बुधवार, 8 जनवरी 2014

चेतना का रहस्य और आदमी का दिमाग

 photo : google photo

मधुसूदन आनन्द 

क्या आपने वी. एस. रामचन्द्रन का नाम सुना है? रामचन्द्रन साइकॉलजी और न्यूरो साइंस के जाने-माने प्रोफेसर हैं जिन्होंने 'फैंटम्स इन द ब्रेन' और 'द इमर्जिंग माइन्ड' जैसी किताबें लिखकर दुनिया में धूम मचा रखी है। न्यूजवीक ने उन्हें दुनिया के उन 100 मशहूर लोगों की सूची में रखा है, जिनके काम से 21वीं सदी में कुछ अभूतपूर्व, कुछ क्रान्तिकारी निष्कर्ष सामने आने वाले हैं। चेन्नै के ये चमत्कारी अनुसंधानकर्ता अमेरिका के कैलिफॉर्निया विश्वविद्यालय में मस्तिष्क एवं संज्ञान केन्द्र के निदेशक हैं, जो मानवीय मस्तिष्क के रहस्यों की खोज करने में लगे हैं। उनकी खोज न्यूरो साइंस, फिलॉसफी और चेतना की गुत्थियों को खोल सकती है। 

आदमी का दिमाग एक अद्भुत मायालोक है, हालांकि आज हम जानते हैं कि हमारे दिल का धड़कना, हमारा सांस लेना, अंग संचालन, व्यवहार, स्मृति, भाषा, विचार, भावनाएं, तर्क शक्ति, कामनाएं, अवधारणाएं, कलाएं, सौन्दर्य शास्त्र, साहित्य और हमारा दर्शनशास्त्र आदि दिमाग से ही निकलते और नियंत्रित होते हैं। आज हम मोटे तौर पर दिमाग के उन हिस्सों को जानते हैं जिनसे हमारा बोलना-चालना, हाथ पैरों का चलना वगैरह नियंत्रित होता है, लेकिन फिर भी न्यूरो साइंस यानी मस्तिष्क संरचना और संचालन का विज्ञान अभी अपनी शैशव अवस्था में ही है। आम धारणाओं के विपरीत एक से डेढ़ किलो के बीच का औसत भार वाला वयस्क दिमाग बेहद कोमल होता है, कुछ-कुछ जैली की तरह और सुर्ख लाल। एक दिमाग एक सेकंड में 100 खरब संकेतों को प्रोसेस कर सकता है। जाहिर है दुनिया का कोई कम्प्यूटर आज ऐसा करने में सक्षम नहीं। आज एम.आर.आई. के जरिए हम दिमाग की मोटी-मोटी गतिविधियों को देख सकते हैं। जबकि मॉलिक्यूलर विश्लेषण से पता चलता है कि एक अंग के रूप में दिमाग क्या काम करता है लेकिन सोचने-समझने जैसी उच्च क्रियाओं में दिमाग कैसे काम करता है, यह ठीक-ठीक मालूम नहीं। दिमाग में लाखों-करोड़ों न्यूरॉन या तंत्रिकाएं हैं। उनके बीच क्या आपसी सम्बन्ध है, वे कैसे काम करती हैं, यह हमें ठीक-ठीक मालूम नहीं, लेकिन यह सही है कि न्यूरो साइंस के जरिए पता चल रहा है कि दिमाग के अन्दर क्या-क्या घट रहा है। 
 फ्रंटलाइन' पत्रिका के ताजा अंक में रामचन्द्रन के साथ शशि कुमार का एक विचारोत्तेजक इंटरव्यू छपा है। इस इंटरव्यू में रामचन्द्रन कहते हैं कि एक दिन यह सम्भव होगा कि न्यूरो साइंस की प्रगति दर्शनशास्त्र के तमाम बुनियादी प्रश्नों को हाशिए पर धकेल दे। एक जिज्ञासु और सोचने वाला दिमाग बार-बार प्रश्न करता है- मैं कौन हूँ? मैं यहां (इस संसार में) क्यों हूँ? यह संसार क्यों है? कुछ होने की बजाय कुछ भी नहीं होता, तो क्या होता? आदि-आदि। रामचन्द्रन कहते हैं कि ये प्रश्न साइंस के नहीं हैं। साइंस इनसे नहीं टकराती। ये ज्ञान मीमांसा के प्रश्न हैं। ये प्रश्न, हो सकता है, अनुत्तरित रहें, लेकिन चेतना का प्रश्न शायद हल हो जाए। चेतना यानी दिमाग को चलाने वाली चीज। चेतना क्या है? न्यूरॉन्स और उनकी गतिविधि को ही मोटे तौर पर चेतना के रूप में देखा जा सकता है। चेतना यानी होने का संज्ञान। साइंस में इसे क्वालिया कहा गया है। यह हमारी मानसिक स्थितियों का चरित्र या गुण है। मसलन गंध अनुभव करना, दर्द महसूस करना या डर जाना ऐसे अनुभव हैं, जिन्हें व्याख्यायित नहीं किया जा सकता। लेकिन ये हैं और इन्हें महसूस करने वाली चेतना को क्वालिया कहा गया है। लेकिन न्यूरॉन्स की ऐसी गतिविधियां भी चलती रहती हैं जिनके बारे में हमें कुछ पता नहीं होता या वे चेतना में नहीं आतीं। हमें उनके होने का कोई अनुभव नहीं होता। अगर एक बार वे समझ में आ जाएं तो कई भेद खुल सकते हैं। दर्शनशास्त्र के कई प्रश्न हल हो सकते हैं। 

वैज्ञानिक नजरिए से देखिए, हम क्या हैं? कई रसायनों और प्रणालियों का एक चलता-फिरता कारखाना। जटिल जीवन की एक मामूली कड़ी, डी.एन.ए. के जरिए अपने माता-पिता से जुड़ी। रामचन्द्रन प्रसिद्ध विज्ञानी फ्रांसिस क्रिक को उद्धृत करते हुए व्यंग्य में पूछते हैं कि मनुष्य क्या सचमुच सिर्फ न्यूरॉन का एक पुंज है, और फिर कहते हैं हम यह बात भी निश्चित तौर पर नहीं कह सकते। हमें अगनोस्टिक-अज्ञेयवादी होना पड़ता है। यानी इस बात को हम जान नहीं सकते। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम दार्शनिक मुद्रा अपना लें। जैसे हम जानते हैं कि दिमाग के कुछ खास हिस्सों तक ही कुछ क्रियाएं सीमित रहती हैं, यानी दिमाग के अलग-अलग हिस्सों का अलग-अलग काम है, जैसे रंग सम्बन्धी सूचना के विश्लेषण के लिए फूसीफार्म गाइरस का दिमाग में स्थान है या संज्ञान लेनेवाली तमाम गतिविधियां दिमाग के एक हिस्से तक ही केन्द्रित हैं, तो इसका मतलब यह नहीं हो जाता कि हम तो यह जान ही चुके हैं, अब आगे जानने को क्या रह गया है। हम जानना चाहेंगे कि दिमाग में कौन सी ऐसी क्रियाएं हैं, जो खास हिस्सों तक केन्द्रित हैं। वे किस हद तक और कहां केन्द्रित हैं। वे एक उदाहरण देते हैं : मान लीजिए, आप जानना चाहते हैं कि कार कैसे काम करती है, तो इसके लिए आपको कार को खोलना होगा और इसका मैकेनिजम समझना होगा। ऐसा ही दिमाग के मामले में हैं। आनुवांशिकता और डीएनए अपनी जगह सही हैं, लेकिन दिमाग को समझने के लिए विशुद्ध सैद्धान्तिक या कार्यप्रणालीवादी दृष्टिकोण नहीं अपनाया जा सकता। पिछले 30 वर्षों में प्रयोगवादी दृष्टिकोण ही ज्यादा सफल हुए हैं। सिर्फ दिमाग की संरचना- उसके स्ट्रक्चर के आधार पर ही कुछ नया नहीं खोजा जा सकता। वे मंगलग्रह के एक प्राणी का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि मान लीजिए अमीबा जैसा कोई प्राणी यहां आता है और मनुष्य की चीरफाड़ करते हुए अण्डकोश पाता है और उन्हें समझने की कोशिश करता है। वह देखता है वहां कुरकुर करते तमाम स्पर्म (शुक्राणु) हैं। वह चूंकि एक कोशिका वाला प्राणी है जो विभाजित होता रहता है और सेक्स से अनभिज्ञ है, अत: वह समझेगा, ये जरूर परजीवी होंगे। इसलिए स्ट्रक्चर के आधार पर ही दिमाग को नहीं समझा जा सकता। देखना यह भी होता है कि उसकी कार्यपद्धति क्या है और वह कैसे होती है। यानी दिमाग की संरचना और संचालन दोनों ही माध्यमों को अपनाकर हम कहीं पहुंच सकेंगे। दार्शनिकों के साथ दिक्कत यह है कि वे बिना समझे अनापशनाप शास्त्रार्थ में उलझे रहते हैं।

शायद यहां वे आत्मा-परमात्मा सम्बन्धी बहस की ओर इशारा करना चाहते हैं, जिसमें चेतना को लेकर तरह-तरह की बातें हैं। प्राय: सभी धर्मों में आत्मा को माना गया है लेकिन दिमाग के बारे में हुए अनुसन्धानों से साइंस ने पता लगा लिया है कि दिमाग में एक ऐसा केन्द्र भी होता है जो हमें धामिर्क अनुष्ठानों और ईश-प्रेम के लिए मजबूर करता है। यानी धार्मिक होने में कहीं आपके डीएनए और न्यूरॉन्स की भी भूमिका है। पर रामचन्द्रन कहते हैं कि दर्शन नहीं, न्यूरो साइंस से ही चेतना की प्रकृति का राज खुलेगा। लेकिन एक सच्चे साइंसदान की तरह वे यह भी कहते हैं कि इसका मतलब यह नहीं कि हम सब गुत्थियां सुलझा लेंगे। मसलन कलाओं और संगीत की एक ज्ञानातीत प्रकृति भी होती है, जरूरी नहीं कि इसका रहस्य भी खुल जाए। यह पता चल ही जाए कि साहित्य और कलाएं कभी-कभी क्यों अनुभवातीत हो जाती हैं। वे कहते हैं कि मैं कौन हूँ, क्यों हूँ, क्या मेरा जन्म एक दुर्घटनावश हुआ है- इन प्रश्नों को ज्ञानमीमांसा के लिए छोड़ दीजिए, चेतना को जरा अलग तरह से समझिए। जीवन की तरह चेतना शब्द का इस्तेमाल भी कई तरीकों से होता है। यह वस्तुत: कई मेकेनिजम का समुच्चय है। एक तो क्वालिया है और दूसरा स्व है। यानी वह चीज, जो जागरूक है, जगी हुई है। जो जान रही है कि यह लाल है, यह गुलाब है। लेकिन अगर आप यह नहीं जानते कि आप जानते हैं, तब जानना शब्द का कोई अर्थ नहीं रह जाता। 

वे कहते हैं कि न्यूरॉन्स द्वारा यह पता लगाया जा चुका है कि जब किसी को दर्द होता है तो उसका अनुभव दूसरे को भी हो सकता है। ये ऐसे न्यूरॉन्स हैं जो आपके और दूसरों के बीच की दीवार तोड़ते हैं। आप दूसरों से सहानुभूति करते हैं। रामचन्द्रन इन न्यूरॉन्स को जिन्हें मिरर न्यूरॉन्स कहा जाता है, दलाईलामा न्यूरॉन्स कहते हैं। इनकी खोज का मनोविज्ञान में आज वही स्थान बन गया है, जो जीवविज्ञान में डीएनए का है। इस खोज से मानवीय चेतना के अनेक अनजाने पहलुओं पर रोशनी पड़ेगी। रामचंद्रन ने पता लगाया है कि मिरर न्यूरॉन्स की कमी के कारण ही बच्चे चुपचाप और एकाकी महसूस करते हैं। न्यूरॉन्स ने आपको दूसरों के व्यक्तित्व में घुसने का रास्ता बता दिया है। वे कहते हैं कि कल्पना कीजिए चार-पांच शताब्दी के बाद कोई साइंसदान आपके दिमाग को बिल गेट्स के दिमाग में तब्दील कर दे तो आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी। और फिर खुद ही जवाब देते हैं कि 90 प्रतिशत लोग ऐसा कृत्रिम दिमाग लेने के बजाय अपना दिमाग ही अपने पास रखना चाहेंगे, क्योंकि वह सिर्फ रसायनों का संसार नहीं है, उसमें संस्कृति, इतिहास, पर्यावरण, परंपरा और समाजशास्त्र है। इन तमाम बातों की उसमें प्रोग्रामिंग नहीं की जा सकती। 

रामचंद्रन का यह इंटरव्यू पठनीय है, लेकिन यह जितने सवाल उठाता है, उतने जवाब नहीं मिलते। जैसे वे कहते हैं कि चेतना इस तरह के प्रश्नों से भी जुड़ी है कि मैं यहां क्यों हूं। मगर इसका उत्तर उनके पास नहीं है। वे कहते हैं यह ज्ञानमीमांसा का प्रश्न है, फिजिक्स, बायॉलजी या साइकॉलजी का नहीं। क्या पता चेतना के रहस्यों का पता लगाते-लगाते वे इन सवालों पर भी रोशनी डाल सकें क्योंकि वे पौर्वात्य धर्मों और हिन्दू धर्म में ऐसी जिज्ञासाओं के उल्लेख की ओर बार-बार इशारा करते हैं। sabhar :
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