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शनिवार, 1 मार्च 2014

अब ब्रेनटॉप

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प्रीतंभरा प्रकाश
सुनने में भयावह लग सकता है कि आपका हाथ किसी और की इच्छा के हिल-डुल रहा है और उस 'किसी और' को आप देख भी नहीं पा रहे। लेकिन अब यह संभव हो गया है। पिछले दिनों वाशिंगटन यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च में ह्यूमन टु ह्यूमन ब्रेन इंटरफेस को पहली बार दफे सफल पाया गया।

यहां के वैज्ञानिकों ने ऐसा सिस्टम डिवेलप किया है, जिसमें एक व्यक्ति एक खास इंटरफेस का इस्तेमाल करके दूसरे व्यक्ति की सोच को कंट्रोल कर सकता है। यह इंटरफेस इंटरनेट के जरिए दोनों के दिमागों को कनेक्ट करता है। एक और खास बात यह कि इसे डिवेलप करने वाली रिसर्च टीम में एक भारतीय भी शामिल है।

वाशिंगटन यूनिवर्सिटी में प्रफेसर राजेश राव ने इलेक्ट्रिकल ब्रेन रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल करके अपना दिमागी सिग्नल अपने साथी को भेजा। इस सिग्नल की वजह से उनके साथी की कीबोर्ड पर टिकी उंगली में हरकत हुई। राव के असिस्टेंट स्टोको का कहना है कि कंप्यूटरों की तरह ही इंटरनेट दो दिमागों को भी कनेक्ट कर सकता है, और हम दिमाग में बसे ज्ञान को एक इंसान से दूसरे के दिमाग में ट्रांसफर करना चाहते हैं।
इससे पहले ड्यूक यूनिवसिर्टी के रिसर्चरों ने दो चूहों के बीच और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी ने इंसान और चूहे के बीच ब्रेन टु ब्रेन कम्युनिकेशन का प्रयोग किया था। राव का मानना है कि उनका प्रयोग इंसानों के बीच ब्रेन कम्युनिकेशन का पहला साइंटिफिक प्रयोग है।

ब्रेन कंप्यूटर इंटरफेस पर वैज्ञानिक लंबे समय से काम करते रहे हैं। जल्दी ही हम अपने स्मार्टफोन या कंप्यूटर को केवल अपने दिमाग से निर्देशित कर सकेंगे। कुछ सालों में नौबत यहां तक आ सकती है कि आपका रोबोट असिस्टेंट आपके पास नींबू पानी का ग्लास लेकर खड़ा हो, क्योंकि आपके बताए बगैर ही उसे पता चल चुका है कि आपको प्यास लगी है। मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के जर्नल में छपे रिव्यू के मुताबिक, एक जानी-मानी टेक्नोलॉजी कंपनी ऐसे टैबलेट का परीक्षण कर रही है, जिसे दिमाग से ही नियंत्रित किया जा सकेगा। इसके लिए एक हैट पहनने की जरूरत पड़ेगी, जिसमें मॉनिटरिंग इलेक्ट्रोड्स लगे होंगे।

कैलिफोर्निया की कंपनी न्यूरोस्काई ने हाल ही में एक ब्लूटूथ वाला हेडसेट रिलीज किया है, जो ब्रेन वेव्स के हलके-फुलके बदलाव भी मॉनिटर कर सकता है। इससे लोगों को कंप्यूटर और स्मार्टफोन पर कंसंट्रेशन बनाकर रखने वाले गेम्स खेल पाने की सुविधा मिल रही है। इसके सहारे जो गेम्स खेले जा रहे हैं, उनमें दिमाग का रोल जॉयस्टिक वाला है। एक और कंपनी इमोटिव ऐसा हेडसेट बेच रही है, जो एक बड़े से एलियन हाथ की तरह दिखती है।

यह ब्रेन वेव्स को पढ़ सकती है और इसका इस्तेमाल फ्लिकर फोटोज तलाशने के लिए किया जा सकता है। इसके लिए कीवर्ड्स नहीं चाहिए। खुशी या उत्साह जैसे आपके मनोभाव को समझकर उसी के मुताबिक तस्वीरें यह तलाशेगा। एक और लाइटवेट वायरलेस हेडबैंड म्यूज में एक ऐसा ऐप है जो ब्रेन को एक्सरसाइज करने के लिए उकसाता है।

कार बनानेवाली कंपनियां भी ऐसी तकनीकों पर काम कर रही हैँ, जिनसे ड्राइविंग के दौरान झपकी आने पर सीट को ही इसका आभास हो जाए और वह आपको सचेत कर दे। आंख लग जाने पर स्टीयरिंग व्हील खड़खड़ाने लगे तो ड्राइव करने वाले की नींद अपने आप खुल जाए। हालांकि इस बारे में ब्राउन इंस्टीट्यूट के न्यूरोसाइंटिस्ट जॉन डी़ का कहना है कि ऐसी तमाम तकनीकें दिमागी बातचीत को बाहर से सुनने की कोशिश भर हैं, जबकि दिमाग की उथल-पुथल को सही मायनों में जानने के लिए हमें ब्रेन में सेंसर्स इंप्लांट करने की जरूरत पड़ेगी। ये सेंसर चिप के रूप में भी हो सकते हैं।


photo ; googale
ब्रेन कंप्यूटर इंटरफेस नामक तकनीक की कल्पना वैज्ञानिकों ने इसलिए की थी, ताकि पैरालिसिस जैसी बीमारियों से ग्रस्त लोग कंप्यूटर से संवाद बनाकर रोबोट को कंट्रोल कर सकें और तरह अपने छोटे-मोटे काम खुद ही संपन्न करके अपनी असमर्थता पर काबू पा सकें। पिछले दिनों ब्रेनगेट नाम के एक प्रोजेक्ट में टोटल पैरालिसिस से ग्रस्त दो लोगों ने केवल अपने दिमाग के इस्तेमाल से मनचाहे काम किए।

इनमें से एक महिला 15 सालों से अपने हाथ हिलाने में भी असमर्थ थी, लेकिन रोबोटिक आर्म और अपनी ब्रेन एक्टिविटी को रेस्पांड करने वाले कंप्यूटर के सहारे उसने कॉफी की बोतल पकड़ी, अपने लिए कॉफी सर्व की और बोतल को वापस टेबल पर रख दिया। यह सब रोबोटिक आर्म के मूवमेंट्स के बारे में सोचने भर से संभव हो गया।

हालांकि दिमाग के भीतर लगे चिप के लंबे समय तक काम कर सकने के बारे में वैज्ञानिक अभी कुछ खास नहीं कर सके हैं। फिलहाल अमेरिका में जारी ब्रेन एक्टिविटी मैप प्रोजेक्ट में इस समस्या पर गंभीरता से काम किया जा रहा है। उम्मीद है कि इस प्रोजेक्ट के बाद स्मार्टफोन और टैबलेट्स की दुनिया में क्रांतिकारी बदलाव होंगे।

केवल सोचने भर से टीवी चैनल बदल लेने की संभावना भी जताई जा रही है। कुछ फ्यूचरिस्ट वैज्ञानिकों का दावा है कि सन 2045 तक इंसान अपने दिमाग को ही कंप्यूटर पर अपलोड करने में कामयाब हो जाएगा।

sabhar :http://navbharattimes.indiatimes.com/

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