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गुरुवार, 22 अगस्त 2013

कभी शिव तो कभी कृष्ण बनकर सेक्स करता था यह बाबा

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कभी शिव तो कभी कृष्ण बनकर सेक्स करता था यह बाबा
अपने आप को भगवान का करीबी बताने वाले आसाराम बापू पर एक नाबालिग लड़की को बंधक बना बलात्कार करने का आरोप लगा है। उत्तर प्रदेश की एक नाबालिग लड़की ने आसाराम पर जोधपुर में अनुष्ठान के बहाने दुष्कर्म करने का मामला दिल्ली में दर्ज कराया है। आसाराम अक्सर विवादों में रहते हैं।
 
 
 
आसाराम ऐसे अकेले संत नहीं हैं जिनपर इस तरह का सनसनीखेज आरोप लगे हैं। ऐसे कई संत हैं जो विवादों में रह चुके हैं| आइये आपको बताते हैं एक ऐसे संत के बारे में जिसे सेक्स स्कैंडल में सामने आने के बाद ही दुनिया उसे पहचाने लगी। इतना ही नहीं इस बाबा को तो स्कैंडल स्वामी तक कहा जाता है।
 कभी शिव तो कभी कृष्ण बनकर सेक्स करता था यह बाबा
स्कैंडल स्वामी कहे जाने इस बाबा का नाम है नित्यानंद स्वामी। नित्यानंद सबसे पहले तब चर्चा में आए जब 2010 में दक्षिण की एक चर्चित अभिनेत्री के साथ उनका आपत्तिजनक वीडियो एक निजी चैनल ने टेलिकास्ट किया गया। इस मामले में कर्नाटक पुलिस ने उनके खिलाफ केस भी दर्ज किया। 
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पुलिस से पीछा छुड़ाकर यहां से वहां भागने वाले स्वामी नित्यानंद को  बैंगलुरु पुलिस ने हिमाचल प्रदेश से गिरफ्तार कर उन्हें जेल भेज दिया। 52 दिन जेल में बिताने के बाद नित्यानंद बेल मिलने के बाद जेल से बाहर आए।
 कर्नाटक पुलिस की सीआईडी द्वारा तैयार की गई चार्जशीट में नित्यानंद की ज़िंदगी के कई पहलू सामने आए। 430 पेज की चार्जशीट में नित्यानंद ने एक महिला भक्त को यह कहते हुए सेक्स के लिए राजी किया था कि वह शिव है और महिला पार्वती। नित्यानंद ने महिला को राजी करते हुए यह भी कहा था कि वे एक दैवीय कार्य कर रहे हैं और इसमें कुछ भी अनैतिक नहीं है। चार्जशीट में महिला का बयान भी दर्ज है जिसमें कहा गया है कि स्वयंभू स्वामी नित्यानंद ने मोक्ष पाने का लालच देकर उनसे शारीरिक संबंध बनाए।


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अभी सेक्स स्कैंडल से स्वामी नित्यानंद का पीछा छूटा भी नहीं था कि एक एनआरआई महिला ने स्वामी पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगा दिए। इस शादीशुदा महिला के अनुसार बाबा ने उसे पर्सनल कामों के लिए चुना, फिर सेक्शुअल एब्यूज किया। 

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बाबा ने अपने कुकर्म को सही ठहराने के लिए श्रीकृष्ण और राधा के प्रेम का उदाहरण दिया। बाबा ने कहा कि तुम लकी हो जो बाबा के पर्सनल काम के लिए चुनी गई हो। महिला का दावा है कि नित्यानंद ने 6 साल तक उसका यौन शोषण किया। 
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नित्यानंद की लीलाएं लगातार जारी थी। नया मामला किसी महिला के यौन शोषण का न होकर पुरुष से जुड़ा था। इस बार बाबा के एक पुरुष अनुयायी ने उन पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया और बाबा पर इस संबंध में भी मामला दर्ज कर लिया गया।  

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इसी दौरान स्वामी नित्यानंद पर एक अजीबो गरीब आरोप लगा, जिसके मुताबिक नित्यानंद पवित्र जल में नशे की दवाएं मिलाकर भक्तों को देते थे। नित्यानंद पर अधीनम मठ के गलत इस्तेमाल के भी आरोप लगे।
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स्वामी नित्यानंद पर एक और सनसनीखेज आरोप उन्हीं के भक्त ने लगाया जिसके मुताबिक नित्यानंद के आश्रम में बाघ की खाल और हाथी के दांतों का इस्तेमाल किया जाता है। इस आरोप के बाद नित्यानंद पर वन्य जीवन संरक्षण कानून के तहत आरोप दर्ज कर लिया गया।

स्वामी के सेक्स स्कैंडल के बाद अगर उनकी किसी हरकत की चर्चा सबसे ज्यादा होती है तो वो है 2011 में गुरु पूर्णिमा के मौके पर उनकी अनोखी हरकत की। इस दौरान नित्यानंद ने भक्तों को अपने इशारे पर हवा में उछालने का दावा किया। हैरानी की बात यह है कि इन लोगों में दक्षिण की वो अभिनेत्री भी शामिल थीं जिसके साथ स्वामी को स्कैंडल स्वामी बनाया था।


2013 में स्कैंडल स्वामी महाकुंभ पहुंचे और यहां भी विवादों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। महानिर्वाणी अखाड़े ने उन्हे महमंडलेश्वर बनाया और बाकियों ने उनका विरोध शुरु कर दिया और बसंत पंचमी के दिन उनका शाही स्नान सवालों के घेरे में आ गया।

आखिरकार नित्यानंद स्वामी ने खुद को शाही स्नान से दूर ही रखा और वो महानिर्वाणी अखाड़े के शाही स्नान और जुलूस में नजर नहीं आए । sabhae : bhaskar.com






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भारत की डूबती अर्थव्यवस्था के सामने हैं दस बड़े खतरे

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भारत की डूबती अर्थव्यवस्था के सामने हैं दस बड़े खतरे

नई दिल्ली. भारत के प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री भले ही अर्थशास्त्री हों लेकिन वे भी इन दिनों अर्थव्‍यवस्‍था की हालत ठीक करने का उपाय नहीं खोज पा रहे हैं। डॉलर के मुकाबले रुपया नीचे गिरने का नोज नया रिकॉर्ड बना रहा है। गुरुवार को एक डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की कीमत 65 तक पहुंच गई। हाल के महीनों में डालर के मुकाबले रुपए में सबसे अधिक गिरावट देखी जा रही है। पिछले दो माह के दौरान ही डालर की तुलना में रुपया करीब 15 प्रतिशत से ज्यादा गिर चुका है। इसके बावजूद ऐसी कोई तस्वीर सामने नहीं आ रही कि रुपए का गिरना कहां जाकर रुकेगा। जानकार तो यहां तक कह रहे हैं कि डालर-रुपया की विनिमय दर 70 रुपए का स्तर भी छू ले तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। 
 
रुपए की गिरावट से अर्थव्यवस्था पर पड़ रहे प्रभाव से पीएम, वित्त मंत्री, वित्त मंत्रालय के आला अधिकारी से लेकर रिजर्व बैंक के गवर्नर सभी उलझन में हैं। इसके बावजूद उन्हें राह नहीं सूढ रही है कि रुपए को कैसे मजबूती दी जाए। सरकार की ओर से बार-बार कहा जा रहा है कि अर्थव्यवस्था पहले की तरह मजबूत है और 1980 या 1990 के हालात पैदा होने का खतरा नहीं है। रुपए में गिरावट भले ही अस्थायी दौर हो लेकिन अर्थव्यवस्था की जो हालत है उसे लेकर सरकार के उपाय और आश्वासन घरेलू और बाहरी निवेशकों में विश्वास पैदा करने में नाकाम साबित हो रहे हैं। आइए आपको बताते हैं भारतीय अर्थव्यवस्था पर इस समय कौन से दस बड़े खतरे मंडरा रहे हैं। 
भारत की डूबती अर्थव्यवस्था के सामने हैं दस बड़े खतरे

राजकोषीय घाटा बढ़ा
 
सरकार की कुल आय और व्यय में अंतर को ही राजकोषीय घाटा कहा जाता है। इससे पता चलता है कि सरकार को कामकाज चलाने के लिए कितनी उधारी की जरूरत पड़ेगी। कुल राजस्व का हिसाब-किताब लगाने में उधारी को शामिल नहीं किया जाता है। राजकोषीय घाटा आमतौर पर राजस्व में कमी या पूंजीगत व्यय में काफी बढ़ोत्तरी से होता है। राजकोषीय घाटे की भरपाई आमतौर पर केंद्रीय बैंक ( भारत में रिजर्व बैंक) से उधार लेकर की जाती है या इसके लिए छोटी और लंबी अवधि के बॉन्ड के जरिए पूंजी बाजार से फंड जुटाया जाता है। विदेशी मुद्रा भंडार घटकर महज इतना रह गया है कि वह सात महीने का ही काम चला सकता है जबकि 2007-08 में यह मुद्रा भंडार डेढ़ साल की आयात जरूरत पूरी करने के लिए काफी था।
 
भारत का राजकोषीय घाटा 2007-2008 में 3.5 फीसदी था जो बढ़कर 2011-12 में 5.8 फीसदी हो गया था। एक आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक, केन्द्र सरकार पर कुल कर्ज 44.69 करोड़ रूपए है जो जीडीपी का 50 फीसदी के करीब है। केंद्र का लक्ष्य सरकारी घाटे को इस वित्तीय वर्ष में 4.8 फीसद तक करना है लेकिन ऐसा होने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं। केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 2.63 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया था जो 2013-14 के बजट अनुमान का 48.4 फीसदी है। वर्ष 2012-13 की अप्रैल-जून तिमाही में राजकोषीय घाटा बजट अनुमान का 37.1 प्रतिशत था। 
 
रिजर्व बैंक के गवर्नर डी सुब्बाराव ने हबाल ही में वित्त वर्ष 2013-14 की ऋण एवं मौद्रिक नीति की घोषणा करते हुए कहा था कि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बढता चालू खाता घाटा सबसे बड़ा और पहला खतरा बन रहा है। यह ऐतिहासिक रूप से उच्चतम पर बना हुआ है। आरबीआई के अनुसार चालू खाता घाटा जीडीपी का 2.5 प्रतिशत होना चाहिए जो कि अनुमानित 5.2 प्रतिशत पर बना हुआ हुआ है। इससे पूंजी के आंतरिक स्रोतों पर दबाव पड़ता है और बाजार तरलता के संकट की ओर बढ़ता है। आने वाले समय में भी सरकार के घाटे से उबरने के आसार नहीं नजर आ रहे हैं। आइए जानते हैं कि इसकी क्या वजहें है-

भारत की डूबती अर्थव्यवस्था के सामने हैं दस बड़े खतरे

खाद्य सुरक्षा विधेयक से बढ़ेगा खजाने पर बोझ
 
केंद्र सरकार के खाद्य सुरक्षा विधेयक को लागू करने के फैसले से सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ेगा। बड़ी आबादी को सस्ती दरों पर अनाज उपलब्ध कराने के लिए सरकार को पहले महंगे दामों पर अनाज खरीदना होगा और फिर इसके बाद इसे सब्सिडाइज रेट पर बेचा जाएगा। डीबीएस बैंक ने अनुमान जाहिर किया था कि इस विधेयक के लागू होने के बाद चालू वित्त वर्ष में सरकार का राजकोषीय घाटा 4.8 प्रतिशत के अनुमानित लक्ष्य से आधा प्रतिशत और आगे बढ़ सकता है। इससे डंवाडोल चल रही भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए और समस्याएं खड़ी हो सकती हैं। 
 
सिंगापुर स्थित इस ब्रोकरेज फर्म ने एक रिपोर्ट में कहा था, ‘इस साल राजकोषीय घाटा तय लक्ष्य से कम से कम आधा प्रतिशत ऊपर जा सकता है।’ रिपोर्ट में कहा गया है कि सब्सिडी बिल बढ़कर जीडीपी के 2.3 प्रतिशत तक पहुंच सकता है जो 1.9 प्रतिशत के लक्ष्य से काफी ऊपर है। सब्सिडी बिल में बढ़ोतरी की मुख्य वजह व्यापक स्तर पर खाद्य सब्सिडी होगी। राजकोषीय मोर्चे पर रुपये में गिरावट और बाद में कच्चे तेल में तेजी, आग में घी डालने जैसा काम करेगी। मंत्रिमंडल ने खाद्य सुरक्षा विधेयक को लागू करने के लिए अध्यादेश लाने का निर्णय किया है। खाद्य सुरक्षा विधेयक के जरिए देश की दो तिहाई आबादी को 1 से 3 रुपये प्रति किलो की दर पर हर महीने 5 किलो खाद्यान्न का कानूनी अधिकार मिल जाएगा। इसके अलावा जानिए, अगले साल होने वाले चुनाव क्या असर डालेंगे अर्थव्यवस्था पर- अगले साल होंगे चुनाव और पड़ेगा खजाने पर बोझ 
 
2014 में होने वाले लोकसभा चुनावों से भी सरकारी खजाने पर कमरतोड़ बोझ पड़ेगा। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक अगले साल मार्च से पहले ही चुनावों की घोषणा हगो सकती है। ऐसे में अर्थव्यवस्था के तब तक वांछित लक्ष्य पाने की उम्मीद कम है। अर्थव्यवस्था तब तक बढ़ते राजकोषीय घाटे की भरपाई भी कर लेगी तो आने वाले समय में इन चुनावों से सरकारी खजाने पर बड़ा बोझ पड़ेगा। चुनावों के पास आने से पहले सरकार ने लोकलुभावनी नीतियों के तहत ही खाद्य सुरक्षा विधेयक लागू किया है। इसके अलावा आने वाले महीनों में सरकार की ओर से कुछ और ऐसी घोषणाएं हो सकती हैं जो चुनावों के मद्देनजर की जाएं। लेकिन इसका बुरा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा और राजकोषीय घाटा आने वाले समय में और बढ़ता दिखाई दे सकता है। 
 
अगले साल फरवरी में अंतरिम बजट पेश किया जाना है। नियमों के तहत आम चुनाव से पहले सरकार महज लेखानुदान बजट पेश कर सकती है। निवेशकों को यह इंतजार थोड़ा लंबा लग सकता है और मुमकिन है कि वे निवेश के लिए कहीं और बेहतर बाजार तलाशने में जुट जाएं। खतरा सिर्फ निवेशकों का ही नहीं बल्कि और भी बड़ा है। जैसे-जैसे अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें पढ़ेंगी वैसे ही सरकार का घाटा बढ़ेगा, जानिए कैसे-



 तेल महंगा होने से बढ़ेगा सरकारी घाटा
 
रुपए की कीमत अंतर्राष्ट्रीय बाजार में गिरने से कच्चा तेल बढ़ी हुई कीमतों में मिल रहा है। कमजोर रुपये की सबसे ज्यादा मार पेट्रेालियम पदार्थों पर ही पड़ रही है। देश में पेट्रोलियम पदार्थो की जितनी खपत है, उसका 80 फीसदी भारत को आयात करना पड़ता है। पेट्रोलियम मंत्रालय के एक अधिकारी के मुताबिक डालर के मुकाबले रुपए के कमजोर होने से इस क्षेत्र की कंपनियों पर एक साल में 8200 करोड़ रुपए का अधिभार बढ़ जाता है। इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (आईओसी) के निदेशक (वित्त) पी.के. गोयल ने बताया कि कमजोर रुपए से इस वर्ष अप्रैल से जून तक 840 करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है। अब नुकसान और होगा क्योंकि रुपया 64 के पार जा चुका है। लेकिन महंगी कीमतों में मिले कच्चे माल के बावजूद पेट्रोल को छोड़ कर अन्य पेट्रोलियम उत्पादों को तेल कंपनियां सरकार द्वारा तय कीमतों पर ही बेच सकती हैं। हालांकि इस प्रक्रिया में घाटे की भरपाई सरकार करती है लेकिन सब्सिडी कब मिलेगी, इसका कोई पता नहीं होता। 
 
वैसे भी चुनाव पास आने की वजह से सरकार की ओर से तेल कंपनियों पर दाम न बढ़ाने या न्यूनतम बढ़ाने का दबाव होगा। ऐसे में खरीद और बिक्री रेट में होने वाले अंतर को भी सरकार को ही भरना होगा। इससे आने वाले समय में सरकार की जेब पर और बोझ पड़ सकता है और यह अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदायक होगा। आगे पढ़ें, वैश्विक अर्थव्यवस्था में संकट से आई तरलता में कमी

वैश्विक अर्थव्यवस्था में संकट से तरलता में कमी
 
वैश्विक अर्थव्यवस्था की पतली हालत के कारण देश में विदेशी पूंजी का प्रवाह भी मंद है। इससे अर्थव्यवस्था में तरलता का संकट भी बन रहा है। इसे दूर करने के लिए निवेश का माहौल बनाने की जरूरत है। इसके साथ ही घटता निवेश भी अर्थव्यवस्था के लिए जोखिम है। आरबीआई गर्वनर डी सुब्बाराव ने कहा है कि विकास दर को पटरी पर लाना निवेश के बिना संभव नहीं है। लेकिन देश में निवेश का माहौल बिगड़ रहा है। बीते समय में कारोबारी भरोसा डगमगाया है। व्यापार में सुस्ती से निवेश की धारणा भी कमजोर बनी हुई है। ऋणदाता और कर्ज लेने वाले दोनों ही जोखिम उठाने की स्थिति में नहीं हैं। आरबीआई ने सरकार से निवेश के अनुकूल बनाने का अनुरोध किया है। रिजर्व बैंक ने उच्च मुद्रास्फीति को भी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए जोखिम वाला तत्व बताया है और कहा कि आपूर्ति बढ़ाकर इस पर काबू पाने का प्रयास करना चाहिए। आरबीआई ने मौद्रिक उपायों के माध्यम से मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने की कोशिश की है, लेकिन खाद्य वस्तुओं की कीमतों का दबाव दिख रहा है। न्यूनतम समर्थन मूल्यों में बढ़ोतरी, वेतन में लगातार वृद्धि से मुद्रा स्फीति के और बढ़ने का खतरा है। आगे जानें, भारत के सामने हैं 1991 के दौर से से ज्यादा खतरनाक हालात
भारत की डूबती अर्थव्यवस्था के सामने हैं दस बड़े खतरे

1991 के दौर से से ज्यादा खतरनाक हैं हालात
 
1991 का समय भारतीय अर्थव्यवस्था में आमूल-चूल बदलाव के तौर पर याद किया जाता है। देश के सामने मुंह बाए खड़े संकट से निपटने के लिए सरकार ने तब निवेश, विदेश पूंजी, औद्योगीकरण के लिए अर्थव्यवस्था के दरवाजे खोल दिए थे। लेकिन इस समय संकट पहले से काफी बड़ा है। आईएमएफ ने भी चेतावनी दी है कि भारत और चीन में 2008 के बाद ग्रोथ में आने वाली गिरावट भविष्य के खतरे का संकेत है। आईएमएफ ने ग्रोथ में आई इस गिरावट को तकनीकी विकास के धीमे होने से जोड़ा है। इसके मुताबिक भारत लगभग उसी जाल में फस रहा है (मध्यम आय जाल), जिसमें पहले लैटिन अमेरिकी देश और बाद में दक्षिण-पूर्व एशियाई देश फंसे थे। 1997-98 में दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों पर आया आर्थिक संकट मुख्त तौर पर विदेशी भुगतान संकट था। जिसके चलते इन देशों को अपनी मुद्रा का अवमूल्यन करना पड़ा था। जायदाद की कीमतें घटने के कारण बैंकों इत्यादि पर संकट तो आया ही, रोजगार के अवसर भारी मात्रा में कम हुए। इसका असर भारत पर पड़ सकता था, लेकिन भारत इससे लगभग अछूता रहा और उसके बाद इसकी ग्रोथ रेट भी पहले से ज्यादा बढ़ गई। 1998 के बाद 2011-12 तक भारत में औसत ग्रोथ रेट 7 प्रतिशत को भी पार कर गई थी। 
 
तब भारत इसलिए बच पाया, क्योंकि रुपया पूंजी खाते पर परिवर्तनीय नहीं था। हालांकि, तत्कालीन सरकार रुपए को पूर्णतया परिवर्तनीय बनाने की कोशिश में थी। लेकिन इस आर्थिक संकट के चलते और विभिन्न एजेंसियों की चेतावनी के कारण सरकार को इसे टालना पड़ा था। वहीं दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों से विदेशी मुद्रा का इसलिए भारी रूप से वापस लौटी क्योंकि उनकी करेंसियां पूर्णतया परिवर्तनशील थीं। भारत में रुपया पूर्णतया परिवर्तनशील नहीं था और अभी भी काफी हद तक नियंत्रण में है। भारत के बचने का दूसरा कारण विदेशी विनिमय दर पर रिर्जव बैंक का काफी नियंत्रण था। तीसरे, हमारी अर्थव्यवस्था निर्यात आधारित नहीं थी और देश में घरेलू मांग में वृद्घि के फलस्वरूप हमारे उद्योगों की ग्रोथ तेज थी। एक कारण विदेशी ऋण-जीडीपी अनुमात बहुत कम होना भी था। उस समय भारत पर विदेशी ऋण 100 अरब डालर के आसपास ही था। 2008 में अमेरिकी संकट से भी भारत काफी हद तक बचा रहा, जिसका मूल कारण यह था कि देश शेष दुनिया पर बहुत ज्यादा निर्भर नहीं था। आज देश में विदेशी मुद्रा भंडार, जो कभी तीन साल के आयातों के लिए काफी थे, अब घटकर मात्र 6 महीनों के आयात के लिए ही है। इसलिए संकट पहले से ज्यादा है। आगे पढ़ें, प्रशिक्षित कामगारों की कमी पड़ रही भारी 
 प्रशिक्षित कामगारों की कमी 
 
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए प्रशिक्षित कामगारों की कमी सबसे बड़ा खतरा बनकर उभर रही है। योजना आयोग के एक अनुमान के अनुसार हर साल कामगारों की श्रेणी में शामिल होने वाले 1.28 करोड़ लोगों में से केवल 20 फीसदी को ही औपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त होता है। योजना आयोग का कहना है कि जिस अर्थव्यवस्था में विकास की दर नौ प्रतिशत से भी ऊपर रही हो वहां मजदूरों को प्रशिक्षत करना सबसे बड़ी चुनौती है। योजना आयोग के मुताबिक प्रशिक्षित कामगारों की ताकत भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए संभावनाओं के नए दरवाजे खोल सकती है तो इसकी कमी भारी पड़ सकती है। योजना आयोग का अनुमान है कि पूरी दुनिया में 2020 तक चार करोड़ 60 लाख प्रशिक्षित कामगारों की जरूरत होगी। कोशिश करे तो भारत के पास भी 4.7 करोड़ प्रशिक्षित कामगार तैयार हो सकते हैं। 
 
भारतीय उद्योग संघ (सीआईआई) के कौशल विकास निदेशक हरमीत सेठी के मुताबिक भारत के पास 2022 तक 50 करोड़ प्रशिक्षित टेक्निशियन तैयार हो सकते हैं। यह लक्ष्य बड़ा तो है पर असंभव नहीं है। इसके लिए असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की कौशल क्षमता बढ़ाने के लिए दीर्घकालिक प्रयत्न करने होंगे। प्रशिक्षत कामगारों से अर्थव्यवस्था को ऐसे फायदा होता है कि इससे न केवल उत्पादन क्षमता बढ़ती है बल्कि उनकी आमदनी भी बढ़ती है। प्रशिक्षित कामगार विदेशों में भी जा सकते हैं, जिससे भारत को विदेशी मुद्रा प्राप्त होगी। प्रशिक्षत कामगार चाहे तो खुद का कारोबार स्थापित कर सकता है। इन सबसे बाजार में पूंजी की तरलता बनी रहती है। इसके अलावा आरतीय अर्थव्यवस्था 2008 की मंदी के बाद से युवाओं की बढञती फौज के लिए रोजगार पैदा करने में नाकाम रही है। यह भी निराशा का माहौल बना रहा है। आगे पढ़ें, काले धन से हो रहा अर्थव्यवस्था को नुकसान

काले धन से अर्थव्यवस्था को नुकसान
 
काले धन से भारतीय अर्थव्यवस्था को जो नुकसान पहुंचा है उसका सही अनुमान लगाना तो मुश्किल है क्योंकि काले धन की सही-सही मात्रा का पता नहीं लगाया जा सकता है। काले धन के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था को पिछले एक दशक में करीब 123 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है। अकेले वर्ष 2010 में 1.6 अरब डॉलर की अवैध राशि देश से बाहर गई है। यह खुलासा वाशिंगटन स्थित शोध संगठन ‘ग्लोबल फाइनेंशियल इंटेग्रिटी’ (जीएफआई) की रिपोर्ट से हुआ है। रिपोर्ट में भारत को आठवां सबसे बड़ा ऐसा देश बताया गया है, जहां से सबसे अधिक अवैध पूंजी बाहर गई है। इस मामले में भारत का स्थान चीन, मेक्सिको, मलेशिया, सऊदी अरब, रूस, फिलीपीन्स तथा नाइजीरिया के बाद आता है।
 
हाल ही में कोबरा पोस्ट ने खुलासा किया था कि कुछ बड़े निजी बैंक काला धन नकद लेते हैं और उसे बीमा और सोने में निवेश करते हैं। ये बैंक काले धन को अपनी निवेश योजनाओं में डालते हैं। इसके लिए वे रिजर्व बैंक की शर्तो का उल्लंघन करते हुए बिना पैन कार्ड के ही खाता खोला जाता है। इस हवाला कारोबार में बैंक काला धन देने वाले ग्राहकों की पहचान गुप्त रखते हैं और जरूरत के हिसाब उनके अकाउंट खोले और बंद किए जाते हैं। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि बैंक ग्राहकों को अवैध नगदी रखने के लिए लॉकर देता है, जिसमें करोड़ों रुपये कैश रखे जाते हैं। इसके साथ ही बताया गया है कि काले धन को विदेश भेजने में भी बैंक मदद करता है। बैंकों के मैनेजमेंट जानबूझ कर सुनियोजित तरीके से इनकम टैक्स ऐक्ट, फेमा, रिजर्व बैक के मानदंडों, केवाईसी के नियमों, बैंकिंग ऐक्ट, प्रिवेंशन ऑफ मनी लाउन्ड्रिंग ऐक्ट (पीएमएलए) की धज्जियां उड़ा रहे हैं। लेकिन केंद्र सरकार कावेधन को लेकर गंभीर नजर नहीं आ रही है। आगे पढ़ें, बेकार की चीजों में बढ़ा निवेश 
बेकार की चीजों में बढ़ा निवेश 
 
भारतीयों का सोने से प्रेम जगजाहिर है। हर साल दुनिया में तराशे जाने वाले सोने का बड़ा हिस्सा भारत में आकर जमा हो जाता है। लेकिन इसका एक बड़ा नुकसान यह होता है कि बड़ी पूंजी बेकार पड़ी रहती है और बाजार की कोई मदद नहीं करती है। हाल ही में एक प्रेस कांफ्रेंस में अर्थशास्त्री पीएम मनमोहन सिंह ने भारत के फिर से 1991 जैसे संकट में घिरने के सवाल को तो नकार दिया लेकिन उन्होंने कहा कि भारतीयों का निवेश ऐसी चीजों में बढ़ रहा है जो तरलता बढ़ाने में मददगार नहीं हो रही हैं। 1991 के संकट के समय भारत को सोना गिरवी रखना पड़ा था और पहली बार व्यापक स्तर पर आर्थिक सुधार लागू करने पड़े थे। मनमोहन सिंह ने माना है कि आयात घाटे की बड़ी वजह सोने का ज्यादा आयात है। उन्होंने कहा, “लगता है कि हम काफी निवेश व्यर्थ की संपत्तियों में कर रहे हैं।” आगे पढ़ें, निवेशकों को नहीं मिल पा रही प्रेरणा

 
गहरे संकट में फंसे रुपए को मजबूती दो तरह से मिल सकती है। एक तो भारतीय निर्यात को बढ़ाया जाए और विदेशी निवेशक भी देश की प्रगति के हिस्सेदार बनें। लेकिन मौजूदा समय में दोनों ही मोर्चों पर कुछ खास नहीं हो रहा है। रुपए की कमजोरी को थामने के लिए रिजर्व बैंक के उपायों से देश का उद्योग जगत भी खासा नाराज है। उद्योग प्रमुखों का कहना है कि रिजर्व बैंक ने विदेश में निवेश के लिए जो पूंजी सीमाएं लगाई हैं, उससे देश 80 के दशक की तरफ लौट सकता है। तब भारतीय कंपनियों का विदेशों में निवेश शून्य था। आर्थिक जानकारों का कहना है कि हाल में देखा जाए तो सरकार ने घरेलू अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में खास प्रयास नहीं किए हैं। जब तक घरेलू अर्थव्यवस्था को फिर से मजबूती नहीं मिलेगी वर्तमान माहौल से निजात पाना मुश्किल है। देश में विदेशी निवेश को फिर से आकर्षित करना है तो पहले घरेलू अर्थव्यवस्था को मजबूत करना होगा, जो फिलहाल पिछले एक दशक के निचले स्तर पर है। विदेशी निवेश का प्रवाह बढ़ाने में तभी सफलता मिलेगी जब घरेलू अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। विदेशी निवेश का जुड़ाव मूल तौर पर अर्थव्यवस्था की मजबूती से है। इसलिए जरुरी है कि सरकार जब तक अर्थव्यवस्था को कुछ साल पहले की स्थिति में लाने की दिशा में कदम उठाए।  sabhae : bhaskar.com
 



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पार्टनर पर रख सकते हैं ऐसे नजर, शक्की लोगों के लिए मजेदार खबर

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अमेरिका और चीन जैसे देशों की जासूसी करना एक हद तक आसान है। किसी भी देश की खुफिया एजेंसी इस काम के लिए काफी तत्पर रहती है। लेकिन अगर बात अपने ब्वॉयफ्रेंड की जासूसी की हो तो मामला उलटा पड़ जाता है। आसानी से झूठ बोलने वाले लोगों को पकड़ पाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन हो जाता है। 
जरा सोचिए, अगर आपका ब्वॉयफ्रेंड कहे कि वो जिम में है और असलियत कुछ और ही हो तो कितना बुरा लगेगा। अब ऐसे ही झूठे लोगों का पता लगाने के लिए एक सीक्रेट ऐप आ गया है। इस ऐप का नाम है 'ब्वॉयफ्रेंड ट्रैकर'। यह ऐप गूगल प्ले पर उपलब्ध है।
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इस नए ऐप की मदद से आप अपने ब्वॉयफ्रेंड या गर्लफ्रेंड का पता आसानी से लगा सकते हैं। अगर अपने साथी पर शक है तो इस ऐप को डाउनलोड करना शायद आपके लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।
यह ऐप स्मार्टफोन के GPS ट्रैकिंग सिस्टम का इस्तेमाल करता है। इस ऐप को डाउनलोड करने के बाद जिस भी इंसान का पता लगाना हो, उसका फोन नंबर इसमें एंटर करना होता है।गूगल प्ले पर यह ऐप कुछ समय के लिए फ्री में उपलब्ध है। इसके बाद इसे फिर से अपग्रेड करना होगा। यह ऐप एंड्रॉइड 2.1 और उसके बाद के ऑपरेटिंग सिस्टम पर काम करता है।इस ऐप में सिर्फ ट्रैकिंग की ही नहीं, बल्कि कई और तरह के गेम्स भी मिलते हैं। इस ऐप में लव क्विज भी है, जिसके जरिए आपसे कई तरह के सवाल पूछे जाएंगे और इसके बाद रिजल्ट बताया जाएगा।

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इसके अलावा, नेम एनेलाइजर और चीट मीटर जैसे कुछ सर्विसेस और हैं, जो इसे एक धांसू ऐप बनाती हैं। इस ऐप का साइज 214 किलोबाइट है। इसे अब तक 50000 लोग डाउनलोड कर चुके हैं। ब्राजील में इस ऐप की वजह से काफी बवाल भी मचा है। ब्राजील के कई लोगों का कहना है कि इस ऐप की वजह से उनकी प्राइवेसी को काफी नुकसान पहुंचा है। इतना ही नहीं, ट्रेंड में आते ही हजारों ब्राजीली लोगों ने इसे डाउनलोड भी कर लिया था।  sabhar : bhaskar.com





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डेल इंडिया में जाएगी1000 लोगों की नौकरी

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अनुमेहा चतुर्वेदी
नई दिल्ली।। अमेरिकी एमएनसी डेल के करीब 1000 कर्मचारियों की जॉब जा सकती है। सूत्रों का कहना है कि कंपनी अगले 6 महीनों में अपने इंटरनैशनल सर्विसेज बिजनस में राइटसाइजिंग कर सकती है। सूत्रों का कहना है कि कंपनी के मोहाली स्थित अपने इंटरनैशनल सर्विसेज ऑपरेशंस को बंद किया जा सकता है। यहां करीब 1300 लोग काम करते हैं। हालांकि कंपनी ने इन खबरों को कयास बताते हुए इन पर किसी टिप्पणी से इनकार कर दिया है।

सूत्रों का यह भी कहना है कि डेल के कुछ सीनियर स्टाफ की भी छुट्टी हो सकती है। कहा जा रहा है कि डेल में कार्यकारी डायरेक्टर आदिल कात्रक और डेल इंटरनैशनल सर्विसेज में डायरेक्टर (ट्रेनिंग) विख्यात सिंह को जाने के लिए कह दिया गया है।

मोहाली में कंपनी का इंटरनैशनल सर्विसेज ऑफिस 2005 में शुरू किया गया था। यह अमेरिका में कंज्यूजर टेक सपोर्ट और कस्टमर केयर की सर्विसेज देता है। फिलहाल डेल के भारत में करीब 10 हजार कर्मचारी हैं और मोहाली के अलावा गुड़गांव, हैदराबाद और बेंगलुरू में उसके दफ्तर हैं। सूत्रों के मुताबिक, यह डेल में ग्लोबल राइटसाइजिंग प्रक्रिया का हिस्सा है। डेल में फिलहाल इसके फाउंडर व सीईओ माइकल डेल और इंवेस्टर कार्ल इकान के बीच टेकओवर की लड़ाई चल रही है। इस वजह कंपनी अच्छी हालत में नहीं है और उसकी सेल्स में भारी कमी आई है। sabhar : http://navbharattimes.indiatimes.com

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नोकियाः लूमिया 925, लूमिया 625 लॉन्च

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नई दिल्ली। नोकिया स्मॉर्टफोन मार्केट में अपनी पकड़ मजबूत करने की लगातार कोशिश कर रही है। इसी मद्देनजर उसने लूमिया 925 और 625 हैंडसेट लॉन्च किए। लूमिया 925 की कीमत 33,500 रुपये रखी गई है, जबकि लूमिया 625 20,000 रुपये में मिलेगा।
लूमिया 925 और लूमिया 625 में लोगों को 1.5 लाख से भी ज्यादा ऐप्स मिलेंगे। कैमरे के हिसाब से लूमिया 925 शानदार फोन है। इससे आप एक साथ 10 फोटोग्राफ्स खींच सकते हैं और ये मोबाइल फोन खुद ब खुद एक्शन शॉट और मोशन फोकस की मदद से फोटोग्राफ्स को एडिट भी कर सकता है।
अपनी लूमिया रेंज को ज्यादा पॉपुलर बनाने के लिए नोकिया लूमिया 625 और 925 के साथ 16,000 रुपये का ऑउट ऑफ द बॉक्स एंटरटेनमेंट पैकेज बिल्कुल फ्री दे रहा है। नोकिया लूमिया 625 पर आपको ईएमआई का भी ऑप्शन मिल जाएगा।

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बुधवार, 21 अगस्त 2013

शोधकर्ताओं ने ऐसा माइंड रीडिंग कम्‍प्‍यूटर बनाया है जो कोमा में जा चुके शख्‍स के दिमाग को पढ़ ता है

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जल्‍द ही मंदिर-मस्जिद के नाम पर खून बहाने वालों का इलाज कर सकेंगे डॉक्‍टर!

कनाडा के कुछ उससे संवाद कर सकशोधकर्ताओं ने ऐसा माइंड रीडिंग कम्‍प्‍यूटर बनाया है जो कोमा में जा चुके शख्‍स के दिमाग को पढ़ ता है। कोमा में जाने के बाद इंसान का मस्तिष्‍क तो जीवित रहता है लेकिन शरीर के सभी अंग काम करना बंद कर देते हैं। जिस कारण इंसान न तो बोल पाता है और न कोई प्रतिक्रिया दे पाता है। लेकिन इस नए कम्‍प्‍यूटर की मदद से कोमा में पड़े इंसान से सीधा संवाद कर कई समस्‍याओं को सुलझाया जा सकता है।
 
यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्‍टर्न ओंटारिया के शोधकर्ता न्‍यूरोइमेजिंग की मदद से इंसानी दिमाग को पढ़ने का दावा कर रहे हैं। मस्तिक में जो भी चल रहा है, उसे हां या नहीं के उत्‍तर के रूप में कम्‍प्‍यूटर की स्‍क्रीन पर देखा जा सकता है। 
 
शोधकर्ताओं का दावा है कि उनकी यह नई खोज कोमा में जाने के कारण पूरी तरह निष्क्रिय हो चुके लोगों से संवाद करने के लिए एक क्रांतिकारी खोज हो सकती है। इनकी इस खोज के बारे में द जर्नल ऑफ न्‍यूरोसाइंस में पब्लिश किया गया है। 
 
प्रमुख शोधकर्ता लोरिना नेसी कहती हैं कि उनकी इस नई खोज से किसी भी इंसान के दिमाग में चल रहे किसी भी भाव को बिना एक्‍शन और बोले हुए कम्‍प्‍यूटर के माध्‍यम से लाया जा सकता है। मॉडर्न न्‍यूरोसाइंस के लिए यह किसी वरदान से कम नहीं है। अब तक कोमा में जा चुके इंसान से संवाद करने का कोई भी साधन डॉक्‍टरों के पास मौजूद नहीं है। 
 
जो मरीज पूरी तरह कान्शस हैं लेकिन ब्रेन में नुकसान पहुंचने के कारण कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दे पा रहे हैं, उनके लिए यह अविष्‍कार नई जिंदगी देने वाला है। लेकिन इस अविष्‍कार से केवल उन्‍हीं सवालों के जवाब मिलेंगे, जिनके जवाब हां या फिर नहीं में आ सकते हैं। मसलन 'क्‍या तुम शादीशुदा हो?' या फिर 'क्‍या तुम्‍हारे कोई भाई और बहन हैं?' ऐसे सवालों का जवाब कोमा में पड़ा व्‍यक्ति सिर्फ सोच सकता है, बोल नहीं सकता है। स्‍कैनर की मदद से व्‍यक्ति ऐसे सवालों का सही जवाब दे सकता है। इस तकनीक में जब इंसान से कोई प्रश्‍न पूछा जाता है तो उसका ध्‍यान सही जवाब पर होता है। कम्‍प्‍यूटर स्‍कैनर की मदद से इस जवाब को स्‍क्रीन पर शो करेगा। sabhae : bhaskar.com

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भारत के चार शहरों की जलसमाधि बनाने का खतरा!

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भारत के चार शहरों की जलसमाधि बनाने का खतरा!

नई दिल्ली. दुनिया भर में तेजी से बदल रहे मौसम से होने वाले खतरे के बारे में अब तक बहुत कुछ कहा जा चुका है। मौसम में इस बदलाव से होने वाले संभावित खतरों पर भी दुनिया भर में चर्चा हो रही है लेकिन असल खतरा दुनिया भर में समुद्र के किनारे बसे शहरों और वहां रह रहे लोगों पर मंडरा रहा है। दुनिया के 20 ऐसे शहर हैं जिनका आने वाले सालों में नामो निशां तक मिट सकता है और उन शहरों की जल समाधि बन सकती है। वर्ल्ड बैंक के नए अध्ययन में कहा गया है कि अगर दुनिया भर की सरकारें इन विनाश की आहट समय रहते नहीं सुनेंगी और बाढ़ से बचने के तरीकों पर गौर नहीं करेंगी तो दुनिया के इन शहरों को बर्बाद होने से नहीं बचाया जा सकता है। 2050 तक इन शहरों में बाढ़ से होने वाला नुकसान 63 लाख करोड़ रुपए होगा। पहले नंबर पर चीन का शहर ग्वांगझू है। 
 भारत के इन चार शहरों की बनेगी जलसमाधि, दुनिया के 20 शहरों पर मंडरा रहा है खतरा
दूसरे नंबर पर भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई है। समुद्र के किनारे बसे होने की वजह से इस पर ज्यादा खतरा है। पिछले कुछ सालों से बाढ़ से मुंबई को काफी नुकसान हुआ है। 
 भारत के इन चार शहरों की बनेगी जलसमाधि, दुनिया के 20 शहरों पर मंडरा रहा है खतरा
मुंबई के बाद भारत का जो दूसरा शहर रिस्क पर है वह कोलकाता है। कोलकाता की बाढ़ का एक दृश्य। 

भारत के इन चार शहरों की बनेगी जलसमाधि, दुनिया के 20 शहरों पर मंडरा रहा है खतरा
इक्वाडोर का ग्वायाक्विल शहर भी खतरे के निशान पर तैर रहा है। 
 
भारत के इन चार शहरों की बनेगी जलसमाधि, दुनिया के 20 शहरों पर मंडरा रहा है खतरा

चीन का शहर शेनझेन खतरे की सूची में पांचवें नंबर पर है। 
 
भारत के इन चार शहरों की बनेगी जलसमाधि, दुनिया के 20 शहरों पर मंडरा रहा है खतरा
भारत का शहर चेन्नई भी आने वाले सालों में डूबने के कगार पर है। 
भारत के इन चार शहरों की बनेगी जलसमाधि, दुनिया के 20 शहरों पर मंडरा रहा है खतरा

नरेंद्र मोदी के गुजरात का शहर सूरत भी ग्लोबल वार्मिंग के खतरे पर है। 
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यहां बेटी को मिलती है पिता से खुली छूट, एकांत के लिए देते हैं स्पेशल हट

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यहां बेटी को मिलती है पिता से खुली छूट, एकांत के लिए देते हैं स्पेशल हट
दुनिया में आज भी अधिकांश देशों में बेटियों को सेक्शुअल फ्रीडम नहीं है, लेकिन कुछ ऐसे देश है जहां परंपरा से ही पिता अपनी बेटी को सेक्स संबंध बनाने के लिए खुली छूट देता है।इतना ही नहीं वह बेटी के लिए अपने फ्रेंड के साथ एकांत में खास पल बिताने के लिए शानदार हट भी उपलब्ध करवाता है।
यह सुनकर हम हैरान हो सकते हैं, लेकिन यह एक देश के समाज विशेष की परंपरा है। दुनिया के कुछ देशों  में इससे मिलती-जुलती समाज में प्रचलित सेक्स लाइफ की विचित्र परंपराएं प्रचलित हैं।
यहां बेटी को मिलती है पिता से खुली छूट, एकांत के लिए देते हैं स्पेशल हट

गुआम में कुछ लोगों का फुलटाइम प्रोफेशन कौमार्य भंग करना है। इतना ही नहीं इस काम के लिए युवतियां इन लोगों को पैसा भी चुकाती हैं। गुआन के कानून के अनुसार यहां कुंवारी लड़की को शादी करने की मनाही है। पहले उसे अपना कौमार्य भंग करवाना जरूरी है।
यहां बेटी को मिलती है पिता से खुली छूट, एकांत के लिए देते हैं स्पेशल हट
कीनिया के लोउ समाज में यह मान्यता प्रचलित है कि परिवार के व्यक्ति मौत होने पर उसकी विधवा को  दूसरे पुरुष के साथ हमबिस्तर होना होता है। यह पति की मौत के बाद शुद्धिकरण की प्रक्रिया है। इससे आगे की पीढ़ी बढ़ाई जाती है।

यहां बेटी को मिलती है पिता से खुली छूट, एकांत के लिए देते हैं स्पेशल हट

न्योतैमोरी : यह जापान में प्रचलित है, जिसमें महिला या पुरुष के शरीर (बॉडी सुशी) पर व्यंजन (सुशी) रखकर खाए जाते हैं। इसमें महिला या पुरुष के शरीर का अधिकांश हिस्सा नग्न होता है। इसके लिए महिला या पुरुष को तैयार होने के लिए पहले स्थिर रहने का कड़ा अभ्यास करना होता है। जापान की इस परंपरा ने दुनिया के मीडिया का ध्यान अपनी ओर खूब खींचा है।

यहां बेटी को मिलती है पिता से खुली छूट, एकांत के लिए देते हैं स्पेशल हट

 पापुआ न्यूगिनी में ट्रोब्रिआनडर्स जनजाति है। यहां छह से आठ साल की लड़कियों को सेक्स शुरू करना पड़ता है और लड़कों को 10 से 12 साल की उम्र में। हालांकि साथ में खाना खाने पीने के बावजूद भी उन्हें शादी करने की मनाही रहती है।
यहां बेटी को मिलती है पिता से खुली छूट, एकांत के लिए देते हैं स्पेशल हट
फैंग एक अफ्रीकी समाज है, जिनकी तरह-तरह की मान्यताएं प्रचलित हैं। उनकी एक मान्यता यह भी है कि वे दिन में सेक्स नहीं करते हैं और वे इसे अशुभ मानते हैं।
यहां बेटी को मिलती है पिता से खुली छूट, एकांत के लिए देते हैं स्पेशल हट

 नार्थ कोलंबिया में यह एक कॉमन प्रैक्टिस है कि यहां के किशोर गधी के साथ सेक्स करते हैं। इसे परंपरा और विधान के अनुसार सही माना है। माना जाता है कि एक लड़के का पुरुष बनने के सफर को तय करने के लिए ऐसा करना बेहतर है।

यहां बेटी को मिलती है पिता से खुली छूट, एकांत के लिए देते हैं स्पेशल हट
कंबोडिया में केरुंग समुदाय के लोग अपनी बेटियों को भरपूर सेक्शुअल स्वतंत्रता देते हैं। वे अपनी बेटियों को एकांत के पल बिताने के लिए अलग से झोपड़ी तैयार करके देते हैं, ताकि वे इसमें सो सकें और लड़कों से मिल सकें।
यहां बेटी को मिलती है पिता से खुली छूट, एकांत के लिए देते हैं स्पेशल हट
6- आयरलैंड में एक समाज जिसे इसि बेआग नाम से जाना जाता है। वे अपने बच्चों का पालन पोषण इस तरह करते हैं कि उसे सेक्स का बिल्कुल भी ज्ञान नहीं हो। यहां तक कि जब शादी हो जाती है तो सेक्स के दौरान पूरी तरह से कपड़े उतारे नहीं जाते हैं। इस समाज में शारीरिक संबंध बनाने के दौरान भी पूरे कपड़े उतारना वर्जित है।
यहां बेटी को मिलती है पिता से खुली छूट, एकांत के लिए देते हैं स्पेशल हट

 ब्लैक सी के किनारे विवादित क्षेत्र अबखाजियान में अबखाजियान रहते हैं। इनका संबंध काकेसियन एथनिक ग्रुप से है। यहां के युवा जवानी तक ब्रम्हचर्य का पालन करते हैं। शादी होने के बाद देर रात में ही सेक्स करते हैं। यही राज उनकी लंबी उम्र का भी है।
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बॉबी जिंदल अमेरिकी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार!

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वाशिंगटन। अमेरिका के लुइसियाना प्रांत के भारतीय मूल के गवर्नर बॉबी जिंदल रिपब्लिकन पार्टी के 2016 के लिए राष्ट्रपति पद के संभावित उम्मीदवार हो सकते हैं। उनके गृह राज्य में रिपब्लिकन पार्टी के आंतरिक चुनाव में 50 प्रतिशत सदस्यों ने उनकी उम्मीदवारी का समर्थन किया है।

जिंदल 2011 में गवर्नर के पद पर दोबारा चार वर्ष के लिए निर्वाचित हुए थे। अब वह गवर्नर के पद पर दोबारा निर्वाचित नहीं हो सकते।

राजनीतिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने वाली वाशिंगटनस्थित समाचार वेबसाइट पालिटिको के अनुसार, पिछले सप्ताह करवाए गए रिपब्लिकन सर्वेक्षण में राज्य में ओबामा को 37 प्रतिशत स्वीकार्यता मिली थी।

सर्वेक्षण में पाया गया कि गरीब लोगों के लिए अमेरिकी सरकार के स्वास्थ्य कार्यक्रम का विरोध करने के जिंदल के फैसले का 55 प्रतिशत लोगों ने समर्थन किया, जबकि 37 प्रतिशत उनके इस फैसले के खिलाफ थे।

लुइसियाना के 62 फीसदी लोगों ने ओबामाकेयर का विरोध किया। 53 फीसदी ने इसका कड़ा विरोध किया और सिर्फ 33 फीसदी ने इस कानून का समर्थन किया। 80 फीसदी रिपब्लिकन चिकित्सीय मदद पर जिंदल की राय का समर्थन करते हैं।

जिंदल की मुख्य परामर्श कंपनी ऑनमैसेजइंक पर 12 अगस्त से 15 अगस्त तक 800 वोटरों के बीच यह सर्वे किया गया। इस जनमत संग्रह का संचालन नेशनल रिपब्लिकन सीनेटोरियल कमेटी के लिए किया गया था। sabhar :www.webdunia.com

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मर चुकी महिला को डॉक्टरों ने जिंदा किया!

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मेलबर्न। ऑस्ट्रेलिया के डॉक्टरों ने एक ऐसी महिला की जिंदगी बचा ली जो 42 मिनट पहले मृत घोषित हो चुकी थी। इस महिला को हार्ट अटैक के बाद गंभीर हालत में अस्पताल लाया गया था जहां शीघ्र ही उसे मृत घोषित कर दिया गया। लेकिन ऐसी हाईटेक मशीनों के जरिए जो दिमाग में खून की सप्लाई जारी रखती हैं, मेलबर्न के डॉक्टर महिला की धमनियों में खून का रास्ता खोलने में कामयाब रहे और इससे महिला के दिल की धड़कनें भी लौट आईं।
अस्पताल ने महिला के बचने को हैरानी भरा बताया है। पीड़ित महिला वैनीसा तानासियो 41 साल की हैं और दो बच्चों की मां हैं। तानासियो को पहली बार ये अटैक आया था और उसी ने उन्हें लगभग मौत के मुंह में पहुंचा दिया लेकिन चमत्कारी मशीन और डॉक्टरों की मेहनत-सूझबूझ से उनकी जान बच गई।


तानासियो ने बताया कि वो बहुत अच्छा महसूस कर रही हैं। किसी ऐसे व्यक्ति के लिए जो इसी हफ्ते तकरीबन एक घंटे तक मृत रहा हो, वाकई इतनी जल्दी उबरना बहुत बड़ी बात है। उन्होंने कहा कि डॉक्टर और नर्स तारीफ के काबिल हैं। वो मशीन भी बेहद शानदार है।  sabhar :http://khabar.ibnlive.in.com

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मंगलवार, 20 अगस्त 2013

इस तस्वीर खींचने के बाद फोटोग्राफर ने किया था सुसाइड

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TOP PICTURES: इस तस्वीर खींचने के बाद फोटोग्राफर ने किया था सुसाइड


एक तस्वीर हजार शब्दों को बयां करती है, लेकिन कुछ तस्वीरें ऐसी भी होती हैं, जो देखने वाले को झकझोर कर रख देती हैं। आज वर्ल्ड फोटोग्राफी डे है। 
 
फोटोग्राफरों द्वारा बीते समय में दुनिया के विभिन्न विषयों पर कुछ ऐसी तस्वीरें ली गई हैं, जिन्होंने वैश्विक स्तर पर भूख, त्रासदियों और ऐतिहासिक पलों को दुनिया के सामने व्यक्त किया है।
 
 
प्रस्तुत है कुछ ऐसी तस्वीरें, जिन्होंने दुनिया के हर शख़्स को चौंका दिया और कई गंभीर पहलुओं पर दुनियाभर के देशों का ध्यान आकर्षित किया।
 
 
तस्वीर में: इस तस्वीर को अवॉर्ड मिलने के बाद भी इसके फोटोग्राफर केविन कार्टर ने आत्महत्या कर ली। अफ्रीका में कुपोषण के शिकार बच्चे के मरने का इंतजार करता एक गिद्ध। इस तस्वीर ने पश्चिमी देशों के कान खड़े कर दिए थे। यह तस्वीर बहस का मुद्दा भी बन गई थी। 
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लॉरेंस बेटलर यह तस्वीर 7 अगस्त 1930 को इंडियाना के मैरियन में खींची थी। ब्लैक युवकों थॉमस शिप और अब्राम स्मिथ को सरेराह फांसी पर चढ़ा दिया था।  दोनों पर अपनी स्थानीय श्वेत लड़की के बलात्कार का आरोप लगाया गया था, जो बाद में झूठ साबित हुआ। तकरीबन दस हजार लोगों की भीड़ ने इन दोनों को सरेआम फांसी पर चढ़ा दिया था। लड़की के अंकल ने किसी तरह तीसरे युवक की जान बचाई थी। इस तस्वीर की हजारों प्रतियां बेची गई थीं।
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बौद्ध भिक्षु का आत्मदाह (1963)
 
इस तस्वीर ने उस दौरान पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया था। यह बौद्ध भिक्षु दक्षिणी वियतनाम में अमेरिकी युद्ध का विरोध कर रहा था। भिक्षु ने खुद को आग लगा ली, लेकिन तकलीफ के इन क्षणों में वह न चिल्लाया और न जरा भी हिला। उसकी चुपचाप मौत हो गई। 
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यह तस्वीर 1999 की है, जब डॉक्टर्स ने स्पाइना बिफिडा का सफल ऑपरेशन किया था। यह एक तरह का डिसऑर्डर होता है, जिसमें बच्चे का स्पाइनल कॉर्ड पूरी तरह से नहीं बना होता है या फिर वह किसी का काम का नहीं होता। बच्चे ने पैदा होते ही डॉक्टर्स की अंगुलियों को थाम लिया। 

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इराक युद्ध (2003)
 
एक इराकी कैदी अपने चार साल के बेटे को दुलारता हुआ। उसका बेटा पिता के ढके हुए चेहरे और हाथों में लगी हथकड़ियों को देख डर जाता है। कैदी सैनिकों से अपील करता है कि उसकी हथकड़ी खोल दी जाए ताकि वह बच्चे को प्यार कर सके। अंतत: सैनिक कैदी के आग्रह को मान लेते हैं। 
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भोपाल गैस कांड (1984)
 
भोपाल गैस कांड दुनिया के सबसे बड़े औद्योगिक आपदाओं में से एक है। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में हुई इस त्रासदी में 25 हजार से ज्यादा लोग प्रभावित हुए थे। यह तस्वीर उस वक्त की है, जब एक बच्चे को दफनाया जा रहा था। गैस के कारण बच्चे की आंखें भी बाहर निकल आई थीं। 
TOP PICTURES: इस तस्वीर खींचने के बाद फोटोग्राफर ने किया था सुसाइड

अमेरिका के नॉर्थ कैरोलिना के हैरी हार्डिंग हाई स्कूल में डोरोथी काउंट सबसे पहली ब्लैक स्टूडेंट थी। स्कूल के पहले ही दिन उसके साथ अभद्र व्यवहार हुआ। मां-बाप ने उसकी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए पहले ही दिन से उसे स्कूल ने निकाल लिया। यह 1957 की घटना है। तस्वीर में देखा जा सकता है कि कैसे उसके साथी स्टूडेंट उसका मजाक उड़ा रहे हैं।

TOP PICTURES: इस तस्वीर खींचने के बाद फोटोग्राफर ने किया था सुसाइड
जंग के कई पहलू भी होते हैं। कई बार बेशुमार गलतियां हो जाती हैं, जिसका खामियाजा आने वाली कई पीढ़ियों को भुगतना पड़ता है। 1972 में दक्षिण वियतनाम में छिड़े युद्ध के दौरान वियतनामी प्लेन ने गलती से नेपाम बम अपने सैनिकों और नागरिकों पर ही गिरा दिया। इलाके में भगदड़ मची गई। नेपाम बम का इस्तेमाल वियतनाम-अमेरिकी युद्ध के दौरान किया जाता था। 
TOP PICTURES: इस तस्वीर खींचने के बाद फोटोग्राफर ने किया था सुसाइड

कोलंबिया के आर्मिरो में 1985 में फूटे ज्वालामुखी 25 हजार लोगों की मौत हो गई थी। ज्वालामुखी से निकलने वाला मलबा और कीचड़ शहर के निचले इलाकों और आसपास के करीब दस भागों में भर गया था। ऑमयरा सांजेच सिर्फ 13 साल की थी, जब वह इसी तरह की कीचड़ में फंस गई थी। अपना घर बर्बाद होने के बाद वह तीन दिनों तक कीचड़-पानी में फंसी रही। उस दौरान फ्रेंक फॉर्नियर ने उसे कैमरे में कैद किया। इस तस्वीर ने 1985 में वर्ल्ड प्रेस फोटो ऑफ द ईयर का पुरस्कार जीता था। कुछ दिनों बाद ही ऑमयारा की मौत हो गई।
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कुछ यूं होता है धंधा, क्योंकि यहां वेश्यावृत्ति एक धर्म के सामान है

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STRANGE: कुछ यूं होता है धंधा, क्योंकि यहां वेश्यावृत्ति एक धर्म के सामान है

अमेरिका के रूरल नेवादा में प्रॉस्टीट्यूशन लीगल है। उस इलाके में कई ब्रॉथेल हैं। इनमें वेश्याएं बेरोक-टोक जिस्म का व्यापार करती हैं।
फोटोग्राफर मार्क मैक एन्ड्रयूज ने इन ब्रॉथेल्स के बीच 5 साल बिताए और वेश्याओं के जीवन और लाइफ स्टाइल से जुड़ी अनेकों तस्वीरें खींची।
'नेवादा रोज' नाम से एक प्रोजक्ट करते हुए उन्होंने अपने 5 साल यहां बिताए और अपने रिसर्च में इन वेश्याओं की लाइफस्टाइल को करीब से जाना।
STRANGE: कुछ यूं होता है धंधा, क्योंकि यहां वेश्यावृत्ति एक धर्म के सामान है

बैटल माउंटेन के एक वेश्यालय में कस्टमर्स के आने के पहले एक वेश्या तैयार होती हुई
STRANGE: कुछ यूं होता है धंधा, क्योंकि यहां वेश्यावृत्ति एक धर्म के सामान है
कार्सन सिटी के लव रॉन्च में निकोल की फीस चुकाने के लिए कस्टमर एटीएम से पैसे निकाल रहा है। निकोल अपने कस्टमर से चिपकी है।

STRANGE: कुछ यूं होता है धंधा, क्योंकि यहां वेश्यावृत्ति एक धर्म के सामान है

कार्सन सिटी के ही लव रॉन्च ब्रॉथेल के पार्लर में ग्रुप में बैठी वेश्याएं।

STRANGE: कुछ यूं होता है धंधा, क्योंकि यहां वेश्यावृत्ति एक धर्म के सामान है
बनी रॉन्च की प्रॉस्टीट्यूट्स हॉल में बैठी चाय का आनंद ले रही हैं। sabhar : bhaskar.com










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