शनिवार, 5 अक्तूबर 2013

क्या दिमाग़ पर क़ब्ज़ा संभव है?

इंसानी दिमाग पर नियंत्रण

इंसान के दिमाग़ पर नियंत्रण करना अब वैज्ञानिकों की कोरी कल्पना, या तंत्र-मंत्र की किताबों तक ही सीमित नहीं रहने वाला.
वॉशिंगटन विश्वविद्यालय में किए गए एक शोध में इंटरनेट के माध्यम से एक वैज्ञानिक ने दूसरे वैज्ञानिक के दिमाग़ को नियंत्रित करके दिखाया है.

लेकिन कुछ कहते हैं कि अभी इस सबके बारे में कहना बहुत जल्दबाज़ी होगी.कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इससे पता चल सकता है कि भविष्य में इंसानों के बीच संवाद कैसे होगा.

प्रयोग

वॉशिंगटन विश्वविद्यालय कैंपस में एक कंप्यूटर स्क्रीन के पास बैठे वैज्ञानिक राजेश राव अपने साथी वैज्ञानिक एंड्री स्टोको को संदेश देते हैं कि वह गोला दाग़ें.
कैंपस के दूसरे छोर पर एक कीबोर्ड के सामने बैठे स्टोको न चाहते हुए भी कीबोर्ड का स्पेसबार दबा देते हैं.
रावकी स्क्रीन पर गोला उड़कर रॉकेट को लगता हुआ दिखाई देता है.
ख़ास बात यह है कि स्टोको को संदेश देने के लिए राव ने न ज़ुबान हिलाई न ही शरीर का कोई और अंग. उन्होंने स्टोको को संदेश अपने दिमाग़ से भेजा.
यह घटना एक इंसान के किसी दूसरे इंसान के दिमाग़ पर नियंत्रण करने का पहला प्रमाण है.
हालांकि शोधकर्ता इसे थोड़ा कम आकर्षक नाम 'इंसान से इंसान का दिमाग़ी अंतरसंबंध' दे रहे हैं.
लेकिन आम आदमी को यह हैरी पॉटर के खलनायक वोल्डेमोर्ट का दिमाग़ पर नियंत्रण करने वाला सम्मोहन शाप जैसा लग सकता है.
हालांकि स्टोको इस प्रयोग को मज़ाक़ में मशहूर टीवी सीरीज़ स्टार ट्रेक में स्पोक द्वारा दिमाग़ से बातें साझा करने जैसा बताते हैं.
इंसानी दिमाग पर नियंत्रण
बहरहाल वह कहते हैं, "इस मामले में इंटरनेट का इस्तेमाल किया गया था. जैसे वह कंप्यूटरों को जोड़ता है उसने दिमाग़ों को जोड़ा था."
राव कहते हैं कि एक क्लिक करेंसोची गई बात को किसी दूसरे के दिमाग़ का पढ़ना और लागू होते हुए देखना "सचमुच बहुत उत्साहजनक और अद्भुत" था
वह कहते हैं, "अगले चरण में दोनों दिमाग़ों के बीच और दोतरफ़ा संवाद करना होगा."

तकनीक

लेकिन दिमाग़ के तकनीक को नियंत्रित करने की और भी कई उदाहरण हैं.
जैसे कि, क्लिक करेंसैमसंग दिमाग़ से चलने वाले एक टैबलेट पर प्रयोग कर रहा है.
टेक्नोलॉजी फ़र्म इंट्राक्सॉन एक "मस्तिष्क संवेदी हेडबैंड" की मार्केटिंग कर रही है जिससे आप अपने क्लिक करेंदिमाग़ से चीज़ों को नियंत्रित कर सकते हो.
यह उपकरण पहले ही शारीरिक रूप से अक्षम लोगों द्वारा बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया जा रहा है.
साफ़ है कि इस प्रयोग में इस्तेमाल की गई दिमाग़ के आदेश लेने और देने की तकनीक पहले से ही मौजूद है.
इलेक्ट्रोनसैफलोग्राफ़ी, वह तकनीक है जिसे राव के दिमाग़ से संदेश भेजने के लिए इस्तेमाल किया गया. इसे सामान्यतः मेडिकल पेशे में खोपड़ी से दिमाग़ की हरकतें रिकॉर्ड करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.
ट्रांसक्रेनियल मैग्नेटिक स्टिमुलेशन, वह तकनीक है जिससे स्टोको की उंगली ने हरकत की. इस तकनीक का इस्तेमाल किसी हरकत के लिए दिमाग़ को उत्तेजित करने के लिए किया जाता है.
वॉल्डेमॉर्ट
लेकिन इन दोनों का एक साथ इस्तेमाल कर एक आदमी से दूसरे के आदेश का पालन करवाना- यह नया है.
हालांकि शोधकर्ता यह बताना नहीं भूलते कि यह प्रयोग सिद्धांत के लिहाज़ से बहुत शुरुआती चरण में है.

संभावनाएं

लेकिन रोबोटिक्स में पीएचडी करने वाले और 'रोबोकैलिप्स' के लेखक डेविड विल्सन कहते हैं कि यह प्रयोग 'सिद्धांत के सबूत' के रूप में बहुत महत्वपूर्ण है.
वह कहते हैं, "इसने एक बहस शुरू कर दी है कि भविष्य में दिमाग़ से दिमाग़ का संवाद कैसे समाज को प्रभावित करेगा."
हालांकि वह यह भी कहते हैं, "हालांकि यह प्रयोग इतने छोटे दायरे में किया गया है कि इसका व्यावहारिक रूप से कोई विशेष अर्थ नहीं है, लेकिन यह हमें सोचने पर मजबूर तो करता ही है."
लेकिन सभी प्रभावित नहीं हैं.
फ़्यूचरोलॉजिस्ट (भविष्य की अध्ययनकर्ता) डॉ इयान पीयरसन विज्ञान और अभियांत्रिकी के क्षेत्र से हैं.
वह कहती हैं, "एक साधारण सा विचार की पहचान करने वाला तंत्र बहुत मामूली चीज़ है. अगर वह एक व्यक्ति के विचार को लेकर सीधे दूसरे व्यक्ति में पैदा करवा सकते- तो मैं प्रभावित हो जाती."

डॉक्टर डेविड विल्सन
हालांकि सामान्यतः इस क्षेत्र में होने वाला विकास इंसानों के बीच संवाद और सहयोग के असर को लेकर आमतौर पर सहमति है.
स्टोको कहते हैं कि संभव है कि एक दिन पायलट के अक्षम हो पाने की स्थिति में ज़मीन बैठा आदमी किसी यात्री के माध्यम से हवाई जहाज़ को ज़मीन पर उतरवाने में कामयाब हो जाए.

आशंकाएं

हालांकि दिमाग़ पर नियंत्रण का पूरा सिद्धांत ही अक्सर इसके दुरुपयोग की आशंकाओं से घिरा रहता है.
लेकिन रोबोट नियंत्रित भविष्य के बारे में किताब लिखने वाले विल्सन कहते हैं इस प्रयोग के असर को लेकर आशांवित हैं.
वह कहते हैं, "मुझे इसमें कोई भी ख़तरा नहीं दिखाई देता. यह तो दो अलग भाषा बोलने वाले लोगों को एक बेहतर दल बनाने में सहायता कर सकता है- जिससे समस्याएं जल्दी सुलझ सकेंगी."
वॉशिंगटन विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर चंतल प्रत ने भी इस प्रयोग के संचालन में मदद की थी.
वह विल्सन की बात से सहमत हैं.
चंतल कहती हैं, "ऐसी कतई संभावना नहीं है कि जिस तकनीक का हम इस्तेमाल कर रहे हैं उसे किसी ऐसे किसी व्यक्ति पर लागू नहीं किया जा सकता जो इसे चाहता न हो या जिसे इसकी जानकारी न हो."
डॉक्टर पीयरसन कहती हैं "जब दिमाग तक हमारी पूरी तरह सीधी पहुंच हो जाएगी और आप किसी को रोबोट की तरह इस्तेमाल कर सकेंगे तब दिक्क़त हो सकती है."

"चाहे यह ग़ुलामी हो या सरकारी नियंत्रण- कौन जानता है. आप इस बारे में जिनती चाहें कहानियां लिख सकते हैं." sabhar : bbc.co.uk

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