गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

मिलिए दुनिया के सबसे गरीब प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति से

मिलिए दुनिया के सबसे गरीब प्रधानमंत्री से, संपत्ति के नाम सिर्फ तीन मोबाइल

काठमांडू। आपको जानकार आश्चर्य होगा कि नेपाल के प्रधानमंत्री सुशील कोईराला के पास खुद संपत्ति के नाम पर महज तीन मोबाइल हैं। इस हिसाब से वह दुनिया के सबसे गरीब प्रधानमंत्री भी माने जा सकते हैं। कोईराला द्वारा संपत्ति का ब्यौरा पेश करने के बाद इसका खुलासा हुआ। कोईराला ने सोमवार को अपनी संपत्ति का ब्यौरा प्रधानमंत्री कार्यालय और काउंसिल ऑफ मिनिस्टर्स (OPMCM) में पेश किया है, जिसमें महज तीन मोबाइल फोन होने की जानकारी दी गई है।
नहीं हैं बैंक अकाउंट
जानकारी के मुताबिक, कोईराला के पास न तो कोई घर है और न गाड़ी। उनके पास सोने-चांदी के आभूषण भी नहीं हैं। अविवाहित कोईराला का अपना कोई बैंक अकांउट भी नहीं है। इसी साल मार्च में जब संपत्ति का ब्यौरा पेश किया था, उसमें उन्होंने बताया था कि एक चेक पेमेंट के लिए उन्हें मिला था, जिसके लिए उन्होंने खाता खोला था, लेकिन यह तय नहीं है कि अब वह अकाउंट चालू है या बंद, क्योंकि इसके बाद उन्होंने कोई लेनदेन नहीं किया। कोईराला के पास एक घड़ी और एक सोने की अंगूठी भी है, लेकिन अंगूठी सोने से बनी है या किसी और धातु से, इसकी जानकारी भी उन्हें नहीं है।
 
सीधे बने नेपाल के पीएम
74 वर्षीय कोईराला नेपाल में अपनी सामान्य जीवनशैली के लिए जाने जाते हैं। बीते 5 दशकों से नेपाल की राजनीति में सक्रिय कोईराला नेपाल के 37वें प्रधानमंत्री बनने से पहले किसी भी सार्वजनिक पद पर नहीं रहे हैं। प्रधानमंत्री के तौर पर उन्हें 56,200 रुपए तनख्वाह मिलती है। 

ये हैं दुनिया के सबसे गरीब राष्ट्रपति

उरुग्वे के राष्ट्रपति जोसे मुजिका को दुनिया का सबसे गरीब राष्ट्रपति माना जाता है। वह जिस तरह का जीवन जीते हैं, वैसा जीवन कोई फकीर ही जी सकता है। वह राष्ट्रपति भवन के बजाय अपने दो कमरे के मकान में रहते हैं। सुरक्षा के नाम पर बस दो पुलिसकर्मी की सेवा लेते हैं। आमलोगों की तरह कुएं से पानी भरते हैं और अपने कपड़े खुद धोते हैं। वह अपनी पत्नी के साथ मिलकर फूलों की खेती करते हैं ताकि कुछ एक्स्ट्रा आमदनी हो सके। खेती के लिए ट्रैक्टर खुद से चलाते हैं। इसके खराब होने पर खुद ही मैकेनिक की तरह ठीक भी करते हैं। कोई नौकर-चाकर अपनी सेवा के लिए नहीं रखते हैं। अपनी बहुत पुरानी फॉक्सवैगन बीटल गाड़ी को खुद चलाकर ऑफिस जाते हैं। हालांकि ऑफिस जाते समय वह कोट-पैंट पहनते है
सारी सुविधाओं के बावजूद फकीर जीवन
एक देश के राष्ट्रपति को जो भी सुविधाएं मिलनी चाहिए, इन्हें वो सारी सुविधाएं दी गई हैं। पर इन्होंने इन सुविधाओं को लेने से इनकार कर दिया। वेतन के तौर पर इन्हें मिलता है हर महीने 13300 डॉलर। अपने वेतन से 12000 डॉलर गरीबों को दान दे देते हैं। बाकी बचे 1300 डॉलर में से 775 डॉलर छोटे कारोबारियों को देते हैं। अगर आपको कहीं से भी ऐसा लगता है कि शायद उरुग्वे एक गरीब देश है, इसीलिए यहां का राष्ट्रपति भी गरीब है, तो यह आपका भ्रम है। उरुग्वे में प्रति माह प्रति व्यक्ति की औसत आय 50000 रुपए है। वह 2015 में अपने पद से रिटायर हो जाएंगे। साथ ही अगला चुनाव भी नहीं लड़ेंगे। 

मिलिए दुनिया के सबसे गरीब प्रधानमंत्री से, संपत्ति के नाम सिर्फ तीन मोबाइल

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कामेच्छा बढ़ाने का काम करता है मेथीदाना

भारतीय और अन्य एशियाई देशों में अपनी यौन क्रियाओं को बढ़ाने की इच्छा रखने वाले लोगों को पश्चिम के उत्पादों की तरफ देखने की जरूरत नहीं है, क्योंकि घर-घर में मिलने वाली मेथी भी इसमें सक्षम है।
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ब्रिसबेन स्थित एकीकृत नैदानिक और आणविक चिकित्सा केंद्र के अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि भारत में सबसे अधिक मात्रा में पाई जाने वाली मेथी पुरुषों की कामेच्छाओं को काफी अच्छे स्तर तक बढ़ाने में सक्षम है। 
 
अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार मेथी के बीज में पाया जाने वाला सैपोनीन पुरुषों में पाए जाने वाले टेस्टोस्टेरॉन हॉरमोन में उत्तेजना पैदा करता है।
 
गौरतलब है कि भारत में कढ़ी और सब्जियों में इस्तेमाल की जाने वाली मेथी मुख्य तौर पर राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा और पंजाब में उगाई जाती है।
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बुधवार, 10 सितंबर 2014

यौन मुद्रा काम ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन

काम ऊर्जा अनंत है , महावीर ने इसे अनंत वीर्य कहा है । अनंत वीर्य से अर्थ जैविक वीर्य से नहीं है -सीमेन से नहीं है । अनन्तवीर्य से अर्थ उस काम ऊर्जा से है , जो निरंतर मन से शरीर तक उतरती है - पर जो मन से नहीं   आती है । वह आती है आत्मा से मन तक , और मन से शरीर तक । ये  सीढ़ियाँ है । उसके बिना वह उत्तर नहीं सकती । अगर बीच में से मन टूट जाए , तो आत्मा और शरीर  के बीच सारे सम्बन्ध टूट जाएंगे । 
 जिस शक्ति  को योग और तंत्र ने  काम ऊर्जा कहा है , वह जीव शास्त्रीय काम ऊर्जा नहीं है । वह काम ऊर्जा ऊपर की तरफ पुनः गति कर सकती है ।  किसी ब्यक्ति में भी ये काम ऊर्जा  ऊपर की तरफ गति कर जाए , तो  जिंदगी उतनी ही सरल , इन्नोसेंट और निर्दोष  हो जायेगी , जितनी  छोटे बच्चे की होती है । यह  यौन ऊर्जा नीचे की तरफ सहज आती है ।यह प्रकृति की   तरफ से आती है । 
अगर किसी मनुष्य को इस ऊर्जा ऊपर की तरफ  ले जाना है , तो  सहज नहीं होगा , यह संकल्प से होगा । 

जो लोग भी ऊपर की तरफ जाना चाहते है , उन्हें  दूसरी बात समझ लेनी चाहिए की संकल्प और संघर्ष मार्ग होगा । ऊपर जाया जा  सकता है , और ऊपर जाने के अपूर्व आनंद है ।  क्योंकि नीचे जाकर जब सुख मिलता है क्षणिक ही सही -तो ऊपर जाकर किया मिल सकता है , उसकी कल्पना भी नहीं  सकते ।
यौनऊर्जा जो नीचे बह  कर जो लाती है वो सुख है , ऊपर उठ  कर जो लाती है वो आनंद है ।  

फोटो:गूगल 


स्रोत  : ओशो  ध्यान योग पुस्तक से 








 
   


मंगलवार, 9 सितंबर 2014

सेक्स रैकेट में गिरफ्तार एक और हीरोइन

PICS: सेक्स रैकेट में गिरफ्तार एक और हीरोइन


पुलिस यह भी पता लगाने की कोशिश करेगी कि इस रैकेट को भी वही लोग तो नहीं चला रहे थे, जिसमें पिछले हफ्ते हैदराबाद से अभिनेत्री श्वेता बसु रंगे हाथ पकड़ी गई थी.आगे देखिए दिव्या श्री की कुछ और हॉट तस्वींरें...






PICS: सेक्स रैकेट में गिरफ्तार एक और हीरोइन


PICS: सेक्स रैकेट में गिरफ्तार एक और हीरोइन


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सोमवार, 8 सितंबर 2014

सेक्स रैकेट में पकड़ी गई अभिनेत्री श्वेता करेगी बड़ा खुलासा!







नई दिल्ली: हैदराबाद के हाई प्रोफाइल सेक्स रैकेट में पकड़ी गई बॉलीवुड अभिनेत्री श्वेता बसु प्रसाद अपने ग्राहकों के नामों का खुलासा कर सकती हैं। बता दें कि हैदराबाद पुलिस ने पिछले सप्ताह श्वेता को हैदराबाद के बंजारा हिल्स स्थित एक पंच सितारा होटल में आपत्तिजनक अवस्था में पकड़ा था। रिपोर्टों के मुताबिक श्वेता के ग्राहकों में मुंबई सहित देश के अन्य बड़े शहरों के दिग्गज कारोबारी शामिल हैं और इन उद्योगपतियों ने अभिनेत्री के साथ रात गुजारने के लिए सेक्स रैकेट संचालक को एक लाख रुपए का भुगतान किया था। गौरतलब है कि हैदराबाद पुलिस ने बंजारा हिल्स के एक पांच सितारा होटल में छापा मारा था। इस छापे में 23 वर्षीया श्वेता आपत्तिजनक अवस्था में पकड़ी गईं। रिपोर्टों की मानें तो श्वेता अपने ग्राहकों के नाम सार्वजनिक करने के लिए तैयार हैं।  रिपोर्टों के मुताबिक आर्थिक तंगी की वजह से 'मकड़ी' फिल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाली यह अभिनेत्री जिस्मफरोशी के धंधे में उतरी।





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अब खुद ही रिपेयर हो जाएंगे डैमेज दांत

अब खुद ही रिपेयर हो जाएंगे डैमेज दांत

लंदन। ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने एक नई तकनीक ईजाद की है, जिससे दांत की सड़न के बाद ड्रिलिंग और फीलिंग जैसे झमेलों से छुटकारा मिल सकता है। हर साल दुनियाभर में करीब 2.3 बिलियन लोगों को दांतों की समस्या से जूझना पड़ता है। 
 
ब्रिटिश रिसर्चरों ने एक ऐसी तकनीक का आविष्कार किया है, जिससे सड़े हुए कैविटी वाले दांत अब खुद-बखुद रिपेयर हो जाएंगे। यह शोध लंदन के किंग्स कॉलेज में किया गया, जहां इस नेचरल रिपेयर के लिए इलेक्ट्रिकल करंट का इस्तेमाल किया गया।
 
इस ट्रीटमेंट की खोज करने वाले वैज्ञानिकों की मानें तो यह अनोखा ट्रीटमेंट तीन वर्षों के भीतर आम लोगों तक पहुंच जाएगा। इस ट्रीटमेंट को दो हिस्सों में बांटा गया है। पहले स्टेप में दांत के बाहरी लेवल इनामेल पर मौजूद सडऩ को हटाया जाता है। दूसरे स्टेप में डैमेज दांत के भीतरी हिस्से में हल्के से इलेक्ट्रिक करंट की मदद से मिनरल डाल दिया जाता है। 
 
दर्द से मिलेगा छुटकारा
 
यह मौजूदा प्रॉसेस की तरह तकलीफदेह नहीं है, जिसमें कैविटी भरने से पहले दांत के ऊपर इंजेक्शन लगाया जाता और फिर क्लीनिंग प्रॉसेस में भी दर्द से जूझना पड़ता है। नई डिवाइस में न्यूनतम करंट जैसी सुविधा है। ड्रिल करने की जरूरत नहीं पड़ती है। दांतों के अंदर कैल्शियम और फॉस्फेट मिनरल डाल दिया जाता है, जो नैचुरल तरीके से दांत को रिपेयर करने में मदद करता है। sabhar :http://www.bhaskar.com/

गुरुवार, 4 सितंबर 2014

ज्ञान तथा अज्ञान - कुछ भी रहस्य नहीं !



अमानित्वमदम्भित्वमहिंस क्षान्तिरार्जवम्। 
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः।।
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च। 
जन्ममृत्यु ज्र्व्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्।।
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु। 
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु।।
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी। 
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि।।
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वम्  तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्। 
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यादतोन्यथा।।


विनम्रता , दम्भहीनता , अहिंसा , सहिष्णुता , सरलता , प्रामाणिक गुरु के पास जाना , पवित्रता , स्थिरता , आत्मसंयम , इंद्रियतृप्ति के विषयों का परित्याग , अहंकार का अभाव , जन्म , मृत्यु वृद्धावस्था तथा रोग के दोषों की अनुभूति , वैराग्य , संतान , स्त्री , घर , तथा अन्य वस्तुओं की ममता से मुक्ति , अच्छी तथा बुरी घटनाओं के प्रति समभाव , मेरे (भगवान  श्रीकृष्ण ) प्रति निरंतर अनन्य भक्ति , एकांत स्थान में रहने की इच्छा , जन समूह से विलगाव , आत्म - साक्षात्कार की महत्ता को स्वीकारना , तथा परम सत्य की दार्शनिक खोज - इन सब को मैं ज्ञान घोषित करता हूँ और इनके अतिरिक्त जो भी है , वह सब अज्ञान है।    

Humility, pridelessness, nonviolence, tolerance, honesty, service to the guru, purity, stability, self-control, detachment from sensual delights, absence of egotism, an objective view of the miserable defects of material life, that is, birth, death, the infirmity of old age, disease, etc., freedom from infatuation with wife, son, home, etc., nonabsorption in the happiness and unhappiness of others, constant equal-mindedness in the contact of desirable or undesirable objects, unfaltering and unadulterated devotion to Me, preference for solitude, indifference to mundane socializing, perception of the eternality of self-knowledge, and realization of the goal of divine knowledge certainly all these have been declared as actual knowledge, and everything apart from this is ignorance.

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सोमवार, 1 सितंबर 2014

अवचेतन मन की शक्ति



फोटो : गूगल


आप का मस्तिष्क  एक है लेकिन इसके दो स्पष्ट भाग है ,चेतन मन और अवचेतन मन इसे जागृत और सुसुप्त मन भी कहा जा सकता है ।  आप को याद रखना चाहिए चेतन और अवचेतन दो मस्तिष्क  नहीं है । वे तो एक ही मस्तिष्क में होने वाली गतिविधियों  के दो क्षेत्र  है ,आपका चेतन मन तार्किक  मस्तिष्क है , जो विकल्प चुनता है । उदाहरण के लिए , आप अपनी पुस्तक , अपना घर , अपना जीवन साथी  चुनते है । आप सारे निर्णय चेतन मन से करते है । दूसरी तरफ आप के सचेतन सुझाव के बिना ही आप का ह्रदय अपने आप काम करता है और पाचन , रक्त संचार , साँस लेने की प्रक्रिया अपने आप चलती है । ये सारे काम आपका अवचेतन मन करता है । आप अपने अवचेतन मन पर जो भी छाप छोड़ते  है या जिसमे भी प्रबल विश्वास करते है , आप का अवचेतन मन उसे स्वीकार कर  लेता  है । यह आप के चेतन मन की तरह तर्क नहीं करता है  या बहस नहीं करता है । आप का अवचेतन मन उस मिट्टी  की तरह है , जो किसी भी तरह के बीज को स्वीकार कर लेता है , चाहे अच्छा हो या बुरा । आप के विचार सक्रिय है । वे बीज है ।  नकारात्मक विचार या  विध्वंसात्मक विचार  आप के अवचेतन मन में नकारात्मक रूप से कार्य करते है । देर सबेर  वे प्रकट हो ही जाएंगे  और अपने अनुरूप  किसी नकारत्मक घटना को जन्म दे देंगे ।

आपका अवचेतन मन हमेशा काम करता रहता है ।  यह रात दिन सक्रिय रहता है , चाहे आप इस्पे  काम करे या न करे । आप का अवचेतन मन आप के शरीर का निर्माता है , लेकिन आप इस खामोस प्रक्रिया को देख और सुन नहीं सकते । आपका पाला हर बार अपने अवचेतन के बजाय चेतन  मन से पड़ता है ।  बस आप अपने चेतन मन से सर्वश्रेष्ठ  की आशा  करते रहे और पक्का कर ले की आप के आदतन विचार अच्छी, सुन्दर , सच्ची न्यायपूर्ण और सदभावना पूर्ण चीजो पे केंद्रित हो आप जैसी कल्पना करेंगे परिणाम बिलकुल वैसा ही होगा


स्रोत - डॉ  जोसेफ  मर्फी की " आपके अवचेतन मन की शक्ति " पुस्तक से 

रविवार, 31 अगस्त 2014

47–ए न्‍यू मॉडल ऑफ दि यूनिवर्स—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

पी. डी. ऑस्पेन्सकी एक रशियन गणितज्ञ और रहस्‍यवादी था। उसे रहस्‍यदर्शी तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन रहस्‍य का खोजी जरूर था। विज्ञान अध्‍यात्‍म, गुह्म विद्या, इन सबमें उसकी एक साथ गहरी पैठ थी। इस अद्भुत प्रतिभाशाली लेखक ने पूरी जिंदगी अस्‍तित्‍व की पहेली को समझने-बुझने में लगायी। उसने विश्वंभर में भ्रमण किया, वह भारत भी आया, कई योगियों और महात्‍माओं से मिला। और अंत मैं गुरजिएफ का शिष्‍य बन गया। गुरजिएफ के साथ उसे जो अनुभव हुए उनके आधार पर उसने कई किताबें लिखी।
ऑस्पेन्सकी को बचपन से ही अदृश्‍य पुकारता था; उसकी झलकें आती थी। एक तरफ वह फ़िज़िक्स का अध्‍यन करता और दूसरी तरफ उसे ‘’अनंतता’’ दिखाई देता।
ओशो ने ऑस्‍पेन्‍सकी की पाँच किताबों को अपनी मनपसंद किताबों में शामिल किया है। ‘’टर्शियम ऑर्गेनम’’, ‘’इस सर्च ऑफ दि मिरेकुलस’’, ‘’ एक न्‍यू मॉडल ऑफ यूनिवर्स’’, ‘’दी फोर्थ वे’’, और ‘’दि फ़्यूचर साइकॉलॉजी ऑफ मैन’’। वे स्‍पष्‍ट रूप से कहते थे, ऑस्पेन्सकी की किताबें मुझे बहुत पसंद है।
इस किताब के भी 542 पृष्‍ठ है, और बारह प्रकरण है। यह एक अच्‍छा खाता रत्‍नाकर हे। विचारों के रत्‍न ही रत्‍न भरे पड़े है। इसके पन्‍नों में। और हर विचार ऐसा जो हमें एक नई अंतर्दृष्‍टि दे, जीवन के बारे में नये ढंग से सोचने की प्रेरणा दे। किताब का प्रारंभिक प्रकरण है ’’इसोटेरिज्‍म एक मॉडर्न थॉट (गुह्म विज्ञान और आधुनिक विचार) और अंतिम प्रकरण है: सेक्‍स एंड इवोल्यूशन (सेक्‍स और विकास)। ऑस्‍पेन्‍सकी निरंतर विज्ञान की खोजों का आधार लेते हुए, उसकी नींव पर रहस्‍य और अध्‍यात्‍म का भवन खड़ा करता है। उसका पूरा प्रयास यह है कि अतीत के आविष्‍कारों, वैज्ञानिकों, तर्क शास्त्रियों और नियमों को रद्द करके आधुनिक मनुष्‍य को एक नवीन, संपूर्ण और स्‍वस्‍थ आध्‍यात्‍मिक दृष्‍टि दी जाये। इसीलिए उसने किताब का नामकरण किया है: ‘’ए न्‍यू मॉडल ऑफ दि यूनिवर्स’’ इसी नाम का एक प्रकरण भी है इस किताब में।
ऑस्‍पेन्‍सकी का तर्क सीधा-साफ है। वह कहता है विश्‍व को समझने के लिए उसकी एक रूपरेखा बनानी जरूरी है। जैसे घर बनाने से पहले आर्किटेक्‍ट उसका नक्‍शा बनाता है। विज्ञान और दर्शन ने अतीत में विश्‍व का जो नक्‍शा बनाया था वह बड़ा संकीर्ण था। फ़िज़िक्स, केमिस्‍ट्री, खगोलविज्ञान इतना विकसित नहीं हुआ था। अब बीसवीं सदी में विज्ञान ने और विचार ने इतनी छलाँगें लगाई है कि अब हमें अरस्तू न्‍यूटन, पाइथागोरस, यूक्लिडी इत्‍यादि लोगों को सम्‍मानपूर्वक विदा करना चाहिए। विज्ञान ने ही अपने पुरखों की उपयोगिता निरर्थक कर दी है।
किताब की भूमिका में प्रसिद्ध अंग्रेज नाटककार इब्‍सेन द्वारा निर्मित एक पात्र डॉ स्‍टॉकमन का एक वक्तृत्व ऑस्पेन्सकी के उद्धृत किया है। (इस वक्‍तव्‍य पर ओशो के पेन के लाल निशान लगे है।) वह कहता है, ‘’ कुछ जरा-जर्जर सत्‍य होते है। वे अपनी उम्र से कुछ ज्‍यादा जी चुके है। और जब सत्‍य इतना बूढा होता है तो वह झूठ बनने के रास्‍ते पर होता है। इस तरह के सभी जीर्ण सत्‍य मांस के सड़े हुए टुकड़े की तरह होते है। उनमें पैदा होने वाली नैतिक बीमारी लोगों की अंतड़ियों को भीतर से कुरेदती रहती है।
अतीत का विचार और विज्ञान अब एक बूढा सत्‍य हो चूका है जो लंबी उमर के कारण असत्‍य बन गया है।
ऑस्पेन्सकी ने दो तरह की सोच बतायी है: तर्कसंगत और मनोवैज्ञानिक, अब तक हम आस्‍तित्‍व को तर्कसंगत मस्‍तिष्‍क से समझने की कोशिश करते थे लेकिन अस्‍तित्‍व बहुत विराट है, उसे समझने के लिए नई संवेदनशीलता चाहिए जो कि मनोवैज्ञानिक सोच से आ सकती है। तर्क बड़े सुनिश्चत निष्‍कर्ष निकालता है। और तार्किक मस्‍तिष्‍क सोचता है कि उसने सब कुछ जान लिया। इसलिए जीवन के रहस्‍य को वह बिलकुल चूक जाता है। मनोवैज्ञानिक मस्‍तिष्‍क मुश्‍किल में पड़ जाता है। क्‍योंकि उसके सामने रहस्‍य के इतने द्वार खुल जाते है कि वह कुछ भी सुलझा नहीं पाता। अस्‍तित्‍व के समक्ष विवश होकर खड़ा रह जाता है। लेकिन वह आदमी रहस्‍य को जीता है।
ऑस्पेन्सकी को बचपन से ही अदृश्‍य पुकारता था; उसकी झलकें आती थी। एक तरफ वह फ़िज़िक्स का अध्‍ययन करता और दूसरी तरफ उसे अनंतता के आलोक में वस्‍तुओं की जड़ता खो जाती। सब कुछ चैतन्‍य से तरंगायित नजर आता। जब चेतना नजर आती है तो उसके साथ एक और परिवर्तन घटते है। वस्‍तुओं को जोड़ने वाले एक अखंड तत्‍व का साक्षात होता है। इन परा मानसिक अनुभूतियों के बाद ऑस्‍पेन्‍सकी अपने घर में न रह सका। वह पूरब की और चल पडा गुह्म रहस्‍य विद्यालयों और गुरूओं की खोज में।
ऑस्‍पेन्‍सकी अपनी यात्रा के दौरान ईजिप्‍त से होते हुए भारत आया। वह इतने आध्‍यात्‍मिक व्यक्तियों से मिला कि धीरे-धीरे उसकी आंखों के सामने एक नया रहस्‍यपूर्ण समाज उभरने लगा, नयी कोटि के लोग जिनके पैदा होने की तैयारियाँ चल रही है; नये आदर्श नये बीज बोये जा रहे है ताकि आदमी की नई नस्‍ल पैदा हो। क्‍या यह ओशो चेतना के अवतरण की पूर्व तैयारी थी। वे नई कोटि के लोग कौन है? ओशो कहते है: ‘’ऑस्‍पेन्‍सकी मेरे संन्‍यासियों की बात कर रहा है।‘’ (बुक्स आय हैव लव्‍ड)
ऑस्‍पेन्‍सकी रहस्‍य लोक और भौतिक जगत को जोड़नेवाला एक सेतु है। वह निरंतर मनुष्‍य की प्रचलित, स्‍थापित धारणाओं का अनदेखा पहलू दिखाता है। जैसे डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत के बारे में वह कहता है, कि यह सिद्धांत अब मनुष्‍य के मस्‍तिष्‍क में इतना खुद गया है। इसके पक्ष में बोलना पुरातन पंथी लगता है। लेकिन विकास वाद हर कहीं लागू नहीं होता। अगर हर चीज एक नियम के अनुसार विकसित हो रही है तो फिर दुर्घटनाओं का क्‍या? घटनाओं की आकस्‍मिकता की क्‍या व्‍याख्‍या होगी। कुछ चीजें ऐसी भी है जो विकास से परे है,‍ जैसे आनंद, चेतना, आसमान।
समय की चर्चा करते हुए, ‘’इटर्नल रिकरन्‍स’’ ‘’अर्थात शाश्‍वत पुनरावर्तन’’ के प्रकरण में ऑस्‍पेन्‍सकी ने यह अंत दृष्टि दी है कि तार्किक मस्तिष्क को समय जैसा दिखाई देता है, केवल वैसा ही नहीं है। समय का तीन आयामों के, विश्‍व के पास का चौथा आयाम भी है: अनंतता, अनंतता समय का अंत ही विस्‍तार नहीं है। बल्‍कि त्रिकाल(भूत, वर्तमान, भविष्‍य) के पार स्‍थित, चौथा आयाम है जिसे सामान्‍य तार्किक मन समझ नहीं पाता।
पुनर्जन्‍म की वैज्ञानिक जरूरत बताते हुए ऑस्‍पेन्‍सकी कहता है, यदि पुनर्जन्‍म न हो तो मानव जीवन बहुत ही बेतुका, अर्थहीन और छोटा मालूम होता है। जैसे किसी उपन्‍यास का एक फटा हुआ पन्‍ना। इस छोटे से जीवन के लिए इतनी आपाधापी, इतना शोरगुल व्‍यर्थ जान पड़ता है।
ऑस्‍पेन्‍सकी भारत में कई योगियों से मिला। उसने स्‍वयं योग का अभ्‍यास भी किया। इस अभ्‍यास से निर्मित हुआ एक प्रकरण: ‘’योग क्‍या है।‘’
ऑस्‍पेन्‍सकी की विशिष्‍टता यह है कि इस किताब को यह दार्शनिक या अध्‍यात्‍मिक शब्‍दजाल नहीं बनाता, बल्‍कि लगातार वैज्ञानिक धरातल पर ले आता है। भौतिक जगत और सूक्ष्‍म जगत, विज्ञान और अध्‍यात्‍म का एक अंतर-नर्तन सतत चलता रहता है। इसलिए यह ग्रंथ एक फंटासी न रहकर वैज्ञानिक खोज बनती है। सभी स्थापित वैज्ञानिक नियमों को ऑस्‍पेन्‍सकी ने आध्‍यात्‍मिक आयाम के द्वारा विस्‍थापित कर दिया है। न्‍यूटन का सर्वमान्‍य गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत ऑस्‍पेन्‍सकी अ-मान्‍य कर दिया है। उसकी दृष्‍टि में गुरुत्वाकर्षण तभी तक लागू है जब तक हम वस्‍तुओं को ठोस आकार की तरह देखते है। यदि वस्‍तुएं केवल वर्तुलाकार तरंगें है। जो एक दूसरें से जुड़ी हुई है तो कौन किसको खींचेगा। हम किस तल से चीजों को देखते है इस पर उसके नियम निर्भर करते है। एक कुर्सी तभी तक कुर्सी है जब तक हम चीजों को जड़ मानते है। इलेक्ट्रॉन की आंखों से देखें तो कुर्सी एक नाचते हुए अणुओं का ऊर्जा-पुंज है। और अवकाश में जायें तो कुर्सी की कोई उपयोगिता नहीं है, क्‍योंकि वहां ‘’बैठना’’ संभव ही नहीं है। सब कुछ तैरता रहता है।
‘’ए न्‍यू मॉडल ऑफ दि यूनिवर्स’’ एक आनंद यात्रा है। इसके शब्‍द मृत आकार नहीं है। जीवंत प्राणवान अनुभूतियां है। ऑस्‍पेन्‍सकी की भाव दशा में आकर हम इस अभियान पर चलें तो वाकई नये मनुष्‍य बनकर बाहर आयेंगे—एक ताजगी लेकर, नई आंखे और नई समझ लेकर।
लेकिन यह ताजगी इतनी आसानी से नहीं मिलेगी। 542 पृष्‍ठ का लंबा सफर तय करना पड़ेगा। उतना साहस और धीरज हो तो विश्‍व का यह नया नक्‍शा आपके जीवन को रूपांतरित कर देगा। लंदन के ‘’रूट लेज एण्‍ड केगन पॉल लिमिटेड’’ ने इसे 1931 में प्रकाशित किया था। उसके बाद इसके छह संस्‍करण प्रकाशित हुए। टी. वी. के उथले मनोरंजन से जो ऊब गये है उनके लिए यह किताब एक स्‍वास्‍थ्‍यवर्धक बौधिक पोषण है।
किताब की एक झलक:
दि फोर्थ डायमेन्‍शन—(चौथा आयाम)
यह ख्‍याल लोगों के मन में बढ़ना और मजबूत होना जरूरी है कि एक गुह्म ज्ञान है। जो उस सारे ज्ञान के पार है, जो मनुष्‍य अपने प्रयत्‍नों से प्राप्‍त कर सकता है। क्‍योंकि ऐसी कितनी ही समस्‍याएं है, प्रश्‍न है, जिन्‍हें वह सुलझा नहीं सकता।
मनुष्‍य स्‍वयं को धोखा दे सकता है, सोच सकता है उसका ज्ञान बढ़ता है, विकसित होता है; और वह पहले जितना जानता-समझता था, अब उससे अधिक जानने समझने लगा है। लेकिन कभी-कभार वह ईमानदारी से देखे कि आस्‍तित्‍व की बुनियादी पहेलियों के आगे वह इतना ह विवश है जितना कि जंगली आदमी या छोटा बच्‍चा होता है। हालांकि उसने कई जटिल यंत्र खोज लिए है। जिन्‍होंने उसके जीवन को और उलझा दिया है। लेकिन सुलझाया कुछ भी नहीं।
स्‍वयं के साथ और भी ईमानदारी बरतें तो मनुष्‍य पहचान सकता है कि उसकी सारी वैज्ञानिक और दार्शनिक प्रणालियां और सिद्धांत इन यंत्रों और साधनों की मानिंद है, क्‍योंकि वे प्रश्‍नों को और दुरूह बना देते है। हल नहीं करते।
दो खास प्रश्‍न जो मनुष्‍य को हर वक्‍त धेरे रहते है वे है—अदृश्‍य जगत का प्रश्‍न और मृत्‍यु की पहले।
मनुष्‍य चिंतन के पूरे इतिहास में सभी रूपों में , निरपवाद रूप से, जगत को दो कोटियों में बांटा गया है: दृश्‍य और अदृश्‍य। और लोगों को इस बात का अहसास रहा है कि दृश्‍य जगत जो उनके सीधे निरीक्षण और अध्‍ययन का अहसास रहा है कि दृश्‍य जगत जो उनके सीधे निरीक्षण और अध्‍ययन का हिस्‍सा है वह बहुत छोटा है, लगभग है ही नहीं। जिसकी तुलना में विराट अदृश्‍य आस्‍तित्‍व है। ….विश्‍व का यह विभाजन—दृश्‍य और अदृश्‍य–मनुष्‍य की विश्‍व-संबंधी पूरी सोच की आधारशिला है; भले ही इन विभाजनों को उसने नाम कुछ भी दिया हो। अगर हम विश्‍व के दर्शनों की गिनती करें तो ये विभाजन स्‍पष्‍ट हो जायेंगे। पहले ता हम सभी विचार पद्धतियों को तीन वर्गों में बांट दें–
1. धार्मिक पद्धति
2. दार्शनिक पद्धति
3. वैज्ञानिक पद्धति
सभी धार्मिक पद्धतियां, निरपवाद रूप से, जैसे ईसाइयत, बौद्ध, जैन से लेकर जंगली आदमी के पूर्णतया अप्रगति धर्म तक जो कि आधुनिक मनुष्‍य को आदिम दिखाई देते है। विश्‍व को दो वर्गों में बांटते है—दृश्‍य और अदृश्‍य। ईसाइयत में ईश्‍वर, फ़रिश्ते, शैतान, दैत्‍य, जीवित और मृत व्‍यक्‍तियों की आत्‍माएं, स्‍वर्ग और नर्क की धारणाएं है। और उससे पूर्व पेगन धर्मों में आधी तूफान, बिजली, बरसात, सूरज, आसमान, इत्‍यादि-इत्‍यादि नैसर्गिक शक्‍तियों को मानवीय रूप देकर देवताओं की शकल में पूजा गया है।
दर्शन में एक घटनाओं का जगत है। और एक कारणों का जगत है। एक संसार वस्‍तुओं का और एक संसार विचारों का। भारतीय दर्शन में, विशेषत: उसकी कुछ शाखाओं में दृश्‍य याने घटनाओं के जगत को माया कहा गया है, जिसका अर्थ है: अदृश्‍य जगत की अयथार्थ प्रतीति, इसलिए वह है ही नहीं।
विज्ञान में, अदृश्‍य जगत अणुओं का जगत है। और अजीब बात यह है कि वही विशाल मात्राओं का जगत है। जगत की दृश्‍यता उसकी मात्रा से नापी जाती है। अदृश्‍य जगत में है: कोशिकाएं, मांसपेशियाँ, माइक्रो-ऑर्गानिज्‍मस, दूरबीन से देखे जाने वाले सूक्ष्‍म जीवन, इलेक्ट्रॉन -प्रोटोन- न्‍यूट्रॉन, विद्युत तरंगें। इसी जगत में शामिल है, दूर-दूर तक फैले सितारे, सूर्य मालाएँ और अज्ञात विश्व। माइक्रोस्कोप एक आयाम में हमारी दृष्‍टि को विशाल करता है। और टेलीस्‍कोप दूसरी दिशा में। लेकिन जो अदृश्‍य विश्‍व शेष रह जाता है उसकी तुलना में विज्ञान की सूक्ष्‍म दृश्‍यता बहुत कम है।
ऑन दि स्‍टडी ऑफ ड्रीम्‍स एण्‍ड हिप्‍नोटिज्‍म:
यह पुस्‍तक ओशो ने सन 1869 में पढ़ी। जैसी कि उनका पढ़ने का अंदाज था, वे पुस्‍तक के महत्‍वपूर्ण अंशों पर लाल और नीले निशान लगाते थे। इस पुस्‍तक के जिन अंशों पर ओशो ने नीले बिंदु लगाये है उनमें से कुछ अंश प्रस्‍तुत है:
मेरे जीवन के कुछ बहुत अर्थपूर्ण संस्कार ऐसे थे जो स्‍वप्‍नों के जगत से आये। बचपन से स्‍वप्‍न लोक मुझे आकर्षित करता रहा। स्‍वप्‍नों की अगम घटना की व्‍याख्‍या मैं हमेशा ढूँढता रहा और यथार्थ और अयथार्थ स्वप्नों का अंतर-संबंध जानने की कोशिश करता रहा हूं, मेरे कुछ असाधारण अनुभव स्‍वप्‍नों से संबंधित रहे है। छोटी आयु में ही मैं इस ख्‍याल को लेकिर जागता था कि मैंने कुछ अद्भुत देखा है, और वह इतना रोमांचकारी है कि अब तक मैंने भी जो जाना था, समझा था, वह बिलकुल नीरस जान पड़ता है। इसके अलावा, मैं बार-बार आनेवाले स्‍वप्‍नों से आश्‍चर्यचकित था। ये स्‍वप्‍न बार-बार एक ही परिवेश में एक ही शकल में आते और उनका अंत भी एक जैसा होता। और उनके पीछे वही स्‍वाद छूटता।
सन 1900 के दरमियान जब मैं सपनों पर उपलब्‍ध पूरा साहित्‍य पढ़ चुका, मैंने खुद ही अपने स्‍वप्‍नों को विधिवत समझने की ठान ली। मैं अपने ही एक अद्भुत ख्‍याल पर प्रयोग करना चाहता था। जो बचपन में ही मेरे दिमाग में मेहमान हुआ था: क्‍या स्‍वप्‍न देखते समय होश साधना संभव नहीं है? मतलब, स्‍वप्‍न देखते हुए यह जानना कि में सोया हूं और होश पूर्वक सोचना, जैसे हम जागे हुए सोचते है।
मैंने अपने स्‍वप्‍नों को लिखना शुरू किया। उससे मेरी समझ में एक बात आ गई कि स्‍वप्‍नों को देखना हो तो जो सामान्‍य विधियां सिखाई जाती है वे किसी काम की नहीं हे। स्‍वप्‍न निरीक्षण को झेल नहीं पाते। निरीक्षण उन्‍हें बदल देता है। और शीध्र ही मेरे ख्‍याल में आया कि मैं जिनका निरीक्षण कर रहा था वे पुराने स्‍वप्‍न नहीं थे। बल्‍कि नये स्‍वप्‍न थे जिन्‍हें मेरे निरीक्षण ने पैदा किया था। मेरे भीतर कुछ था जिसने स्‍वप्‍न पैदा करने शुरू किये। मानों वे ध्‍यान को आकर्षित कर रहे थे।
दूसरा प्रयास स्‍वप्‍न में जागे रहना, इसे साधते-साधते मैं स्‍वप्‍नों को निरीक्षण करने का एक नया ही अंदाज सीख गया। उसने मेरी चेतना में एक अर्ध-स्‍वप्‍न की स्‍थिति पैदा कर दी। और मैं निश्‍चित रूप से जान गया कि अर्ध-स्‍वप्‍न की स्‍थिति के बिना स्‍वप्‍नों का निरीक्षण करना असंभव था।…इस अर्ध स्‍वप्‍न की स्‍थिति में मैं एक ही समय सोचा रहता और जागा भी रहता।
ऐक्सपैरिमैंट मिस्‍टिसिज्‍म:
सामान्‍य जीवन में हम सिद्धांत और प्रतिसिद्धांत के रूप में सोचते है। हमेशा हर कहीं, ‘’हां’’ या ‘’ना’’ में जवाब होत है। अलग ढंग से सोचने पर, नये तरीके से सोचने पर वस्‍तुओं को चिन्‍ह बनाकर सोचने पर मैं अपनी मानसिक प्रक्रिया की बुनियादी भूल को समझ गया।
हकीकत में हमेशा तीन तत्‍व होते है। दो नहीं। सिर्फ, हां या ना नहीं होते, वरन ‘’हां’’ ‘’ना’’, ‘’और कुछ’’ और होते है। और इस तीसरे तत्‍व का स्‍वभाव, जो कि समझ के परे था, कुछ ऐसा था कि उसने सामान्‍य तर्क को असंगत बना दिया और सोचने की आम पद्धति में बदलाहट की मांग की। मैंने पाया कि हर समस्‍या का उत्‍तर हमेशा ‘’तीसरे’’ अज्ञात तत्‍व से आता है। और इस तीसरे तत्‍व के बिना सही निष्‍कर्ष निकालना असंभव था।
मैं जब प्रश्‍न पूछता था तो मैं देखता था कि अकसर वह प्रश्‍न ही गलत पेश किया गया है। मेरे प्रश्‍न का उत्‍तर देने की बजाय वह ‘’चेतना’’ जिससे मैं बात करता था, उस प्रश्‍न को ही उलटा कर, घूमाकर दिखा देती कि प्रश्‍न गलत था। धीरे-धीरे मैं देखने लगा कि क्‍या गलत था। और जैसे ही मैंने स्‍पष्‍ट रूप से देखा कि मेरे प्रश्‍न में गलत क्‍या था, मुझे उत्‍तर दिखाई दिया। लेकिन उत्‍तर हमेशा अपने भीतर तीसरा तत्‍व लिये रहता जो इससे पहले में देख नहीं पाता था। क्‍योंकि मरे प्रश्‍न सदा दो तत्‍वों पर खड़ा रहता सिद्धांत और प्रतिसिद्धांत। मैंने इसे अपने लिए इस भांति सोच लिया: सारी कठिनाई प्रश्‍न के बनाने में थी। अगर हम सही प्रश्‍न बना सकें तो हमे उत्‍तर का पता चलना चाहिए। सही ढंग से पूछे गये प्रश्‍न में उत्‍तर अंतर्निहित होता है। लेकिन वह उत्‍तर हमारी अपेक्षा से कही भिन्‍न होगा।
ओशो का नज़रिया:
मैं पुन: ऑस्‍पेन्‍सकी का जिक्र करने जा रहा हूं, मैं उसकी दो किताबों का नाम ले चुका हूं। एक ‘’टर्शियम ऑर्गेनम’’ जो उसने अपने गुरु गुरजिएफ से मिलने से पहले लिखी थी। ‘’टर्शियम ऑर्गेनम’’ गणितज्ञों में प्रसिद्ध है। क्‍योंकि ऑस्‍पेन्‍सकी ने जब यह किताब लिखी तब वह गणितज्ञ था। दूसरी किताब ‘’इन सर्च ऑफ मिरेकुलस’’ उसने उस समय लिखी जब वह गुरूजिएफ के साथ कई वर्ष रह चुका था। लेकिन उसने तीसरी किताब लिखी है जो इन दो किताबों के बीच लिखी, ‘’टर्शियम ऑर्गेनम’’ के बाद और गुरूजिएफ से मिलने से पहले। इस किताब को बहुत कम ख्‍याति प्राप्‍त हुई है। यह किताब है: ‘’ए न्‍यू मॉडल ऑफ दि यूनिवर्स’’ बडी विचित्र किताब है। बड़ी विलक्षण।
ऑस्‍पेन्‍सकी ने पूरी दुनिया में गुरु की खोज की, खास कर भारत में। क्‍योंकि लोग अपनी मूढ़ता में सोचते है कि गुरु सिर्फ भारत में ही मिलते है। ऑस्‍पेन्‍सकी ने भारत में खोज की, और वर्षों खोज की। गुरु की खोज में वह बंबई भी आया था। उन दिनों में उसने ये सुंदर किताब लिखी ‘’न्‍यू मॉडल ऑफ दि यूनिवर्स’’
यह एक कवि की कल्‍पना है। क्‍योंकि उसे पता नहीं है कि वह क्‍या कह रहा है। लेकिन जो वह कह रहा है वह सत्‍य के बहुत-बहुत करीब है। लेकिन सिर्फ ‘’करीब’’ ख्‍याल रखना। और सिर्फ बाल की चौड़ाई तुम्‍हारी दूरी बनाने के लिए काफी है। वह दूर ही रहा। वह खोजता रहा…..खोजता रहा….
इस किताब में उसने उसकी खोज का विवरण लिखा है। किताब अचानक खत्‍म हो जाती है। मॉस्को के एक कैफेटेरिया में, जहां उसे गुरूजिएफ मिलता है। गुरूजिएफ वाकई एक विलक्षण गुरु था। वि कैफेटेरिया में बैठकर लिखता था। लिखने के लिए भी क्‍या जगह ढूँढी। वह कैफेटेरिया में जाकर बैठता….लोग बैठे है, खा रहे है, …..बच्‍चे इधर-उधर दौड़ रहे है। रास्‍ते से शोर गुल आ रहा है। हॉर्न बज रहे है….ओर गुरूजिएफ खिड़की के पास बैठा, इस सारे उपद्रव से घिरा ‘’आल एंड एवरीथिंग’’ लिख रहा है।
ऑस्‍पेन्‍सकी ने इस आदमी को देखा और इसके प्रेम में पड़ गया। कौन बच सकता था? वह सर्वथा असंभव है कि गुरु को देखो और उसके प्रेम में न पड़ जाओं, बशर्ते कि तुम पत्‍थर के होओ…..या सिंथेटिक चीज से बने हो। जैसे ही उसने गुरूजिएफ को देखा…..आश्‍चर्य। उसने देखा कि यही वे आंखें है जिन्‍हें खोजते हुए वह पूरी दुनियां में घूम रहा था। भारत की धूल-धूसरित गंदी सड़कें छान रहा था। और यह कैफेटेरिया मॉस्‍को में उसके घर के बिलकुल पास था। कभी-कभी तुम जिसे खोजते हो वह बिलकुल पास में मिल जाता है।
ए न्‍यू मॉडल ऑफ दि यूनिवर्स’’ काव्‍यात्‍मक है, लेकिन मेरी दृष्‍टि के बहुत करीब आती है। इसलिए मैं उसे सम्‍मिलित करता हूं।
ओशो

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300 से ज्यादा खोज कर चुका ये संस्थान, शहर को दे रहा नई पहचान


300 से ज्यादा खोज कर चुका ये संस्थान, शहर को दे रहा नई पहचान

जमशेदपुर. लौहनगरी जमशेदपुर की पहचान साइंस सिटी के रूप में भी बन चुकी है। कई ऐसी वस्तुएं हैं, जिनका उपयोग हम घर या बाहर कर रहे हैं, वह कैसे बना? कहां अनुसंधान हुआ है? शायद नहीं पता है। कई चीजें शहर में बनी हैं। इसे बनाने में एनएमएल का योदान रहा है। शहर को नई पहचान देने और देश को विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी बनाने में राष्ट्रीय धातुकर्म प्रयोगशाला (एनएमएल) का अहम योगदान रहा है। साठ वर्षों के सफर में एनएमएल 300 खोज कर चुका है। विज्ञान के क्षेत्र में यहां के वैज्ञानिकों की उपलब्धियों को शब्दों में समेटना कठिन है। दैनिक भास्कर एनएमएल की नई खोज व कुछ ऐसे अनुसंधान को सामने लाने का प्रयास कर रहा है, जिसका उपयोग आप करते हैं, लेकिन नहीं जानते कि इसका इन्वेंशन शहर में हुआ है। आज राष्ट्रीय विज्ञान दिवस है। इस साल का थीम है क्रफोस्टरिंग साइंस्टिफिक टेंपर (वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देना)। प्रस्तुत है भास्कर की विशेष रिपोर्ट।
क्यों मनाया जाता है विज्ञान दिवस
28 फरवरी 1928 को सर सीवी रमन ने प्रकाश की गति पर खोज की थी। इस खोज के लिए उन्हें 1930 मेें नोबेल पुरस्कार दिया गया था। इसके बाद से देश ने विज्ञान के क्षेत्र में पीछे मुड़ कर नहीं देखा। 28 फरवरी को मिली सफलता पर राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद् और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय की ओर से प्रतिवर्ष इस दिन राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाया जाता है।
इन्वेंशन- अब स्प्रे से जोड़ी जाएंगी टूटी हड्डियां
अब टूटी हड्डियों को स्प्रे मारकर जोड़ा जा सकेगा। एनएमएल के वैज्ञानिक डॉ अरविंद सिन्हा ने वर्ष 2003 में ऐसे केमिकल की खोज की है, जिसके स्प्रे मात्र से ही टूटी हड्डियां जुड़ जाएंगी।  यह इतना प्रभावशाली है कि हड्डी जुडऩे के बाद बिल्कुल पहले की तरह हो जाती है। हड्डी के सॉफ्ट पार्ट को जोडऩे के लिए स्प्रे का उपयोग किया जा रहा है।
अब तक क्या : गंभीर रूप से टूटी हड्डियों को स्टील प्लेट लगाकर जोड़ा जाता है। हड्डियां जुडऩे के बाद दोबारा ऑपरेशन कर प्लेट निकालना पड़ता था। इस पूरी प्रक्रिया में मरीज को काफी कष्ट होता था।
आगे क्या : डॉ सिन्हा ने बताया कि थ्री डायमेन्शन स्ट्रक्चर ब्लॉक पर रिसर्च चल रहा है। प्रारंभिक दौर में सफलता मिल गई है। पांच तकनीक अलग-अलग कंपनियों को उपलब्ध कराई गई हैं। ये कंपनियां स्प्रे बना रही हैं।
मशीन की उम्र बताएगा उपकरण
अब किसी मशीन की उम्र कितनी है, यह लाइफ एसेसमेंट मशीन बताएगी। मशीन के जीवन को जांचने के लिए बनाया गया सबसे ज्यादा क्षमता वाला उपकरण एशिया में एनएमएल के पास है। इस मशीन को एनएमएल में पहली बार १९७० के दशक में बनाया गया था। एनएमएल में ऐसी मशीन की सौ यूनिट हैं। एक यूनिट की लागत चार करोड़ रुपए है। देश समेत दुनिया की कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपनी मशीन व यंत्रों की जांच के लिए सैंपल भेजती हैं।
इनकी उम्र का पता चलेगा : किसी भी प्रकार की मशीन, रेलवे का ओवरहेड वायर, ऑयल कंपनी के संयंत्र, पुल, रेल लाइन व अन्य संयंत्र।
इन्सपीरेशन- हावड़ा ब्रिज को दिया जीवन
आप जानते हैं हावड़ा ब्रिज को अंग्रेजों ने बनवाया था। 705 मीटर लंबे लोहे के इस पुल में पिलर नहीं है। शायद यह नहीं पता कि लोहे में जंग क्यों नहीं लगती? यह एनएमएल की देन है। एनएमएल के वैज्ञानिकों ने हावड़ा ब्रिज को इस समस्या से बचाने व उसके रख-रखाव के लिए एक केमिकलयुक्त पेंट का खोज की। इस खास तरह के पेंट से लोहे की उम्र सौ साल बढ़ जाती है। एनएमएल ने एमटी कोलोसोम कोर्टिंग नामक केमिकल वर्ष 1985 में लगाया। इससे ब्रिज की लाइफ बढ़ गई है। एनएमएल के वैज्ञानिक हावड़ा ब्रिज की जानकारी लेते रहते हैं।
देश को दिया एल्युमीनियम वायर
1960 दशक के पहले बिजली आपूर्ति के लिए तांबे के तार का उपयोग होता था। यह न केवल महंगा होता था, बल्कि हमेशा कार्बन लगने से बिजली आपूर्ति में बाधा होती थी। इस समस्या को दूर करने के लिए एनएमएल ने १९६५-६८ में रिसर्च किया और एल्युमीनियम तार बनाया। इससे भारत को एक नई तकनीक मिली। अब देश में बिजली आपूर्ति के साथ रेल के इलेक्ट्रिक इंजन को चलाने में इसी वायर का उपयोग किया जा रहा है।
स्टेनलेस स्टील की खोज
स्टील से बनने वाले बर्तनों में निकेल का उपयोग किया जाता था। इसे विदेश से मंगाना पड़ता था। इससे स्टील बर्तनों की कीमत ज्यादा होती थी। एनएमएल ने स्टेनलेस स्टील की खोज की। निकेल की जगह एल्युमीनियम का उपयोग किया। इसलिए आज देश में स्टेनलेस स्टील के बर्तन सस्ते मिलते हैं।
क्राउन इन द क्राउड- चाईबासा की छात्रा को नेशनल अवार्ड
चाईबासा की 10वीं क्लास की छात्रा अनीशा परवीन विज्ञान के क्षेत्र में जूनियर रिसर्चर के रूप में पहचान बना चुकी है। कम लोग जानते हैं कि बड़ाजामदा के राजकीयकृत स्कूल में पढऩे वाली इस नन्ही छात्रा को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार ने नई खोज के लिए राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार इंस्पायर अवार्ड-२०१३ से नवाजा है। अनीशा राज्य की एकमात्र प्रतिभागी थी।
खोज, जिसके लिए मिला सम्मान : केले के थंब व गोबर को मिलाकर आर्गेनिक कम्पोस्ट (खाद) की खोज की है। इस खाद से जमीन की उर्वरा शक्ति 300 गुणा बढ़ जाती है। अनीशा ने बताया कि केले के थंब से निकलने वाले फाइबर टिश्यू से सिल्क ग्रेड का धागा बनाया जा सकता है। इन धागों से वस्त्र पेपर, ग्रीटिंग, फोटो फ्रेम व अन्य वस्तुएं बनाई जा सकती है।
परसुडीह के छात्र का राष्ट्रीय प्रतियोगिता में चयन
परसुडीह के खासमहल निवासी निलाद्री दासगुप्ता को भी इंस्पायर अवार्ड के लिए चुना गया है। निलाद्री केंद्रीय विद्यालय, जमशेदपुर के आठवीं कक्षा के छात्र हैं। भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्यौगिकी मंत्रालय ने वर्ष २०१४ की प्रतियोगिता के लिए निलाद्री का चयन किया है। उसे मंत्रालय की ओर से पांच हजार रुपए फेलोशिप के रूप में दी गई है। इससे वह प्रोजेक्ट मॉडल तैयार करेंगे। निलाद्री जिला व राज्यस्तरीय प्रतियोगिता में शामिल होंगे। इसके बाद उन्हें राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में मॉडल प्रदर्शित करने का मौका मिलेगा।
क्या आप जानते हैं
भारत में ई-वेस्ट (कचरा) की समस्या लगातार बढ़ रही है। पर्यावरण संरक्षण में आज ई-वेस्ट सबसे बड़ी रुकावट है। मुंबई, बेंगलुरु, कोलकाता, सूरत, पुणे व नागपुर में सबसे ज्यादा ई-वेस्ट होता है।
क्या है ई-वेस्ट : टीवी, मोबाइल, कंप्यूटर, लैपटॉप, फ्रिज, एयर कंडिशन मशीन व ऐसी वस्तु, जो पूरी तरह से नष्ट नहीं होती हैं। इसके अंदर पर्यावरण को प्रभावित करने वाले खतरनाक केमिकल होते हैं। इन्हें जलाने से वायु प्रदूषण और जमीन में दबाने से उर्वरा शक्ति प्रभावित होती है।

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शनिवार, 30 अगस्त 2014

टमाटर घटाता है प्रोस्टेट कैंसर का ख़तरा

टमाटर

टेन में हुए इस अध्ययन के मुताबिक़ नियमित तौर पर टमाटर खाने वाले पुरुषों में प्रोस्टेट कैंसर होने का ख़तरा 20 फ़ीसदी कम हो जाता है.
दुनिया भर के पुरुषों में होने वाले कैंसरों में प्रोस्टेट कैंसर दूसरे नंबर पर है.

कैंसर विशेषज्ञ खाने में फल और सब्जी की भरपूर मात्रा के साथ संतुलित आहार लेने की सलाह देते हैं.ब्रिटेन में हर साल इसके 35,000 नए मामले आते हैं और 10,000 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती है.
विशेषज्ञ रेड और प्रोसेस्ड मीट के साथ ही साथ चर्बी और नमक की कम मात्रा लेने की भी सलाह देते हैं.
ब्रिस्टल विश्वविद्यालय के अध्ययनकर्ता दल ने 50 से 69 साल की उम्र के बीस हज़ार ब्रितानी पुरुषों पर शोध किया और पाया कि नियमित तौर पर टमाटर खाने वालों में प्रोस्टेट कैंसर होने का जोखिम 18 फ़ीसदी कम हो जाता है.

भरपूर मात्रा में फल और सब्जी

फल और सब्जी भरपूर मात्रा में खाने वालों में भी कैंसर का जोखिम कम सब्जी और फल खाने वालों की तुलना में 24 फ़ीसदी कम पाया गया.
सलाद
टमाटर के अंदर कैंसर प्रतिरोधी गुण की वजह लाइकोपेन को माना जाता है. लाइकोपेन एक एंटीऑक्सीडेंट है जो डीएनए और कोशिका को क्षति पहुंचाने से रोक सकता है.
अध्ययनकर्ताओं ने प्रोस्टेट कैंसर के जोखिम को कम करने से जुड़े दो अन्य तत्वों की भी संभावना तलाशी.
इसमें से एक है सेलिनियम, जो कि आटे से बने खाद्य पदार्थों में पाया जाता है और दूसरा है कैल्सियम जो दुग्ध पदार्थों में पाया जाता है.

शोधकर्ताओं ने कहा कि इन तीनों खाद्य तत्वों का अच्छी मात्रा में सेवन करने वाले पुरुषों में प्रोस्टेट कैंसर का जोखिम कम था.sabhar :http://www.bbc.co.uk/

चीन का सबसे अमीर गांव, जहां हर आदमी कमाता है 80 लाख रुपए सालाना

चीन का सबसे अमीर गांव, जहां हर आदमी कमाता है 80 लाख रुपए सालाना

जियांगयिन। आलीशान बंगला, महंगी कार, अच्छी शिक्षा, हर तरह की सुख-सुविधाएं और वो भी मुफ्त में। ये एक सपना हो सकता है, लेकिन चीन के हुआझी गांव में रहने वाले लोगों के लिए ये कोई सपना नहीं, बल्कि हकीकत है। ये गांव चीन के जियांगयिन शहर के पास है और इसे पूरे देश में सबसे अमीर कृषि गांव कहा जाता है। इस गांव में रहने वाले सभी 2000 रजिस्टर्ड लोगों की सालाना आमदनी एक लाख यूरो (करीब 80 लाख रुपए) है।
 
हुआझी गांव आज एक सफल समाजवादी गांव का मॉडल पेश कर रहा है। हालांकि, शुरुआती दौर में गांव की तस्वीर ऐसी नहीं थी। 1961 में स्थापना के बाद यहां कृषि की हालत बहुत खराब थी, लेकिन गांव की कम्युनिस्ट पार्टी कमिटी के पूर्व अध्यक्ष रहे वू रेनवाओ ने इस गांव की सूरत ही बदल दी। 
 
वू ने कैसे बदली गांव की सूरत
 
वू ने औद्योगिक विकास की योजना के लिए पहले गांव का निरीक्षण किया और फिर एक मल्टी सेक्टर इंडस्ट्री कंपनी बनाई। उन्होंने सामूहिक खेती की प्रणाली का नियम बनाया। इसके साथ ही, 1990 में कंपनी को शेयर बाजार में सूचीबद्ध कराया। गांव के लोगों को कंपनी में शेयरधारक बनाया गया।
 
मुफ्त में मिलती हैं सुविधाएं
 
गांव की स्टील, सिल्क और ट्रैवल इंडस्ट्री खास तौर पर विकसित है और इसने 2012 में मुख्य रूप से 9.6 अरब डॉलर का फायदा कमाया। गांव के लोगों के लाभ का हिस्सा कंपनी में शेयर होल्डर निवासियों के बीच बांटा जाता है। एक वेबसाइट के मुताबिक, उनके सकल वार्षिक आय का एक बड़ा हिस्सा यानी 80 फीसदी टैक्स में कट जाता है, लेकिन इसके बदले में रजिस्टर्ड नागरिकों को बंगला, कार, मुफ्त स्वास्थ्य सुरक्षा, मुफ्त शिक्षा, शहर के हेलिकॉप्टर के मुफ्त इस्तेमाल के साथ ही होटलों में मुफ्त खाने की सुविधा भी मिलती है। 
चीन का सबसे अमीर गांव, जहां हर आदमी कमाता है 80 लाख रुपए सालाना

50 साल के ज्यादा उम्र की महिलाओं और 55 साल से ज्यादा उम्र के पुरुषों को हर महीने की पेंशन के साथ ही चावल और सब्जियां भी दी जाती हैं। रजिस्टर्ड लोगों में गांव के वे लोग शामिल हैं, जो इसकी स्थापना के वक्त से ही यहां रह रहे हैं और कंपनी का हिस्सा हैं। इनके पास कंपनी में शेयरधारक होने के सर्टिफिकेट भी हैं। हालांकि, इनके अलावा यहां 20 हजार से ज्यादा शरणार्थी मजदूर भी हैं, जो पड़ोसी गांवों से आकर यहां रह रहे हैं। 
 
हुआझी गांव सिर्फ समृद्ध ही नहीं है, यह देखने में भी बहुत आकर्षक है। देशी-विदेशी तकरीबन 5 हजार लोग रोज इस गांव में घूमने और इसे देखने आते हैं। इन्हें गांव में प्रवेश के लिए एंट्री फीस भी चुकानी पड़ती है। हालांकि, इसके बाद गांव में किसी भी जगह पर घूमने की कोई फीस नहीं है। 
 
हाईटेक शहर से कम नहीं
 
ये गांव हाईटेक शहर से कम नहीं है। यहां 2011 में बनकर तैयार हुआ 74 माले का लॉन्ग्झी इंटरनेशनल होटल यहां की शान को और बढ़ा देता है। इस होटल को बनाने के लिए कोई कर्ज नहीं लिया गया है, बल्कि ये गांव के लोगों के सहयोग से ही तैयार हुआ है। इसके अलावा भी यहां सभी तरह की सुख-सुविधाएं मौजूद हैं। 
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अब टाईप करने की भी ज़रूरत नहीं हिंदी में बोलना काफी




जो काम बोल कर हो जाए उसके लिए टाईप करने की जहमत क्यों उठाना. और वैसे भी बढ़ती तकनीकी के साथ जो न हो कम है. पहले टच स्क्रीन का आविष्कार और अब टाईप तो क्या टच करने की भी ज़रूरत नहीं. जी हां, गूगल पर सर्च करने के लिए अब आपको टाइप करने की जरूरत नहीं, क्योंकि यह काम अब आप बोलकर ही कर सकते हैं वो भी हिंदी में.
गूगल कंपनी ने एंड्रॉयड ओएस पर हिंदी में वॉइस सर्च की सर्विस देना शुरू किया है. यानि इस सर्विस के तहत आप गूगल पर हिंदी में बोलकर सर्च कर सकते हैं. गौरलब है कि गूगल ने अपनी इस सर्विस के बारे में दो महीने पहले ही बता दिया था. तब कंपनी ने कहा था कि गूगल वॉइस सर्च अब भारतीय उच्चारण को भी समझेगा. इसके तहत हिंदी में बोलकर सर्च करने का फीचर आपकी भाषा समझ लेगा. लेकिन बोलकर सर्च करने और टाइप करके सर्च करने के रिजल्ट्स में अंतर दिख सकता है.
एंड्रॉयड ओएस वाले डिवाइस पर हिंदी में सर्च करने के लिए आपको सेटिंग में बदलाव होगा. सबसे पहले अपने एंड्रॉयड फोन की सेटिंग्स में जाइए. फिर अकाउंट्स में गूगल खोलें. फिर इसके सर्च में जाइए. इसके बाद फिर वॉइस खोलिए. इसमें लैंग्वेज में हिंदी (भारत) चुनकर सेव कर दीजिए.
इस प्रोसेस के बाद यूजर अपने फोन की होम स्क्रीन पर ऊपर बार के किनारे बने माइक पर क्लिक करने के बाद हिंदी में बोलकर सर्च कर सकते हैं. यूजर गूगल सर्च एप और गूगल के वॉइस सर्च एप पर भी हिंदी में बोलकर सर्च कर सकते हैं.sabhar :http://www.palpalindia.com/







शुक्रवार, 29 अगस्त 2014

भविष्य में होंगे मस्तिष्क प्रत्यारोपण

बेहद गोपनीय अमेरिकी सैन्य शोधकर्ताओं का कहना है कि अगले कुछ महीनों में वे मस्तिष्क प्रत्यारोपण के विकास से जुड़ी नई प्रगति के बारे में जानकारी पेश करने वाले हैं. मस्तिष्क प्रत्यारोपण की मदद से याददाश्त बहाल की जा सकेगी.
अमेरिका की डिफेंस एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट्स एजेंसी (डीएआरपीए) प्रबुद्ध स्मृति उत्तेजक को बनाने की योजना के कार्यक्रम का नेतृत्व कर रही है. यह इंसानी दिमाग को बेहतर तरीके से समझने के लिए बनाई गई योजना का हिस्सा है. इस योजना में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने दस करोड़ अमेरिकी डॉलर की सहायता दी है.
विज्ञान ने पहले ऐसा काम नहीं किया है. और इस पर नैतिक सवाल भी उठ रहे हैं कि जख्मी सैनिक की याददाश्त को बहाल करने और बूढ़े होते मस्तिष्क के प्रबंधन के नाम पर क्या इंसानी दिमाग के साथ छेड़छाड़ जायज है.
कुछ लोगों का कहना है कि जिन लोगों को इससे लाभ पहुंचेगा उनमें पचास लाख अमेरिकी हैं जो अल्जाइमर बीमारी से पीड़ित हैं और करीब तीन लाख अमेरिकी फौजी हैं जिनमें महिलाएं और पुरुष शामिल हैं. ये वो सैनिक हैं जो इराक और अफगानिस्तान में युद्ध के दौरान घायल हुए और उनके मस्तिष्क में चोटें आई.
डीएआरपीए के प्रोग्राम मैनेजर जस्टिन साचेंज ने इसी हफ्ते अमेरिकी राजधानी में हुई एक कॉन्फ्रेंस में कहा, "अगर आप ड्यूटी के दौरान घायल हो जाते हैं और आप अपने परिवार को याद नहीं रख पाते हैं, ऐसे में हम चाहते हैं कि हम इस तरह के कामों को बहाल कर सकें. हमें लगता है कि हम न्यूरो कृत्रिम उपकरण का विकास कर सकते हैं जो सीधे हिप्पोकैंपस से इंटरफेस कर सकें और पहली प्रकार की यादें बहाल कर सकें. हम यहां एक्सप्लिसिट मेमरी के बारे में बात कर रहे हैं."
बहाल होंगी यादें
एक्सप्लिसिट मेमरी यानि स्पष्ट यादें, ये लोगों, घटना, तथ्य और आंकड़ों के बारे में स्मरणशक्ति है और किसी भी शोध ने यह साबित नहीं किया है कि इन्हें दोबारा बहाल किया जा सकता है. अब तक शोधकर्ता पार्किंसन बीमारी से पीड़ित लोगों में झटके कम करने में मदद कर पाए हैं और अल्जाइमर के पीड़ितों में डीप ब्रेन सिमुलेशन प्रक्रिया की मदद से याददाश्त मजबूत करने में सफल हुए हैं.
इस तरह के उपकरण हृदय पेसमेकर से प्रोत्साहित हैं और दिमाग में बिजली को पहुंचाते हैं लेकिन यह हर किसी के लिए काम नहीं करता है. जानकारों का कहना है कि स्मृति बहाली के लिए और अधिक सूक्ष्म दृष्टिकोण की जरूरत होगी. वेक फॉरेस्ट यूनिवर्सिटी के सहायक प्रोफेसर रॉबर्ट हैंपसन कहते हैं, "स्मृति, पैटर्न और कनेक्शन की तरह है." डीएआरपीए की योजना पर टिप्पणी से इनकार करते हुए वे कहते हैं, "हमारे लिए स्मृति कृत्रिम बनाना वास्तव में ऐसा कुछ बनाने जैसा है जो विशिष्ट पैटर्न देता हो."
चूहों और बंदरों पर हैंपसन के शोध से पता चलता है कि हिप्पोकैंपस में न्यूरॉन्स तब अलग तरह से प्रक्रिया देते हैं, जब वे लाल या नीला रंग या फिर चेहरे की तस्वीर या भोजन के प्रकार को देखते हैं. हैंपसन का कहना है कि मानव की विशिष्ट स्मृति को बहाल करने के लिए वैज्ञानिकों को उस स्मृति के लिए सटीक पैटर्न जानना होगा. सिंथेटिक जीव विज्ञान पर डीएआरपीए को सलाह देने वाले न्यूयॉर्क के लैंगोनी मेडिकल सेंटर में चिकित्सा विज्ञान में नैतिकता पर काम करने वाले आर्थर कैपलान कहते हैं, "जब आप दिमाग से छेड़छाड़ करते हैं तो आप व्यक्तिगत पहचान से भी छेड़छाड़ करते हैं. दिमाग में फेरबदल की कीमत आप स्वयं की भावना को खोने की जोखिम से करते हैं. इस तरह का जोखिम नई तरह का है, जिसका हमने कभी सामना नहीं किया है."
एए/आईबी (एएफपी)
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10 उभरती तकनीकें जो बदल देंगी जीने का अंदाज

।। ब्रह्मानंद मिश्र ।।
नयी दिल्ली
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सदियों से इंसान नये अविष्कारों के जरिये भावी पीढ़ी के जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास करता रहा है. मौजूदा दौर में भी कई ऐसी नयी टेक्नोलॉजी पर शोधकार्य जारी है, जो कुछ वर्षो बाद जीने के अंदाज को बदल सकती हैं. इन्हीं में से 10 उभरती तकनीकों के बारे में बता रहा आज का नॉलेज..
तकनीकी विकास की अवधारणा, मानव विकास की सतत कड़ी है. शायद इसी वजह से तेजी से बदलते आधुनिक युग में भी तकनीक ही विकास की सबसे बड़ी कारक साबित हो रही हैं. इस क्षेत्र में आनेवाली छोटी-बड़ी चुनौतियां ही नयी तकनीक के खोज में लगे वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के लिए प्रेरणास्नेत हैं.
आज के दौर में नैनो टेक्नोलॉजी से लेकर बायोटेक्नोलॉजी तक, इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी से लेकर कॉग्निटिव साइंस की विशिष्टताओं तक ने इंसानी संवेदनशीलता के स्तर को और भी ऊंचा कर दिया है. दूसरी तरफ देखें तो प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और बदलते वैश्विक पर्यावरण ने मानव जाति को भविष्य के बारे में नये सिरे से सोचने के लिए मजबूर कर दिया है.
आज बढ़ती जनसंख्या की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना, मानव जीवन को तरह-तरह की भयानक बीमारियों से मुक्ति दिलाना आदि लगभग सभी देशों की प्राथमिकताओं में शामिल है. सच यह है कि सकारात्मक सतत तकनीकी विकास और बदलाव के बिना वैश्विक स्तर पर चुनौतियों से निपटना संभव ही नहीं है. 
फिलहाल, बेहतर निवेश की कमी, नियमन की समुचित व्यवस्था का अभाव और बड़े स्तर पर तकनीकों के प्रति समझदारी का न होना, तकनीकी विकास के लक्ष्य को हासिल कर पाने में बड़ी बाधा है.
कुछ ऐसी तकनीकें जिन पर शोध प्रक्रिया जारी है, उन पर सकारात्मक दिशा में कदम उठाये जाने की जरूरत है. निकट भविष्य में अच्छे परिणामों की उम्मीदों के साथ दुनियाभर में विभिन्न क्षेत्रों में वैज्ञानिक और संस्थाएं लगातार प्रयासरत हैं.
इन तकनीकों से न केवल सामाजिक जिंदगी में व्यापक बदलाव आयेगा, बल्कि आर्थिक विकास और उत्थान की दिशा में भी परिवर्तन होगा. निश्चित तौर पर ये तकनीकें निकट भविष्य में हमारे समाज के लिए मील का पत्थर साबित हो सकती हैं.
ब्रेन से सीधे संचालित होगा कंप्यूटर
इसकी कल्पना थोड़ी मुश्किल है, लेकिन ब्रेन-कंप्यूटर  इंटरफेस (बीसीआइ) तकनीक द्वारा इंसान अपने मस्तिष्क की शक्ति से कंप्यूटर को सीधे नियंत्रित कर सकता है. इस तकनीक में कंप्यूटर, ब्रेन से मिलने वाले सिग्नलों को आसानी से पढ़ सकता है. मेडिकल साइंस में इस तकनीक में काफी हद तक कामयाबी भी मिल चुकी है. 
पक्षाघात, लॉक्ड-इन-सिंड्रोम या व्हीलचेयर पर पड़े मरीजों की मदद के लिए इस तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है. ब्रेन वेव्स द्वारा भेजे गये सिग्नलों से रोबोटिक कार्यो को संचालित किया जाता है. 
हाल में हुए रिसर्च में ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस को विभिन्न प्रकार के ब्रेन को जोड़ने की संभावनाओं पर काम शुरू किया गया है. वर्ष 2013 में हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने कंप्यूटर-टू-ब्रेन-इंटरफेस तकनीक के माध्यम से इंसान और चूहों के मस्तिष्क के बीच फंक्शनल लिंक स्थापित कर पाने में कामयाबी हासिल की थी. अन्य रिसर्च में कंप्यूटर से मेमोरी को ब्रेन में स्थापित करने की तकनीक पर भी काम किया जा रहा है. 
हालांकि, इस तकनीक को विकसित करने में कई प्रकार के गतिरोध भी सामने आ सकते हैं. मौजूदा ब्रेन-कंप्यूटर-इंटरफेस (बीसीआइ) तकनीक इलेक्ट्रोइंसेफेलोग्राफ (इइजी) की तकनीक पर काम कर रही है, जिसमें इलेक्ट्रोड व्यवस्थित किये जाते हैं.
शरीर पर काम करेंगी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेस
भविष्य में शरीर पर धारण करनेवाली ऐसी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेस उपलब्ध होंगी, जो आपके फिटनेस, हर्ट रेट, स्लीप पैटर्न और स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारियों से आपको अपडेट करती रहेंगी. ऐसी तकनीक निश्चित तौर पर मानव समाज को तकनीक के बेहद करीब लायेगी. बीते कुछ वर्षो में गूगल ग्लास से लेकर फिटबिट रिस्टबैंड जैसी डिवाइसेस ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया है.
नयी पीढ़ी की इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस मानव शरीर की जरूरतों के मुताबिक डिजाइन की जायेंगी, जिनका उपयोग इंसान विभिन्न हालातों में बेहतर तरीके से कर सकेगा. ये उपकरण आकार में बेहद छोटे होंगे और उच्च क्वालिटी के विभिन्न सेंसरों द्वारा सुसज्जित होंगे. 
आनेवाले समय में इन उपकरणों के फीडबैक सिस्टम को और भी अपग्रेड किया जायेगा, जिससे इनकी मांग तेजी से बढ़ेगी. मौजूदा उपकरणों में सेंसर प्रणाली युक्त इयरबड्स (हर्ट-रेट की निगरानी करने वाला उपकरण) और हेप्टिक शू-सोल्स (पैरों द्वारा वाइब्रेशन अलर्ट महसूस करने पर जीपीएस की दिशा तय करता है) इस दिशा में बेहतर काम कर रहे हैं. 
लेटेस्ट तकनीक में गूगल ग्लास का इस्तेमाल ऑन्कोलॉजिस्ट सजर्री के दौरान या अन्य विजुअल इंफोर्मेशन में किया जाता है. विशेषज्ञों के मुताबिक, आगामी वर्षो में और भी तकनीकें आयेंगी.
स्क्रीनलेस डिस्प्ले
बिना स्क्रीन का दृश्य- सुनने में भले ही यह अजीब लगता हो, लेकिन आने वाले कु छ वर्षो में यह तकनीक भावी पीढ़ी के लिए आम बात हो जायेगी. वैज्ञानिक और कई तकनीकी संस्थान ऐसी डिवाइस विकसित करने में जुटे हैं, जिसकी मदद से हम बिना स्क्रीन के ही दृश्यों को देख सकेंगे. यह तकनीक प्रोजेक्शन डिवाइस या होलोग्राम मशीन के रूप में दुनिया के सामने आ सकती है.
आधुनिक संचार तकनीकों में स्मार्टफोन जैसी डिवाइस हमें ज्यादा से ज्यादा फीचर मुहैया करा रहे हैं,  लेकिन हम कुछ बेहद महत्वपूर्ण काम (खासकर लिखने जैसा काम), इससे नहीं कर सकते हैं. पहला कारण तो यह कि डिस्प्ले का आकार अपेक्षाकृत छोटा होता है. ऐसी स्थिति में स्क्रीनलेस डिस्प्ले का महत्व बेहद आसानी से समझा जा सकता है. 
खास यह है कि इस तकनीक से होलोग्राफिक इमेज पैदा की जा सकती है. वर्ष 2013 में एमआइटी मीडिया लैब्स ने टेलीविजन के स्टैंडर्ड रिजोल्यूशन पर होलोग्राफिक कलर वीडियो डिस्प्ले में कामयाबी हासिल की थी.
स्क्रीनलेस डिस्प्ले, व्यक्ति के रेटिना पर इमेज को सीधे प्रोजेक्ट कर प्राप्त किया जा सकता है. कुछ कंपनियों ने एक हद तक सफलता हासिल करते हुए बायोनिक कॉन्टेक्ट लेंस, होलोग्राम वीडियो और बुजुर्गो व कम देख पाने वाले व्यक्तियों के लिए मोबाइल फोन आदि भी बनाया. 
माना जा रहा है कि भविष्य में यह तकनीक आंखों को भी दरकिनार करते हुए सिनेप्टिक इंटरफेस (दो न्यूरॉन या न्यूरॉन और मसल के बीच केंद्र) तक पहुंच सकती है, जिसके माध्यम से विजुअल की सूचना सीधे ब्रेन तक पहुंचेगी.
वैकल्पिक ऊर्जा स्नेत
दुनियाभर में ऊर्जा की खपत लगातार बढ़ रही है. ऐसे में परंपरागत स्नेतों पर निर्भरता कम करने और भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए विभिन्न स्तरों पर काम शुरू किया जाना है. परंपरागत ऊर्जा स्नेतों- तेल, कोयला और प्राकृतिक गैसों के इतर नाभिकीय ऊर्जा, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा सहित वाटर पावर और जियो-थर्मल एनर्जी को सर्वसुलभ बनाने के लिए नयी तकनीकों का सहारा लिया जा रहा है. दुनियाभर में कुल ऊर्जा खपत का करीब 85 प्रतिशत परंपरागत ऊर्जा स्नेतों पर निर्भर है.
जियो-थर्मल एनर्जी : यह एक प्रकार की प्राकृतिक उष्मा होती है, जो पृथ्वी के आंतिरक हिस्सों में पैदा होती है. यह ऊष्मा ज्वालामुखी या गर्म जलधाराओं के रूप में बाहर आती है. ऐसी गर्म जलधाराएं चट्टानों को तोड़कर निकाली जाती हैं. 
इन गर्म जलधाराओं से ऊष्मा को संरक्षित करने के साथ-साथ, भाप से बिजली भी पैदा की जा सकती है. दुनिया के कुछ हिस्सों में जियो-थर्मल एनर्जी को मुख्य ऊर्जा स्नेत के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है. कैलीफोर्निया में वर्ष 1960 से जियोथर्मल एनर्जी से बिजली पैदा की जा रही है.
ज्वार-भाटा और समुद्रीय ऊष्मा: समुद्र में तेजी से लहरों के उठने और गिरने की प्रक्रिया में काफी मात्र में ऊर्जा पैदा होती है. इस ऊर्जा को संरक्षित कर तकनीकों के माध्यम से बिजली पैदा की जा सकती है. हालांकि, दुनिया के चुनिंदा हिस्सों में ही इस तकनीक पर काम किया जा सकता है, क्योंकि इसके लिए जलीय तरंगों की तीव्रता अधिक होनी चाहिए. हाइड्रो पावर डैम के माध्यम से फ्रांस, रूस, कनाडा और चीन जैसे कुछ देशों में इस ऊर्जा को संरक्षित किया जा रहा है.
बायोमॉस एनर्जी : कुछ बायोमॉस (पौधों, जीवों के अवशेष और सूक्ष्म जीव) का ईंधन के रूप में इस्तेमाल करते हुए ऊर्जा पैदा की जा सकती है. कूड़े-कचरों व अन्य अवशेषों को जलाकर मिथेन गैस (प्राकृतिक गैस) प्राप्त की जा सकती है. पश्चिमी यूरोपीय देशों में इससे बिजली पैदा करने की प्रक्रिया चल रही है.
नाभिकीय ऊर्जा : परमाणु के नाभिकों के विखंडन और नाभिकों के संलयन की प्रक्रिया में काफी मात्र में ऊर्जा मुक्त होती है. इससे प्राप्त ऊर्जा को वैकल्पिक ऊर्जा के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. नाभिकीय रिएक्टरों में यूरेनियम और प्लूटोनियम के परमाणुओं की विखंडन प्रक्रिया के दौरान मुक्त ऊर्जा से बिजली का उत्पादन किया जाता है. 
कुछ वैज्ञानिकों का तो यहां तक मानना है कि वैश्विक स्तर पर ऊर्जा जरूरतों को पूरा कर पाने में भविष्य में नाभिकीय रिएक्टरों की सबसे अहम भूमिका हो सकती है.
दिखेगी क्वांटम कंप्यूटर की ताकत!
कंप्यूटिंग पावर ने भले ही दुनिया को यह दिखाया हो कि स्पीड और एक्यूरेसी के बीच तालमेल कैसे बिठाया जाता है, लेकिन आधुनिक दुनिया की सोच इससे भी कहीं ज्यादा बड़ी है. 
उम्मीद की जा रही है कि एक दिन क्वांटम कंप्यूटर दुनिया के सामने होगा, जो मौजूदा कंप्यूटर से कई गुना तेज होगा. क्वांटम कंप्यूटर मौजूदा सिलिकॉन कंप्यूटर की तुलना में गणनात्मक प्रक्रियाओं को अपेक्षाकृत ज्यादा तेजी से कर सकता है. वैज्ञानिकों ने प्राथमिक क्वांटम कंप्यूटर को बनाने में कामयाबी हासिल भले ही कर ली हो, लेकिन वास्तविक क्वांटम कंप्यूटर का सपना अभी वर्षो दूर है.
क्या है क्वांटम कंप्यूटर: इस कंप्यूटर की डिजाइन क्वांटम फिजिक्स के सिद्धांतों पर आधारित होती है. इसकी कंप्युटेशनल पावर परंपरागत कंप्यूटर की तुलना में बहुत अलग होती है. कंप्यूटर फंक्शन बाइनरी नंबर फॉर्मेट में डाटा को स्टोर करता है, जो केवल 0 और 1 की सिरीज में होता है. 
कंप्यूटर मेमोरी के न्यूनतम घटक को बिट में मापते हैं. दूसरी ओर, क्वांटम कंप्यूटर सूचनाओं को 0, 1 या क्वांटम सुपरपोजिशन की दो अवस्थाओं में स्टोर करता है. इस ‘क्वांटम बिट’ को ‘क्यूबिट’ कहा जाता है, जो बाइनरी सिस्टम की तुलना में ज्यादा फ्लेक्सिबल होता है. इसी वजह से क्वांटम कंप्यूटर बड़ी कैलकुलेशन को बेहद आसानी से कर सकता है.
समुद्र के पानी से धातुओं का अवक्षेपण
समुद्र मंथन की यह नयी तकनीक वैश्विक स्तर पर कई बड़े बदलाव ला सकती है. समुद्री जल में कई प्रकार के धात्विक तत्व मिले होते हैं, जिन्हें बाहर हटाते हुए विभिन्न जरूरतों को पूरा किया जा सकता है. 
समुद्र के पानी से साधारण नमक को अवक्षेपित करने यानी हटाने की तकनीक बहुत पुरानी है. नयी तकनीकों के माध्यम से समुद्री जल से सोडियम, मैग्नीशियम, कैल्शियम और पोटैशियम को अवक्षेपित किया जा रहा है. 
इसका सबसे बड़ा उदाहरण जापान का है, जो समुद्री जल से यूरेनियम को अलग करने के लिए शोध कर रहा है. ऐसा होने पर ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में काफी मदद मिलेगी. एक रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब दुनिया का सबसे बड़ा डिसैलिनेशन प्लांट बनाने की तैयारी कर रहा है, जिसकी क्षमता प्रतिदिन 6,00,000 क्यूबिक मीटर पेयजल की होगी. 
साथ ही, यह देश रोजाना डिसैलिनेशन  (विलवणीकरण) की इस तकनीक से 3.3 मिलियन क्यूबिक मीटर पेयजल पैदा करता है. वर्ष 2030 तक वैश्विक स्तर पर 345 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी डिसैलिनेशन की तकनीक से हासिल की जा सकेगी. दुनिया के अन्य देशों में इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य हो रहे हैं. उम्मीद की जा रही है कि आने वाले समय में समुद्री पानी के डिसैलिनेशन की प्रक्रिया और सस्ती व सुगम हो जायेगी.
नैनो-वायर लिथियम ऑयन बैटरी
आधुनिक युग में विद्युत आवेश (इलेक्ट्रिक चाजर्) को संचित करने के लिए बैटरी ही सबसे सहज माध्यम है. घरेलू उपयोग से लेकर व्यावसायिक उपयोग में बैटरी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. 
लिथियम-ऑयन बैटरी का ऊर्जा घनत्व (एनर्जी पर वेट) अपेक्षाकृत अधिक होता है. ऐसी बैटरी का इस्तेमाल मोबाइल फोन, लैपटॉप और  इलेक्ट्रिक कार आदि में किया जाता है. बढ़ती ऊर्जा जरूरतों और विभिन्न प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के लिए यह बेहद पावरफुल तकनीक है. 
बैटरी में दो इलेक्ट्रोड होते हैं. कैथोड (पॉजिटिव टर्मिनल) और एनोड (निगेटिव टर्मिनल) के बीच इलेक्ट्रोलाइट होता है. इसी इलेक्ट्रोलाइट की वजह से दोनों इलेक्ट्रोड के बीच ऑयन घूमते हैं, जिससे करंट पैदा होता है. लिथियम ऑयन बैटरी में एनोड ग्रेफाइट से बना होता है, जो अपेक्षाकृत सस्ता और टिकाऊ होता है. वैज्ञानिकों ने  सिलिकॉन एनोड पर काम करना शुरू किया है. 
इस तकनीक से पावर स्टोरेज क्षमता में बढ़ोतरी होगी. फिलहाल, अभी सिलिकॉन एनोड्स में संरचनात्मक दिक्कतें आ रही हैं. नैनोवायर या नैनोपार्टिकल्स की तकनीक आने से कुछ उम्मीदें बढ़ी हैं.
पहली डेंगू वैक्सीन की उम्मीद जगी
दुनिया की तकरीबन आधी आबादी पर डेंगू का खतरा मंडराता रहता है. इस गंभीर बीमारी से निपटने के लिए अभी तक कोई ठोस हल नहीं निकाला जा सका है. डेंगू वैक्सीन के लिए वैज्ञानिक और दुनियाभर की कई संस्थाएं शोधरत हैं.
उम्मीद की जा रही है कि इस दिशा में आगामी दो-तीन वर्षो में एक कारगर वैक्सीन बनाने में कामयाबी मिल सकती है. डब्ल्यूएचओ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, डेंगू (मच्छरजनित बीमारी) से प्रतिवर्ष 10 करोड़ से ज्यादा लोग प्रभावित होते हैं. बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले दो वर्षो के दौरान पांच संस्थाओं के शोधकर्ताओं ने दो वर्ष से 14 वर्ष तक के 6000 बच्‍चों में वैक्सीन का परीक्षण किया. इन दो वर्षो में 56 फीसदी मामलों में डेंगू वायरस को रोकने में एक हद कामयाबी मिली है. 
लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड टॉपिकल मेडिसिन के प्रोफेसर मार्टिन हिब्बर्ड का मानना है कि इसमें मिली कामयाबी उत्साहजनक है, लेकिन वैक्सीन के 56 प्रतिशत प्रभावी होने से संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता है. हम अभी भी लक्ष्य से काफी दूर हैं. मालूम हो कि सनोफी पास्चर कंपनी पिछले 20 वर्षो से वैक्सीन रिसर्च की दिशा में कार्य कर रही है.
बहु-उपयोगी है थ्री-डी प्रिंटिंग
थ्री-डी प्रिंटिंग या एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग (योगात्मक उत्पादन) डिजिटल फाइल से तीन विमीय (थ्री-डी) किसी ठोस वस्तु के इमेज बनने की प्रक्रिया है. थ्री-डी प्रिंटेड वस्तु के निर्माण में योगात्मक प्रक्रिया (एडिटिव प्रॉसेस) अपनायी जाती है. 
इस प्रक्रिया के तहत किसी पदार्थ की क्रमागत परतों को एक के बाद एक व्यवस्थित किया जाता है. प्रत्येक परत को बेहद पतले क्षैतिज क्रॉस-सेक्शन के माध्यम से देखा जा सकता है.
थ्री-डी प्रिंटिंग की तकनीक : इसकी प्रक्रिया किसी वस्तु के आभासी चित्र बनाने से शुरू होती है. वचरुअल डिजाइन थ्री-डी मॉडलिंग की मदद से सीएडी (कंप्यूटर एडेड डिजाइन) फाइल में या थ्री-डी स्कैनर में तैयार की जाती है. यह स्कैनर वस्तु की थ्री-डी डिजिटल कॉपी तैयार करके थ्री-डी मॉडलिंग प्रोग्राम में रखता है. 
प्रिंटिंग की प्रक्रिया में सॉफ्टवेयर फाइनल मॉडल को सैकड़ों-हजारों क्षैतिज परतों में बांट देता है. थ्री-डी प्रिंटर प्रत्येक स्लाइस (टू-डाइमेंशनल) को पढ़ता है और सभी परतों को एक साथ प्रदर्शित करते हुए एक थ्री-डी इमेज को प्रिंट करता है. थ्री-डी प्रिंटिंग की कुछ अहम तकनीकों पर काम चल रहा है. 
इसमें सेलेक्टिव लेजर सिंटरिंग (एसएलएस) तकनीक में हाइ पावर के लेजर का इस्तेमाल किया जाता है. कुछ कंपनियों द्वारा एफडीएम टेक्नोलॉजी (फ्यूज्ड डिपोजिशन मॉडलिंग) में प्लास्टिक तंतुओं व धातुओं के तारों का इस्तेमाल किया जाता है. स्टीरियोलिथोग्राफी (एसएलए) में फोटोपॉलिमराइजेशन (फोटोबहुलीकरण) के सिद्धांत पर थ्री-डी प्रिंटिंग की जाती है.
बहुत उपयोगी है थ्री-डी प्रिंटिंग तकनीक : थ्री-डी प्रिंटिंग तकनीक का इस्तेमाल डिजाइन विजुलाइजेशन, प्रोटोटाइपिंग/ कंप्यूटर एडेड डिजाइन, धातुओं की ढलाई, कृषि, शिक्षा, हेल्थकेयर और एंटरटेनमेंट आदि में मुख्य रूप से किया जाता है.
और भी उम्मीदें : इस तकनीक से  कॉमर्शियल क्षेत्र में बड़ा बदलाव आयेगा. मैन्युफैक्चरिंग की दुनिया के लिए यह और भी अहम होगी.
मानव के सहजीवाणु से चिकित्सा
मानव शरीर को संघटीय तंत्र के बजाय पूरा पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में देखा जा सकता है. मानव शरीर में वृहद संख्या में सूक्ष्म जीवाणु होते हैं. इन्हीं माइक्रोबायोम ने हाल के वर्षो में चिकित्सा विज्ञान में एक अलग प्रकार के शोध के लिए वैज्ञानिकों को प्रेरित किया है. वर्ष 2012 में दुनिया की 80 बड़ी वैज्ञानिक संस्थाओं ने ह्यूमन माइक्रोबायोम पर रिसर्च किया और यह निष्कर्ष निकाला कि मानव पारितंत्र में 10,000 से ज्यादा माइक्रोबायल की प्रजातियां पायी जाती हैं. मानव के शरीर में इनकी करोड़ों कोशिकाएं होती हैं और शरीर के द्रव्यमान में इनकी एक से तीन प्रतिशत तक हिस्सेदारी होती है.
डीएनए सिक्वेंसिंग और बायोइंफोर्मेटिक्स जैसी तमाम तकनीकों के माध्यम से बीमारियों और स्वास्थ्य में इन माइक्रोब्स प्रजातियों पर अध्ययन किया जा रहा है. इंसान के स्वस्थ्य जीवन में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है. 
इसे इस बात से समझा जा सकता है कि आंतों में मौजूद सूक्ष्म जीवाणु पाचन क्रिया में अहम भूमिका निभाते हैं. दूसरी ओर, शरीर में व्याप्त रोगाणु खतरनाक भी साबित हो सकते हैं और कई बार तो वे बीमारी व मौत का कारण भी बनते हैं. फिलहाल, कई रिसर्च संस्थान बीमारियों में माइक्रोबायोम की भूमिका पर शोध कर रहे हैं. 
इससे संक्रमण, मोटापा, मधुमेह और आंत से संबंधित बीमारियों से जुड़े कई निष्कर्ष निकलने की संभवानाएं जतायी जा रही हैं. ह्यूमन माइक्रोबायोम टेक्नोलॉजी से गंभीर बीमारियों के इलाज में कई रास्ते निकलने और आम स्वास्थ्य सेवाओं में अच्छे परिणाम की बहुत उम्मीदें हैं.
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