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गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

भोग से योग का मार्ग दिखाता खजुराहो

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मध्यकालीन भारत के चंदेल राजाओं के पराक्रम और वैभव की गाथाएं आज भी बुंदेलखंड में सुनी जाती हैं। कला और संस्कृति के प्रति उनके लगाव के प्रमाण खजुराहो में अत्यंत जीवंत रूप में मौजूद हैं। भव्य मंदिरों के रूप में खड़े ये साक्ष्य उस दौर के धर्म, कला और जीवन के तमाम भावों को अपने में समेटे हुए हैं।
खजुराहो के गगनचुंबी देवालयों की भित्तियों में जड़ी असंख्य मूर्तियां जीवन के हर आयाम को विभिन्न कोणों से प्रदर्शित करती हैं। मंदिरों की ये भित्तियां पाषाण पर उकेरे किसी महान ग्रंथ के पन्नों सी प्रतीत होती हैं। जिसे पढ़ने पर हर वर्ष लाखों सैलानी खजुराहो चले आते हैं। वास्तव में खजुराहो के ये मंदिर संसार भर के पर्यटकों के लिए भारत का अद्वितीय उपहार हैं। इसी कारण खजुराहो आज विश्व पर्यटन मानचित्र पर एक सुनहरे बिंदु की तरह दीप्तिमान है। यूं तो खजुराहो की ख्याति मंदिरों की दीवारों पर स्थित कामक्रीड़ामग्न मूर्तियों के कारण अधिक है, किंतु इसका कला वैभव केवल यहीं तक सीमित नहीं है। यहां कई अन्य मूर्तियां भी अपने शिल्प कौशल के कारण पर्यटकों को बेहद प्रभावित करती हैं। खजुराहो की यही विशेषता देश-विदेश के तमाम पर्यटकों को अपनी ओर खींचती है।
बदलता रहा नाम
झांसी रेलवे स्टेशन से बाहर आते ही हमें खजुराहो के लिए बस तैयार मिली। करीब पांच घंटे के थका देने वाले सफर के बाद हम खजुराहो पहुंच गए। वहां उतरते ही हमें होटल के एजेंटों के साथ साइकिल रिक्शा व ऑटोरिक्शा वालों ने आ घेरा। छोटे शहर की छोटी-छोटी सड़कों पर साइकिल रिक्शे से ही हम होटल की ओर चल दिए। सफर की थकान के कारण हमें पहले आराम की जरूरत थी। विश्राम के बाद जब हम होटल से बाहर निकले तो दोपहर बीत चुकी थी। भीड़-भाड़ से परे छोटे से शहर में घूमते हुए सब कुछ आसपास नजर आ रहा था। मुख्य मार्ग पर बढ़ते हुए, बाजार के सामने हमें आलीशान मंदिरों का समूह नजर आया। यही तो था चंदेलों का स्थापत्य संसार। इसे देख कुछ पल के लिए तो हम ठिठक गए। किंतु हमें पता था कि किसी गाइड की सहायता के बिना उन मंदिरों पर लिखे आलेखों को पढ़ना हमारे लिए कठिन था। इसलिए हमने पर्यटन कार्यालय जाकर अगले दिन के लिए एक गाइड की व्यवस्था की तथा अन्य जानकारियां प्राप्त कीं। वहां से हम वापस बाजार आए और एक रूफटॉप रेस्टोरेंट में आ बैठे। वहां से मंदिर परिसर स्पष्ट नजर आ रहा था। कॉफी के सिप लेते हुए हम मंदिरों पर उतरती सांवली शाम का नजारा देख रहे थे।
मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित खजुराहो का इतिहास काफी पुराना है।इब्नबतूता ने इस स्थान को कजारा कहा है, तो चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपनी भाषा में इसे ‘चि: चि: तौ’ लिखा है। अलबरूनी ने इसे ‘जेजाहुति’ बताया है, जबकि संस्कृत में यह ‘जेजाक भुक्ति’ बोला जाता रहा है। चंदबरदाई की कविताओं में इसे ‘खजूरपुर’ कहा गया तथा एक समय इसे ‘खजूरवाहक’ नाम से भी जाना गया।लोगों का मानना था कि इस समय नगर द्वार पर लगे दो खजूर वृक्षों के कारण यह नाम पड़ा होगा। जो कालांतर में खजुराहो कहलाने लगा।
ताकि समझ सके समाज
चंदेलवंशीय राजाओं का शासनकाल इस क्षेत्र का स्वर्णिम दौर था। उन्होंने 9वीं से 14वीं शताब्दी के दौरान यहां राज किया था। खजुराहो के प्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण उन्होंने ही करवाया था। इन मंदिरों की भित्तियों पर मानव जीवन के हर पहलू को अत्यंत स्पष्ट रूप से उकेरा गया है। बुंदेलखंड में इस संबंध में एक जनश्रुति है। कहते हैं एक बार राजपुरोहित हेमराज की पुत्री हेमवती संध्या की बेला में सरोवर में स्नान करने पहंुची। आकाश में विचरते चंद्रदेव ने जब स्नान करती नवयौवना की भीगी हुई रूपराशि को देखा तो वह उस पर आसक्त हो गए। उसी पल वह रूपसी हेमवती के समक्ष प्रकट हुए और उससे प्रणय निवेदन किया। कहते हैं कि उनके मधुर संयोग से जो पुत्र उत्पन्न हुआ उसने ही बड़े होकर चंदेलवंश की स्थापना की। समाज के भय से हेमवती ने उस बालक को वन में करणावती नदी के तट पर पाला और उसका नाम चंद्रवर्मन रखा। बड़ा होकर चंद्रवर्मन एक प्रभावशाली राजा बना। एक बार उसकी माता हेमवती ने उसे स्वप्न में दर्शन देकर, ऐसे मंदिरों के निर्माण के लिए प्रेरित किया जो समाज को ऐसा संदेश दें जिससेसमाज यह समझ सके कि जीवन के अन्य पहलुओं के समान कामेच्छा भी एक अनिवार्य अंग है। ताकि इस इच्छा को पूर्ण करने वाला इंसान कभी पापबोध से ग्रस्त न हो। ऐसे मंदिरों के निर्माण के लिए चंद्रवर्मन ने खजुराहो को चुना। इसे अपनी राजधानी बनाकर उसने यहां 85 वेदियों का एक विशाल यज्ञ किया। बाद में इन्हीं वेदियों के स्थान पर 85 मंदिर बनवाए गए थे। जिनका निर्माण चंदेलवंश के आगे के राजाओं द्वारा जारी रखा गया। यद्यपि 85 में से आज यहां केवल 22 मंदिर शेष हैं। लेकिन उन सब पर जीवन के अनंत उत्सव का गौरवशाली प्रदर्शन उसी तरह विरचित है।
शिल्पकारों ने आस्था से आसक्ति तक जीवन के तमाम संवेगों को इन मंदिरों की भित्तियों पर उतार डाला था। तभी तो यहां सौंदर्यबोध, कलात्मकता और देवत्व का अनन्य संगम देखने को मिलता है। 14वीं शताब्दी में चंदेलों के खजुराहो से प्रस्थान के साथ ही सृजन का वह दौर खत्म हो गया। करीब एक सदी बाद मंदिरों का महत्व भी घटने लगा और धीरे-धीरे ये अतीत की परतों में छिप गए। समय की आंधी ने खजुराहो के दो-तिहाई मंदिरों को तो निगल ही लिया। बाद में बीसवीं सदी के आरंभ में एक अंग्रेज इंजीनियर टी.एस. बर्ट ने नये सिरे से खजुराहो की खोज की। उन दिनों यहां एक छोटा सा गांव और केवल 22 मंदिर शेष थे। खजुराहो गांव से इनकी भौगोलिक स्थिति के अनुसार ये मंदिर अब पश्चिमी, पूर्वी और दक्षिणी मंदिर समूह के रूप में विभाजित हैं। खजुराहो के अधिकतर महत्वपूर्ण मंदिर पश्चिमी समूह में ही हैं। आधुनिक खजुराहो इसी मंदिर समूह के सामने बसा है। ज्यादातर होटल, रेस्टोरेंट तथा बाजार यहीं हैं।
मंदिरों के चार समूह
सुबह जल्दी ही हम मंदिरों के दर्शन के लिए चल पड़े। गाइड के साथ हम पहले मंदिर परिसर से बाहर स्थित मतंगेश्वर मंदिर पहुंचे। यह खजुराहो का सबसे प्राचीन मंदिर है। जिसे राजा हर्षवर्मन ने 920 ई. में बनवाया था। इस मंदिर में आज भी पूजा-अर्चना होती है। पिरामिड शैली में बने एक ही शिखर वाले इस मंदिर की शिल्प रचना एकदम साधारण है। गर्भगृह में करीब ढाई मीटर ऊंचा और एक मीटर व्यास का एक शिवलिंग है। मंदिर में पहुंचकर हमने भी शिवलिंग के दर्शन कर पुष्प अर्पित किए। वहां से हम मंदिरों के मुख्य परिसर के द्वार पर आए और टिकट लेकर प्रवेश किया। वहां एक विशाल उद्यान में ऊंचे शिखर वाले कई मंदिर हैं। ये सभी ऊंचे चबूतरों पर बने हुए हैं।
परिसर में हमने सबसे पहले लक्ष्मण मंदिर देखा। यह मंदिर 930 ई. में राजा यशोवर्मन द्वारा बनवाया गया था। उन्हें लक्ष्मण के नाम से भी जाना जाता था। पंचायतन शैली में बने इस मंदिर के चारों कोनों पर एक-एक उप मंदिर बना है। मुख्य मंदिर के द्वार पर रथ पर सवार सूर्यदेव की सुंदर प्रतिमा है। आगे बढ़कर मंदिर की वाह्य दीवारों पर जब हमने दृष्टि डाली तो हतप्रभ रह गए। दीवारों पर सैकड़ों मूर्तियां जड़ी थीं। जिन्हें एक ही दृष्टि में देख पाना कठिन था। मूर्तियों के संबंध में जब गाइड ने हमें सिलसिलेवार बताना शुरू किया तो हमारे लिए मूर्तियों की सुंदरता, उनकी भाव-भंगिमा और प्रसंग को समझना आसान हो गया। मूर्तियों की श्रृंखला में तीन कतारों में प्रमुख मूर्तियां थीं। उनके अतिरिक्त कुछ कतारें छोटी मूर्तियों की थीं। मध्य में बने आलों में देव प्रतिमाएं हैं। अधिकतर मूर्तियां उस काल के जीवन और परंपराओं को दर्शाती हैं। इनमें नृत्य, संगीत, युद्ध, शिकार आदि जैसे दृश्य हैं। प्रमुख मूर्तियों में विष्णु, शिव, अग्निदेव आदि के साथ गंधर्व, सुरसुंदरी, देवदासी, तांत्रिक, पुरोहित और मिथुन मूर्तियां हैं। कालीदास के अभिज्ञान शाकुंतलम की नायिका भी इन दीवारों पर उपस्थित है। स्नान के बाद सरोवर से बाहर आती शकंुतला के भीगे सौंदर्य को शिल्पकार ने बड़ी निपुणता से पत्थर पर उकेरा है। केलिक्रीडा के दृश्यों की उन्मुक्त उपस्थिति ने हमें एकबारगी चौंका दिया। हम सोचने लगे कि कामोद्दीपक भावों की प्रस्तुति इतनी बेबाक भी हो सकती है। वह भी एक मंदिर की दीवार पर। एक मूर्ति में तो नायक-नायिका द्वारा एक-दूसरे को उत्तेजित करने के लिए नख-दंत का प्रयोग कामसूत्र के किसी सिद्धांत को दर्शा रहा है। मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु की त्रिमुखी प्रतिमा के दर्शन होते हैं। अंदर की दीवारों पर भी मूर्तियां विद्यमान हैं। लेकिन प्रकाश के अभाव में वे स्पष्ट नजर नहीं आतीं। लक्ष्मण मंदिर के चबूतरे पर छोटी-छोटी मूर्तियां हैं। इनमें धर्मोपदेश, नृत्य-संगीत शिक्षा, युद्ध के लिए प्रस्थान के दृश्यों के साथ ही कुछ दृश्य सामूहिक मैथुन के भी हैं। लक्ष्मण मंदिर के सामने दो छोटे मंदिर हैं। इनमें एक लक्ष्मी मंदिर व दूसरा वराह मंदिर है।
उत्सव के दृश्य
वहां से हम विश्वनाथ मंदिर की ओर बढ़ गए। उससे पूर्व पार्वती मंदिर भी है। यह नवनिर्मित मंदिर है। दरअसल यहां स्थित मंदिर खंडित हो चुका था। 1880 के आसपास छतरपुर के महाराजा ने यह वर्तमान मंदिर बनवाकर उसमें पार्वती की प्रतिमा स्थापित कर दी। यह मंदिर अन्य मंदिरों से भिन्न है। आगे स्थित है विश्वनाथ मंदिर जो शिव को समर्पित है। 90 फुट ऊंचे और 45 फुट चौड़े इस मंदिर का निर्माण 1002 ई. में राजा धंगदेव द्वारा करवाया गया था। यह मंदिर भी पंचायतन शैली में बना है। किंतु इसके चार उप मंदिरों में से दो ही शेष हैं। मंदिर की सीढि़यों के आगे दो शेर और हाथी बने हैं। इस मंदिर की दीवारों पर भी तीन पंक्तियां प्रमुख प्रतिमाओं की हैं। गाइड ने बताया कि प्राय: हर मंदिर में इस तरह की तीन पंक्तियां बनी हैं। यहां इनमें देव प्रतिमा, अष्टदिग्पाल, नागकन्याएं व अप्सरा आदि हैं। अन्य कतारों में उस काल की समृद्धि का चित्रण राजसभा, रासलीला, विवाह और उत्सव के दृश्यों के रूप में है। इनमें वीणावादन करती नायिका तथा पैर से कांटा निकालती अप्सरा पर्यटकों का ध्यान जरूर आकर्षित करती हैं। मुख्य आलों में चामुंडा, वराही, वैष्णवी, कौमारी, महेश्वरी व ब्रह्माणी आदि के बाद अंत के आले में नटेश्वर की प्रतिमा है। गर्भगृह की दीवारों पर शिव अनेक रूपों में चित्रित हैं तथा गर्भगृह में शिवलिंग के दर्शन होते हैं। प्रमुख मंदिर के सामने बड़ा सा नंदी मंडप है। बारह खंबों पर टिके चौकोर मंडप में शिव के वाहन नंदी की छह फुट ऊंची प्रतिमा है।
विश्वनाथ मंदिर देखने के बाद हम हरे-भरे उद्यान के मध्य बने साफ-सुथरे मार्ग से अन्य मंदिरों की ओर चल दिए। अभी तक देवी मूर्तियों के विचारों में मग्न हम चित्रगुप्त मंदिर पहुंचे तो मूर्तिकला का एक और कैनवास हमारे सामने था। यह मंदिर सूर्यदेव को समर्पित है। इसका निर्माण राजा गंडदेव द्वारा 1025 ई. के लगभग करवाया गया था। मंदिर की दीवारों पर अन्य मूर्तियों के मध्य उमा महेश्वर, लक्ष्मी नारायण और विष्णु के विराट रूप में मूर्तियां भी हैं। जन जीवन की मूर्तियों में पाषाण ले जाते श्रमिकों की मूर्तियां मंदिर निर्माण के दौर को दर्शाती हैं। मुख्य प्रतिमाओं के मध्य यहां भी एक पशु की आकृति अधिक संख्या में देख हमने गाइड से पूछा तो उसने बताया कि ये व्याल व शार्दूल की प्रतिमाएं हैं और हर मंदिर पर बनी हैं।
यम की प्रतिमा
चित्रगुप्त मंदिर की दीवारों पर नायक-नायिका को आलिंगन के विभिन्न रूपों में चित्रित किया गया है। गर्भगृह में सात घोड़ों के रथ पर सवार भगवान सूर्य की प्रतिमा विराजमान है। निकट ही हाथ में लेखनी लिए चित्रगुप्त बैठे हैं। इन मंदिरों में विदेशी पर्यटक भी बहुतायत में आते हैं। हमने देखा जापान से आए पर्यटकों के एक समूह को एक गाइड उन्हीं की भाषा में मंदिर व मूर्तियों के विषय में बता रहा था। तब हमें पता चला कि खजुराहो और आसपास के पढ़े-लिखे युवकों ने अलग-अलग देशों की भाषाएं सीख कर गाइड के रूप में एक अच्छा रोजगार अपना लिया है। इनकी योग्यता के अनुसार पर्यटन विभाग द्वारा इन्हें अधिकृत किया जाता है। विदेशी पर्यटकों के लिए भी खजुराहो में बिखरी कला संपदा के भी यहां पर्याप्त इंतजाम किए गए हैं। क्योंकि प्राचीन मूर्तियों के अंतरराष्ट्रीय माफिया की नजर हमेशा यहां की मूर्तियों पर रहती है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा यहां एक गार्ड एवं एक अटेंडेंट को हर समय तैनात रखा जाता है। ये लोग पर्यटकों को मूर्तियों से छेड़-छाड़ करने से भी रोकते हैं। शायद इसीलिए यहां की दीवारें कुछ भारतीय पर्यटकों की पर्यटन स्थलों पर अपना नाम लिखने की आदत का शिकार नहीं हुई।
चित्रगुप्त मंदिर से कुछ आगे जगदंबी मंदिर है। इसे लोग जगदंबा मंदिर भी कहते हैं। मूलत: यह मंदिर विष्णु को समर्पित था। लेकिन मंदिर में कोई प्रतिमा न थी। छतरपुर के महाराजा ने जब इन मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया तब यहां जगदंबा की प्रतिमा स्थापित कर दी गई। इस मंदिर में अन्य देव प्रतिमाओं के साथ यम की प्रतिमा भी विद्यमान है। यहां भी दीवारों पर कुछ अच्छे मैथुन दृश्य प्रभावित करते हैं। प्रवेश द्वार के सरदल पर चतुर्भुजी विष्णु गरुड़ पर आसीन नजर आते हैं। मंदिर की आलियों में सरस्वती एवं लक्ष्मी की प्रतिमाएं विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। जगदंबी मंदिर के निकट ही महादेव मंदिर है। इस छोटे मंदिर का मूलभाग खंडित अवस्था में है तथा वेदी भी नष्ट हो चुकी है। प्रवेश द्वार पर एक मूर्ति में राजा चंद्रवर्मन को सिंह से लड़ते दर्शाया गया है। यह दृश्य चंदेलों का राजकीय चिह्न बन गया था।
कामसूत्र के सिद्धांत
इन मंदिरों की कतार में आगे स्थित है कंदारिया महादेव मंदिर। यह खजुराहो का सबसे विशाल तथा विकसित शैली का मंदिर है। 117 फुट ऊंचा, लगभग इतना ही लंबा तथा 66 फुट चौड़ा यह मंदिर सप्तरथ शैली में बना है। इसके चारों उप मंदिर सदियों पूर्व अपना अस्तित्व खो चुके थे। लेकिन फिर भी इसकी भव्यता में कोई कमी नजर नहीं आती। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। इसका निर्माण राजा विद्याधर ने मोहम्मद गजनी को दूसरी बार परास्त करने के बाद 1065 ई. के आसपास करवाया था। संभवत: कंदरा के समान प्रतीत होते इसके प्रवेश द्वार के कारण इसका नाम कंदारिया महादेव पड़ा होगा। वाह्य दीवारों पर सुर-सुंदरी, नर-किन्नर, देवी-देवता व प्रेमी युगल आदि सुंदर रूपों में उपस्थित हैं। मध्य की दीवारों पर कुछ अनोखे मैथुन दृश्य चित्रित हैं। एक स्थान पर ऊपर से नीचे की ओर एक क्रम में बनी तीन मूर्तियां काम सूत्र में वर्णित एक सिद्धांत की अनुकृति कही जाती हैं। इसमें मैथुनक्रिया के आरंभ में आलिंगन व चुंबन के जरिये पूर्ण उत्तेजना प्राप्त करने का महत्व दर्शाया है। एक अन्य दृश्य में एक पुरुष शीर्षासन की मुद्रा में तीन स्ति्रयों के साथ रतिरत नजर आता है। विशालतम मंदिर की वाह्य दीवारों पर कुल 646 मूर्तियां हैं तो अंदर भी 226 मूर्तियां स्थित हैं। इतनी मूर्तियां शायद अन्य किसी मंदिर में नहीं है। मंदिर की बनावट और अलंकरण भी अत्यंत वैभवशाली है। कंदारिया महादेव मंदिर का प्रवेश द्वार नौ शाखाओं से युक्त है। जिन पर कमल पुष्प, नृत्यमग्न अप्सराएं तथा व्याल आदि बने हैं। सरदल पर शिव की चारमुखी प्रतिमा बनी है। इसके पास ही ब्रह्मा एवं विष्णु भी विराजमान हैं। गर्भगृह में संगमरमर का विशाल शिवलिंग स्थापित है। मंडप की छतों पर भी पाषाण कला के सुंदर चित्र देखे जा सकते हैं।
वैसे तो हमने परिसर के सभी मंदिर देख लिए थे किंतु मन अभी भी खजुराहो के शिल्पकानन में ही भटक रहा था। वास्तव में मूर्तिशिल्प के इस विपुल वैभव को एक बार में अपनी स्मृतियों में समेटना असंभव था। एक बार फिर इन मंदिरों को देखने का निर्णय कर हम बाहर आ गए।
भोजन तरह-तरह के
शाम के समय खजुराहो के बाजार में टहलने निकले तो वहां हमें फूड फेस्टिवल का सा नजारा देखने को मिला। सड़क के किनारों पर चाट की दुकानें तो थी हीं, शाकाहारी मारवाड़ी भोजन के रेस्टोरेंट भी नजर आ रहे थे। लेकिन इन सब से बढ़कर उन रेस्टोरेंट के बोर्ड थे जो यह दर्शा रहे थे कि यहां चाइनीज, कांटिनेंटल, जापानी, कोरियन, इजरायली या इटालियन फूड भी उपलब्ध हैं। दरअसल खजुराहो के कई रेस्तराओं में विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए उनके देश का भोजन उपलब्ध कराना आरंभ कर दिया है। इसके लिए उन्होंने पहले उस तरह का भोजन बनाना सीखा है। इसी तरह यहां के दुकानदारों ने पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए विदेशी भाषाओं के बोर्ड भी लगवा रखे हैं। यहां ज्यादातर दुकानें, हस्तशिल्प, एंटीक वस्तुएं, पारंपरिक परिधान, पिक्टोरियल बुक्स तथा पिक्चर पोस्टकार्ड आदि की हैं। दिन में हमने कई विदेशी पर्यटकों को साइकिल पर घूमते देखा था। पता चला कि घूमने के लिए यहां साइकिल किराये पर मिल जाती है। रिक्शा या ऑटो की तुलना में यह साधन हमें अच्छा लगा। साइकिल पर स्वतंत्र रूप से घूमते हुए स्थानीय जीवन को भी निकट से देखा जा सकता है। हमने भी अगले दिन साइकिल से घूमने का मन बना लिया।
यहां मंदिर सैलानियों के लिए सुबह से शाम तक खुले रहते हैं। सूर्यास्त के बाद पश्चिमी मंदिर परिसर एक बार फिर जीवंत हो उठता है। यहां ध्वनि एवं प्रकाश कार्यक्रम होता है। कार्यक्रम शुरू होते ही अंधकार में डूबे मंदिर रंग-बिरंगे प्रकाश में नहा उठते हैं। प्रकाश के खूबसूरत संयोजन के साथ खजुराहो के स्वर्णिम दौर की दास्तां भी सुनने को मिलती है। पर्यटकों के लिए यह एक अनोखा अनुभव होता है।
सैर साइकिल पर
अगले दिन हम साइकिल से पूर्वी मंदिरों की ओर चल दिए। ये मंदिर खजुराहो के प्राचीन गांव के निकट थोड़ी-थोड़ी दूरी पर स्थित हैं। इनमें चार जैन तथा तीन हिंदू मंदिर हैं। सबसे पहले हम ब्रह्मा मंदिर पहुंचे। पिरामिड शैली में बना यह छोटा सा मंदिर है। ब्रह्मा की प्रतिमा के साथ यहां भगवान विष्णु और शिव भी उपस्थित हैं। मंदिर में एक शिवलिंग भी है। ब्रह्मा मंदिर से करीब तीन सौ मीटर की दूरी पर वामन मंदिर है। भगवान विष्णु के वामन अवतार को समर्पित यह मंदिर स्थापत्य शैली तथा प्रतिमाओं के आधार पर 11वीं सदी के उत्तरा‌र्द्ध में बना माना जाता है। इस मंदिर की दीवारों पर प्रेमी युगलों के कुछ आलिंगन दृश्यों को छोड़ ज्यादातर एकल प्रतिमाएं हैं। यहीं शिव विवाह का खूबसूरत अंकन भी देखने को मिलता है।  सप्तशाखाओं से अलंकृत प्रवेश द्वार के बाद गर्भ में वामन की चतुर्भुज प्रतिमा विद्यमान है। जबकि बाहरी आलियों में नृ¨सह एवं वराह अवतार की प्रतिमाएं भी हैं। वामन मंदिर से जरा सा आगे चले जाएं तो जवारी मंदिर है। भगवान विष्णु को समर्पित इस मंदिर में उनके बैकुंठ रूप में दर्शन होते हैं। मंदिर की बाहरी दीवारों पर काफी संख्या में मूर्तियां है। इनमें अनेक मैथुन दृश्य भी हैं।
जैन तीर्थ था खजुराहो
अपने स्वर्णकाल में खजुराहो जैन तीर्थ के रूप में भी विख्यात था। आज यहां चार जैन मंदिर स्थित हैं। इनमें से घंटाई मंदिर आज खंडहर अवस्था में है। एक मंडप के रूप में दिखने वाले इस मंदिर के स्तंभों पर घंटियों का सुंदर अलंकरण है। प्रवेश द्वार पर शासन देवी-देवताओं की मनोहारी प्रतिमाएं हैं। जबकि गर्भगृह के द्वार पर शासन देवी चक्रेश्वरी की गरुड़ पर आरूढ़ प्रतिमा है। शेष तीनों जैन मंदिर कुछ दूर एक परिसर में स्थित हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है पा‌र्श्वनाथ मंदिर। जो राजा धंगदेव के काल में एक वैभवशाली नगर श्रेष्ठी द्वारा बनवाया गया था। इस मंदिर का भू-विन्यास कुछ विशिष्ट है। यहां मंदिर की बाहरी दीवारों पर तीर्थकर प्रतिमाएं बनी हैं। इनके साथ कुबेर, द्वारपाल, गजारूढ़ या अखारूढ़ जैन शासन देवताओं का सुंदर अंकन भी है। गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर नवग्रहों के साथ जैन तीर्थकरों के दर्शन भी होते हैं। गर्भगृह में पा‌र्श्वनाथ जी की श्यामवर्ण प्रतिमा विराजमान है। यहीं बराबर में आदिनाथ मंदिर है। इसकी शिखर संयोजना एकदम सादी है। यहां मूर्तियों की पंक्तियों में गंधर्व, किन्नर, विद्याधर शासन देवी-देवता, यक्ष मिथुन व अप्सराएं शामिल हैं। इनमें आरसी से काजल लगाती नायिका तथा शिशु पर वात्सल्य छलकाती माता को देख सैलानी मुग्ध हो जाते हैं। मंदिर के तोरण में तीर्थकर माता के सोलह स्वप्नों का सुंदर चित्रण है और गर्भगृह में आदिनाथ जी की प्रतिमा है। परिसर में स्थित शांतिनाथ मंदिर को प्राचीन मंदिर नहीं कहा जा सकता। क्योंकि यह लगभग सौ वर्ष पुराना मंदिर है। यहां आज पूजा-अर्चना का नियम है। मंदिर में मूलनायक सोलहवें तीर्थकर शांतिनाथ की बारह फुट ऊंची प्रतिमा तथा चित्र दर्शनीय हैं। परिसर के साथ ही साहु शांति प्रसाद जैन कला संग्रहालय भी है। जहां खजुराहो क्षेत्र से प्राप्त सौ से अधिक प्राचीन प्रतिमाएं प्रदर्शित हैं।
पूर्वी मंदिरों के बाद हम रास्ता पूछते हुए दक्षिणी मंदिरों की ओर चल दिए। इनमें से एक खोकर नदी के तट पर स्थित दूल्हादेव मंदिर है। यह मंदिर शिव को समर्पित है। इस मंदिर के संरक्षण के लिए वहां कुछ कार्य चल रहा था, इसलिए यह लोहे के जाल से घिरा था। ऐसी स्थिति में यहां बाहरी मूर्तियों को देखना संभव न था। मंदिर के अंदर एक विशाल शिवलिंग पर एक हजार छोटे-छोटे शिवलिंग बने हैं। यह 12वीं शताब्दी में निर्मित चंदेल राजाओं की अंतिम धरोहर है। चतुर्भुज मंदिर जाने के लिए नदी के पुल को पार कर एक गांव और खेतों के बीच से होकर पहुंचे। ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर साइकिल चलाने का यह पहला अनुभव था। चतुर्भुज मंदिर एक साधारण चबूतरे पर बना है। इस मंदिर की दीवारों पर बनी मूर्तियों में दिग्पाल, अष्टवसु, अप्सराएं और व्याल प्रमुखता से हैं। इस मंदिर की दीवारों पर मिथुन मूर्तियों का अभाव है। मंदिर के गर्भगृह में शिव की सौम्य प्रतिमा है। कुछ वर्ष पूर्व चतुर्भुज मंदिर से कुछ दूर एक ओर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने उस टीले पर उत्खनन कार्य शुरू करवाया तो एक विशाल मंदिर का खंडित हिस्सा सामने आया। उस स्थान को बीजा मंडल कहा जाता है। यहां अभी उत्खनन कार्य जारी है।
बलुआ पत्थर के बने हैं मंदिर
कला पारखी जब खजुराहो के मंदिरों के भू-विन्यास व उर्ध्व विन्यास पर गौर करते हैं तो पता चलता है कि इनमें से ज्यादातर मंदिर बलुआ पत्थर के बने हैं। इनमें से कुछ मंदिरों के निर्माण में ग्रेनाइट का प्रयोग भी हुआ है। अपने निर्माण के एक हजार वर्ष पूरे कर रहे इन मंदिरों की निर्माण शैली भी विशिष्ट है। पर्वत के समान ऊंचे उठते ये मंदिर बाहरी तौर पर देखें तो रथ शैली में बने कहे जाते हैं। इनमें से चित्रगुप्त मंदिर, जगदंबी मंदिर और चतुर्भुज मंदिर त्रिरथ शैली में बने छोटे मंदिर हैं। लक्ष्मण मंदिर, विश्वनाथ मंदिर और दूल्हादेव मंदिर पंचरथ शैली में बने हैं तथा कंदारिया महादेव सप्तरथ शैली का बेजोड़ नमूना है। आंतरिक तौर पर इनकी शैली सांधार व निरंधार रूप में है। सांधार शैली के मंदिरों का आतंरिक भाग अ‌र्द्धमंडप, महामंडप, अंतराल, गर्भगृह और प्रदक्षिणा पथ के रूप में पांच भागों में विभाजित है। जो मंदिर निरंधार शैली में बने हैं, उनमें प्रदक्षिणा पथ का अभाव है। खजुराहो मंदिरों के बहिरंग व अंतरंग के अलंकरण के रूप में मूर्तियों का प्राचुर्य तो जैसे इनका गौरव है। इष्ट देवताओं की प्रतिमाओं के अलावा नारी सौंदर्य तथा कामकला की मूर्तियां यहां सबसे ज्यादा प्रभावित करती हैं। पाषाण पर हथौड़े-छेनी का प्रयोग शिल्पकारों ने इतने सधे ढंग से किया है कि उनकी प्रशंसा किए बिना कोई पर्यटक वापस नहीं जा सकता। प्रत्येक मूर्ति पर नारी शरीर की कोमलता और सौष्ठव का हर पक्ष स्पष्ट झलकता है। आकर्षक ग्रीवा, उन्नत वक्ष, बल खाते कटि प्रदेश और उभरे नितंबों के साथ कमनीय देह की हर लोच और लचक यहां विद्यमान है। नारी जीवन के अनेक प्रसंग यहां मौजूद हैं। कहीं वह वेणी गूंथ रही है तो कहीं दर्पण में अपने सौंदर्य को निहार रही है, कहीं पगतल में आलता लगा रही है तो कहीं प्रेम पाती पढ़ रही है। हर प्रसंग में उनकी भावभंगिमा अर्थपूर्ण नजर आती है। यह तय है कि इतनी उत्कृष्ट मूर्तियों के रचनाकार कलाजीवी नहीं, कलासाधक रहे होंगे।
समझ से परे
मंदिर की भित्तियों पर जब जीवन के हर आयाम को उकेरने का प्रयास किया जा रहा था तो वे महान रचनाकार भला दैनिक रागात्मकता से उभरे आनंद को उकेरने में कैसे चूकते। इसलिए प्राय: हर मंदिर पर प्रेमपूरित प्रस्तर प्रतिमाएं विद्यमान हैं। अन्य मूर्तियों की तुलना में मूर्तियों की संख्या बहुत कम है। किंतु फिर भी काम कला का हर रूप यहां नजर आता है। वात्स्यायन के कामसूत्र में वर्णित अनेक आसन भी खजुराहो की मैथुन प्रतिमाओं में अंकित हैं।
इन सबमें सामूहिक मैथुन के दृश्य तो दर्शकों के मन में एक अलग तरह का कौतूहल पैदा करते ही हैं, किंतु पशु मैथुन के गिने-चुने दृश्यों का रहस्य समझ से परे है। यहां स्थित रति दृश्यों में कुछ तो वास्तव में इतने उत्कृष्ट बन पड़े हैं कि उनसे चरम अनुभूति का भाव भी झलकता है। ऐसे रति दृश्य खजुराहो की महानतम कलाकृति कहे जा सकते हैं। मूर्ति शिल्प की उत्कृष्टता यह भी दर्शाती है कि ये मैथुन मूर्तियां किसी तरह के पूर्वाग्रह या कुंठा से उपजी हुई रचनाएं नहीं है। किंतु धार्मिक स्थलों पर इनकी उपस्थिति सामान्य जन के मन में कई तरह के प्रश्नों को भी जन्म देती है। आखिर उपासना के पथ पर भोग-विलास का क्या अर्थ है? भक्ति के साथ भोग का क्या मेल? लेकिन ऐसे दृश्यों का उत्तर न तो मंदिर की दीवारों पर मिल सका और न किसी शिलालेख पर ही।
इस संदर्भ में जो भी मत सामने आते हैं, वे सब अनुमान पर ही आधारित कहे जा सकते हैं। एक मत है कि ये मूर्तियां यहां अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष के सिद्धांत का हिस्सा हैं। इस विषय में यह भी कहा जाता है कि ये प्रतिमाएं भक्तों के संयम की परीक्षा का माध्यम हैं। जो इन काममग्न मूर्तियों के प्रभाव से मुक्त रह पाएगा, वही मंदिर में अपने इष्टदेव के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त करेगा। ऐसे भी लोग हैं जो हेमवती की कथा को ही सत्य मानते हैं।
एक मत यह भी है कि चंदेल राजाओं के काल में इस क्षेत्र में तांत्रिक समुदाय की वाममार्गी शाखा का वर्चस्व था। जो योग तथा भोग दोनों को मोक्ष का साधन मानते थे। ये मूर्तियां उनके क्रियाकलापों की ही देन हैं। बहरहाल स्थापत्य की इस विधा के मूल में कारण और औचित्य चाहे कुछ भी रहा हो, यह तो निश्चित है कि उस काल की संस्कृति में ऐसी कला का भी महत्वपूर्ण स्थान था।
प्रकृति की संपदा निराली
खजुराहो में पर्यटकों के लिए पुरातत्व महत्व का एक और आकर्षण पुरातत्व संग्रहालय है। जहां प्राचीन मंदिरों तथा प्रतिमाओं के अवशेष संग्रहीत हैं। इसके अतिरिक्त चौसठ योगिनी मंदिर, लालगुआन महादेव मंदिर तथा शिवसागर झील भी देखने योग्य जगहें हैं। खजुराहो के आसपास भी कुछ दर्शनीय स्थल हैं। केन नदी के तट पर स्थित एनेह फॉल वहां से 19 किलोमीटर दूर है। काफी ऊंचाई से गिरता यह झरना अनोखा प्राकृतिक दृश्य प्रस्तुत करता है। दूसरी ओर 7 किलोमीटर दूर बेनी सागर झील एक सुंदर पिकनिक स्पॉट है। पन्ना मार्ग पर 34 किलोमीटर दूर पांडव जल प्रपात भी पर्यटकों को आकर्षित करता है। यहां से आगे निकल जाएं तो पन्ना राष्ट्रीय उद्यान में अनेक वन्य प्राणियों को उनके वास्तविक परिवेश में स्वच्छंद विचरण करते देख सकते हैं।
एक शाम खजुराहो में हमें लोकनृत्यों से झूमती सांस्कृतिक संध्या देखने का अवसर मिला। जिसमें मध्यप्रदेश के साथ अन्य राज्यों के नृत्य भी प्रदर्शित किए गए। वैसे खजुराहो में सांस्कृतिक गतिविधियां अधिक नहीं हैं। फिर भी जैन मंदिरों में होने वाला पालकी महोत्सव, होली पर जल विहार वार्षिक मेला तथा शिवरात्रि पर लगने वाला मेला कुछ धार्मिक आयोजन हैं। इनमें स्थानीय पर्यटक अधिक होते हैं। दिसंबर में यहां लोक नृत्यों का राष्ट्रीय समारोह लोकरंजन भी पर्यटकों को बहुत आकर्षित करता है। इसके साथ ही उस समय लोक आभूषण एवं लोकवादकों की प्रदर्शनी भी लगती है। लेकिन देश-विदेश के पर्यटकों को यहां सबसे ज्यादा लुभाने वाला कार्यक्रम हर वर्ष मार्च में होने वाला खजुराहो नृत्य समारोह है। इस समारोह में देश के विभिन्न शास्त्रीय नृत्यों की जानी-मानी प्रतिमाएं अपनी प्रतिमा का प्रदर्शन करती है। यूं भी भारत के शास्त्रीय नृत्य मंदिरों से सदा ही जुड़े रहे हैं। इस उत्सव के सहारे हर वर्ष इन नृत्यों की थाप मंदिर प्रांगण में सुनने को मिलती है। पृष्ठभूमि में नजर आते आलीशान मंदिर हर नृत्य को अनोखी भव्यता प्रदान करते हैं।
वास्तव में अद्भुत हैं खजुराहो के ये कला तीर्थ। सर्वोत्तम मूर्तिकला, सुव्यवस्थित शिल्पकला तथा उत्कृष्ट वास्तुकला की यह मुक्ताकाश दीर्घा सदियों तक कलाप्रेमियों और सौंदर्य उपासकों को आकर्षित करती रहेगी। sabhar :http://www.jagranyatra.com/

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