हमारे सूर्य के इस "जुड़वें भाई" के अध्ययन का काम सन् 1984 में शुरू हुआ था। वैज्ञानिकों ने पाया है कि समय समय पर पृथ्वी पर रहने वाले प्राणियों की कुछ प्रजातियाँ सामूहिक रूप से विलुप्त हो जाती हैं। ऐसी "मृत्यु अवधि" 2 करोड़ 70 लाख साल में एक बार दोहराई जाती है। यदि यह सिद्धांत सही है तो हमारे सूर्य का यह "साथी" जब अपनी कक्षीय अवधि पूरी करता हुआ क्विपर पट्टी में प्रवेश करता है तो हमारे सौरमंडल के ग्रहों में हलचल मच जाती है।
हमारे सूर्य का यह "साथी" भूरे या सफ़ेद रंग का बौना सितारा है जो पृथ्वी से 1.5 प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, "मौत का सितारा" चमकता नहीं है। इसलिए, इसका पता केवल इन्फ़रा रेड सेंसरों की सहायता से ही लगाया जा सकता है। फ़िलहाल, "मौत के सितारे" के अस्तित्व की पुष्टि करना या इससे इनकार करना संभव नहीं है।