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सच्ची घटना: पुनर्जन्म

सच्ची घटना-2: पेंटिंग में बसी थी पिछले जन्म की पत्नी की आत्मा!

वाराणसी. क्या मरने के बाद किसी की आत्मा ऑइल पेंटिंग में सालों तक रह सकती हैं? इस सच्ची घटना में शैलेश बाबू के साथ कुछ ऐसा ही हुआ।
 बात उन दिनों कि है जब शैलेश बाबू डिब्रूगढ़ टी-स्टेट में लोगों के लिए मेस चलाया करते थे। 
हरी बाबू (बदला हुआ नाम) भी उन दिनों काशी से डिब्रूगढ़ काम करने पहुंचे थे।शैलेश बाबू की मेस में हरी बाबू भी लोगों के साथ रहने लगे। 
वहीं शैलेश बाबू की पत्नी की एक बड़ी सी ऑइल पेंटिंग उनके कमरे में टंगी थी। एक रात हरी बाबू ने एक बहुत सुंदर महिला को शैलेश बाबू का पांव बिस्तर पर दबाते देखा, यह देख उनके होश उड़ गए क्योंकि महिला की शक्ल ऑइल पेंटिंग वाली महिला से हूबहू मिल रही थी।
 हरी बाबू 60 के दशक में टी स्टेट में काम करने के लिए डिब्रूगढ़ पहुंचे थे। मेस शैलेश बाबू चलाते थे, अजनबी शहर होने के कारण हरी बाबू ने मेस में ही रहना पसंद किया। 
एक दिन देर रात पूर्णिमा के दिन हरी बाबू ने शाम को शैलेश बाबू के कमरे में रखी ऑइल पेंटिंग को देखा तो उन्हें विचित्र सी रहस्यमय अनुभूति महसूस हुई। उसी रात को नींद न आने पर वह हरी बाबू के कमरे से बाहर आए, तो उन्होंने शैलेश बाबू के पास दो स्त्रियों को देखा। 
दोनों उनकी सेवा कर रही थी। हरी बाबू चीखे, कि शैलेश बाबू गैर औरतों के साथ।इतना कहते ही दोनों स्त्रियां अचानक गायब हो गई। 
नीचे से मेस में ही काम करने वाले जतीन बाबू भी चले आए। शैलेश बाबू उठकर कमरे में गए। हरी बाबू भी कमरे में दाखिल हुए, जैसे ही उनकी नजर ऑइल पेंटिंग पर पड़ी, रौंगटे खड़े हो गए। पेंटिंग में महिला की आंखे (हरी बाबू) को घूर रही थी, मानो कोई साक्षात देख रहा हो।
 उस दिन से उन्हें चित्र से डर लगने लगा। जतीन बाबू ने सुबह बताया कि शैलेश बाबू आपसे बहुत प्यार करते हैं, हरी बाबू का चेहरा उनके दामाद से मिलता है। इसी लिए शैलेश बाबू उनके प्यार करते हैं। उस दिन के बाद से हरी जब भी ऑइल पेंटिंग की ओर देखते, मानो उसे यही लगता कि महिला साक्षात् कुछ कहना चाहती हो।
 क्या संबंध था शैलेश और हरी में, कौन थी दोनों महिलाएं जो शैलेश बाबू की सेवा करती थी

मेस के सारे स्टाफ विजयादशमी पर छुट्टी पर चले गए। 
हरी बाबू ने एक रात फिर देखा कि दो महिलाएं छत पर शैलेश बाबू के पैर दबा रही हैं। वह फिर से चीख पड़े कि पलक झपकते दोनों महिलाए फिर से गायब हो गई।
 बहुत पूछने पर जतीन बाबू ने बताया कि 'वह शैलेश बाबू की बेटी और पत्नी की आत्माएं थी। एक दिन मैं सच जानने के लिए शैलेश बाबू के कमरे में दाखिल हुआ। 
ऑइल पेंटिंग की महिला आखों में अंगार लिए मानो मुझे नुकसान पहुंचाना चाहती थी। 
जतीन बाबू ने मुझे उस दिन बचा लिया।
 कमरे से बाहर आकर जतीन बाबू ने दोनों आत्माओं के रहस्यों को बताया कि ऑइल में शैलेश बाबू की स्वर्गवासी पत्नी और दूसरी महिला उनकी बेटी है, जिसकी हत्या उसके पति ने शराब के नशे में कर दी थी। शैलेश बाबू अपने दामाद को बेहद प्यार करते थे। दामाद की शक्ल तुमसे मिलती है।
 जतीन बाबू ने एक और चौंकाने वाला सच बताया कि दामाद खीरु मेरा ही बेटा था, जिसकी शक्ल तुम्हारी तरह थी। पत्नी और बेटी शैलेश बाबू को मरने के बाद भी प्यार करती रही। ऑइल पेंटिंग में मानों उनकी पत्नी का वास है। इसी कारण से उस पेंटिग कि महिला अपने दामाद के रूप में देख तुमसे चिढ़ती थी।' 
जानिए फिर क्या हुआ

पूरी कहानी सुनने के बाद हरी बाबू ने फैसला लिया कि वह डिब्रूगढ़ छोड़कर कही और चले जाएंगे। 
हरी बाबू अगले दिन कोलकाता की ट्रेन पकड़ने स्टेशन पहुंचे। जतिन बाबू और शैलेश बाबू उनको छोड़ने आए। जतीन ने हरी बाबू से कहा कि आज दूसरी बार उनका बेटा उनसे दूर जा रहा है।
 शैलेश बाबू ने सिर्फ इतना कहा 'कि पिछले जन्म में तुमने सांस और पत्नी के प्यार को नहीं समझा था, 
इसी सीख के लिए इस जन्म में तुम यहां आए थे।' तभी ट्रेन चल पड़ी, ऑइल पेंटिंग वाली महिला मानो सामने खड़ी थी और यही कह रही थी कि इस जन्म में जीवन साथी को बहुत प्यार देना।

 मौत के 25 साल बाद पुनर्जन्म ले वापस लौटी प्रेमिका



सच्ची घटना-1: मौत के 25 साल बाद पुनर्जन्म ले वापस लौटी प्रेमिका


वाराणसी. घटना बनारस के नामी विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले दो प्रेमी युगलों से जुड़ी है।
 आज़ादी के कुछ सालों बाद ग्रेजुएशन कर रहे मनोज (बदला हुआ नाम) और शांति (बदला हुआ नाम) एक-दूसरे से बेहद प्यार करते थे। दोनों एमए के बाद शादी करने वाले थे।

एक दिन अचानक शांति की मौत एक मामूली-सी बीमारी के कारण हो गई।
 मनोज ने शमशान घाट पर अपनी आंखों के सामने प्रेमिका को जलते देखा। शांति ने मानो उसी समय मनोज के कानों में ये कहा - 'मैं वापस आऊंगी और अगले जन्म में तुम्हारी बंनूगी।'

मनोज शांति के मरने के बाद टूट सा गया था। उसने शादी न करने का मन बना लिया।
 वह कोलकाता काम करने चला गया। 25 साल बाद उसकी मुलाकात ऐसे लोगों से हुई जो मृत आत्माओं से संपर्क साध लेते हैं। मनोज शांति की आत्मा से मिलना चाहता था।
मृत आत्माओं से संपर्क साधने वाले मिथलेश बाबू पितृ पक्ष की अमावस्या के दिन अपने घर के बड़े से हॉल में मृत आत्माओं से संपर्क लिए साधना को बैठ गए।
उन्होंने अपनी 20 वर्षीय बेटी मोहिनी (बदला हुआ नाम) को सामने बिठाया और साधना शुरू कर दी। मनोज का मिथलेश बाबू ने मोहिनी से परिचय करवाया।
धीरे-धीरे हॉल का माहौल रहस्यमय होता गया।
 मोहिनी की आवाज भारी होने लगी, उसने उठकर मनोज को गले से लगा लिया और बोलने लगी 'मैं सुरभि हूं, जिसका तुमने शांति के जाने के बाद खूब इस्तेमाल किया और मरने के लिए सड़क पर छोड़ दिया।'
दरअसल, सुरभि शांति की ही सहेली थी।
वह शांति की मौत के बाद मनोज के नजदीक आ गई थी। बाद में मनोज और सुरभि का रोड एक्सीडेंट हुआ, जिसमें सुरभि की मौत हो गई।
जानिए मोहिनी के शरीर से कैसे बाहर निकली सुरभि की आत्मा

मिथलेश बाबू ने मोहिनी को बैठने को कहा तो शरीर में प्रवेश सुरभि की आत्मा चीखने लगी - 'मनोज मेरा है।'
 साधना फिर से शुरू करते हुए उन्होंने कुछ मंत्रों को पढ़ा और मोहिनी गिर पड़ी। चंद मिनटों बाद वह तपाक से फिर खड़ी हो गई। मोहिनी के कंठ से निकला - 'बेटा क्या कर रहे हो, सुरभि अतृप्त आत्मा है।
 वह तुम्हारा जीवन बर्बाद कर देगी। अमावस्या की वजह से मैंने तुम्हें बचा लिया।' यह मनोज की मां थी। मां की आत्मा मोहिनी के शरीर में अचानक खूब जोर-जोर से हंसने लगी। मोहिनी के मुख से भारी आवाज आई - तुझे तेरा प्यार मिल गया, जिसकी वजह से तू 25 सालों तक भटकता रहा।
 मोहिनी ही तेरी शांति है, जिसने इस जन्म में तुझे अपने पास बुला लिया है। मां की आत्मा मोहिनी के शरीर से निकलते ही मोहिनी को सबकुछ याद आ गया।
मिथलेश बाबू ने बताया कि मोहिनी ने ही शांति का जन्म लिया है।
 मनोज को सहज ही विश्वास नहीं हो पा रहा था। मोहिनी ने जब कुछ पुरानी बातों का जिक्र मनोज से किया तो वह समझ गया कि शांति का पुनर्जन्म हुआ है। उम्र के फासले के बाद भी दोनों विवाह को तैयार हो गए।
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