Loading...

सोमवार, 3 मार्च 2014

जोसेफ स्टालिन का रहस्यवादी युद्ध

0

जोसेफ स्टालिन का रहस्यवादी युद्ध

दुनिया के इतिहास में द्वितीय विश्व युद्ध बीसवीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण और शायद सबसे दुखद घटना थी| यह भयानक युद्ध (द्वितीय विश्व युद्ध की घटनाओं का वर्णन इतिहास में विस्तार से किया गया हैं ) केवल मैदान पर ही नहीं, बल्कि एक अज्ञेय रहस्यमय स्तर पर भी लड़ा गया था|

जर्मन फ्यूरेर एडॉल्फ हिटलर के रहस्यवादी जूनून के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है| जर्मन संगठन "Ahnenerbe" (पूर्वजों की विरासत ) गूढ़ अनुसंधान और रहस्यमय शक्तियों से जुडी कलाकृतियों को खोजने में व्यस्त था और उस की गतिविधियों के बारे में भी विशेषज्ञ अच्छी तरह से जानते हैं| लेकिन इस बात को बहुत कम लोग जानते हैं कि सोवियत नेता जोसेफ स्टालिन के लिए भी रहस्यवाद वास्तव में अनजाना विषय नहीं था, हालांकि सोवियत संघ का सरकारी रवैया नास्तिकता के प्रचार का था| हमारी आज की कहानी स्टालिन और उनके रहस्यवाद के बारे में है|
जोसेफ स्टालिन को पता था कि नाजी जर्मनी के साथ युद्ध अपरिहार्य था, लेकिन उन्होंने सोचा था कि यह युद्ध1941 में नहीं लेकिन दो या तीन साल बाद शुरू होगा| हिटलर द्वारा सोवियत संघ पर आक्रमण स्टालिन के लिए एक अप्रिय आश्चर्य के रूप में प्रकट हुआ| 22 जून 1941 के दिन बख्तरबंद जर्मन सेना ने सोवियत संघ की सीमा को पार कर लिया| हिटलर की सेना, जिसने उस समय तक आधे से अधिक यूरोप पर कब्जा कर लिया था, अविश्वसनीय रूप से शक्तिशाली थी| हिटलर की योजना एक आकस्मिक हमले के माध्यम से मास्को पर कब्जा करने की थी| प्रारंभ में जर्मन सैनिकों को उनके हमले में सफलता मिली और सोवियत सेना को हार के बाद हार का सामना करना पड़ा| शत्रु तेजी से मास्को की ओर बढ़ रहा था| शरद ऋतु तक सोवियत राजधानी में आतंक छा गया| स्टालिन के मास्को से प्रस्थान के बारे में अफवाहें चारों ओर फैल गई थीं| सरकार को स्थानांतरित करने के लिए तैयारी वास्तव में जारी थी| इस प्रयोजन के लिए एक विशेष ट्रेन को पूरी गोपनीयता में एक गुप्त स्थान पर तैयार रखा गया था|
मास्को के बाहरी इलाके में धन्य मात्रोना रहती थी जो रूसी ईसाइयों द्वारा अत्यधिक सम्मानित की जाती थी| वह जन्म से अंधी थी, लेकिन उसमें आध्यात्मिक आंखों के माध्यम से आम लोगों की तुलना में अधिक देखने की क्षमता थी| वह बीमार लोगों की चिकित्सा करती थी और उसे भविष्यवाणी करने की ईश्वरीय देन प्राप्त थी| मास्को छोड़ने के बारे में अंतिम निर्णय लेने से एक दिन पहले स्टालिन उसे मिलने के लिए गया| कहा जाता है कि जब स्टालिन ने कमरे में प्रवेश किया तो मात्रोना की पीठ दरवाजे की ओर थी और वह खिड़की के पास बैठीथी| कहते हैं कि स्टालिन कमरे में आया और उसने सहायक को बर्खास्त करने के लिए इशारा किया. मात्रोना चुपचाप बैठी थी| स्टालिन ने खांस कर अपनी उपस्थिति जताने की कोशिश की|
" जोसेफ क्या तुम्हें ठण्ड लग गई है ? तुम खाँस रहे हो," मात्रोना ने मुड़े बिना पूछा|
" नमस्ते", स्टालिन ने धीरे से जवाब दिया, "मैं ठीक हूँ "|
"यह अच्छी बात है| तुम्हें अच्छे स्वास्थ्य की जरूरत है| यह कठिन समय है और जल्द खत्म होने वाला नहीं है| हालांकि बचने के लिए एक विशेष ट्रेन तैयार करने कीकोई ज़रूरत नहीं थी | आपको इसकी आवश्यकता नहीं है| "
" आपको कैसे पता चला? " स्टालिन हैरान था |
" भगवान से", मात्रोना ने शांति से उत्तर दिया, “मत जाओ, जर्मन आक्रामक मास्को नहीं ले पाएगा|”
"और यह मेरी जीत होगी ? "
मात्रोना ने सिर हिलाकर जवाब दिया :
"तुम्हारी नहीं,हमारी| सभी लोगों की जीत| भगवान हमारे साथ है| खैर, तुम्हारी भी| तो तुमने नहीं जाने का फैसला किया है ? "
अपने चरमराते जूतों में स्टालिन ने एक पैर से दूसरे पैर पर भार बदलते हुए कहा, "इस के बारे में सोचना होगा|"
स्टालिन ने मास्को नहीं छोड़ा| हिटलर ने 7 नवम्बर 1941 के दिन रूसी राजधानी पर जीत के लिए योजना बनाई थी, लेकिन इस दिन लाल सेना द्वारा क्रेमलिन की दीवार के नीचे परेड का आयोजन किया गया| परेड का निरीक्षण स्वयं जोसेफ स्टालिन ने किया| नए टैंक परेड के मैदान में उतारे गए, साइबेरिया और सुदूर पूर्व से सैनिकों के दस्ते और नौसैनिक दल भी सेनानियों में शामिल हो गए| परेड से वे सीधे युद्धक्षेत्र की ओर रवाना हो गए| दुनिया में इस परेड के बारे में संदेश से अधिक कोई महत्वपूर्ण खबर नहीं थी| मास्को के निकट लाल सेना के जवाबी हमले ने नाजियों को आश्चर्यचकित कर दिया| सोवियत कैमरामैनों द्वारा निर्मित फिल्म "मास्को के पास जर्मन सैनिकों की हार" कई देशों में स्क्रीन पर दिखाई गई| भारत में यह फिल्म खास तौर पर लोकप्रिय हुई, क्योंकि भारत लड़ाई में हिटलर विरोधी गठबंधन में शामिल होने वाले पहले देशों में से एक था और यूरोप और अफ्रीका के मोर्चों पर नाजियों के विरुद्ध लड़ा| 1943 में, मास्को की लड़ाई के बारे में बनाए गए वृत्तचित्र ने सर्वश्रेष्ठ वृत्तचित्र फीचर फिल्म के लिए "ऑस्कर" जीता|
दिव्यदृष्टा लोगों की एक विशेष क्षमता यह थी कि अच्छाई और बुराई के बीच सबसे बड़ी लड़ाई के परिणाम का चित्र उन्हें स्पष्ट रूप से दिखाई दे जाता था| वास्तविक घटनाओं से पता चला कि उनकी भविष्यवाणी कभी कभी बहुत सटीक रहती थी|
प्रसिद्ध मोहनिद्राप्रेरक और भेदक जादूगर वुल्फ मेस्सिंग ने कई देशों में दौरा किया| उन्होंने एक बार कहा था कि यदि जर्मनी सोवियत संघ के खिलाफ युद्ध छेड़ेगा तो जर्मन फ्यूरर खुद मर जाएगा| जब हिटलर को इसके बारे में पता चला तो उसे बहुत क्रोध आया और उसने मेस्सिंग के सिर के लिए दो लाख जर्मन मार्क के पुरस्कार की घोषणा की| नाजी गुप्त सेवाओं को वुल्फ मेस्सिंग को वारसा में गिरफ्तार करने में कामयाबी मिली| परन्तु मेस्सिंग गेस्टापो को सौंपे जाने के बाद गार्ड को सम्मोहित करने में कामयाब रहे और हिरासत से भाग निकले| फिर वह सोवियत संघ पहुँच गए|
सोवियत शहरों में मेस्सिंग के दौरों को भारी लोकप्रियता मिली| वह सम्मोहन द्वारा लोगों का वशीकरण करते थे, और दर्शकों के विचारों को पढ़ लेते थे| सोवियत संघ पर जर्मन हमले से कुछ ही महीने पहले 1940 की सर्दियों में मेस्सिंग ने लाल सेना की जीत की भविष्यवाणी की| मेस्सिंग ने बताया कि उन्होंने अंतर्दृष्टि से वास्तविकता के रूप में बर्लिन की सड़कों पर सोवियत टैंक देखे थे| 1943 में एक प्रदर्शन के दौरान उन्होंने विजय का निर्दिष्ट दिनांक भी बताया-- मई 9| इस भविष्यवाणी के बारे में स्टालिन को भी पता चला| और जब 9 मई 1945 के दिन जर्मनी ने आत्मसमर्पण के कागजों पर हस्ताक्षर किए तो स्टालिन ने मेस्सिंग को बधाई का तार भेजा|
युद्ध के बाद स्टालिन ने मेस्सिंग को क्रेमलिन बुलाया| कलाकार ने अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन किया परन्तु सोवियत नेता ने इसमें ज्यादा उत्साह व्यक्त नहीं किया| केवल अपने पाइप से धुआं उड़ाते हुए उन्होंने मेस्सिंग से पूछा:
अगर मैं आपको बाहर न निकलने देने के आदेश दूँ तो क्या आप क्रेमलिन के बाहर निकल सकते हैं?”
“मैं कोशिश कर सकता हूँ, कॉमरेड स्टालिन|” .
मेस्सिंग ने स्टालिन को अलविदा कहा और दरवाजा खोलकर बाहर चला गया| समूची सुरक्षा व्यवस्था को पार करने के बाद घर लौट आया| शाम को स्टालिन ने फोन किया:
“आप ऐसा कैसे कर पाए, मुझे बताओ? सभी चौकिओं पर आप को नहीं निकलने देने की चेतावनी दी गई थी|”
“यह बहुत आसान है। आप ने मेस्सिंग को रोकने का आदेश दिया था| मैं रक्षकों के मन में यह विश्वास पैदा कर पाया कि मैं मार्शल वराशीलोव हूँ|”
महान युद्ध के प्रकोप के साथ भी एक रहस्यमय इतिहास जुड़ा हुआ है| नाजी जर्मनी द्वारा सोवियत संघ पर हमले से कुछ ही समय पहले 1941 की गर्मियों में स्टालिन ने व्यक्तिगत रूप से तैमूर राजवंश की कब्र की खुदाई की शुरुआत के निर्देश पर हस्ताक्षर किए थे| अक्सर कहा जाता है कि तैमूर लंग या तैमूर इतिहास में सबसे बड़े विजेताओं में से एक था जिसने 14वीं सदी में मध्य एशिया में एक विशाल राज्य बनाया और रूस, भारत, ईरान और चीन के विरुद्ध कई लम्बे सैन्य अभियानों का नेतृत्व किया| तैमूर का मकबरा समरकंद में सोवियत संघ के क्षेत्र पर था| बड़ी संख्या में पुरातत्वविदों और खुफिया कर्मियों का दल वहाँ भेजा गया| खुदाई का काम तेजी से किया गया| सबसे पहले तैमूर लंग के बेटे और पोते के अवशेष पाए गए| उन्के नीचे हरिताश्म पत्थर की तीन टन की एक स्लैब पर तैमूर लंग के अनेक नाम और ताबूत खोलने की चष्ट करने वालों के नाम एक चेतावनी दिखाई दी| शिलालेख पर लिखा था: "यदि कोई भी व्यक्ति तैमूर की कब्र खोलने की कोशिश करेगा तो वह सजा का भागी होगा और दुनिया भर में भयंकर युद्ध छिड़ जाएगा| " खतरनाक शब्दों ने शोधकर्ताओं का जोश ठंडा कर दिया लेकिन फिर भी स्लैब उठाने का फैसला किया गया| तैमूर लंग के अवशेष 21 जून 1941 को निकाले गए और अगले दिन 22 जून को पुरातत्वविदों ने रेडियो पर सुना कि नाजी जर्मनी ने आक्रमण न करने की संधि का उल्लंघन करते हुए सोवियत संघ की सीमा को पर कर लिया|
पुरातत्वविदों का दल मॉस्को लौट आया| स्टालिन को खुदाई और कड़ी चेतावनी के बारे में कुछ महीनों के बाद ही बताया गया| उन्होंने तुरंत महान
विजेता और उसके रिश्तेदारों के अवशेष फिर से दफनाने के लिए आदेश दिया| महत्वपूर्ण बात यह है कि इस सम्बन्ध में तीन रोचक तथ्य
सामने आये: पहला तथ्य यह है कि तैमूर वंश के अवशेषों के
विधिपूर्ण शवाधान के लिए उस समय के लिए एक बड़ी राशि का
आवंटन किया गया- इस राशि से 16 टैंकों का निर्माण किया जा सकता था| दूसरा तथ्य: दफन से से पहले तैमूर लंग के अवशेष एक महीने के लिए पुरातत्वविदों की दृष्टि से ओझल हो गए|
लाल सेना में भर्ती मुस्लिम सैनिकों के मुताबिक, जिनकी संख्या काफी बड़ी थी, तैमूर लंग के अवशेष इस समय में युद्ध मोर्चों पर दिखाई
दिए| वे ईसाई धार्मिक स्मृति चिन्हों की तरह प्रतिष्ठित किए गए ताकि योद्धाओं को प्रेरित कर सकें|. स्टालिन ने उन्हें हवाई जहाज पर
युद्धक्षेत्र की लाइन पर ले जाने का आदेश दिया| तीसरा और अंतिम तथ्य: तैमूर लंग और उसके परिवार के अवशेषों को पूर्ण सम्मान के साथ 20 दिसम्बर 1942 को दफनाया गया| और इन दिनों सोवियत सेना ने स्टालिनग्राद की लड़ाई में घिरी फ़ील्डमार्शल Paulus की सेना को छुड़ाने की कोशिश कर रहे जर्मन सैनिकों को पछाड़ दिया| इस सफलता ने जर्मन सेना की स्थिति को बिलकुल निराशाजनक बना दिया| और छह हफ्ते बाद फील्ड मार्शल Paulus ने अपनी सेना के अवशेष के साथ आत्मसमर्पण कर दिया| स्टालिनग्राद में सोवियत सेना की जीत द्वितीय विश्व युद्ध में एक महत्वपूर्ण मोड़ था|

अमेरिकी पत्रिका "टाइम" ने 1942 में स्टालिन को Man of the Year के रूप में मान्यता दी| इस साप्ताहिक पत्रिका की रेटिंग में स्टालिन ने पहले भी खुद को पाया था लेकिन एक तानाशाह और एक दुष्ट
प्रतिभाशाली आदमी के रूप में| इस बार स्टालिन को बुराई के खिलाफ लड़ाई में एक नायक के रूप में प्रस्तुत किया गया| इंग्लैंड के किंग जॉर्ज VI ने उन्हें एक प्रतीकात्मक तलवार निम्नलिखित उत्कीर्ण शब्दों के साथ भेजी: "स्टालिनग्राद के फौलादी लोगों को समर्पित"
1943 में तेहरान में आयोजित एक सम्मेलन में हिटलर विरोधी गठबंधन के तीन नेता जोसेफ स्टालिन, फ्रेंकलिन रूजवेल्ट और विंस्टन चर्चिल पहली बार मिले| सम्मेलन के परिणाम स्टालिन के लिए काफी अनुकूल निकले| सबसे पहले, मित्र राष्ट्रों ने मई 1944 से पहले ब्रिटिश चैनल के इस पार दूसरे मोर्चे को खोलने का वादा किया| और दूसरी बात, जीत के बाद प्रतिभागियों के बीच जर्मनी के विभाजन पर एक प्रारंभिक समझौते पर भी सहमति बन गई|
विद्वान् विंस्टन चर्चिल के अनुसार स्टालिन में कुछ रहस्यमय शक्ति थी: “जब स्टालिन हॉल में आया तो मैं, एक रईस, कूद कर, और दोनों हाथ सिपाही की तरह सीधे रख कर खड़ा हो गया," विंस्टन चर्चिल ने अपने संस्मरण में इस भेंट की चर्चा करते हुए बाद में लिखा|
उसी वर्ष 1943 में राज्य द्वारा प्रोत्साहित नास्तिकता के समर्थक देश सोवियत संघ में आर्थोडक्स चर्च का उत्पीड़न बंद कर दिया गया| ईसाई चर्चों, मठों, धार्मिक अकादमी को फिर से खोल दिया गया और रूसी चर्च के पैट्रिआर्क को चुना गया| यह एक और रहस्यमय कहानी का परिणाम था|
लेबनान के पहाड़ों पर बसे Antiochian आर्थोडक्स ईसाई चर्च के मेट्रोपोलिटन एलिजा शत्रुओं के आक्रमण से रूस की रक्षा के लिए ईश्वर से प्रार्थना करने वालों में अग्रणी थे| उन्होंने एकांत में प्रार्थना करने के लिए एक गहरे पथरीले तहखाने को चुना जहाँ बाहर की दुनिया से कोई आवाज नहीं आ सकती थी| भोजन, पानी और नींद का परिष्कार करते हुए उन्होंने दरवाजा बंद कर लिया| तीन दिन बाद उन्होंने एक आवाज सुनी जिसने उन्हें बताया कि रूस में क्या किया जाना जरूरी है| कहा जाता है कि एलिजा ने लिखा: मंदिरों, मठों, धार्मिक अकादमियों और मदरसों को खोल दिया जाए| पुजारियों को युद्ध के मोर्चे से तुरंत वापिस बुलाया जाए ताकि वे ईश्वर की सेवा कर सकें| गुफा से बाहर निकलने के बाद मेट्रोपोलिटन एलिजा ने रूसी आर्थोडक्स चर्च के प्रतिनिधियों और सोवियत सरकार से संपर्क किया| भूतपूर्व सोवियत संघ की राज्य सुरक्षा समिति के अभिलेखागार में आजतक उनका टेलीग्राम और पत्र सुरक्षित हैं| स्टालिन ने उनकी शर्तें पूरी तरह से स्वीकार कर लीं|
युद्ध में जीत के बाद अक्टूबर 1947 में स्टालिन ने मेट्रोपोलिटन एलिजा को रूस आमंत्रित किया| इस बैठक पर खींची गई फिल्म की फुटेज आज भी संरक्षित है| मेट्रोपोलिटन एलिजा को रत्नों से सजाया पवित्र आइकॉन और क्रॉस उपहार में दिये गये| परन्तु मेट्रोपोलिटन एलिजा ने दो लाख डॉलर के स्टालिन पुरस्कार से इंकार कर दिया और इस राशि को उन अनाथ बच्चों के रखरखाव पर खर्च करने का आदेश दिया जिन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध में अपने पिता को खो दिया था| sabhar :http://hindi.ruvr.ru/

0 टिप्पणियाँ :

एक टिप्पणी भेजें

 
Design by ThemeShift | Bloggerized by Lasantha - Free Blogger Templates | Best Web Hosting