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शनिवार, 4 जनवरी 2014

इंसान या भगवान? दोनों बच्चों का बचपन से ही पूंछ निकल आएं हैं

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SPECIAL: इंसान या भगवान? एक पंजाब का तो दूसरा हरियाणा का

देश के पंजाब और हरियाणा में दो ऐसे बच्चे हैं जिन्हें उन्हीं के परिवार वाले उन बच्चों को देवता का रूप दे रहे हैं। कारण दोनों बच्चों का बचपन से ही जेनेटिक गड़बड़ी के कारण पूंछ निकल आएं हैं। यह कहानी हरियाणा के पानीपत का 9 साल का बच्चा सुमित वर्मा और पंजाब के फतेहगढ़ का 13 साल का बच्चा अर्शिद अली खान की है। तो आइए, सबसे पहले हम पानीपत के सुमित वर्मा के बारे में आपको विस्तृत जानकारी देते हैं। सुमित की पीठ पर जेनेटिक गड़बड़ी के कारण जन्म से ही बालों की पूंछ सी है। इस कथित पूंछ को नौ सालों तक बच्चे के माता-पिता छुपाए रहे, मगर गरीबी ने उन्हें ऐसा बदला कि अब वही माता-पिता चाहते हैं कि यह ‘रहस्य’ दुनिया के सामने आ जाए। 
 
वे सोचते हैं कि यह पता लगने के बाद सरकार और बड़े लोगों के बीच उनका मान सम्मान बढ़ेगा। उन्हें कोई न कोई मदद मिलेगी। इससे उनकी जिंदगी पटरी पर आ जाएगी। खास बात यह है कि माता-पिता के इस ह्रदय परिवर्तन से बच्चा अब तक अनजान है। उसे पता नहीं कि जीवन देने वाले माता-पिता उसे भगवान के अंश रूप में स्थापित करने का मन बना चुके हैं। वह नहीं जानता, अगर ऐसा हुआ तो उसका बचपन एक व्यवसाय में बदल जाएगा। 
SPECIAL: इंसान या भगवान? एक पंजाब का तो दूसरा हरियाणा का

सुमित ने बताया, ‘मुझे पढऩा और खेलना पसंद है। बचपन से ही मेरी पीठ पर घने बाल हैं। मगर कम लोगों को इसकी जानकारी है।’ उसने बताया कि कॉलोनी में किसी को उसकी पूंछ के बारे में जानकारी नहीं है। उसके रिश्तेदार या कोई भी उसकी पूंछ के बारे में चर्चा नहीं करता। सुमित के साथ सबका सामान्य व्यवहार होता है। उसे कभी प्यार, कभी फटकार तो कभी मार भी पड़ती है। सुमित का कहना है कि पूंछ से कभी-कभी परेशानी तो होती है, लेकिन अब वह इसके साथ रहना सीख गया है। वह पूजा के समय ज्योत जलाता है और गणेश भगवान की आरती करता है। 

SPECIAL: इंसान या भगवान? एक पंजाब का तो दूसरा हरियाणा का
 दूसरी कहानी है पंजाब के फतेहगढ़ की, जहां पूंछ लेकर पैदा हुआ, आस्था का केंद्र रहा बच्चा व उसके परिजन आज पूंछ को लेकर ही दुविधा में है। जन्म से ही अपाहिज होने के चलते वह जैसे तैसे अपनी जिंदगी की गाड़ी दूसरों के सहारे खींचने को मजबूर है। आस्था के क्षेत्र में उस समय तहलका मच गया था जब 15 फरवरी 2001 को जिले के गांव नबीपुर में एक मुस्लिम परिवार के घर पैदा हुए बच्चे के पूंछ होने की बात चर्चा में आई। हिन्दू देवता के पूंछ की तुलना बच्चे से करते हुए भारी संख्या में श्रद्धालुओं ने बच्चे के घर में आना शुरू कर दिया तथा मन्नतें भी मांगी गई।देवता का स्वरूप होने पर श्रद्धालुओं की ओर से भेंटें भी दी जाने लगी। मुस्लिम परिवार में पैदा होने के बावजूद श्रद्धालुओं ने इसका नाम भी बाला जी रख दिया तथा आज वह बाला जी के नाम से ही जाने जाते है। अल्प आयु में तो पूंछ को लेकर इसे कुदरत की देन मानते रहे, लेकिन उमर बढऩे के साथ पूंछ का बढऩा तथा उस पर उग रहे बाल बाला जी के परिजनों की चिंता बढ़ा रहे है। क्योंकि बाला जी के बड़े होने के साथ साथ पूंछ भी बढ़ती जाएगी। चिंता इस बात की भी है कि पूंछ को कैसे हटाया जाए, जिसको लेकर देश के विभिन्न अस्पतालों के माहिर डाक्टरों की भी राय ली गई थी।बच्चे के नाना इकबाल कुरैशी बताते है कि उनके नाती जिसका नाम उन्होंने अर्शिद अली खान रखा था, लोगों ने उन्हें बाला जी का नाम दे दिया। अर्शिद के जन्म से ही पूंछ थी। इसके अलावा उनके लेफ्ट बाजू के ऊपर श्री हनुमान की बाजू की तरह धागे का निशान तथा पैरों के तलों में भी सामान्य से हट कर अलग किस्म के निशान व लक्षण बंदर देवता प्रदर्शित करते थे। बच्चे के पूंछ लेकर पैदा होने से सभी हैरान थे क्योंकि ऐसा कोई केस कभी सुनने में नही आया था। 

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रीड़ की हड्डी पर उगी पूंछ को लेकर कई डाक्टरों ने काटने की भी सलाह दी, लेकिन आपरेशन की सफलता के संदेह को लेकर वह आपरेशन से डरते रहे। लोग भी इनमें आस्था जताने लगे दूर दराज के क्षेत्रों से इनका आशीर्वाद लेने पहुंचते रहे। जिन लोगों की मनोकामना पूरी हुई उनकी भेंट भी बाला जी ने स्वीकार की। मुस्लिम परिवार में जन्में बाला जी को दोनों ही धर्मों में आस्था है तथा उन्होंने घर में बाला जी का मंदिर भी बना रखा है। नबीपुर के सरकारी स्कूल में कक्षा सात में शिक्षा ले रहे बाला जी अपाहिज होने के चलते अपने साथी बच्चों के साथ ट्राई साइकिल से ही स्कूल पहुंचते है। 
बाला जी की प्राइमरी स्कूल की अध्यापिका रंजीत कौर ने बताया कि बाला जी का व्यवहार आम बच्चों की तरह है, पर इनकी किसी भी बात को ग्रहण करने की शक्ति दूसरे बच्चों की अपेक्षा कुछ अधिक है। इन्हें गीत गाने तथा संगीत का शौक शुरू से ही रहा तथा एलिमेंटरी स्कूलों के जिला स्तरीय मुकाबलों में इनाम भी जीते। बच्चे के असामान्य होने के चलते इनके सहपाठी व दूसरे बच्चे भी इनको पूरा आदर देते हुए बाला जी के नाम से ही पुकारते है। बाला जी के शौच आदि की मुश्किल को लेकर स्कूल में इनके लिए विभाग की ओर से खास शौचालय भी बनवाया गया था। 
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sabhar : bhaskar.com



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