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मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

देश-विदेश में रिसर्च के लिए प्राचीन ग्रंथों का अनमोल खजाना है साधु आश्रम

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प्राचीन ग्रंथों का अनमोल खजाना है साधु आश्रम, देश-विदेश में रिसर्च के लिए है प्रसिद्ध


होशियारपुर। पंजाब की पावन धरा होशियारपुर में उना मार्ग स्थित साधु आश्रम में विश्वेश्वरानंद वैदिक रिसर्च इंस्टिट्यूट को समर्पित इस संस्थान का इतिहास गौरवमय रहा है। वैदिक साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए आज भी यह केंद्र देश में ही नहीं विदेशों में भी रिसर्च के लिए प्रसिद्ध है।
 
साधु आश्रम में स्थित इस केंद्र में अनगिनत प्राचीन ग्रंथ व दक्षिण भारतीय लिपि में लिखे संस्कृति के अनेक ग्रंथ पड़े हैं। देश-विदेश से विद्वान, अध्यापक व खोजकर्ता खोज करने के लिए आते रहते हैं। इस संस्था में चारों वेदों के अंग्रेजी व फ्रैंच भाषा में अनुवाद मौजूद हैं। वेदों से संबधित साहित्य भी यहां रखा हुआ है।
 
ज्ञान का विशाल भंडार है यह केंद्र
 
ब्रिटेन के इनसाइक्लोपीडिया विश्व की प्रमुख भाषाओं की डिक्शनरियां व प्रसिद्ध विद्वानों की आत्मकथा सहित यहां पर करीब डेढ़ लाख पुस्तकें मिल जाती है। पंडित जवाहर लाल नेहरु व महात्मा गांधी की आत्मकथा का अंग्रेजी व हिंदी अनुवाद यहां मौजूद है। धर्मसूत्र, ब्राह्मण व आर्य साहित्य यहां उपलब्ध है।
 
उल्लेखनीय है कि पुणे के भंडारा रिसर्च इंस्टीट्यूट के बाद बीबीआरआई भारत का दूसरा ऐसा संस्थान है, जिसके पास ज्ञान का इतना विशाल भंडार है। धार्मिक शास्त्रों के अलावा साहित्य, कला, दर्शन शास्त्र, ज्योतिष, भाषा व लिपि से संबधित हजारों पुस्तकें यहां हैं।
 
गुरमुखी लिपि में लिखा हुआ श्री राम चरित मानस ग्रंथ, संस्कृत में लिखे श्री गुरु ग्रंथ साहिब व बाइबल के एडीशन यहां देखे जा सकते हैं। मुगल बादशाह औरंगजेब की हस्त लिखित कुरान के अंशों के चित्र, कुरान मजीद का हिंदी में अनुवाद, पबूची लिपि में लिखी गई एक पुस्तक, जिसे अब तक पढ़ा नहीं जा सका है व अनेक हस्त लिखित पुस्तकें ऐसी हैं, जिनको कैमिकल ट्रीटमेंट से बचाने की जरुरत है।
 
चरक संहिता व भाव प्रकाश ग्रंथ यहां पड़े हैं, जिनसे आयुर्वेद का असीमित ज्ञान लिया जा सकता है। इन ग्रंथों में बिमारियों व उनके इलाज को चित्रों द्वारा पेश किया गया है। कई प्राचीन सिक्के यहां की अनमोल धरोहर हैं। 
 
इस संस्था के निर्माण के लिए होशियारपुर के गांव बजवाड़ा निवासी धनी राम भल्ला ने पिता की याद में अपने गांव के नजदीक बने साधु आश्रम में जगह दी थी। 1957 में वैदिक संस्था का यहां निर्माण करने वाले आचार्य विश्वबंधु को महाराजा पटियाला, गोपी चंद भार्गव व संस्कृति के प्रति रूचि रखने वाली अनेक शख्सियतों ने धन का सहयोग दिया। 
 विभाजन के समय लाहौर से होशियारपुर आया था यह केंद्र
 
देश के बंटवारे से पहले यह केंद्र लाहौर के डीएवी संस्थान परिसर में स्थापित था। जब देश का विभाजन हुआ तो इस संस्थान के तत्कालीन डायरेक्टर विश्व बंधु जी ने पाकिस्तान सरकार को कहा, "हम इस धरोहर को हिंदुस्तान ले जाते हैं, क्योंकि यहां तो अब इस्लाम धर्म स्थापित हो गया है।" पाकिस्तान सरकार इसके लिए यह कहते हुए राजी नहीं हुआ कि यह तो देश की धरोहर हैं और वे नहीं ले जाने देंगे।
 
कहते हैं कि यह बात सुन विश्वबंधु जी ने योजना के तहत रातोंरात हिंदुस्तान की तरफ आ रहे घोड़ागाड़ी, बैलगाड़ी, ट्रक व रेल में किसी तरह दुर्लभ ग्रंथों को रखते हुए सभी को यही बताया कि इसे हिंदुस्तानी सीमा में किसी सुरक्षित स्थानों पर रखवा देना। 
प्राचीन ग्रंथों का अनमोल खजाना है साधू आश्रम, देश-विदेश में रिसर्च के लिए है प्रसिद्ध
बजवाड़ा के धनीराम भल्ला के सहयोग से साधु आश्रम में बना यह केंद्र
 
साधु आश्रम में आज संस्थान के चेयरमैन प्रोफेसर प्रेमलाल शर्मा के साथ-साथ प्रोफेसर कृष्ण मुरारी शर्मा, पीयू के रजिस्ट्रार सुरजीत सिंह ठाकुर व डॉ. वेदप्रकाश ने बताया कि इस केंद्र के साथ लगते हुए ऐतिहासिक गांव के रहने वाले धनीराम भल्ला, जो कानपुर के बड़े उद्योगपति थे, ने विश्वबंधु जी को यह निमंत्रण दिया,  "आप इस केंद्र का स्थापना होशियारपुर में करें, तो मैं जमीन देने को तैयार हूं।"
 
विश्वबंधु जी, जो तमाम कष्ट व परेशानियों को झेलते हुए लाहौर से इस प्राचीन ग्रंथों को संभालकर लाए थे, ने होशियारपुर में इस केंद्र की नींव रखी। पद्म विभूषण से सम्मानित आचार्य विश्ववंधु के प्रयासों से 1965 में इस संस्था का एक भाग पंजाब यूनीवर्सिटी चंडीगढ़ से जुड़ गया, जिसका नाम विश्वेश्वरानंद विश्व बंधु संस्कृत व भारत भारती अनुशीलन संस्थान रखा गया। इसके तहत शिक्षा विभाग, लाइब्रेरी, वैदिक खोज व निर्माण, शोध व प्रकाश का काम यहां शुरू हुआ।
 
19.42 मीटर लंबी जन्मकुंडली व अश्वफल प्रकाश ग्रंथ है अमूल्य धरोहर
 
शास्त्री, आचार्य व एमए संस्कृत यहां पढ़ाई जाती है। पुरातन धरोहरों को वैज्ञानिक ढंग से बचाने का प्रशिक्षण दिया जाता है। कॉम्प्लेक्स में विद्यार्थियों के लिए होस्टल व खोजकर्ताओं के लिए रेस्ट हाउस तथा कैंटीन की सुविधा है। दूर-दराज व पास से आए शोधकर्ता व विद्यार्थी कई दिन यहां रह कर शोध करते हैं। लाइब्रेरी के साथ ही यहां बना संग्रहालय सैलानियों के लिए आकर्षण का केंद्र है। संग्रहालय का काम पुरातत्व विभाग देखता है। महाराजा पटियाला की पुरानी देवनागरी लिपि में लिखी 19.42 मीटर लंबी जन्म कुंडली व अश्वफल प्रकाश ग्रंथ यहां की अमूल्य धरोहरों में से एक है।


ग्रंथ भारत पहुंचने पर ही आचार्य विश्वबंधु जी ने छोड़ा था पाकिस्तान
 
विशेश्वरानंद वैदिक शोध संस्थान का आगाज सरकारी रुप से इसके संस्थापक स्वर्गीय आचार्य विश्वेश्वरानंद और स्वामी नित्यानंद जी ने शिमला में शांतिकुटि के स्थान पर सन 1903 में किया। सन 1916 में स्वामी नित्यानंद परकोलवासी हुए। स्वामी विश्वेश्वरानंद से सन 1918 तक शिमला में ही इस केंद्र को संचालित किया।
 
होल्कर दरबार की ओर से आर्थिक सहायता का वचन मिलने पर सन 1918 में इस पहले मैसूर और बाद में इंदौर में स्थानांतरित कर दिया गया। पांच वर्ष के बाद इसे लाहौर ले जाया गया। यहां वो अराजकीय रूप में सन 1947 तक बड़ी सफलतापूर्वक चलता रहा।
 
देश विभाजन के समय इस संस्थान का अस्तित्व लाहौर में मिट जाता, यह भांप आचार्य विश्वबंधु जी ने इसे भारत लाने की ठान ली। उन्होंने इस अनमोल धरोहर राष्ट्रीय संपदा को अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय समझकर संगीनों के साये और गोलियों की बौछार में भी छाती से लगाए रखा। इसकी पांडुलिपियों, पुस्तकों, रजिस्टरों तथा अन्य संबधि कागजों को मिलाकर कुल वजन 4000 क्विंटल बनता था। जब तक एक-एक वस्तु भारत नहीं पंहुच गई, तब तक आचार्य जी वहीं बैठे रहे। 
 आचार्य विश्व बंधु का संक्षिप्त परिचय
 
आचार्य विश्वबंधु जी का जन्म 30 सितंबर, 1898 को जिला शाहपुर में हुआ। उन्होंने सन 1918 में पंजाब विश्वविद्यालय लाहौर से बीए व 1919 में एमए शास्त्री की परीक्षाएं विश्वविद्यालय में प्रथम रहकर उत्तीर्ण की। सन 1920 में इटली सरकार की शिक्षा परिषद ने उन्हें नाइट कमांडर का अवॉर्ड प्रदान किया। सन 1950 में फ्रांस की ओर से उन्हें उच्चतम आदरी उपाधि दी गई। सन 1968 में शोध कार्यों के लिए पद्मभूषण से अलंकृत किया गया। एशियेटिक सोसायटी ने वेदों का अध्ययन करने के लिए उन्हें सन 1968 में स्वर्णपदक प्रदान किया। वह जीवन के अंतिम क्षण 1 अगस्त, 1973 तक इस संस्थान के डायरेक्टर पद पर अपनी भूमिका बखूबी निभाते रहे।
 sabhar :
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