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शनिवार, 14 अप्रैल 2012

दवा पहुंचेगी अब माइक्रोचिप से

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कुछ समय पहले वैज्ञानिक कह रहे थे कि वे एक ऎसे माइक्रोचिप बनाना चाहते हैं जिसे मरीजों की त्वचा के नीचे लगा दिया जाए और वह समय-समय पर दवा की संतुलित मात्रा मरीज को देता रहे। तब लगता था कि वे कोई खयाली पुलाव पका रहे हैं, लेकिन अब यह परिकल्पना सच के एक कदम और करीब पहुंच गई है। 

अमरीका में वैज्ञानिक ऎसे एक माइRोचिप का एक महिला पर परीक्षण कर रहे हैं जिसे ऑस्टियोपोरोसिस है, ये एक ऎसा रोग है जिसमें हçaयां कैल्शियम की कमी से कमजोर हो जाती हैं। एक माईक्रोचिप  को उनकी कमर में लगाया गया है और उसे रिमोट कंट्रोल के जरिए शुरू कर दिया गया है। साइंस ट्रांसलेशनल मेडिसिन में प्रकाशित विवरण के अनुसार इस माइक्रोचिप के क्लिनिकल ट्रायल से पता चला है कि चिप सही मात्रा में शरीर को दवा दे रहा है और उसके कोई साइड इफेक्ट भी नहीं हैं। इस प्रयोग के बारे में अमरीकन एसोसिएशन ऑफ एडवांसमेंट ऑफ साइंस में भी चर्चा की गई है।
मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी के प्रोफेसर रॉबर्ट लैंगर इस चिप का निर्माण करने वालों में से एक हैं। ये नाखून के आकार का माईक्रोचिप   है जो दवा के छोटे-छोटे पैकेट से जुड़ा होता है। वे दावा करते हैं कि नियंत्रित हो सकने वाले इस चिप ने चिकित्सा के क्षेत्र में नई संभावनाओं को द्वार खोल दिए हैं। वे कहते हैं, "सच कहें तो आप इस चिप में दवा की दुकान डाल सकते हैं।" माइक्रोचिप लगे उपकरण को महिलाओं के कमर के पास लगाया गया है।    मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी के प्रोफेसर रॉबर्ट लैंगर इस चिप का निर्माण करने वालों में से एक हैं। ये नाखून के आकार का माइRोचिप है जो दवा के छोटे-छोटे पैकेट से जुड़ा होता है। वे दावा करते हैं कि नियंत्रित हो सकने वाले इस चिप ने चिकित्सा के क्षेत्र में नई संभावनाओं को द्वार खोल दिए हैं। वे कहते हैं, "सच कहें तो आप इस चिप में दवा की दुकान डाल सकते हैं।" माइक्रोचिप लगे उपकरण को महिलाओं के कमर के पास लगाया गया है।
मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी के प्रोफेसर रॉबर्ट लैंगर इस चिप का निर्माण करने वालों में से एक हैं। ये नाखून के आकार का माइRोचिप है जो दवा के छोटे-छोटे पैकेट से जुड़ा होता है। वे दावा करते हैं कि नियंत्रित हो सकने वाले इस चिप ने चिकित्सा के क्षेत्र में नई संभावनाओं को द्वार खोल दिए हैं। वे कहते हैं, "सच कहें तो आप इस चिप में दवा की दुकान डाल सकते हैं।" माइक्रोचिप लगे उपकरण को महिलाओं के कमर के पास लगाया गया है।  वे बताते हैं कि इस उपकरण में ऎसी सामग्री का प्रयोग किया गया है, जो शरीर को नुकसान नहीं पहुंचाते और इस उपकरण के भीतर इलेक्ट्रॉनिक्स लगे हुए है। जिसमें दवा और दवा के पैकेट दोनों होते हैं। इसके काम करने की पद्धति के बारे में बताते हैं कि हर दवा के छोटे पैकेट को प्लेटिनम और टिटेनियम की पतली झिçल्लयों से ढक कर रखा गया है। 
वे बताते हैं कि इस उपकरण में ऎसी सामग्री का प्रयोग किया गया है, जो शरीर को नुकसान नहीं पहुंचाते और इस उपकरण के भीतर इलेक्ट्रॉनिक्स लगे हुए है। जिसमें दवा और दवा के पैकेट दोनों होते हैं। इसके काम करने की पद्धति के बारे में बताते हैं कि हर दवा के छोटे पैकेट को प्लेटिनम और टिटेनियम की पतली झिçल्लयों से ढक कर रखा गया है। इस माइRोचिप को विकसित करने का काम भी साथ में चल रहा है। इस उपकरण का प्रयोग डेनमार्क में सात महिलाओं पर किया जा रहा है, जिनकी उम्र 65 से 70 वर्ष के बीच है। वैज्ञानिकों ने अपने शोध पत्र में बताया है कि इस उपकरण के जरिए दवा दिया जाना ठीक उसी तरह से प्रभावशाली साबित हो रहा है जैसा पेन-इंजेक्शन के जरिए दवा देने पर होता है और इससे हçaयों में सुधार हो रहा है। उनका कहना है कि अब तक कोई साइड इफैक्ट देखने में नहीं आया है। उन्होंने ये भी स्पष्ट किया है कि किसी दवा का प्रभावशाली होना न होना इस प्रयोग का हिस्सा नहीं है और ये प्रयोग सिर्फ इस उपकरण के लिए किया जा रहा है। हालांकि इस प्रयोग की शुरूआत मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में हुई थी लेकिन अब इसका विकास माइRोचिप इंक नाम की एक कंपनी कर रही है।  अब ये कंपनी इस उपकरण को और विकसित करने की कोशिश कर रही है जिससे कि इसमें दवा की और खुराकें डाली जा सकें। अभी जो प्रयोग किया जा रहा है उसमें उपकरण में दवा की सिर्फ 20 खुराकें ही हैं लेकिन कंपनी मानती है कि इस उपकरण में सैंकड़ों खुराक डालना संभव है। हालांकि इस उपररण को बाजार में आने में अभी भी पाँच साल का समय लगेगा।
यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, सैन डियागो में बायोइंजीनियरिंग के प्रोफेसर जॉन वाटसन ने इस शोध पर टिप्पणी करते इस उपकरण में सुधार की जरूरत बताई है। उन्होंने कहा, "शोध के दौरान एक मरीज पर ये उपकरण कारगर नहीं रहा। वह आठवीं महिला थी जिसका जिक्र शोध पत्र में नहीं किया गया है।यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, सैन डियागो में बायोइंजीनियरिंग के प्रोफेसर जॉन वाटसन ने इस शोध पर टिप्पणी करते इस उपकरण में सुधार की जरूरत बताई है। उन्होंने कहा, "शोध के दौरान एक मरीज पर ये उपकरण कारगर नहीं रहा। वह आठवीं महिला थी जिसका जिक्र शोध पत्र में नहीं किया गया है।
उनका कहना है कि इंजेक्शन लगाने के इंझट से मुक्त होने के लिए लोग इसे अपना लेंगे, खासकर ऑस्टियोपोरोसिस के मामले में जिसमें महिलाओं को पैराथॉयराइड का इंजेक्शन खुद लेना होता है। वे कहती हैं, "हालांकि ये प्रयोग अभी बहुत छोटा है लेकिन इसके नतीजे उत्साहित करने वाले हैं।" मैसाच्युसेट्स के शोधकर्ता कहते हैं कि अब इस पर विचार किया जा सकता है कि चिप्स अलग-अलग तरह की दवाओं पर नियंत्रण करे और मरीज के शरीर की स्थिति के अनरूप दवा की मात्रा तय कर सके।



    

sabhar : patrika.com

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