूरदर्शिता, सद्भावना, उदारता, न्याय प्रियता. विज्ञान का अर्थ है- योग्यता, साधन, शक्ति, सम्पन्नता, शीघ्र सफलता प्राप्त करने की सामर्थ्य.
आत्मिक और भौतिक दोनों क्षेत्रों में जब संतुलित उन्नति होती है, तभी उसे वास्तविक विकास माना जाता है.
भारत प्राचीन काल में बुद्धिमान बनने के लिए ज्ञान की और बलवान बनने के लिए विज्ञान की उपासना में संलग्न रहता था. योगी लोग जहां भक्ति भावना द्वारा भगवान में संलग्न होते थे, वहां कष्ट साध्य साधनाओं तथा तपश्चर्याओं द्वारा अपने में अनेक प्रकार की सामथ्र्य भी उत्पन्न करते थे. भावना से भगवान और साधना से शक्ति प्राप्त होती है, यह निर्विवाद है.
आज का ज्ञान प्रत्यक्ष दृश्यों, अनुभवों व विज्ञान मशीनों पर अवलंबित है. वैज्ञानिक भौतिक जानकारी तथा शक्तियां पाने के लिए भौतिक उपकरणों का प्रयोग कर रहे हैं. यह तरीका  खर्चीला, श्रमसाध्य, स्वल्पफलदायक एवं अस्थायी है. जो ज्ञान बड़े-बड़े विद्वानों, प्रोफेसरों, द्वारा उत्पन्न किया जा रहा है, वह भौतिक जानकारी तो काफी बढ़ा देता है, पर उससे अंत:करण में आत्मिक महानता, उदार दृष्टि तथा लोकसेवा के लिए आत्म त्याग की भावना पैदा नहीं होती. प्राचीनकाल में ज्ञान और विज्ञान के आधार आज से भिन्न थे.
आज जिस प्रकार हर वस्तु जड़ जगत और भौतिक परमाणुओं में से खोजी और उपलब्ध की जाती है, उसी प्रकार प्राचीन काल में प्रत्येक प्रत्येक शक्ति आत्मिक जगत में से ढूंढ़ी जाती थी. आज का आधार भौतिकता है, प्राचीनकाल का आधार आध्यात्मिकता था.
ज्ञान-विज्ञान का प्राचीन शोध गायत्री और यज्ञ के आधार पर होता था. यही दोनों अध्यात्म विद्या के माता-पिता हैं. गायत्री ज्ञान रुपिणी है, यज्ञ विज्ञान प्रतीक है. गायत्री मंत्र के 24 अक्षरों में मनुष्य जाति का ठीक प्रकार प्रदर्शन करने वाली शिक्षाएं भरी हैं. इन अक्षरों का गुंथन रहस्यमय विद्या के रहस्यमय आधार पर भी है.
इनकी नियमित उपासना से अलौकिक शक्तियां एवं आध्यात्मिक गुणों की तेजी से अभिवृद्धि होती है, बुद्धि तीव्र होती है, जिसके आधार पर जीवन की समस्या की अनेक गुत्थियों को सरल किया जा सकता है. यज्ञ का विज्ञान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है. सांस्कृतिक पुनर्त्थान ज्ञान-विज्ञान बिना असंभव है. भारतीय संस्कृति के बीज मंत्र गायत्री की शिक्षाओं तथा शक्तियों के आधार पर हमारा सारा ढांचा खड़ा है. यदि हम गायत्री माता और यज्ञ पिता की प्रतिष्ठा और उपासना करें तो और भी उत्तम व महत्त्वपूर्ण वस्तुएं पा सकते हैं.
-गायत्री तीर्थ शांतिकुंज हरिद्वार sabhar :http://www.samaylive.com/

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