गुरुवार, 10 अप्रैल 2014

गरीबी ने बना दिया वैज्ञानिक

गरीबी ने बना दिया वैज्ञानिक, सिर्फ 1200 में बनाई 1.25 लाख रुपए की मशीन

रायपुर.  मशरूम की खेती के लिए 69 साल की नानी को सवा लाख रुपए का उपकरण चाहिए था। घर की माली हालत खराब थी। 
 
एनआईटी पास मैकेनिकल इंजीनियर धीरज साहू ने जब नानी (अगास बाई) की परेशानी देखी तो महंगे उपकरण की सस्ती तकनीक वाला वर्जन बनाने की जिद ठान ली। जज्बा काम आया। कुछ दिनों की मेहनत से वैसा ही उपकरण ‘इनाकुलेशन चैंबर’ मात्र 1200 रुपए में तैयार हो गया। इसकी मदद से नानी ने मशरूम उत्पादन शुरू किया। अब आर्थिक स्थिति सुधरने लगी है।
 
सपना साकार हुआ 
 
धीरज के माता-पिता नानी के साथ कांकेर जिले के सिंगारभाट में रहते हैं। नानी ने मशरूम उगाने का प्रशिक्षण कृषि विज्ञान केंद्र से लिया। अगास बाई चाहती थीं कि मशरूम बीज उत्पादन से जुड़ें, लेकिन महंगी मशीन रोड़ा बन रही थी। जब नाती ने इनाकुलेशन चैंबर बना दिया तो सपना हकीकत बन गया।
 
दो महीने में 17 हजार कमाए  
 
मशरूम बीज उत्पादन में तीन हजार रुपए खर्च निकालने के बाद भी दो महीने में 17 हजार रुपए का शुद्ध मुनाफा हुआ है। अब तो दामाद यानी धीरज के पिता घनश्याम साहू भी सिलाई का काम छोड़कर मशरूम बीज तैयार करने में जुट गए हैं।
 
गरीबी ने बना दिया वैज्ञानिक, सिर्फ 1200 में बनाई 1.25 लाख रुपए की मशीन
ऐसे बनाई मशीन
 
धीरज के अनुसार बीज उत्पादन में लेमिनर फ्लो नामक उपकरण की जरूरत पड़ती है। यह बैक्टीरिया और फंगस खत्म करता है। उसने इस मशीन के काम करने के तरीके की जानकारी जुटाई। कांकेर के कृषि केंद्र में रखे इसी तरह के एक मॉडल का अध्ययन किया। इसके बाद अपनी तकनीक इजाद की और बीज बनाने की नई मशीन तैयार हो गई।
 
विवि प्रमोट करेगा
 
यह अच्छा इनोवेशन है। विशेषज्ञों से छोटी-मोटी खामियां दूर करवाकर इस तकनीक को प्रमोट करेंगे। इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (आईसीएआर) को भी सक्सेस स्टोरी भेजेंगे। उम्मीद है, यह तकनीक किसानों के लिए मददगार साबित होगी।
 
डॉ. एसके पाटिल, कुलपति, इंदिरा गांधी कृषि विवि, रायपुर 
 
फोटो- धीरज साहू की नानी (अगास बाई)

मां का दर्द सह न सका, खोज निकाली दवा
 
जमशेदपुर.  समस्या, पीड़ा, दर्द हो तो आमतौर पर लोग घबरा जाते हैं। जो इसका डट कर सामना करते हैं, वो कुछ ऐसा कर जाते हैं, जिससे समाज का भला होता है। देश-दुनिया को फायदा पहुंचता है।
 
डॉ अरविंद सिन्हा ऐसे इंसान हैं, जिनसे मां का दर्द सहा नहीं गया और ऐसी दवा खोज निकाली, जिससे आज लाखों लोगों का दुख दूर हो रहा है। डॉ सिन्हा नेशनल मेटलर्जिकल लेबोरेट्री (एनएमएल), जमशेदपुर में सीनियर प्रिंसिपल साइंटिस्ट हैं। उन्होंने ऐसा स्प्रे ईजाद किया है, जिससे टूटी हुई हड्डियों को जोड़ने में स्टील प्लेट की जरूरत नहीं होती। बल्कि, स्प्रे करने मात्र से हड्डियां जुड़ जाती हैं। 
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40,000 रुपए में बना ली फोर व्हीलर गाड़ी
 
रतलाम. नौगांवा जागीर के किसान अनिल गिरी गोस्वामी ने टू-व्हीलर के रेट में फोर व्हीलर बना दी। यह नैनो कार से भी छोटी है। 
 
इनसे बना वाहन
 
राजदूत के चार पहिए, चेसिस, चार शॉकअप, पानी खींचने के काम में इस्तेमाल होने वाला 5.5 हॉर्स पावर का इंजन,मारुति वैन की स्टेयरिंग और सीट से बनी है यह फोर व्हीलर गाड़ी। 

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ट्रैक्टर का काम करता है बुलेट
 
भारत में बुलेट को शान की सवारी के रूप में जाना जाता है। रास्ता कितना भी मुश्किल क्यों न हो यह अपनी ताकत से मुसाफिर को मंजिल तक पहुंचाता है। गुजरात के मनसुख भाई जागनी ने बुलेट को एक अलग ही रूप दे दिया है। मनसुख भाई ने देशी जुगाड़ से बुलेट को ट्रैक्टर बना दिया। यह बुलेट ट्रैक्टर 30 मिनट में एक एकड़ जमीन की जुताई कर सकता है और इस काम में सिर्फ दो लीटर इंधन की खपत होती है।

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पैडल से चलती है यह वॉशिंग मशीन
 
केरल की रेम्या जोसे का जन्म गरीब परिवार में हुआ। मां के बीमार होने पर घर से सारे कपड़े रेम्या को धोने पड़े और उसके पास वॉशिंग मशीन नहीं था। रेम्या ने इस समस्या के हल के लिए पैडल से चलने वाला वॉशिंग मशीन बना लिया। इस मशिन पर बैठकर पैडल मारने पर बॉक्स में रखे गए कपड़े धुलते हैं। 
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हवा से निकलता है पानी
 
असम के मेहतर हुसैन और मुशताक अहमद ने बांस की मदद से पवन चक्की बनाया है। इसकी मदद से जमीन के अंदर से पानी निकाला जा रहा है। गुजरात के नमक के मजदूरों के लिए यह खोज बहुत उपयोगी है। वे इसकी सहायता से पानी हटाते हैं और डीजल की तुलना में कम पैसे में उनका काम हो जाता है। sabhar ;http://www.bhaskar.com/






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