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शुक्रवार, 11 अक्तूबर 2013

इस वीर के तरकस में थे तीन ऐसे बाण जिससे भगवान कृष्ण को भी लगता था डर

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इस वीर के तरकस में थे तीन ऐसे बाण जिससे भगवान कृष्ण को भी लगता था डर

सीकर. एक ऐसा महान योद्धा जिसकी वीरता एवं साहस के सामने पूरी दुनिया शीश झुकाती है। इस योद्धा ने अपनी वीरता के प्रमाण और वचन-वद्धता के लिए एक पल में अपना सर धर से अलग कर दिया था। इसी कारण इन्हें शीश के दानी के नाम से जाना गया। इस वीर के तरकश में थे तीन ऐसे बाण जिससे पल भर में पूरी दुनिया समाप्त हो सकती थी। इसके कारण देवता भी हो दहशत में थे। दहशत भी इतनी कि खुद श्रीकृष्ण को क्षल करने पर मजबूर होना पड़ा। आज कलयुग में इन्हे भगवान श्री कृष्ण  के अवतार के रूप में पूजा जाता है। 
dainikbhaskar.com के धर्मयात्रा की इस कड़ी में हम आपको लेकर चल रहे हैं शेखावाटी के सीकर जिले में स्थित इस परम वीर के धाम जिसे खाटू धाम के नाम से जाना जाता है। इस वीर की महिमा का बखान करने वाले भक्त राजस्थान या भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया के कोने-कोने में मौजूद हैं।
इनके पास थे तीन ऐसे बाण जिससे भगवान कृष्ण को था इतिहास पलटने का डर
यह धाम सीकर से 65कि.मी. दूर खाटूश्यामजी गांव में स्थित है। सफेद मार्बल से बना यह प्राचीन मंदिर हिंदू भगवान, श्रीकृष्ण का अवतार मने जाने वाले खाटूश्याम को समर्पित है तथा, अनेक मजेदार कहानियों से जुड़ा है। इस मंदिर का वर्णन महान ग्रंथ ’महाभारत’ में भी किया गया है। यह कहानी एक ऐसे वीर की है जो गदाधारी भीम के पोते थे और भीम के पुत्र घटोतकच्छ और नाग कन्या अहिलवती के पुत्र थे।
किसने दिया इन्हें श्याम का नाम
इस वीर का बाल्यकाल में नाम बर्बरीक थ। उनकी माता, गुरुजन एवं रिश्तेदार उन्हें इसी नाम से जानते थे। इनका यह नाम इनके बडे-बडे और घने बाल होने के कारण पडा| वे महान पान्डव भीम के पुत्र घटोतकच्छ और नाग कन्या अहिलवती के पुत्र है। बाल्यकाल से ही वे बहुत वीर और महान यौद्धा थे। उन्होने युद्ध कला अपनी माँ से सीखी थी। कृष्ण ने उन्हें खाटूश्यामजी का नाम दिया था। उसके बाद इसी नाम से वो जाने गए।
के पास थे ऐसे तीन बाण जिससे पूरी दुनिया हो सकती थी ध्वस्त
बालक वीर बर्बरीक के जन्म के पश्चात् घटोत्कच इन्हें भगवन श्री कृष्ण के पास लेकर गए थे। श्री कृष्ण के बताए बातों के राह पर चलते हुए बर्बरीक ने विजय नामक ब्राह्मण का शिष्य बनकर अस्त्र-शस्त्र विद्या ज्ञान हासिल किया और उनके यज्ञ को राक्षसों से बचाकर, उनका यज्ञ संपूर्ण कराया। विजय नाम के उस ब्राह्मण का यज्ञ संपूर्ण करवाया। बर्बरीक ने भगवान शिव की घोर तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया जिससे मां भगवती व भगवन शिव शंकर बर्बरीक से बहुत प्रसन्न हुए और उनके सामने प्रकट होकर तीन बाण प्रदान किए जिससे तीनो लोकों में विजय प्राप्त की जा सकती थी।
महाभारत का युद्ध प्रारम्भ होने पर वीर बर्बरीक ने अपनी माता के सामने युद्ध में भाग लेने की इच्छा प्रकट की और तब इनकी माता ने इन्हें युद्ध में भाग लेने की आज्ञा दे दी और यह वचन लिया की तुम युद्ध में हारने वाले पक्ष का साथ निभाओगे। इस पर बर्बरीक कुरुक्षेत्र की ओर चल पड़े।
एक बाण से पीपल के पेड के सभी पत्तों को छेद डाला
सर्वव्यापी कृष्ण ने ब्राह्मण वेश धारण कर बर्बरीक से परिचित होने के लिये उसे रोका और यह जानकर उनकी हंसी भी उडायी कि वह मात्र तीन बाण से युद्ध में सम्मिलित होने आया है। ऐसा सुनने पर बर्बरीक ने उत्तर दिया कि मात्र एक बाण शत्रु सेना को ध्वस्त करने के लिये पर्याप्त है और ऐसा करने के बाद बाण वापिस तरकस में ही आयेगा। यिद तीनो बाणों को प्रयोग में लिया गया तो तीनो लोकों में हाहाकार मच जायेगा। इस पर कृष्ण ने उन्हें चुनौती दी की इस पीपल के पेड के सभी पत्तों को छेद कर दिखलाओ, जिसके नीचे दोनो खडे थे। बर्बरीक ने चुनौती स्वीकार की और अपने तरकस से एक बाण निकाला और इश्वर को स्मरण कर बाण पेड के पत्तो की और चलाया।
तीर ने क्षण भर में पेड के सभी पत्तों को भेद दिया और कृष्ण के पैर के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने लगा, क्योंकि एक पत्ता उन्होनें अपने पैर के नीचे छुपा लिया था, बर्बरीक ने कहा कि आप अपने पैर को हटा लीजिये वर्ना ये आपके पैर को भी छेद देगा। यह सब देख कर भगवान कृष्ण बर्बरीक से अत्यंत प्रभावित हुए। इस पर श्री कृष्ण बर्बरीक से पूछते हैं की तुम युद्ध में किसके साथ हो इस प्रश्न पर बर्बरीक ने कहा कि युद्ध भाग लेने के लिए आते समय मां ने कहा था की पुत्र उस ओर से लड़ना जो हार रहा हो तथा निर्बल हो। कृष्ण ने सोचा की इस समय तो कौरव ही हार रहे हैं और इस समय में वह कौरवों का ही साथ देगा और यदि ऐसा हुआ तो पांडवों के लिए अच्छा न होगा।
.और एक पल में कलम कर दिया अपना सर
इस पर उन्होंने ब्राह्मण रूप में ही बालक बर्बरीक से दान स्वरूप बर्बरीक का सर मांग लिया इस पर बर्बरीक ने उन्हें यह दान देने का वचन दिया किंतु ब्राह्मण के असली रूप को जानने की इच्छा व्यक्त की इस पर श्री कृष्ण ने बालक को अपने वास्तविक रूप के दर्शन दिए। श्री कृष्ण ने ऐसा इसलिए किया क्योकि अगर बर्बरीक युद्ध में भाग लेते तो कौरवों की समाप्ति केवल 18 दिनों में नहीं हो सकती थी और युद्ध निरंतर चलता रहता। श्री कृष्ण ने बर्बरीक से कहा की युद्ध भूमि की पूजा करने के लिए किसी एक वीर के शिश के दान की जरूरत है। तुम्हारे अंदर मैने वो वीर देखा है। इस पर बर्बरीक ने श्री कृष्ण से प्रार्थना की कि वह पूरा महाभारत को देखना चाहता है। श्री कृष्ण ने बर्बरीक की प्रार्थना को स्वीकार किया और फाल्गुन महीने की द्वादश तिथि को बर्बरीक ने अपना शीश दान के रुप में दे दिया।
पूरा महाभारत देखने वाला एकमात्र योद्धा
श्री कृष्ण ने बालक बर्बरीक के शीश को अमृत से सींचा और युद्धभुमि के समीप ही पहाड़ की सबसे ऊंची चोटी पर रख दिया। जहां से उन्होंने पूरे युद्ध को देखा। युद्ध की समाप्ति पर पांडवों में आपस में ही इस बात को लेकर तनाव उत्पन्न हो गया कि युद्ध में कौन विजयी हुआ। इस पर कृष्ण ने उनसे कहा कि बर्बरीक का शीश सम्पूर्ण युद्ध का साक्षी है वही सही और गलत का निर्णय ले सकता है। सभी इस बात से सहमत होकर बर्बरीक के पास गये। बर्बरीक के शीश ने उत्तर दिया कि कृष्ण ही युद्ध मे विजय प्राप्त कराने में सबसे महान पात्र हैं। उन्हें युद्धभुमि में सिर्फ उनका सुदर्शन चक्र घूमता हुआ दिखायी दे रहा था जो कि शत्रु सेना को काट रहा था, महाकाली दुर्गा कृष्ण के आदेश पर शत्रु सेना के रक्त से भरे प्यालों का सेवन कर रही थीं। उन्हें यह वरदान मिला कि उन्हें कलयुग में श्याम के नाम से पूजा जाएगा। 
औरंगजेब ने किया था मंदिर को नष्ट
श्याम मंदिर बहुत ही प्राचीन है। श्याम मंदिर की आधारशिला सन् 1720 में रखी गई थी। एक मान्यता के मुताबिक सन् 1679 में औरंगजेब की सेना ने इस मंदिर को नष्ट कर दिया था। इस मंदिर की रक्षा के लिए उस समय अनेक राजपूतों ने अपना प्राणोत्सर्ग किया था। श्री कृष्ण भगवान के कलयुग के अवतार के रूप में यहां पर खाटू में विराजमान हैं। खाटू श्याम जी को हारे का सहारा माना जाता है। बर्बरीक को अनेक नामों से पुकारा जाता है यह खाटू श्याम, श्याम सरकार, र्यावर्चा, सुहृदय, शीश के दानी, तीन बाणधारी, खाटू नरेश और कलयुग के अवतार जैसे नामों से जाना जाते हैं।
sabhar; bhaskar.com

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