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गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

वृद्धावस्था को रोकने आजीवन युवा रहने के लिए कुछ रिसर्च

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स्किन सेल्स से बन सकेंगे नए ऑर्गन्स


लंदन 
वैज्ञानिकों ने इंसानी शरीर की त्वचा की कोशिकाओं (स्किन सेल्स) से स्टेम सेल्स तैयार करने से जुड़ी बड़ी उपलब्धि हासिल की है। इन स्टेम स्टेल्स में एंब्रियो या भ्रूण में तब्दील होने की क्षमता है। एक टॉप साइंटिस्ट ने 'द इंडिपेंडेंट' को रविवार को यह जानकारी दी। इस तकनीक का परीक्षण चूहों पर पूरी तरह से कामयाब रहा है और वैज्ञानिक मानते हैं कि यह इंसानों के लिए भी बिलकुल फिट रहेगा। ऐसे में इंसानों में होने वाली असाध्य बीमारियों मसलन पार्किन्सन, हार्ट डिजीज आदि के बेहतर इलाज की संभावनाएं और मजबूत हो चली हैं। दरअसल, इस तकनीक के जरिए बीमारी से ग्रस्त अंगों को मरीज के स्टेम सेल्स के जरिए दोबारा से तैयार किया जा सकता है।

जर्म सेल्स भी किए जा सकते हैं तैयार 
हालांकि, स्किन सेल्स से इंसानी भ्रूण तैयार करने की फिलहाल कोई मंशा नहीं है, लेकिन वैज्ञानिकों का मत है कि ऐसा किया जाना सैद्धांतिक तौर पर मुमकिन है। प्रयोग के दौरान चूहों के भ्रूण तैयार करने में कामयाबी मिलना इस बात का संकेत देते हैं कि इन भ्रूण से किसी खास तरह के टिशू (ऊतक) तैयार किए जा सकते हैं, जो अंग विकसित करने की दिशा में अहम साबित होगा। यहां तक कि इस तकनीक से जर्म सेल्स भी तैयार किए जा सकते हैं, जिनसे स्पर्म और डिंब (एग्स) बनते हैं।



मशीनी अवतार से अमर बनेगा मनुष्य


मुकुल व्यास

मनुष्य अनंतकाल से अमृत की तलाश कर रहा है और अब विज्ञान भी अमरत्व के नुस्खे खोजने में जुट गया है। वृद्धावस्था को रोकने या आजीवन युवा रहने के लिए कुछ रिसर्च वैज्ञानिक आधार पर हो रही हैं और कुछ बातें कल्पना लोक में तैर रही हैं। एक रूसी धनकुबेर द्मित्री इत्स्कोव अपने अति महत्वाकांक्षी 'अवतार' प्रोजेक्ट के जरिए मनुष्य को टर्मिनेटर जैसे साइबोर्ग के रूप में अमर बनाने का सपना देख रहे हैं। उनका इरादा 2045 तक मनुष्य की चेतना को एक मशीन में हस्तांतरित करने का है, जहां उसकी पर्सनैलिटी और यादें हमेशा जिंदा रहेंगी। इस अवतार का कोई भौतिक रूप नहीं होगा।

इसका अस्तित्व सिर्फ इंटरनेट जैसे नेटवर्क में होगा। इस तरह के साइबोर्ग होलोग्राम के माध्यम से अपने माहौल के साथ संवाद करेंगे। इत्स्कोव के प्रोजेक्ट में इस समय साइंस कम और साइंस-फिक्शन ज्यादा दिखता है, लेकिन वह अपने इरादों के प्रति गंभीर हैं और इसके लिए वैज्ञानिकों की भर्ती कर रहे हैं। समाज को 'नव-मानवता' की ओर ले जाने के लिए वह संयुक्त राष्ट्र महासचिव की मदद भी मांग रहे हैं।यह तो वक्त ही बताएगा कि इत्स्कोव अपनी योजना को कितना आगे बढ़ा पाएंगे, लेकिन भविष्य में एजिंग के दुष्प्रभावों को रोकना संभव हो सकता है। बहुत मुमकिन है कि मनुष्य का जीवनकाल बढ़ाने का कोई कारगर तरीका भी हाथ लग जाए। वैज्ञानिक एजिंग की प्रक्रिया के पीछे आणविक और आनुवंशिक कारणों को समझने की कोशिश कर रहे हैं। बर्कली स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया (यूसी) में किए गए एक अध्ययन को इस दिशा में महत्वपूर्ण सफलता मिली है, साथ ही इससे बुढ़ापे से जुड़ी बीमारियों के इलाज के नए तरीके विकसित करने की उम्मीद भी जग गई है। यूसी के रिसर्चरों ने अपने एक प्रयोग में एक बूढ़े चूहे की रक्त स्टेम कोशिका में एक दीर्घायु जीन मिला कर उसकी आणविक घड़ी को पीछे खिसका दिया। इससे बूढ़ी स्टेम कोशिकाओं में नई जान आ गई और वे फिर से नई ब्लड स्टेम कोशिकाएं उत्पन्न करने में समर्थ हो गईं।

दीर्घायु जीन का नाम 'सर्ट-3' है। यह दरअसल 'सर्ट' समूह का प्रोटीन है, जो ब्लड स्टेम कोशिकाओं को स्ट्रेस से निपटने में मदद करता है। प्रमुख रिसर्चर डेनिका चेन के अनुसार यह खोज बहुत रोमांचक है और इससे बुढ़ापे से जुड़ी बीमारियों के इलाज के तरीके विकसित करने का रास्ता खुल गया है। पिछले 10-20 वर्षों में वैज्ञानिकों को बुढ़ापे की प्रक्रिया को समझने में कई सफलताएं मिली हैं। वृद्धावस्था को अब अनियंत्रित और बेतरतीब प्रक्रिया नहीं माना जाता। यह बहुत ही नियंत्रित प्रक्रिया है, लेकिन इसमें फेरबदल की गुंजाइश है। चेन के मुताबिक एक अकेले जीन के म्यूटेशन या परिवर्तन से जीवनकाल बढ़ाया जा सकता है। प्रश्न यह है कि क्या हम इस प्रक्रिया को समझ कर वृद्धावस्था को सचमुच पलट सकते हैं?

रिसर्चरों ने सबसे पहले ऐसे चूहों के ब्लड सिस्टम का अध्ययन कियाजिनमें सर्ट-3 प्रोटीन के जीन को निष्क्रियकर दिया गया था। रिसर्च से पता चलता है कि युवा कोशिकाओं में ब्लड स्टेम कोशिकाएं अच्छे ढंग से काम करतीहैं और उन्हें बहुत कम 'ऑक्सीडेटिव स्ट्रेसका सामना करना पड़ता है। आक्सीडेटिव स्ट्रेस शरीर के भीतरमेटाबोलिज्म अथवा कोशिकाओं में कुदरती रासायनिक प्रक्रियाओं का एक नुकसानदायक बायप्राडक्ट है। इससेशरीर पर बोझ बढ़ता है। मेटाबोलिज्म के दौरान ऑक्सीजन का एक स्वतंत्र अणु निकलता हैजिसे फ्री रेडिकलभी कहा जाता है। इसमें इलेक्ट्रिकल चार्ज होता है। यदि इस अणु को किसी एंटी ऑक्सीडेंट से तुरंत न्यूट्रलाइजनहीं किया जाता तो यह और ज्यादा फ्री रेडिकल उत्पन्न करता है। इससे कोशिका की दीवार के प्रोटीन और यहांतक कि कोशिका के डीएनए को भी नुकसान पहुंचता है। फ्री रेडिकलों का एक्शन एक कटे हुए सेब के भूरा पड़नेया लोहे के जंग खाने जैसा ही है। शरीर पर दिखने वाले बुढ़ापे के लक्षण ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस के कारण ही होते हैं।वृद्धावस्था की कई बीमारियां भी इसी वजह से होती हैं।

युवावस्था में शरीर की एंटी-ऑक्सीडेंट प्रणाली कम स्ट्रेस को आसानी से झेल सकती हैलेकिन उम्र बढ़ने के साथहमारा सिस्टम ठीक से काम नहीं करता क्योंकि हम या तो ज्यादा ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस उत्पन्न करते हैं या उसे हटानहीं पाते। इन स्थितियों में हमारी सामान्य एंटी-ऑक्सीडेंट प्रणाली काम नहीं करती और हमें सर्ट-3 की जरूरतपड़ती हैलेकिन उम्र के साथ सर्ट-3 का लेवल भी कम हो जाता है। एंटी-एजिंग उपायों के लिए कुछ जीव-जंतुओंमें पाए जाने दीर्घायु संबंधी गुणों का भी अध्ययन किया जा रहा है। अमेरिकी और इस्राइली रिसर्चर यह पतालगाने की कोशिश कर रहे हैं कि पूर्वी अफ्रीका में पाए जाने वाले नेकेड मोल रैट के लंबे और सक्रिय जीवन काराज क्या है। चूहे के इस अनोखे रिश्तेदार में एनआरजी-1 नामक प्रोटीन की मात्रा बहुत ज्यादा पाई गई हैजोकिअसामान्य बात है। मानव शरीर की तुलना में इस चूहे के शरीर पर एजिंग का प्रतिकूल प्रभाव बहुत कम पड़ताहै। 10 से 30 साल तक जीने वाला यह जंतु अंत-अंत तक अपनी बौद्धिक क्षमताप्रजनन शक्ति और बोन हेल्थ कोबनाए रखता हैजबकि सामान्य चूहा औसतन तीन साल में जर्जर बूढ़ा होकर मर जाता है।

कुछ वैज्ञानिक मनुष्यों को ज्यादा समय तक युवा बनाए रखने और उनके जीवन को लंबा करने के लिए फ्रूटफ्लाइज का अध्ययन कर रहे हैं। फ्रूट फ्लाइज और मनुष्यों के जीनों में करीब 60 प्रतिशत तक समानता होती है।दोनों में एजिंग की प्रक्रिया भी लगभग एक जैसी है। यूनिवर्सिटी कालेज लंदन स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ एजिंगके वैज्ञानिक बुढ़ापे से निपटने के मकसद से आनुवंशिकी और लाइफ स्टाइल फैक्टरों का अध्ययन कर रहे हैं।इंस्टीट्यूट में रिसर्च टीम से जुड़े प्रमुख वैज्ञानिक मैथ्यू पाइपर का कहना है कि यदि हमें एजिंग से जुड़े जीन मिलजाते हैं तो एजिंग की घड़ी को हम आगे खिसका सकते हैं। डॉपाइपर के मुताबिक फू्रट फ्लाइज मनुष्यों की तरहही बूढ़ी होती हैं। प्रयोगशाला में जीनों के म्यूटेशन से भी कुछ जीव-जंतुओं का जीवन बढ़ाने में सफलता मिली है।जीवन को लंबा करने का एक और तरीका है आहार पर नियंत्रण। डॉपाइपर का कहना है कि यदि आप किसी चूहेके आहार में 40 प्रतिशत की कमी कर दें तो वह 20 या 30 प्रतिशत ज्यादा जीवित रहेगा। वैज्ञानिकों का दावा हैकि आहार पर नियंत्रण से मनुष्य का जीवन काल भी बढ़ाया जा सकता है।

 

हो रहा है बुढ़ापा रोकने का इंतजाम

भविष्य में एजिंग (बुढ़ापा) के इफेक्ट्स को रोकना संभव हो सकता है और बहुत मुमकिन है कि मनुष्य का जीवनकाल बढ़ाने का कोई कारगर तरीका भी हाथ लग जाए। वैज्ञानिक एजिंग की प्रक्रिया के पीछे मौजूद आणविक कारणों को समझने की कोशिश कर रहे हैं।

बर्कली स्थित युनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया (यूसी) में किए गए एक अध्ययन में इस दिशा में महत्वपूर्ण सफलता दर्ज की गई है और इससे बुढ़ापे से जुड़ी बीमारियों के इलाज के नए तरीके विकसित करने की उम्मीद जग गई है। यूसी के रिसर्चरों ने अपने एक प्रयोग में एक बूढ़े चूहे की रक्त स्टेम कोशिका में एक दीर्घायु जीन मिला कर उसकी आणविक घड़ी को पीछे खिसका दिया। इससे बूढ़ी स्टेम कोशिकाओं में नई जान आ गई और वे फिर से नई ब्लड स्टेम कोशिकाएं उत्पन्न करने में समर्थ हो गईं। दीर्घायु जीन का नाम 'सर्ट 3' है।

यह दरअसल 'सर्ट' समूह का प्रोटीन है, जो ब्लड स्टेम कोशिकाओं को स्ट्रेस से निपटने में मदद करता है। रिसर्चरों ने जब बूढ़े चूहे की ब्लड स्टेम कोशिकाओं में 'सर्ट 3' मिलाया तो नई ब्लड स्टेम कोशिका बनने लगी। यह इस बात का सबूत था कि बूढ़ी ब्लड स्टेम कोशिका के फंक्शन में वृद्धावस्था से जुड़ी गिरावट न सिर्फ रुक गई, बल्कि उसमें पुनर्जीवित होने की क्षमता भी उत्पन्न हो गई। जीव वैज्ञानिकों को पहले से इस बात की जानकारी थी कि सर्ट ग्रुप के प्रोटीन बुढ़ापे की प्रक्रिया को नियंत्रित करते हैं, लेकिन यूसी टीम के अध्ययन में पहली बार यह साबित हुआ कि यह प्रोटीन स्वास्थ्य में आने वाली बुढ़ापे से जुड़ी गिरावट को भी पलट सकता है।
प्रमुख रिसर्चर डेनिका चेन के अनुसार यह खोज बहुत रोमांचक है और इससे बुढ़ापे से जुड़ी बीमारियों के इलाज के तरीके विकसित करने का रास्ता खुल गया है। पिछले 10-20 वर्षों में वैज्ञानिकों को बुढ़ापे की प्रक्रिया को समझने में कई सफलताएं मिली हैं। वृद्धावस्था को अब अनियंत्रित और बेतरतीब प्रक्रिया नहीं माना जाता। यह बहुत ही नियंत्रित प्रक्रिया है, लेकिन इसमें फेरबदल की गुंजाइश मौजूद है। चेन के मुताबिक एक अकेले जीन के म्यूटेशन या परिवर्तन से जीवनकाल बढ़ाया जा सकता है। प्रश्न यह है कि क्या हम इस प्रक्रिया को समझ कर वृद्धावस्था को सचमुच पलट सकते हैं?

बुढ़ापे की प्रक्रिया में सर्ट ग्रुप के प्रोटीन की भूमिका स्पष्ट होने के बाद वैज्ञानिक इसे और ज्यादा गहराई से समझने की कोशिश कर रहे हैं। सर्ट 3 प्रोटीन कोशिका के माइटोकॉन्ड्रिया में पाया जाता है। कोशिका का यह हिस्सा उसका पावरहाउस कहलाता है और यह उसके विकास और मृत्यु को नियंत्रित करने में मदद करता है। पिछले अध्ययनों में पता चला था कि सट र्3 जीन कैलोरी में कटौती के दौरान सक्रिय होता है। प्रयोगों के दौरान एक बात यह भी सामने आई कि कैलोरी में कटौती अनेक प्रजातियों में जीवन काल बढ़ाने में सहायक होती है।

एजिंग के प्रभावों को समझने के लिए रिसर्चरों ने वयस्क स्टेम कोशिकाओं के काम का अध्ययन किया। वयस्कस्टेम कोशिकाएं टिशूज के रखरखाव और उनकी मरम्मत के लिए जिम्मेदार होती हैं। उम्र बढ़ने के साथ स्टेमकोशिकाओं के इस फंक्शन में कमी आने लगती है। रिसर्चरों ने अपने अध्ययन के लिए रक्त स्टेम कोशिकाओं कोचुना क्योंकि वे ब्लड सिस्टम को पूरी तरह से पुनर्गठित करने की क्षमता रखती हैं।

रिसर्चरों ने सबसे पहले ऐसे चूहों के ब्लड सिस्टम का अध्ययन किया, जिनमंे सर्ट 3 प्रोटीन के जीन को निष्क्रियकर दिया गया था। हैरानी की बात यह थी कि युवा चूहों में सर्ट 3 की गैरमौजूदगी से कोई फर्क नहीं पड़ा। लेकिनजैसे-जैसे इन चूहों की उम्र बढ़ी, सर्ट 3 से युक्त सामान्य चूहों की तुलना में उनमें रक्त स्टेम कोशिकाओं की संख्याघटती गई और नई ब्लड कोशिकाओं को पुनर्जीवित करने की उनकी क्षमता भी कम हो गई। इससे पता चलता हैकि युवा कोशिकाओं में ब्लड स्टेम कोशिकाएं ठीकठाक ढंग से काम करती हैं और उन्हें बहुत कम 'ऑक्सीडेटिवस्ट्रेस' का सामना करना पड़ता है।

ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस शरीर के भीतर मेटाबोलिज्म अथवा कोशिकाओं में कुदरती रासायनिक प्रक्रियाओं का एकनुकसानदायक बायप्रॉडक्ट है। इससे शरीर पर बोझ बढ़ता है। मेटाबोलिज्म के दौरान ऑक्सीजन का एक स्वतंत्रअणु निकलता है, जिसे फ्री रेडिकल भी कहा जाता है। इसमें इलेक्ट्रिकल चार्ज होता है। यदि इस अणु को किसीएंटी ऑक्सीडेंट से तुरंत न्यूट्रलाइज नहीं किया जाता है तो यह और ज्यादा फ्री रेडिकल उत्पन्न करता है। इससेकोशिका की दीवार बनाने वाले प्रोटीन और यहां तक कि कोशिका के डीएनए को भी नुकसान पहुंचता है। फ्रीरेडिकलों का एक्शन एक कटे हुए सेब के भूरा पड़ने या लोहे के जंग खाने जैसा ही है। शरीर पर दिखने वालेबुढ़ापे के लक्षण ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस के कारण होते हैं और वृद्धावस्था से जुड़ी कई बीमारियां भी इसी वजह से होतीहैं।

युवावस्था में शरीर की एंटी-ऑक्सीडेंट प्रणाली थोड़े-बहुत स्ट्रेस को आसानी से झेल सकती है, लेकिन उम्र बढ़नेके साथ हमारा सिस्टम ठीक से काम नहीं करता क्योंकि हम या तो ज्यादा ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस उत्पन्न करते हैं याउसे हटा नहीं पाते। इन स्थितियों में हमारी सामान्य एंटी-ऑक्सीडेंट प्रणाली काम नहीं करती और हमें सर्ट 3 कीजरूरत पड़ती है, लेकिन उम्र के साथ सर्ट 3 का लेवल भी कम हो जाता है। रिसर्चरों ने जब बूढ़े चूहों में सर्ट3 कालेवल बढ़ाया तो उनकी रक्त स्टेम कोशिकाएं पुनर्जीवित होने लगीं। इसके चलते उनकी ब्लड कोशिकाओं काउत्पादन बढ़ गया।

अभी यह देखना बाकी है कि सर्ट 3 की अत्यधिक अभिव्यक्ति क्या सचमुच में किसी की उम्र बढ़ा सकती है। लेकिनवैज्ञानिकों का कहना है कि जीवन काल बढ़ाना ही इस रिसर्च का एकमात्र लक्ष्य नहीं है। आनुवंशिक नियंत्रण केज्ञान का उपयोग वृद्धावस्था से जुड़ी बीमारियों के लिए किया जाएगा और यह एजिंग से संबंधित रिसर्च का एकप्रमुख लक्ष्य है। यूसी बर्कली में चेन की लैब में काम करने वाली एक अन्य वैज्ञानिक कैथरीन ब्राउन का कहना हैकि इस रिसर्च में सर्ट 3 से काफी उम्मीदें हैं। हमें इसमें काफी संभावनाएं दिखाई देती हैं। कुछ अन्य रिसर्चर इसप्रोटीन में ट्यूमर को दबाने के गुण को पहले ही उजागर कर चुके हैं। 

मानव क्लोनिंग अचानक करीब

वैज्ञानिकों ने त्वचा की स्टेम कोशिकाओं को प्रारंभिक भ्रूणों में बदल कर मानव क्लोनिंग में एक बहुत बड़ी सफलता प्राप्त की है। स्टेम कोशिकाएं वे कोशिकाएं होती हैं, जो विभाजित होने के बाद शरीर की किसी भी विशिष्ट कोशिका के रूप में विकसित हो सकती हैं। नई तकनीक से उत्पन्न भ्रूणों का इस्तेमाल प्रत्यारोपण ऑपरेशनों के लिए विशिष्ट मानव टिशू उत्पन्न करने में किया गया है। क्लोनिंग तकनीक में यह सफलता डॉली नामक भेड़ के जन्म के 17 के बाद हासिल हुई है और इससे हृदय रोग और पार्किंसन जैसे बीमारियों के बेहतर इलाज की उम्मीदें जग गई हैं। लेकिन इस सफलता से कुछ नए विवाद खड़े हो सकते हैं। कुछ लोग मेडिकल उद्देश्यों के लिए मानव भ्रूण उत्पन्न करने पर नैतिक सवाल उठाएंगे। सबसे बड़ा खतरा यह है कि शिशु क्लोन चाहने वाले दंपतियों के लिए इसी तकनीक से परखनली भ्रूण उत्पन्न किए जा सकते हैं। बहरहाल, नई तकनीक विकसित करने वाले वैज्ञानिकों का दावा है कि उनकी रिसर्च का मुख्य उद्देश्य मरीज की अपनी स्टेम कोशिकाओं से ऐसे विशिष्ट टिशू उत्पन्न करने का है, जिन्हें प्रत्यारोपण के लिए इस्तेमाल किया जा सके। उनका यह भी कहना है कि इस तकनीक का प्रजनन से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन दूसरे वैज्ञानिकों का मानना है कि इस उपलब्धि से हम शिशु क्लोन की दिशा में एक कदम और आगे बढ़ गए हैं।
मरीज की स्टेम कोशिकाओं से समुचित मात्रा में भ्रूणीय स्टेम कोशिकाएं उत्पन्न करना चिकित्सा विज्ञान के लिए एक बड़ी चुनौती थी। अमेरिका में पोर्टलैंड स्थित ओरेगन हेल्थ एंड साइंस यूनिवर्सिटी के प्रमुख रिसर्चर शोहरत मितालिपोव ने बताया कि उन्होंने बहुत कम मात्रा में मानव अंडाणुओं से भ्रूणीय स्टेम कोशिकाएं उत्पन्न करने के लिए सेल के कल्चर में कैफीन मिलाई थी। पहले यह सोचा गया था कि ऐसा करने के लिए हजारों मानव अंडाणुओं की जरूरत पड़ेगी। लेकिन मितालिपोव की टीम ने सिर्फ दो मानव अंडाणुओं से एक भ्रूण स्टेम कोशिका उत्पन्न करने में सफलता प्राप्त की। डॉ. मितालिपोव का कहना है कि यह तरीका मेडिकल इस्तेमाल के लिए ज्यादा कारगर और व्यावहारिक है। इस विधि से उन मरीजों के लिए स्टेम कोशिकाएं उत्पन्न की जा सकती हैं, जिनके अंग बेकार या अशक्त हो चुके हैं। इससे उन रोगों से छुटकारा पाने मदद मिलेगी, जो दुनिया में लाखों लोगों को प्रभावित करते हैं।
रिसर्चरों ने अपनी नई तकनीक में आनुवांशिक रोग वाले शिशु की स्किन कोशिकाएं निकाल कर उन्हें डोनेट किए गए मानव अंडाणुओं में प्रत्यारोपित कर दिया। इस विधि से उत्पन्न मानव भ्रूण आनुवंशिक दृष्टि से आठ महीने के भ्रूण से मिलते जुलते थे। भ्रूण से उत्पन्न कोशिकाओं में मरीज का ही डीएनए था, लिहाजा इन्हें बेहिचक मरीज के शरीर में प्रत्यारोपित किया जा सकता था। शरीर की प्रतिरोधी प्रणाली द्वारा उन्हें ठुकराने का कोई खतरा नहीं था। प्रयोगशाला में चूहों और बंदरों जैसे जानवरों में इस तकनीक से भ्रूण स्टेम कोशिकाएं उत्पन्न करने में सफलता मिल गई थी, लेकिन मनुष्यों में इसको दोहराने के प्रयास विफल हो रहे थे क्योंकि मानव अंडाणु कोशिकाएं बेहद नाजुक होती हैं।

सेल पत्रिका में प्रकाशित रिसर्च में वैज्ञानिकों ने अंडाणु के विकास में आने वाली समस्याओं से बचने के तरीके बताए और सिद्ध किया कि इस तकनीक से दिल, लिवर और स्नायु कोशिकाएं विकसित की जा सकती हैं। रिसर्चरों का विचार है कि पिछली क्लोनिंग तकनीकों की तुलना में नई विधि नैतिक दृष्टि से ज्यादा स्वीकार्य है क्योंकि इसमें निषेचित भ्रूणों का प्रयोग नहीं किया जाता। जापानी रिसर्चरों ने कुछ समय पहले मानव त्वचा से स्टेम सेल निकालने का तरीका विकसित किया था, लेकिन इसमें उन्होंने रसायनों का इस्तेमाल किया था। कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि इस तरीके से जीनों में हानिकारक बदलाव हो सकते हैं।दक्षिण कोरिया की सोल नेशनल यूनिवर्सिटी के वू सुक ह्वांग के नेतृत्व में कुछ वैज्ञानिकों ने 2004 में क्लोनिंग से मानव भ्रूण उत्पन्न करने का दावा किया था। बाद में उन्होंने इन भ्रूणों से भ्रूण स्टेम कोशिकाएं भी निकालने का दावा किया था। लेकिन अनैतिक आचरण और धोखाधड़ी के आरोपों के बाद उन्हें रिसर्च के नतीजों को वापस लेना पड़ा। इस प्रकरण से ह्वांग की काफी बदनामी भी हुई। कुछ अन्य रिसर्चरों ने भी क्लोनिंग से मानव भ्रूण उत्पन्न करने का दावा किया, लेकिन इनमें कोई भी यह साबित नहीं कर सका कि इन भ्रूणों से समुचित मात्रा में ऐसी भ्रूणीय कोशिकाएं उत्पन्न करना संभव है, जिन्हें प्रयोगशाला में विशिष्ट टिशू में बदला जा सके। डॉ. मितालिपोव की तकनीक की खास बात यह यह है कि क्लोन किए गए मानव भ्रूण 150 कोशिकाओं वाली अवस्था तक जीवित रह सकते हैं। इस अवस्था को ब्लास्टोसिस्ट भी कहते हैं। इस अवस्था से भ्रूण स्टेम कोशिकाएं निकाली जा सकती हैं, जिन्हें बाद में स्नायु कोशिकाओं, हृदय कोशिकाओं या जिगर की कोशिकाओं के रूप में विकसित किया जा सकता है। प्रत्यारोपण के दौरान मरीज द्वारा इन्हें खारिज किए जाने की कोई आशंका नहीं है क्योंकि इन कोशिकाओं को मरीज की अपनी आनुवंशिक सामग्री से ही उत्पन्न किया गया है।
इस क्लोनिंग तकनीक का दुरुपयोग संभव है। ह्यूमन जेनेटिक्स अलर्ट के निदेशक डेविड किंग का कहना है कि वैज्ञानिकों ने अंतत: वह रास्ता दिखा दिया है, जिसका मानव क्लोन बनाने में जुटे रिसर्चरों को बेसब्री से इंतजार था। उन्होंने कहा कि नई रिसर्च को प्रकाशित करना एक गैरजिम्मेदाराना कदम है। इस संबंध में और आगे रिसर्च शुरू होने से पहले ही हमें मानव क्लोनिंग पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगाने पर शीघ्र विचार करना चाहिए। कमेंट ऑन रीप्रॉडक्शन एथिक्स की जोसेफीन क्विंटावाल ने इस रिसर्च के औचित्य पर ही सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि स्टेम कोशिका उत्पन्न करने के गैरविवादित तरीके पहले से उपलब्ध हैं। ऐसे में इस रिसर्च की जरूरत क्या थी।

हमें उम्मीद करनी चाहिए कि इस रिसर्च को प्रजनन क्लोनिंग की तरफ मोड़ने की कोशिश नहीं की जाएगी। डॉ. मितालिपोव का कहना है कि वह क्लोनिंग के जरिए बंदर शिशु उत्पन्न करने में असफल रहे हैं। अत: इस बात की संभावना बहुत कम है कि इस तकनीक का प्रयोग मनुष्य के क्लोन उत्पन्न करने के लिए किया जाएगा। ब्रिटेन की न्यू कैसल यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर मैरी हर्बर्ट का मानना है कि नई तकनीक शरीर को अशक्त बनाने वाली बीमारियों के इलाज के लिए मरीज की जरूरत के हिसाब से स्टेम कोशिकाएं उत्पन्न करने में मदद कर सकती है। एडिनबरा विश्वविद्यालय के डॉ. पॉल डि सूजा का मानना है कि महिलाओं के अंडाणुओं के बारे में हमारी बेहतर समझदारी से इनफर्टिलिटी के नए इलाज खोजे जा सकते हैं। sabhar :http://navbharattimes.indiatimes.com/

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