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मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

बाबा रामदेव के नुस्‍खे में यकीन नहीं रखने वाले धोनी देश भर में खोलेंगे जिम

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नई दिल्‍ली. टीम इंडिया के कप्‍तान महेंद्र सिंह धोनी का मानना है कि योग से उन्‍हें ज्‍यादा फायदा नहीं होता है। लेकिन धोनी ने देश भर में जिम खोलने का फैसला किया है। यह देश में किसी खिलाड़ी का अपनी तरह का पहला वेंचर होगा।

एक अखबार ने धोनी के बिजनेस पार्टनर और मैनेजर अरुण पांडेय के हवाले से लिखा है कि इस वेंचर (स्पोर्ट्सफिट वर्ल्ड प्राइवेट लिमिटेड) के तहत पांच सालों में देश भर में 200 जिम खोले जाएंगे। सूत्रों के मुताबिक कुछ विदेशी निवेशकों ने स्पोर्ट्सफिट वर्ल्ड में हिस्सेदारी खरीदी है और कंपनी अगले पांच सालों में 1,500-2,000 करोड़ रुपए निवेश करेगी।  

धोनी की सोच के उलट सचिन तेंडुलकर मानसिक, शारीरिक और आध्‍यात्मिक मजबूती हासिल करने के लिए योग पर भरोसा करते हैं। यह खुलासा किया है कि आईपीएल की दिल्‍ली डेयरडेविल्‍स टीम के योग प्रशिक्षक जेम्‍स हैरिंगटन ने। हैरिंगटन ने 2010-11 में टीम इंडिया के दक्षिण अफ्रीका दौरे के वक्‍त भारतीय क्रिकेटरों को योग के गुर सिखाए थे। हैरिंगटन ने कहा कि दक्षिण अफ्रीका दौरे के समय उन्‍होंने योग का एक सेशन लिया जिसमें धोनी ‘स्‍ट्रेचिंग’ पर जोर देने के मूड में नहीं दिखे। sabhar : bhaskar.com



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घर में न्यूड होकर करेंगी सफाई, चार्ज सिर्फ $100 !

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टेक्सास. घर में काम करने वाली बाई यदि आपके सामने न्यूड होकर सफाई करने ऑफर दे तो आप क्या करेंगे? अजी चौंकिए मत। हिंदुस्तान में भले ही ऐसा कुछ नहीं होता हो लेकिन टेक्सास सिटी में यह संभव है।

शहर में एक न्यूड मेड सर्विस अपने ग्राहकों को ऐसी ही सुविधा उपलब्ध कराने का दावा कर रही है। जिसके बाद से पुलिस की नींद गायब हो गई है। स्थानीय पुलिस लगातार इस कंपनी पर नजर रखी हुई है।

मेलिशा बोरेत्त नाम की एक 26 वर्षीय महिला ने फेंटेसी मेड सर्विस नाम से एक कंपनी शुरू किया। मोहतरमा अपने ग्राहकों से प्रति घंटे का 100 डॉलर रूपए लेती हैं सफाई के नाम पर। इतना ही नहीं, ग्राहकों के अनुरोध पर यह मेड कम कपड़े या बिना कपड़ों के भी सफाई कर सकती है।


फिलहाल मेलिशा की कंपनी में तीन और महिलाएं काम कर रही हैं और धंधा अच्छा चल रहा है। लेकिन पुलिस के नजर रखने के बाद और मीडिया में उछलने से पूरा मामला बिगड़ गया है। स्थानीय पुलिस का कहना है कि मेलिशा अपने ग्राहकों को सेक्स के नाम पर रिझा रही हैं, जो कि गलत है। ऐसे काम की इजाजत हमारा कानून नहीं देता है। sabhar : bhaskar.com

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मां बनने के लिए एक फीमेल फैन ने मांगे जॉन से स्पर्म

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एक्टर से प्रोड्यूसर बने जॉन अब्राहम की फिल्म 'विकी डोनर' इस महीने रिलीज हो रही है। वह स्पर्म डोनेशन के मुद्दे पर शुरू से बोलते आए हैं और खुद डोनेट करने की बात करते रहे हैं। अब, जॉन से एक महिला प्रशंसक ने सचमुच में उनका स्पर्म मांगा है, ताकि वह मां बन सके।



मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, जॉन अब्राहम से एक शादीशुदा महिला ने स्पर्म डोनेट करने का रिक्वेस्ट किया है, जो मां नहीं बन पा रही हैं। उनके लिए आर्टिफिसियल इंसेमिनेशन ही मात्र एक रास्ता है।



महिला का कहना है कि वह जॉन के अलावा किसी और से स्पर्म लेने को तैयार नहीं हैं। स्पर्म डोनेशन के मुद्दे पर जॉन के विचारों का वह महिला सम्मान करती हैं।



जॉन ने हाल में ही एक फंक्शन में कहा था कि वह स्पर्म डोनेट करना चाहते हैं। इसलिए अब देखना है कि जॉन अपने वादे को निभाते हैं कि नहीं। sabhar : bhaskar.com

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धरती बचाने के लिए ऊंट मारो प्रस्ताव

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Thema: Das Sultanat Oman setzt für die Zeit nach dem Öl auf Tourismus

BU: Tausenundein Kamel: Ob dieses Kamel schont ahnt, dass es bald Touristen wird tragen müssen?


Foto: Sven Töniges
ऑस्ट्रेलिया में प्रदूषण कम करने के लिए ऊंटों को मारने का फैसला लिया जा रहा है. ऊंटों के कारण पर्यावरण में मीथेन गैस बढ़ जाती है जो धरती के तापमान को बढाती है. ऊंटों की मौत के बदले कंपनियों को मिलेगा कार्बन क्रेडिट.
ऑस्ट्रेलिया की संसद में अगले हफ्ते एक अजीबोगरीब कानून को मंजूरी मिल सकती है. संसद में प्रस्ताव दिया जा रहा है कि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए ऊंटों की हत्या करनी जरूरी है. इस प्रस्ताव के अनुसार हर ऊंट के बदले 75 डॉलर का कार्बन क्रेडिट दिया जाएगा.
कार्बन क्रेडिट उस अनुमति को कहते हैं जिस के तहत कंपनियों या देशों को कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन के लिए एक सीमा तय की जाती है और इसके लिए सर्टिफिकेट दिया जाता है. एक कार्बन क्रेडिट का मतलब है एक टन कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन की अनुमति. यानी एक ऊंट को मारने के बदले कंपनियों को एक टन अधिक कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जान करने की अनुमति मिल सकेगी
धरती का तापमान बढ़ने की सबसे बड़ी वजह कार्बन डाई ऑक्साइड को ही बताया जाता है. कार्बन डाई ऑक्साइड (CO2) के अलावा मीथेन (CH4) भी एक ऐसी गैस है जिसके कारण धरती का तापमान बढ़ता है. इसलिए इन गैसों को ग्रीन हाउस गैसों के नाम से जाना जाता है. ग्लोबल वॉर्मिंग में मीथेन का असर कार्बन डाय ऑक्साइड के मुकाबले 23 प्रतिशत अधिक होता है. जहां कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन कारखानों से उठे धुंए से होता है, वहां दूसरी ओर वातारवरण में मीथेन का उत्सर्जन अधिकतर चारा खाने वाले जानवरों के कारण होता है.
ऑस्ट्रेलिया में करीब 12 लाख ऊंट हैं और हर सात साल में इनकी संख्या दोगुनी हो जाती है. गाय, भैंस और भेड़ बकरियों की ही तरह ऊंट भी चारा खाते हैं. इंसानों से अलग इन जानवरों का पेट कई भागों में बंटा होता है, जिस कारण वह एक ही बार में खूब सारा खाना खा सकते हैं और बाद में जुगाली कर सकते हैं. जुगाली करने के कारण ही मीथेन पैदा होती है
ARCHIV - Ein Windrad dreht sich vor den Kühltürmen des Kraftwerkes der Vattenfall-Kraftwerke Europe AG im brandenburgischen Jänschwalde (Archivfoto vom 08.12.2006). So eindringlich wie nie zuvor warnt der UN- Klimarat IPCC in seinem jüngsten Bericht vor der Erderwärmung. Die Erderwärmung ist nicht mehr aufzuhalten, selbst im günstigsten Fall steigt sie weiterhin an. Die Durchschnittstemperatur der Jahre 2090 bis 2099 wird je nach Szenario und politischer Entwicklung beim Klimaschutz um 1,1 bis 6,4 Grad Celsius höher liegen als im Durchschnitt der Jahre 1980 bis 1999. Foto: Patrick Pleul (zu dpa-Themenpaket zur UN-Klimakonferenz in Posen vom 20.11.2008) +++(c) dpa - Bildfunk+++.
जानकार मानते हैं कि 20 फीसदी मीथेन जानवरों की जुगाली के कारण बनती है और इनमें सबसे ज्यादा ऊंटों के कारण बनती है. एक ऊंट एक साल में एक कार्बन क्रेडिट के बराबर मीथेन पैदा करता है. इसीलिए ऑस्ट्रेलिया सरकार चाहती है कि ऊंटों से छुटकारा पा लिया जाए.
अजीब बात यह है सरकार ऊंटों को मार कर धरती के तापमान को कम करने के बारे में नहीं सोच रही, बल्कि इस से औद्योगिक फायदा कैसे हो सकता है इस पर चर्चा हो रही है. ऊंटों को मारने के बदले कारखानों को अधिक कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन की अनुमति मिलेगी. इन क्रेडिट्स को केवल ऑस्ट्रेलिया में ही नहीं बल्कि अन्य देशों में भी इस्तेमाल किया जा सकेगा. सरकार की दलील है कि इस से संतुलन बना रहेगा. यानी जानवर कारखानों की भेंट चढ़ जाएंगे
Sounth Algeria, the  camel couple in Janet. Copyright: Marion Beckhäuser..
मरे हुए ऊंटों के मांस से कुत्तों का खाना बनाया जाएगा. मतलब यहां भी कारोबारी मुनाफा. विकसित देश ग्रीन हाउस गैसों और ग्लोबल वॉर्मिंग से लड़ने के लिए हर तरह के पैंतरे अपनाने को तैयार हैं. जाहिर है बेकसूर जानवरों की जान लेना औद्योगीकरण के कारण होने वाले प्रदूषण पर काबू पाने की तुलना में एक सरल उपाय माना जा रहा है. इस बारे में कोई चर्चा नहीं की जा रही कि ऊंटों से पैदा होने वाली मीथेन को इकट्ठा करके ऊर्जा बनाने के बारे में विचार किया जा सकता है. अर्जेंटीना में गायों की पीठ पर प्लास्टिक बांध कर मीथेन गैस इकट्ठा करने का प्रयोग हो रहा है.
sabhar : dw.de

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इंसानों से मिल जुल कर काम करेगा रोबोट

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रजनीकांत का चिटी भले ही बॉलीवुड का रोबोट हो लेकिन दुनिया में ऐसे रोबोटों की भी कल्पना की जा रही है, जो इंसानों के करीब हों. भले ही वे दिखने में इंसानों जैसे न हों लेकिन उनके काम का तरीका हमारे जैसा ही हो.
हाथी की सूंड़ की बात करते हैं. कैसा लचीला होता है. देख कर कभी कभी हंसी आ जाती है लेकिन अगर गौर से देखा जाए तो यह सूंड़ कितने काम की होती है. लकड़ी के मोटे गट्ठर उठाने हों या बड़ा पूरा तरबूज. हाथी बड़े आराम से ये काम कर सकता है. सोचिए अगर हाथी की सूंड़ की तरह कोई रोबोट बन जाए तो कितना आसान होगा.
जर्मनी की मशीनरी टूल्स बनाने वाली मशहूर कंपनी फेस्टो ने हाथी को ध्यान में रख कर रोबोट तैयार किया है, जो अभी परीक्षण के स्तर पर है और कंपनी का कहना है कि इसके शानदार नतीजे आ रहे हैं. कंपनी के प्रोसेस ऑटोमेशन मैनेजमेंट प्रमुख डॉक्टर एकहार्ड रूस का कहना है, "हमारा लक्ष्य ऐसे उपकरण तैयार करना है, जो किसी भी जगह पर इंसानों के साथ मिल कर काम कर सकें. आम तौर पर रोबोट बेहद भारी भरकम और खतरनाक सा दिखने वाला होता है. लेकिन हम इस अवधारणा को बदलना चाहते हैं." कंपनी बायोनिक्स को आधार बना कर काम करने में विश्वास करती है.
बायोलॉजी और तकनीक के मेल को बायोनिक्स कहते हैं. 1950 के दशक में यह शब्द गढ़ा गया. नए उपकरणों को डिजाइन करते वक्त बायोलॉजिकल तरीकों को ध्यान में रखा जाता है और उनके तंत्र को कुछ इस तरह सेट किया जाता है कि वे प्रकृति पर थोपी हुई मशीन न होकर उनका हिस्सा बनने की कोशिश करें. हाथी की सूंड़ भी बायोनिक्स की ही बायोलॉजी और तकनीक के मेल को बायोनिक्स कहते हैं. 1950 के दशक में यह शब्द गढ़ा गया. नए उपकरणों को डिजाइन करते वक्त बायोलॉजिकल तरीकों को ध्यान में रखा जाता है और उनके तंत्र को कुछ इस तरह सेट किया जाता है कि वे प्रकृति पर थोपी हुई मशीन न होकर उनका हिस्सा बनने की कोशिश करें. हाथी की सूंड़ भी बायोनिक्स की ही सोच है
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लेकिन ऐसे प्रोडक्ट तैयार करना मामूली बात नहीं होती. भारी रिसर्च और इंजीनियरिंग की जरूरत होती है और ऐसे किसी प्रोडक्ट को तैयार करने में कई बार तीन साल तक लग जाते हैं. ऐसे में मुनाफा कैसे आएगा. रूस बताते हैं कि ग्राहकों के साथ लगातार रिश्ते बेहतर बनाने की जरूरत होती है. कई बार तो उनकी ग्राहक कंपनियां ही उन्हें नए प्रोडक्ट के बारे में कहती हैं, "एक तरफ आपको ध्यान रखना होता है कि बाजार की क्या जरूरत है और दूसरी तरफ आपको लीक से हट के सोचने की जरूरत होती है. दोनों का सही मिश्रण होना चाहिए. समस्या यह है कि मिश्रण कैसा हो 90:10 या 10:90."
मेडिकल साइंस में हाल के दिनों में बायोनिक्स उत्पादों का चलन तेजी से बढ़ा है. किसी जमाने में लकड़ी की नकली टांग लग जाना ही बड़ी बात मानी जाती थी लेकिन हाल के दिनों में ऐसी कृत्रिम टांगों का भी विकास होने लगा है, जिन्हें प्राकृतिक टांगों की तरह ही डिजाइन किया गया है. यूरोप में हाल ही में ऐसा ऑपरेशन हुआ है, जिसमें दुर्घटना में हाथ गंवा चुके एक शख्स के शरीर में तमाम धमनी तंत्रिकाओं के साथ कृत्रिम हाथ लगाए गए हैं. वह इस हाथ का इस्तेमाल आम लोगों की तरह कर पा रहा है
भारत में भी बायोनिक्स उपकरणों की मांग तेजी से बढ़ी है. फेस्टो का खुद भी भारत में बड़ा कारोबार है. वहां कई यूनिवर्सिटियों में बायोनिक्स की पढ़ाई हो रही है. फेस्टो का कहना है कि उनके प्रोडक्ट में इस बात का ध्यान रखा जा रहा है कि ग्रीन तकनीक का इस्तेमाल हो. कंपनी के इन्नोवेशन मैनेजर नीको पात्सेव्स्की का कहना है, "शुरू में हो सकता है कि काफी पैसे लगें लेकिन आखिर में बचत ही होती है. और चूंकि ग्रीन तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है, इस वजह से आपकी छवि भी बेहतर बनती है
यह भी रोबोट है.


"
कंपनी को इस बात की खुशी है कि उसे भविष्य की तकनीक का महत्वपूर्ण जर्मन पुरस्कार मिल चुका है. अब उसका सारा ध्यान एक स्मार्टबर्ड की तैयारी में है. बिलकुल असली पंछी की तरह दिखने वाला यह उपकरण परिंदे की तरह पंख भी फड़फड़ा सकता है. शुरुआती मॉडल बन कर तैयार है और अब इसे बेहतर करने की तैयारी चल रही है.
sabhar : dw.de


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जीपीएस तकनीक से इंसान का ऑपरेशन

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बहुत जल्द सर्जन भी रास्ता बताने वाली तकनीक का ऑपरेशन में उपयोग करेंगे. थ्री डी तस्वीरों का इस्तेमाल कर ऑपरेशन सटीक और सुरक्षित बन पाएंगे. इंफ्रारेड कैमरों ने डॉक्टरों को रास्ता दिखा दिया है.
एक मिनट के लिए सोच कर देखिए आप ऑपरेशन थिएटर में हैं और सर्जन, प्रोफेसर गेरे स्ट्राउस साइनस का ऑपरेशन करने वाले हैं. पांच मॉनिटर अर्धगोलाकार स्थिति में ऑपरेशन टेबल पर रखे हुए हैं. ऊपर एक बड़ा मॉनिटर टंगा हुआ है और बीच में दो इन्फ्रारेड कैमरे लगे हैं. गेरो स्ट्राउस कहते है जिस तरह से ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम जीपीएस कारों में इस्तेमाल किए जाते हैं ठीक उसी तरह यहां भी होगा. स्ट्राउस के मुताबिक, "कार में आपके पास सेटेलाइट होता है और यह सेटेलाइट मैप के हिसाब से कार की स्थिति बताता है."
ऑपरेशन में इंफ्रारेड कैमरे यही काम करते हैं, वो लगातार ऑपरेशन की तस्वीरें भेजते रहते हैं. एक छोटा रिसीवर उस मरीज से जुड़ा होता है जिसकी तस्वीर कैमरे से उतारी जाती है. जीपीएस सिस्टम में इस्तेमाल होने वाले मैप की जगह डॉक्टरों के पास सीटी स्कैन या फिर एमआरई की तस्वीर होती है जो उन्हें बताती है कि वो ठीक जा रहे हैं
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हाई रिजोल्यूशन वाले सिटी स्कैन और एमआरआई की तस्वीरें सर्जनों को हड्डियों, नाड़ियों और तंत्रिकाओं की अलग अलग और सूक्ष्म तस्वीरें दिखा सकती हैं. मरीज की ऑपरेशन से पहले जांच के दौरान ली गई तस्वीरों को ऑपरेशन के दौरान ही ली गई तस्वीरों से उसी वक्त तुलना की जा सकती है. इसका मतलब यह है कि सर्जन मरीज का ऑपरेशन करते वक्त ही देख समझ कर यह जान सकते हैं कि कहां क्या है और किससे बचना है. इसका असर यह होगा कि सर्जन उस हिस्से को ज्यादा बेहतर तरीके से पहचान कर निशान लगा सकेंगे. साइनस के ऑपरेशन में ऑपरेशन वाला हिस्सा चेहरे की तंत्रिकाओं के आस पास होगा. इस हिस्से पर निशान लगाने के लिए प्रोफेसर स्ट्राउस कंप्यूटर माउस का इस्तेमाल कर तस्वीर पर छोटे छोटे बिंदु से निशान लगा देते हैं और फिर सारे आंकड़े सॉफ्टवेयर की मदद से जुटा लिए जाते हैं.
स्ट्राउस बताते हैं, "कैमरा मरीज और उपरकण की स्थिति पहचान लेता है और एक दूसरे के अनुसार उनकी जानकारी दे देता है." दूरी नियंत्रक बहुत कुछ कार में लगे पार्किंग सेंसर की तरह काम करता है, लेकिन यह उसकी तुलना में बहुत ज्यादा सटीक और बारीक है. इंफ्रारेड कैमरे मरीज की स्थिति चौथाई मिलीमीटर तक बता देते हैं. यह करीब दो तीन बालों की मोटाई के बराबर होती है. अगर सर्जन किसी बेहद संवेदनशील हिस्से के जरूरत से ज्यादा करीब पहुंच जाता है तो फिर अलार्म बज जाता है और उपकरण
अपने आप ही बंद हो जाता है. रास्ता बताने वाली सारी जानकारियां एक मॉनीटर में होती हैं जबकि दूसरा मॉनीटर मरीज के शरीर के भीतरी अंगों की तस्वीर दिखाता रहता है जो इंडोस्कोप की मदद से ली जाती हैं
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ऐसी उम्मीद की जा रही है कि रास्ता बताने वाली तकनीक ऑपरेशन को सुरक्षित बना देगी. जर्मन शहर लाइपजिग के इंटरनेशनल रेफरेंस एंड डेवलपमेंट सेंटर फॉर सर्जिकल टेक्नोलॉजी(आईआरडीसी) में भविष्य के ऑपरेशन थिएटर बन रहे हैं. यहां तक कि थ्रीडी तस्वीरों के साथ काम करना भी बहुत जल्द ही मुमकिन हो जाएगा.
sabhar : dw.de

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रविवार, 15 अप्रैल 2012

क्लासरूम में दिखा रहा था छात्रा को पोर्न फिल्म और...

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कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी से जुड़े हुए फ्रैंस्को कॉलेज के पब्लिक हेल्थ प्रोफेसर पैगी गिश पर एक छात्रा ने क्लासरूम में पोर्न फिल्म दिखाने का आरोप लगाया है। बकौल कैंपसरीफोर्म.ओआरजी साइट छात्रा ने आरोप लगाया है कि पैगी ने उसे 20 मिनट की पोर्न फिल्म क्लासरूम में दिखाई।

'एडवांस्ड सेक्सुअल टेक्नीक्स, वाल्यूम वन' नामक इस वीडियो में सेक्सुअल एक्सप्लिक्ट ऑडियो और ग्राफिक्स कंटेट था। छात्रा की शिकायत के बाद प्रशासन का ध्यान इस ओर गया। ह्यूमेन सेक्सुअलटी कोर्स के नाम पर इस वीडियो को दिखाया गया था।

पैगी का बचाव करते हुए फ्रैंस्को स्टेट कॉलेज के डीन एंड्र्यू हॉफ ने बताया कि 20 मिनट का यह वीडियो ह्यूमैन सेक्सुअलटी जनरल एजुकेशन कोर्स के तहत दिखाया गया था और इसका पोर्न फिल्म से कोई संबंध नहीं था।

स्कूल प्रशासन द्वारा शिक्षा कार्यक्रम के तहत दिखाई गई इस वीडियो के कारण प्रोफेसर पर कोई शिकायत दर्ज नहीं की गई है और मामले को दबा दिया गया है। SABHAR : BHASKAR.COM

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ये है 'बाबाओं' के रहस्यमयी शक्तियों और चमत्कारों का राज!

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नई दिल्ली. अपनी रहस्यमयी शक्तियों के जरिए लोगों के कल्याण का दावा करने वाला बाबाओं का 'सच' धीरे-धीरे सामने आ रहा है। उनके चमत्कार के कायल लोगों के आंखों पर से अंधविश्वास की पट्टी धीरे-धीरे हट रही है। कहीं बिना गए वहां के बारे में बता देना। किसी से बिना मिले उस तक अपनी बात पहुंचा देना। यह जादू या चमत्कार नहीं बल्कि टेलीपैथी है।

टेलीपैथी परामनोविज्ञान की एक शाखा है। इसका मतलब है दूर रहकर आपसी सूचनाओं का बगैर किसी भौतिक साधनों के आदान-प्रदान करना। यह एक ऐसी मानसिक तकनीक है जो दूरियों के बावजूद हमारी बातों को इच्छित लक्ष्य तक पहुंचा देती है। हालांकि इसे अभी विज्ञान की कसौटी पर कसा जा रहा है। इस पर शोध हो रहे हैं। अब तक हुए शोधों में शोधकर्ताओं को सकारात्मक परिणाम मिले हैं।

टेलीपैथी दो व्यक्तियों के बीच विचारों और भावनाओं के आदान-प्रदान को कहते हैं जिसमें हमारी पांच ज्ञानेंद्रियों का इस्तेमाल नहीं होता। यानी इसमें देखने, सुनने, सूंघने, छूने और चखने की शक्ति का इस्तेमाल नहीं होता है।

टेलीपैथी शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल 1882 में फैड्रिक डब्लू एच मायर्स ने किया था। कहते हैं कि जिस व्यक्तिमें यह छठी ज्ञानेंद्रिय होती है वह जान लेता है कि दूसरों के मन में क्या चल रहा है। इंसानों को तो इस विद्या को सीखना पड़ता है किन्तु जीव-जन्तुओं में टेलीपैथी की विद्या जन्मजात पाई जाती है। ऐसा ही एक प्राणी है कछुआ जिसे इस विद्या में महारत हासिल है।

टेलीपैथी के उदाहरण हमें अत्यंत प्राचीन काल से ही देखने को मिलते हैं। वैदिक काल के ऋषि-मुनियों में इस विद्या का प्रयोग होना एक सामान्य बात थी। ऐसा ही उदाहरण रामायण में भी देखने को मिलता है। सीता की खोज करने का वचन देकर जब सुग्रीव नहीं निभाता है तो यह विचार राम के मन में खेद उत्पन्न करता है। ठीक उसी समय हनुमान के मन भी संप्रेषित हो जाता है। हनुमान तत्काल राम का विचार सुग्रीव तक पहुंचा देते हैं।

इंग्लैंड के रैडिंग विश्वविद्यालय के कैविन वॉरिक का शोध इसी विषय पर है कि किस तरह एक व्यावहारिक और सुरक्षित उपकरण तैयार किया जाए जो मानव के स्त्रायु तंत्र को कंप्यूटरों से और एक दूसरे से जोड़े। उनका कहना है कि भविष्य में हमारे लिए संपर्क का यही प्रमुख तरीक़ा बन जाएगा। sabhar : bhaskar.com

 
 

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रात के अंधेरे में भी दिखता है इस अद्भुत बच्चे को

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उसकी आंखें जन्म के समय आम इंसान की तरह काली या भूरे रंग की नहीं थीं। उसकी आंखें नीले रंग की थीं। विलक्षण आंखों वाला ये बच्चा अपने माता-पिता के साथ चीन के एक सुदूर गांव ग्वांज़ी में रहता है। उसका नाम नॉग यूहुई (nong youhui) है।



उसकी आंखों की एक और विशेषता ये है कि आंखों पर जब रोशनी पड़ती है, तो वो हल्की नीली होकर और भी चमकने लगती हैं। ठीक वैसे ही, जैसे किसी जानवर या बिल्ली की आंखों पर रोशनी पड़ते ही वो चमकने लगती हैं। जब पहली बार उसके माता-पिता को इस बारे में पता चला तो वे चिंतिंत हो गए।



ऐसा होना लाजिमी था। इसलिए उन्होंने नॉग यूहुई को स्थानीय डॉक्टर को दिखाया। डॉक्टर ने कहा कि बढ़ती उम्र के साथ ही इसकी आंखों का रंग भी अपने-आप ठीक हो जाएगा। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। ऐसे ही दिन बीतने लगे।



यह घटना 2009 की है। एक दिन उसे स्कूल में दिन के वक्त ही सूरज के उजाले में देखने पर परेशानी हुई तो उसके एक सहपाठी ने मज़ाक में कहा कि उसकी आंखें बिल्ली की आंखों की तरह दिख रही हैं। नॉग यूहुई के शिक्षक को जब इस बारे में पता चला, तो उन्होंने कंफर्म करने के लिए उसकी आंखों को टॉर्च की रोशनी में देखा। वह चौंक गईं। रोशनी पड़ते ही यूहुई की आंखें सचमुच चमक उठीं।



इसके बाद शिक्षक ने रात के अंधेरे में भी उसकी आंखें चैक की तो वह हैरान रह गए। रात के अंधेरे में उसे सब कुछ साफ-साफ दिखाई दे रहा था। नॉग यूहुई ने बताया कि वह अंधेरे में दिन की अपेक्षा ज्य़ादा स्पष्ट देख सकता है। वह अंधेरे में झींगुर को भी आसानी से पकड़ लेता है। इस घटना के बाद से ही इस अनोखी आंखों वाले लड़के की जैसे जिंदगी ही बदल गई हो।



इस बात की भनक जब कुछ देशों के डॉक्टर और वैज्ञानिकों को लगी, तो वे इसकी आंखें टैस्ट करने के लिए इसके पास आने लगे। देखते ही देखते वह पूरी दुनिया में मशहूर हो गया। उसे लोग बिल्ली जैसी आंखों वाला कहकर पुकारने लगे।



हो सकता है बहुत ही जल्द उसका नाम गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में एक ऐसे लड़के के रूप में दर्ज़ हो जाए, जो आसानी से रात के अंधेरे में देख सकता है। कई दफा वह बार-बार के टैस्ट को लेकर और मिलने वालों से परेशान भी हो जाता है sabhar : bhaskar.com

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