अब ट्रांसप्लांटेशन का काम कहीं अधिक आसानी से, तेज़ी से और निरापद ढंग से किया जा सकेगा| डोनर-अंगों का स्थान रोगी के अपने स्टेम सेलों (मेरू कोशिकाओं) से “उगाए गए” अंग ले लेंगे| मानव-शरीर उन्हें आसानी से अपना लेता है, उन्हें अस्वीकार नहीं करता|
मास्को के वैज्ञानिकों ने अंगों की बायोप्रिंटिंग की परियोजना शुरू की है| अब तक वे तीन प्रकार की कोशिकाएं “छाप” चुके हैं| मास्को की “3D बायोप्रिंटिंग सोल्यूशंस” प्रयोगशाला के प्रधान प्रोफ़ेसर व्लादीमिर मिरोनोव ने इसके बारे में बताया|
बायोप्रिंटिंग के लिए मनुष्य की स्टेम सेलों के गोलाभ पुंज इस्तेमाल किए जाते हैं| इनसे बायोजेल पर भावी ऊतक या अंग छापे जाते हैं| रोगी की अपनी कोशिकाओं से बने ऐसे अंग जैविक दृष्टि से उसके शरीर से पूरी तरह संयोजनशील होंगे, जबकि डोनरों के अंगों को कई बार मानव शरीर अस्वीकार कर देता है| इसीलिए यह कहा जा रहा है कि भविष्य बायोप्रिंटिंग का ही है|
इसके लिए मानव शरीर में जो अंग बदलना होता है उसका कम्प्यूटर मॉडल पहले तैयार किया जाता है जिसमें उसकी शरीररचना यानी एनाटोमी और कोशिकाओं संबंधी सभी विशेषताओं को ध्यान में रखा जाता है| इसके बाद रोगी के शरीर के वसा ऊतकों से स्टेम सेल निकाले जाते हैं| इससे अगला चरण है भावी अंग की निर्माण सामग्री – कोशिकाओं के गोलाभ – पाना|
प्रो. मिरोनोव की प्रयोगशाला की नो-हाऊ है – विशेष बायोजेल| इसकी बदौलत गोलाभ समय से पहले एक दूसरे से जुड़ नहीं पाते – न तो प्रिंटर के कार्टरिज में और न ही उसके इजेक्टरों में, जिनसे ये कम्प्यूटर मॉडल के अनुसार “बायोपेपर” पर टपकते हुए भावी अंग का निर्माण करते हैं| कोशिका गोलाभों को तभी एक साथ एक संस्तर में जुड़ना चाहिए जब “बायोपेपर” की बुनियाद पर पूरा संस्तर बन गया हो| इस प्रकार एक-एक संस्तर करके त्रिआयामी अंग बनता है|
“गोलाभ किसी प्रकार की जैविक प्रक्रिया के बिना, सतही तनाव के बल की बदौलत एक दूसरे से जुडते हैं,” प्रो. मिरोनोव ने समझाया|
बायोप्रिंटर पर बनी ऊतक-संरचना को बयोरिएक्टर में रखा जाता है| यहां ऊतकों को द्रुत विकास करवाने वाले तत्व काम करते हैं|
प्रो. मिरोनोव ने यह भी बताया कि अंग की छपाई करते समय उसमें आवश्यक रक्त-वाहिकाओं का भी ध्यान रखा जाता है – उनकी भी छपाई अंग के साथ-साथ होती है| इसके लिए प्रिंटर के कार्टरिज में ऐसे गोलाभ भी भरे जाते हैं जिनसे रक्त-वाहिकाएं बनती हैं|
“3D बायोप्रिंटिंग सोल्यूशंस” प्रयोगशाला रूसी विज्ञान अकादमी के ववीलोव जेनेटिक्स इंस्टीट्यूट के साथ मिलकर काम करेगी| वैज्ञानिक ऐसी रोबोटी प्रणाली बनाना चाहते हैं जिससे प्रिंटर की क्षमता दस हज़ार गोलाभ बूंदें प्रति सेकण्ड तक बढ़ाई जा सके| प्रो. मिरोनोव के शब्दों में इतनी उत्पादनशीलता होने पर ही बायोप्रिंटिंग का काम बड़े पैमाने पर किया जा सकता है
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