रविवार, 27 अप्रैल 2014

तो क्या पानी पर चलना हो सकता है संभव

तो क्या पानी पर चलना हो सकता है संभव!

हम रोजाना जिन चीजों का इस्तेमाल करते हैं उन्हें बनाने में विज्ञान की क्या भूमिका है।

किस तरह सामान्य प्रक्रियाओं के जरिये पदार्थ की खास प्रकृति को बदलकर तरह-तरह की चीजें बनाई जा सकती हैं। यहां तक कि पानी पर चलना संभव है। बेंगलूर स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ सांइस के प्रोफेसर अजय के . सूद ने अत्यंत सरल भाषा और उदाहरणों के जरिये इस बाबत बताया।
श्रीराम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल रिसर्च के 50वें फाउंडर मेमोरियल लेक्चर में 'ड्रिवेन सॉफ्ट मैटर : कनेक्टिंग डीप साइंस टू एवरीडे लाइफ' विषय पर बोलते हुए प्रो. सूद ने कहा कि दूध, मक्खन, साबुन, शैंपू, चाकलेट, फेस क्रीम, पेंट जैसे अ‌र्द्ध ठोस-अ‌र्द्ध तरल पदार्थ ड्रिवेन या चलायमान श्रेणी में आते हैं। इनमें हलचल पैदा कर न केवल इनके गुणों में बदलाव लाया जा सकता है, बल्कि इन्हें जरूरत के मुताबिक विभिन्न आकार-प्रकार या रंग या स्वाद दिया जा सकता है।
मथने, विद्युत क्षेत्र में रखने या किसी माध्यम में घुमाने या हिलाने से इन पदार्थो की प्रकृति बदल जाती है। केवलार की शीट में सामान्य मजबूती होती है। लेकिन जब इसकी दो शीटों के बीच ऐसे खास पदार्थ को खास प्रक्रिया के तहत भरा जाता है तो यह बुलेट प्रूफ बन जाती है। पैथोलॉजी लैब में एंटीजेन कणों को एंटीबॉडी कणों संग घुमाने से वे आपस में चिपक जाते हैं और इस तरह खास बीमारियों का पता चल जाता है। यदि पानी में 50 फीसद मे की स्टार्च मिला दी जाए तो इस घोल से भरे पूल को पैदल पार किया जा सकता है।
कार्यक्रम के प्रारंभ में निदेशक डॉ. केएम चाको ने श्रीराम इंस्टीट्यूट की उपलब्धियों की चर्चा की। साथ ही सर लाला श्रीराम के दूरदर्शी व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण किया। डॉ. श्रीमती मंजू शर्मा ने प्रो. सूद को धन्यवाद दिया। लेक्चर सुनने वालों में प्रो. एमजीके मेनन, प्रो. यशपाल समेत कई वैज्ञानिक, शिक्षाविद तथा इंस्टीट्यूट के छात्र व गणमान्य व्यक्ति शामिल थे। sabhar :http://hindi.ruvr.ru/
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