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शनिवार, 22 फ़रवरी 2014

नैनो रोबो करेगा काया की सैर

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 तकनीक के क्षेत्र में अगली क्रांति का नाम है नैनो टैक्नोलॉजी। वैज्ञानिकों का दावा है कि नैनो के दम पर इस सदी के मध्य तक पूरी दुनिया का कायाकल्प हो जाएगा, बड़े-बड़े काम बेहद छोटे उपकरण कर देंगे। नैनो की दास्तान बता रहे हैं कुलदीप शर्मा




photo : gogale






लिलिपुट जैसे बौनों की दुनिया की कल्पना सबने की है। इस बारे में सोचें तो अजीब-सी सिहरन होती है। दरअसल सूक्ष्म से सूक्ष्मतर की क्रांतिकारी खोज ही नैनो टैक्नोलॉजी है। नैनो एक मीटर का अरबवां हिस्सा होता है। मोटे तौर पर कहें तो मानव के बाल का अस्सी हजारवां भाग। अभी तक परमाणु को सबसे छोटा कण माना जाता रहा है, मगर नैनो उससे भी सूक्ष्म है। इसी सूक्ष्मतम भाग को लेकर हल्की मगर मजबूत वस्तुओं का निर्माण किया जाएगा। इससे करिश्मायी उपकरण तैयार होंगे, जो हैरान करेंगे, मगर सच्चाई लिए होंगे। ऐसे नैनो रोबो तैयार होंगे, जो दिल के लिए खतरा बनी रुकी हुई रक्त धमनियों को खोलते चले जाएंगे। ऐसी मिनी माइक्रोचिप, जो बड़ी मात्रा में सूचनाएं समोएगी, कंप्यूटर, मोबाइल, टीवी की दुनिया ही बदल जाएगी। खानपान, सुरक्षा के नए रूप होंगे।
नैनो रोबो करेगा काया की सैर आज चिकित्सा जगत में इलाज के लिए ‘हिट एंड ट्रायल’ पद्धति है यानी अंदाज के आधार पर रोग की दवा दी जाती है। मगर अब नैनो पद्धति द्वारा दवा ठीक ठिकाने पर पहुंचेगी। इस दिशा में तेल अवीव यूनिवर्सिटी की महत्वपूर्ण सफलता सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार मात्र एक परमाणु की मोटाई का एक ऐसा नैनो कण आधारित नैनो रोबो तैयार कर लिया गया है, जो स्टील की तरह मजबूत है और रबड़ की तरह एकदम लचीला। विश्वविद्यालय के रिसर्च एंड इम्यूनोलॉजी विभाग में कार्यरत शोधकर्ता प्रो. डेन पीयर के अनुसार यह ‘मिनी सबमेरिन’ शरीर के कोने-कोने की खबर लेने में सक्षम है। इसके द्वारा धमनियों-शिराओं की रुकावट को खोल पाना संभव है तो वहीं पूरे इम्यून सिस्टम में यह दवा भी ठिकाने पर पहुंचा देता है।
नैनो कणों में उसके आकार के अनुरूप रंग प्रदर्शित करने की क्षमता है, अत: इसके द्वारा कैंसर कोशिकाओं की पकड़ भी संभव हो चली है। दो नैनो मीटर आकार के कण चमकीले हरे होते हैं तो वहीं 5 नैनो मीटर आकार के कण गहरा लाल रंग प्रदर्शित करते हैं। लंबे समय से इस बात की आवश्यकता महसूस की जा रही थी कि कोई इतना सूक्ष्म उपकरण मिल जाए, जो कोशिका में प्रवेश कर वहां उपस्थित डी.एन.ए.और प्रोटीन से सम्पर्क कर पाए। नैनो कण ने यह सपना साकार कर दिखाया है। इसके आधार पर कैंसर प्रभावित कोशिकाओं को बेहद प्रारंभिक अवस्था में पकड़ पाना संभव होगा। इसके बाद नैनो कणों के सहारे ही कैंसर कोशिका तक दवा पहुंचाना संभव हो जाएगा। इससे अन्य कोशिकाएं प्रभावित नहीं होंगी। 
इसके आगे की सफलता जिऑर्जियाई वैज्ञानिकों ने प्राप्त की है। जिऑर्जिया स्थित ओबेरियन कैंसर इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों द्वारा कैंसर प्रभावित कोशिकाओं को धोकर उन्हें तैराते हुए शरीर से बाहर करने की प्रभावी तकनीक विकसित की गई है। यहां के स्कूल ऑफ बायोलॉजी के डॉ. जॉन मैकडॉनल्ड द्वारा चुम्बकीय नैनो कणों का प्रयोग करते हुए रक्त में तैरती कैंसर कोशिकाओं की धरपकड़ की और उन्हें तैराते हुए शरीर से बाहर ले आए। रिपोर्ट के अनुसार ट्यूमर से कैंसर कोशिकाओं को निकाल उदर में पहुंचाना भी संभव हुआ है। इस तकनीक का प्रयोग ओवेरियन कैंसर के इलाज के लिए प्रभावी होगा।
इस दिशा में भारतीय वैज्ञानिकों की एक उल्लेखनीय दर्द निवारक सफलता सामने आई है। डीआरडीओ के वैज्ञानिकों द्वारा इलेक्ट्रिक शॉक के लिए मैगनेटिक नैनो पार्टिकल्स का प्रभावी प्रयोग कर दर्द को घटाया है। यहां के चीफ कंट्रोलर (आर एंड डी) डॉ. ए. एस. पिल्लई के अनुसार मनोचिकित्सा की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण सफलता है। आने वाले समय में नैनो टैक्नोलॉजी का प्रयोग कर एड्स जैसे गंभीर रोग का भी इलाज संभव होगा। 
नैनो भरेगी अधिक सूचनाहालांकि कंप्यूटर चिप आज भी भरपूर सूचना संजोने में सक्षम है, मगर आने वाले समय में नैनो इसे कई गुना बढ़ा देगी। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की कंपनी आइसिस इनोवेशन द्वारा ‘द ऑक्सफोर्ड इन्वेंशन’ नामक एक प्रभावी तकनीक विकसित की गई है, जिससे कार्बन नैनोट्यूब को शुद्ध कर इसे सिलिकॉन चिप के रूप में प्रयोग किया जा सकेगा। नैनोट्यूब वर्तमान ट्रांजिस्टर के आकार के 500वें भाग के बराबर होती है और इसमें बेहतर विद्युतीय गुण होते हैं। ब्रिटेन और स्पेन के वैज्ञानिक नैनोमीटर ड्रिल का प्रयोग कर चिप में इलैक्ट्रॉन के स्थान पर प्रकाश का प्रयोग करने की दिशा में कार्यरत हैं।
मोबाइल की कीमतें कमनैनो तकनीक आधारित मोबाइल अत्यंत संवेदी, सूचना से भरपूर, अनेक फीचर वाले तो होंगे ही, साथ ही इसकी कीमत भी बहुत कम होगी। इस दिशा में न्यूकासल विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट ऑफ नैनोस्केल साइंस एंड टेक्नोलॉजी - आईएनइएक्स के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने उत्तरी ब्रिटेन के दो पर्यटक स्थान इतने छोटे पैमाने पर बना लिए हैं, जो कोरी आंखों से दिखाई भी नहीं देते। वैज्ञानिकों के इस दल ने रसायनशास्त्र, भौतिकी और मैकेनिकल इंजीनियरिंग का इस्तेमाल करते हुए ‘द एंजल ऑफ द नॉर्थ’ और ‘द टाइन ब्रिज’ नामक दो नन्हे ढांचे बनाए हैं। दोनों ही सिलिकॉन से बने हैं और करीब चार सौ माइक्रॉन चौड़े हैं। इन मॉडलों को बनाने में इस्तेमाल टैक्नोलॉजी को अगली पीढ़ी के मोबाइल फोन के सूक्ष्म एंटीना बनाने के काम में लाया जा सकता है। 
होंगे करिश्मे भी.!जर्मन वैज्ञानिकों ने पिछले दिनों नैनो पार्टिकल्स आधारित ऐसा स्प्रे तैयार किया है, जो सफाई के लिए विशेष तौर पर सहायक होगा। नैनोपूल नामक फर्म द्वारा तैयार यह स्प्रे मानव बाल से भी छोटे स्थान की सफाई कर उसे कीटाणु रहित कर डालता है। स्नानगृह यह स्प्रे आनन-फानन में उन्हें साफ कर डालेगा। यही नहीं, फर्म का दावा है कि ओवन, गैस चूल्हा, बर्तन आदि में जले खाद्य, जले के दाग, पत्थर पर जमी गंदगी हो, कार का शीशा या कपड़े, दाग इस नैनो स्प्रे के आगे टिक नहीं पाएंगे।
भारत में जारी नैनो परियोजनाएंवर्ष 2003 के अंत में भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा कोलकाता में ‘इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन नैनो साइंस एंड टैक्नोलॉजी’ का आयोजन किया गया था। बंगलौर स्थित जवाहर लाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च में नैनो विज्ञान पर उल्लेखनीय कार्य किये जा रहे हैं। यहां से 1.5 नैनोमीटर व्यास की नैनो ट्यूब तैयार की गई। पुणे स्थित राष्ट्रीय रसायन प्रयोगशाला द्वारा नैनो कणों की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया गया है। यहां नीम आधारित स्नव के प्रयोग हुए क्रायोजैनिक मैटल और बायोमैटेलिक नैनो कणों का निर्माण किया गया है। केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग संस्थान, नई दिल्ली स्थित केंद्रीय प्रयोगशाला जैसे देश के विभिन्न संस्थान व विश्वविद्यालय भी नैनो तकनीक की दिशा में शोधरत हैं।
क्या है नैनो टैक्नोलॉजीनैनो तकनीक के सहारे वस्तुओं को अतिसूक्ष्म तरीके से बनाया जा सकेगा। इसका प्रयोग व्यापक रूप में होगा। यह शब्द ग्रीक भाषा से आया है। हालांकि वहां भी यह मूलत: नैनो न होकर ‘नैनोज’ है। इसी नैनोज को प्रारंभिक स्तर पर वैज्ञानिकों ने किसी विशिष्ट अभिप्राय और भविष्य की सूक्ष्मतर कणों से संबंधित शाखा को स्पष्ट करने के लिए प्रयोग किया। लम्बे समय तक इस शब्द को अपनाने के लिए बहस भी हुई, मगर अंतत: इसका प्रयोग सूक्ष्म से सूक्ष्मतर अंश के लिए किया गया। असल में ग्रीक भाषा में नैनोज का शाब्दिक अर्थ बौना (ड्वार्फ) है। sabhar :http://www.livehindustan.com/


नैनों तकनीक यानि इंजीनियरिंग की ऐसी विधा जिसमें एक कण से भी छोटे पदार्थों का अध्ययन किया जाता है, शोध किए जाते हैं। इस तकनीक का इंसान के हित में कैसे इस्तेमाल किया जाए ये एक बड़ा सवाल रहा है।

अगर आप दांत की समस्या से परेशान हैं तो नैनों तकनीक के जरिए इलाज कराना बेहतर विकल्प साबित हो सकता है। सिंगापुर की बायोमर्स कंपनी ने इस दिशा में काफी काम भी किया है। सिंगापुर की नेशनल यूनिवर्सिटी के शोधार्थियों की मदद से कंपनी ने दंत चिकित्सा के लिए ऐसे तार विकसित किए हैं जिनके इस्तेमाल के बाद दांतों को कसने के लिए धातु के तार लगाने की जरूरत नहीं पड़ती।

बायोमर्स के सह संस्थापक और उपाध्यक्ष जॉर्ज एलिफट्रियास कहते हैं, 'हमारी ये सोच है कि पॉलीमर दांत के लिए बेहतर विकल्प हो सकता है। दांतों पर कोई भी ट्रैने के आकार वाले धातु के तार नहीं देखना चाहता।'

कई वैज्ञानिक और शोधकर्ता मानते हैं कि नैनों तकनीक की मदद से इंसान के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव किए जा सकते हैं। रिजर्ववायर और नहरों में पानी की पारगम्यता कम करने के लिए भी इसका इस्तेमाल फायदेमंद साबित हो सकता है।

कपड़ा उद्योग, जंग प्रतिरोधक सामान तैयार करने में और दवाएं बनाने में भी इसका इस्तेमाल हो सकता है। सिंगापुर के मैटेरियल रिसर्च एंड इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर एंडी होर कहते हैं, 'पिछले पांच सालों में इस क्षेत्र में काफी काम हुआ है।'

नुकसान भी कम नहीं : नैनो तकनीक के अगर फायदे हैं तो नुकसान भी कम नहीं। प्रोफसर होर कहते हैं, 'अभी तक वैज्ञानिक मानते थे कि अगर किसी पदार्थ की रासायनिक संरचना के बारे में पता चल जाए तो उसके व्यवहार के बारे में पता लगाया जा सकता है। जैसे कि नमक का स्वाद नमकीन ही होता है फिर चाहे नमक का टुकड़ा छोटा हो या बड़ा। लेकिन आज ऐसा नहीं है। अब साबित हो चुका है कि आकार प्रकार का पदार्थ के व्यवहार पर असर पड़ता है। अगर ज्यादा बड़ा आकार है तो पदार्थ नए तरीके का व्यवहार कर सकता है।'

नैनो तकनीक का स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ता है अभी तक इसके बारे में ठीक से पता नहीं किया जा सका है।

बदलता रहा नजरिया : नैनो तकनीक के बारे में दुनिया का नजरिया पिछले दो दशकों में काफी बदला है। नोबेल विजेता वैज्ञानिक एरिक द्रेक्सलर ने दुनिया के खात्मे का एक काल्पनिक सीन तैयार किया था।

इसमें उन्होंने मॉलिक्यूलर नैनो तकनीक का इस्तेमाल करते हुए ऐसे रोबोट की कल्पना की थी जो पूरी धरती को खा सकता है। इस पूरी तस्वीर में दिखाया गया था कि दुनिया का विनाश करने के दौरान रोबोट स्वयं का विकास भी करता रहता है। हालांकि यह एक तरह की कोरी कल्पना थी लेकिन इससे साबित होता है कि नैनो तकनीक का इस्तेमाल कितना खतरनाक हो सकता है।

स्वास्थ्य पर नैनो तकनीक के प्रभाव का सटीक आंकलन अभी किया जाना बाकी है। जर्मनी के फेडरल इंस्टीट्यूट ऑफ रिस्क एसेसमेंट का कहना है कि अभी तक इस बात के कोई पुख्ता सबूत नहीं मिलें हैं कि नैनो तकनीक के इस्तेमाल का स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है।

अगर देशों की बात की जाए तो 2006 के बाद से ही सिंगापुर नैनो तकनीक के क्षेत्र में काफी आगे रहा है। इस देश में नैनो तकनीक के क्षेत्र में काम करने वाली कंपनियों का स्वागत किया जाता है। फिलहास यहां 13 कंपनियां काम कर रही हैं।

सिंगापुर इकोनॉमिक डेवलपमेंट बोर्ड के निर्देशक यी सेन गियान कहते हैं, '2011 से 2015 के बीच सरकार ने इसके शोध के बजट में 25 फीसदी की बढ़ोतरी की है। हम लोग टैक्स में छूट देते हैं, विकास के लिए कर्ज देते हैं।' sabhar :http://hindi.webdunia.com/

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