Network blog

कुल पेज दृश्य

शुक्रवार, 16 नवंबर 2018

पुरुषों टेस्टोस्टेरोन बढ़ाने के उपाय और तरीके

0



टेस्टोस्टेरोन हमारे शरीर में बनने वाला एक विशेष प्रकार का हार्मोन होता है जो हमारे शरीर की कई क्रियाओं को प्रभावित करता है जैसे हड्डियों की मजबूती, मासंपेशियों की मजबूती, रक्त परिसंचरण, उत्तेजना और समस्त यौन क्रिया| टेस्टोस्टेरोन हार्मोन पुरुषों और महिलाओं दोनों के शरीर में बनता है परन्तु पुरुषों के शरीर में इसकी मात्रा ज्यादा होती है और महिलाओं में इसकी मात्रा बेहद ही कम होती है|


टेस्टोस्टेरोन हार्मोन का मुख्य कार्य

हमारे शरीर को मजबूत रखने और स्टेमिना बनाये रखने में टेस्टोस्टेरोन हार्मोन का बहुत बड़ा हाथ होता है| यही हार्मोन हमें यौन क्रियाओं के लिए उत्तेजित करता है अगर इसकी कमी हो जाये शरीर हमेशा थका हुआ रहेगा और आपकी यौन जीवनशैली भी पूरी तरह प्रभावित हो जाएगी|

दरअसल, 30 वर्ष की आयु के बाद हमारे शरीर में टेस्टोस्टेरोन की मात्रा कम होनी शुरू हो जाती है परन्तु उचित खानपान का ध्यान रखा जाये तो टेस्टोस्टेरोन के लेवल को बढ़ती उम्र में बरक़रार रखा जा सकता है|

टेस्टोस्टेरोन के कार्य –

1. पुरुषों में यौन क्षमता बढ़ाने में सहायक

2. बालों की वृद्धि में सहायक

3. मांसपेशियों को मजबूत करता है

4. बॉडी बिल्डिंग करने में भी सहायक

5. हड्डियों को मजबूत बनाने में सहायक

6. दाढ़ी मूछों के बढ़ने में सहायक

7. रक्त संचरण को सुगम बनाये रखने में सहायक

नोट – शरीर में टेस्टोस्टेरोन की मात्रा ज्यादा कम हो जाये तो व्यक्ति कम उम्र में ही बूढ़ा होने लगता है और उसके अंग सक्रीय रूप से कार्य नहीं करते|

टेस्टोस्टेरोन को कैसे बढ़ायें

बाजार में टेस्टोस्टेरोन को बढ़ाने के नाम पर कई प्रकार की दवाइयां बेची जाती हैं जिनपर किसी बॉडीबिल्डर की फोटो छपी होती है और लोगों को लगता है कि इसे खाकर मेरे शरीर में भी टेस्टोस्टेरोन बढ़ जायेगा और मेरा शरीर भी मजबूत बनने लगेगा जबकि ऐसा बिल्कुल भी नहीं होता है|

बाजार में बिकने वाले इन सभी प्रोडक्ट्स को खरीदने से पहले किसी अनुभवी व्यक्ति की सलाह जरूर लें और तब ही इनको आजमाएं| सौभाग्यवश हमारे आयुर्वेद में भी कई ऐसे तरीके हैं जिनका इस्तेमाल करके आप अपने टेस्टोस्टेरोन लेवल को बढ़ती उम्र में भी बरक़रार रख सकते हैं –

भरपूर नींद लें

पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन की मात्रा घटने का सबसे बड़ा कारण है नींद कम लेना| जो पुरुष 8 घंटे से कम नींद लेते हैं उनके शरीर में टेस्टोस्टेरोन हार्मोन की मात्रा घटने लगती है| जो लोग ज्यादा बिजी रहते हैं और कम सोते हैं उनको लगता है कि वो कम नींद लेकर भी काम चला लेते हैं लेकिन धीरे धीरे यह आदत उनके शरीर और उनकी यौन क्षमता को बुरी तरह प्रभावित करती है|

दरअसल, हमारे शरीर में 70% टेस्टोस्टेरोन सोते समय ही बनता है इसीलिए पूरी नींद लेना बहुत जरुरी है इससे शरीर को ना केवल आराम मिलता है बल्कि टेस्टोस्टेरोन बनने से आपकी मांसपेशियों भी सक्रीय होकर काम करती हैं|

मानसिक तनाव ना लें

किसी महापुरुष ने कहा है कि – “चिंता चिता के समान होती है” ये बात 100% सत्य है| जब भी हम तनाव में होते हैं तो हमारे शरीर में कोर्टिसोल नाम के हार्मोन का स्राव होने लगता है और यह हार्मोन टेस्टोस्टेरोन के उत्पादन को रोक देता है और टेस्टोस्टेरोन हार्मोन को नुकसान भी पहुंचाता है| डॉक्टर्स कहते हैं कि ज्यादा तनाव में रहने वाले लोगों में यौन क्षमता की कमी हो जाती है इसका कारण टेस्टोस्टेरोन की कमी हो जाना ही है|

इसलिए मानसिक तनाव से दूर रहें ताकि आपके शरीर में टेस्टोस्टेरोन का लेवल हमेशा बरक़रार रहे|

उच्च प्रोटीन वाला नाश्ता करें

सुबह का नाश्ता आपके लिए दिन भर की एनर्जी का कार्य करता है| सुबह का नाश्ता कभी मिस ना करें क्यूंकि आप सारी रात से भूखे होते हैं ऐसे में सुबह शरीर को एनर्जी के लिए कुछ ताकत चाहिए होती है अगर आप नाश्ता नहीं करते तो यह आदत भी आपके टेस्टोस्टेरोन लेवल को खराब कर सकती है|

नाश्ते में उच्च प्रोटीन वाली चीज़ें खाएं – जैसे अंडा, मछली, दूध या दही से बनी चीज़ें आदि

अधिक जिंक वाले तत्वों का सेवन करें

जिन सब्जियों में अधिक जिंक की मात्रा होती है वह सभी पौरुष क्षमता को बढ़ाने में कारगर होती हैं इसलिए अधिक जिंक वाले तत्वों का सेवन जरूर करें| जिंक के लिए आप अंडा, पालक, लहसुन, मशरूम, राजमा, फलियां, अलसी के बीज, तिल, लाल मीट, ब्राउन राइस आदि का सेवन करें इन सबमें जिंक प्रचुर मात्रा में होता है|

मोटापे पर पाएं काबू

जो लोग बहुत अधिक मोटे होते हैं उनके शरीर में टेस्टोस्टेरोन का लेवल असंतुलित हो जाता है| शरीर में ज्यादा चर्बी होना टेस्टोस्टेरोन के निर्माण में बाधक साबित होता है| इसलिए अपने मोटापे को कण्ट्रोल में करें|

मोटापा कम करने के लिए आप भूखे ना रहें क्यूंकि इससे तो टेस्टोस्टेरोन लेवल और भी कम हो जायेगा और शरीर भी कमजोर हो जायेगा| आप उचित खानापान और जीवनशैली को ध्यान में रखकर मोटापे को कण्ट्रोल करें|

व्यायाम जरूर करें

बढ़ती उम्र में टेस्टोस्टेरोन के लेवल के कम हो जाने की सबसे बड़ी वजह यही है कि लोगों की जिंदगी व्यस्त होती चली जाती है और लोग व्यायाम से दूर होते चले जाते हैं| व्यायाम ना करने के आपका पाचन तंत्र ठीक प्रकार से कार्य नहीं करता और शरीर में एनर्जी का लेवल भी बिगड़ जाता है|

जो लोग रोजाना व्यायाम करते हैं जो जल्दी बूढ़े नहीं होते हैं और उनके शरीर में बढ़ती उम्र में भी टेस्टोस्टेरोन की कमी नहीं होती है| व्यायाम करने का सबसे अच्छा तरीका है – जॉगिंग या दौड़ लगाना|

मेथी के बीज

जो लोग बॉडी बिल्डिंग करते हैं वो इस बात से भली भांति परिचित होंगे कि मेथी के बीज यानि fenugreek extracts हमारे टेस्टोस्टेरोन को बढ़ाने में कितने सहायक हैं| मेथी के बीजों का सेवन करने से टेस्टोस्टेरोन का लेवल चमत्कारी रूप से बढ़ता है|

मेथी के बीजों का इस्तेमाल करने के लिए आप रात को एक चम्मच मेथी दाने पानी में भिगोकर रख दें और सुबह उठकर खाली पेट इन दानों का चबा लें और ऊपर से मेथी का पानी भी पी जाएँ| इसके रोजाना इस्तेमाल से टेस्टोस्टेरोन के लेवल में बढ़ोतरी होती है|

अंगूर का सेवन करें

अंगूर के सेवन करने से भी शरीर में टेस्टोस्टेरोन की मात्रा बढ़ जाती है| अतः अंगूर के मौसम में खूब अंगूर खाएं इससे आप लम्बे समय तक जवान रहेंगे| जो लोग डायबिटीज के मरीज हैं उनको अंगूर के ज्यादा सेवन से बचना चाहिए क्यूंकि इससे उनकी शुगर बढ़ सकती है|

मीठे पदार्थों का सेवन कम करें

जी हाँ, अगर आपके शरीर में टेस्टोस्टेरोन हार्मोन की कमी है तो आपको मीठी चीज़ों का सेवन कम कर देना चाहिए| जब भी आप मीठी चीज़ों का सेवन करते हैं तो इससे शरीर में इन्सुलिन हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है और इसके कारण टेस्टोस्टेरोन को काफी नुकसान होता है|

खूब पियें पानी

जब भी हमारे शरीर में पानी की कमी हो जाती है तो इसका सीधा प्रभाव हमारे टेस्टोस्टेरोन लेवल पर पड़ता है| लम्बे समय तक प्यासे ना रहें आपके शरीर का सूखापन आपको अंदर से कमजोर बना देगा| टेस्टोस्टेरोन हार्मोन को बढ़ाने के लिए पानी भरपूर पियें|

तो मित्रों इस लेख में हमने आपको टेस्टोस्टेरोन हार्मोन और टेस्टोस्टेरोन को बढ़ाने के उपायों के बारे में विस्तार से बताया है और हमें पूरी उम्मीद है कि यह लेख आपके बेहद काम आएगा| इस लेख को सोशल मिडिया पर भी शेयर जरूर करें ताकि आपके मित्र भी इस जानकारी का लाभ उठा सकें| धन्यवाद!!सभार https://www.nirogijivan.com/


Read more

बुधवार, 14 नवंबर 2018

Suchira singh ki kalam se

0




आदरणीय मेयर उमेश गौतम जी (बरेली), ( भूड़ मोहल्ले में भी कोई बंदर किसी मां का आंचल सूना ना कर दे)

.................आज बरेली के अखबार में एक खबर पढ़कर दिल दहल गया। खबर थी कि एक बंदर मां की गोद से नवजात बच्चा छीनकर ले गया, इससे पहले मां कुछ करती बंदर ने बच्चे को जमीन पर पटक दिया और बच्चे का चेहरा नोच दिया।बच्चे की मौत हो गई। कुछ ऐसा ही आतंक हमारे भूड़ मोहल्ले में बंदरों ने मचा रखा है। यहां छतों पर बंदर हर समय डटे रहते हैं।सड़क पर फैले कूडे के ढेर पर ना जाने कितने बंदर खाने का सामान टटोलते रहते हैं। सड़क से गुजरने वाले राहगीर और बच्चों को बंदर काट खाने को दोड़ते हैं।

स्कूली बच्चे हैं दहशत में
........पास ही छोटे बच्चों का स्कूल है, जिनको बंदर कई बार काट चुके हैं। साथ ही कन्या डिग्री कालेज हैं जहां छात्राएं बंदरों से बचती-बचाती कालेज तक पहुंचती है। मोहल्ले की घर की खिड़की व दरवाजों के सामने बंदर खाने की चीजों को छीनने के लिए बैठे रहते है। जिसके चलते वह घरों में हर समय दरवाजा बंद कर रहने को मजबूर हैं।

माएं अपने नवजातों को आंचल में छुपा लेती हैं
.........मोहल्ले में कुछ नवजात बच्चे हैं जिनकी माएं हमेशा डर के साए में रहती हैं। ना जाने कब बंदर उनके बच्चे को नुकसान पहुंचा दें। काट लें, या उठाकर ले जाएं।

दीवाली पर न हो सकी सजावट
........बंदरों के आतंक के चलते इस बार मोहल्ले के घर दीवाली की सजावट से महरूम रह गए। लोगों ने घरों को अंदर से सजाया, बाहर से नहीं। क्योंकि बंदर सारी सजावट उधेड़ देते हैं।इस बार मोहल्ले वालों की दीवाली फीकी रही। लोगों ने खुद को सुरक्षित करने के लिए जाल लगवा रखे हैं।इंसान पिंजरे में और बंदर खुलेआम घूम रहे हैं।

पूर्व मेयर से काफी बार शिकायत की जा चुकी है।
........पूर्व मेयर डा. आई एस तोमर व सुप्रिया ऐरन से भी इस बावत कई बार शिकायत की जा चुकी है। मगर कोई एक्शन-रिएक्शन या कारवाई नहीं हुई। इस बार मोहल्ले वालों ने आपको मेयर के रूप में चुना है, वो आपसे उम्मीद कर रहे हैं कि शायद आप उनके इस डर को काबू में कर सकें। जिस समस्या का हल पूर्व मेयर ना निकाल सके, आप निकाल लें।

कहीं उपर्युक्त घटना की तरह कोई बंदर किसी मां के आंचल से उसका दुलारा ना छीन जाए और आंचल सूना ना कर दे। (फोटो अगली पोस्ट में)

धन्यवाद
सुचित्रा सिंह
(पत्रकार व एक्ट्रेस)


Read more

24 घंटे' असर करेगी गोली

0

  समाचार
'चौबीस घंटे' असर करेगी गोली
यह नई दवाई चौबीस घंटे तक अपना असर बरक़रार रखेगी
यह नई दवाई चौबीस घंटे तक अपना असर बरक़रार रखेगी

नपुंसकता के शिकार पुरुष अब एक नई दवाई की बदौलत रात दिन जब चाहें यौन संबंध क़ायम करने में सक्षम रहेंगे.

सियालिस नाम की इस दवाई को बनाने वालों का दावा है कि इसका असर चौबीस घंटे तक रहेगा.

अब तक काम आने वाली गोली वायग्रा यौन क्रिया शुरू करने से एक घंटे पहले लेनी होती थी और वह सिर्फ़ चार घंटे ही प्रभावी रहती थी.


अब तक इस बाज़ार पर वायग्रा का ही एकाधिकार था
लेकिन वायग्रा की तरह ही यह दवाई भी नुस्ख़े से ही मिलेगी, जो चाहे उसे नहीं.

इस दवाई की निर्माता कंपनी लिली यूके का कहना है कि इससे दम्पत्ति अधिक सहज और स्वाभाविक रूप से यौन क्रिया का आनंद ले सकते हैं.

जब चाहे...

उनके लिए कोई समय के बंधन नहीं होंगे.

एक ख़ास बात और. इस दवा का असर तो पूरे दिन रहेगा लेकिन यौन क्रिया की ज़रूरत उत्तेजित होने पर ही महसूस होगी.

पुरुष आमतौर पर तभी उत्तेजित होते हैं जब शारीरिक संपर्क या इस तरह के विचार उनके दिमाग़ में आते हैं.

उस समय एक रासायनिक तत्व पैदा होता है जो उनकी यौनेंद्रिय की रक्त वाहिकाओं को फैला देता है.

एक ख़ास एंज़ाइम

यह रासायनिक तत्व एक विशिष्ट एंज़ाइम से नियंत्रित होते हैं और इस एंज़ाइम की कमी से ही यह नपुंसकता पैदा होती है.


लंबे समय तक असर करने वाली इस गोली की वजह से लोग उन्मुक्त भाव से यौन क्रिया का आनंद ले पाएँगे.
डॉक्टर पैट ग्रिफ़िथ
सियालिस गोली इसी एंज़ाइम को जीवित रखती है और उसकी वजह से रक्त का प्रवाह रुकने नहीं पाता.

डरहम के एक चिकित्सक डॉक्टर पैट ग्रिफ़िथ कहते हैं कि इस गोली की वजह से लोग उन्मुक्त भाव से यौन क्रिया का आनंद ले पाएँगे.

उनका कहना है, "लंबे समय तक असर करने वाली इस गोली का यह फ़ायदा है कि लोग यह भूल जाएँगे कि उन्होंने दवा ली हुई है. इससे यौन संबंधों की स्वाभाविकता बनी रहेगी".

एक मनोचिकित्सक डॉक्टर सिंथिया मैकवी कहती हैं, "किसी हड़बड़ी की ज़रूरत नहीं होगी. लोग आराम से रोमांस कर सकते हैं. पार्क में टहल सकते हैं या साथ बैठ कर भोजन का आनंद ले सकते हैं".

जिन मरीज़ों पर इसका परीक्षण हुआ है उनमें से एक ऐलेन का कहना है, "मेरी उम्र साठ साल से ज़्यादा है लेकिन मुझे लगता है कि मुझे अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध क़ायम रखने चाहिए".

"इस दवाई से मनोवैज्ञानिक रूप से मैं बेहतर महसूस कर रहा हूँ".

ब्रिटेन में ही देखा जाए तो लगभग तेइस लाख लोग नपुसंकता से पीड़ित हैं. लेकिन इलाज दस में से एक का ही हो पाता है.
 
 

 असर
बोतल बंद पानी कितना सुरक्षित
?
बिगफ़ुट है या नहीं?


Sabar bbchindi.com

Read more

शनिवार, 3 नवंबर 2018

चीन / दुनिया का पहला फोल्डेबल स्मार्टफोन लॉन्च, 7.8 इंच के टैबलेट को बना सकते हैं 4 इंच का फोन

0

worlds first foldable smartphone flexpai launched in china

फोल्डेबल स्मार्टफोन की कीमत 95,400 रुपए से शुरू
अमेरिकी स्टार्टअप कंपनी रोयॉल ने फोल्डेबल स्मार्टफोन लॉन्च किया
सैमसंग और हुवावे जैसी बड़ी कंपनियों से यह उम्मीद थी
Dainik Bhaskar
Nov 02, 2018, 11:16 AM IST
गैजेट डेस्क. अमेरिकी कंपनी रोयॉल ने दुनिया का पहला फोल्डेबल स्मार्टफोन गुरुवार को चीन में हुए एक ईवेंट में लॉन्च कर दिया। इस स्मार्टफोन का नाम 'Flexpai' रखा गया है। तकनीकी तौर पर ये फोन एक टैबलेट की तरह ही है क्योंकि इसमें 7.8 इंच की स्क्रीन दी गई है, लेकिन इसे मोड़कर 4 इंच का फोन बनाया जा सकता है।

सैमसंग, हुवावे जो नहीं कर पाए वह स्टार्टअप ने कर दिखाया
सैमसंग पहली और हुवावे दुनिया की दूसरी बड़ी स्मार्टफोन कंपनी है। यह उम्मीद की जा रही थी कि इन दोनों में से कोई एक दुनिया का पहला फोल्डेबल स्मार्टफोन पेश करेगी। लेकिन, 6 साल पुरानी अमेरिकी स्टार्टअप कंपनी रॉयोल ने ऐसा कर दिखाया।

पहला फोन जिसमें 7nm स्नैपड्रैगन 8150 प्रोसेसर का इस्तेमाल
Flexpai न सिर्फ दुनिया का पहला फोल्डेबल स्मार्टफोन है बल्कि ये दुनिया का ऐसा पहला फोन भी है जिसमें 7nm स्नैपड्रैगन 8150 प्रोसेसर का इस्तेमाल हुआ है।
इसके अलावा इसमें कंपनी की आरओ-चार्जिंग टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया है और कंपनी का दावा है कि इसकी मदद से बैटरी को 0-80% तक चार्ज होने में सिर्फ एक घंटे का समय लगेगा।



सिर्फ फ्रंट में ही कैमरा, उसी से ले सकेंगे फोटो : इसके फ्रंट में ड्युअल कैमरा दिया गया है जिसका प्राइमरी सेंसर 16 मेगापिक्सल और सेकेंडरी सेंसर 20 मेगापिक्सल का है। इसके जरिए ही सेल्फी और फोटो ले सकते हैं।

95,400 रुपए से शुरू है इसकी कीमत
Flexpai को तीन वैरिएंट में लॉन्च किया गया है, जिसका 6 जीबी रैम, 128 जीबी स्टोरेज वाला वैरिएंट 8,999 युआन (करीब 95,400 रुपए) से शुरू होता है।
वहीं 8 जीबी रैम, 128 जीबी स्टोरेज वैरिएंट की कीमत 9,998 युआन (करीब 1.06 लाख रुपए) और 8 जीबी रैम, 512 जीबी स्टोरेज वाले वैरिएंट की कीमत 12,999 युआन (करीब 1.38 लाख रुपए) रखी गई है।

स्पेसिफिकेशन
डिस्प्ले 7.8 इंच
प्रोसेसर 7nm स्नैपड्रैगन 8150
रैम 6 जीबी/ 8 जीबी
स्टोरेज 128 जीबी/ 512 जीबी
कैमरा 16+20 मेगापिक्सल
बैटरी 3,800mAh
ओएस एंड्रॉयड 9.0
सिक्योरिटी फिंगरप्रिंट सेंसर
sabhar :bhaskar.com

Read more

रविवार, 4 मार्च 2018

तो क्या रोबोट छीन लेंगे ये नौकरियां?

0

Erstes Roboter-Restaurant in Dhaka (Asaduzzaman Pramanik)


रोबोट अब ऑपरेशन थिएटर में भी पहुंच गए हैं. लेकिन इन्हें चलाना तो डॉक्टरों को ही पड़ता है. और अगर रोबोट को संभालने के लिए मुश्किल सॉफ्टवेयर से जूझना पड़े, तो यह मदद की जगह परेशानी का सबब बन सकते हैं.
आने वाले सालों में 40 फीसदी नौकरियां रोबोट के हाथों में होंगी. जानिए वह कौन कौन सी नौकरियां हैं, जो इन मशीनों ने करनी शुरू भी कर दी हैं या फिर जल्द करने वाले हैं और जहां शायद भविष्य में इंसानों की कोई जरूरत ना रह जाए.
जर्मनी की डाक सेवा डॉयचे पोस्ट ने इनका इस्तेमाल शुरू कर दिया है. पीले रंग के रोबोट डाक ले कर लोगों के घर तक जाते हैं. हालांकि क्योंकि अभी इन्हें सीढ़ियां चढ़ना नहीं आता है, इसलिए एक व्यक्ति मदद के लिए इनके साथ रहता है.
तो क्या रोबोट छीन लेंगे ये नौकरियां?
सेल्समैन
आप दुकान में पहुंचें और एक रोबोट आपसे पूछे कि बताइए, मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूं. यह किसी फिल्म का सीन नहीं है, बल्कि ऐसा होने लगा है. जर्मनी में पॉल नाम का रोबोट इलेक्ट्रॉनिक्स के स्टोर पर काम करता है.
पिज्जा के लिए मशहूर डॉमिनोज काफी समय से डिलीवरी वाले रोबोट पर काम कर रहा है. बहुत जल्द आपके घर पिज्जा की डिलीवरी रोबोट किया करेगा. और हो सकता है कि यह उड़ता हुआ ड्रोन के रूप में आप तक पहुंचे.
पुलिस
इन्हें पब के बाहर बॉडीगार्ड के रूप में भी खड़ा किया जा सकता है और घरों के बाहर सुरक्षा के लिए भी तैनात किया जा सकता है. दुबई में बुर्ज खलीफा के बाहर खड़ा यह रोबोट पुलिस का काम कर रहा है.
ऑपरेशन थिएटर में रोबोट का इस्तेमाल अब कई सालों से हो रहा है. डॉक्टर किसी वीडियो गेम की तरह रोबोट को चलाता है. उसे स्क्रीन पर सब कई गुना बड़ा नजर आता है.
बारटेंडर
अगर रोबोट खाना खिला सकता है, तो ड्रिंक्स भी तो पिला सकता है. बोतल खोल कर ग्लास में बियर डालने का काम रोबोट बखूबी कर लेते हैं, और तो और इन्हें टिप भी नहीं देना पड़ता.
सफाई
बाजार में इस तरह के कई रोबोट उपलब्ध हैं, जो खुद ही आपके घर की सफाई कर सकते हैं. ये दरअसल वैक्यूम क्लीनर हैं, जिन्हें आपको पकड़ने की कोई जरूरत नहीं है. ये खुद ही घर में घूमते रहते हैं और कूड़ा जमा करते रहते हैं.
खेती
फसल को काटने का काम भी रोबोट करते हैं. इन्हें बता दिया जाता है कि कहां तक खेत हैं, इन्हें किस दायरे में घूमना है और कटाई जमीन से कितने सेंटीमीटर ऊपर से करनी है. सारी मेहनत ये मशीनें खुद ही कर लेती हैं.
ऑनलाइन कंपनी एमेजॉन के गोदाम में पैकेजिंग का काम रोबोट करते हैं. ये रोबोट खुद ही तय कर लेते हैं कि किस पैकेट को कहां रखना है. सब कुछ ऑटोमेटेड है.
आने वाले समय में इस पेशे पर भी खतरा है. कई जगह रिपोर्ट बनाने के लिए रोबोट का इस्तेमाल होने भी लगा है, खास कर खेल जगत में. रोबोट समाचार एजेंसियों द्वारा मिली सामग्री को मिला जुला कर इंसानों की ही तरह रिपोर्ट लिख सकता है.
टीचर
बहुत मुमकिन है कि भविष्य में क्लासरूम में टीचर की जगह रोबोट खड़ा मिले. क्या क्या पढ़ाना है, यह रोबोट में प्रोग्राम किया जा सकता है. ऑनलाइन यूनिवर्सिटी आज हकीकत हैं. लोग स्क्रीन के आगे बैठ कर तो पढ़ाई करते ही हैं, रोबोट के आगे भी किया करेंगे.
पेंटर
रोबोट कलात्मक काम भी करते हैं. इस रोबोट का नाम बसकर है और यह इंसानों की ही तरह पेंटिंग बनाता है. हर कैनवास पर अलग चित्र, अलग अंदाज. क्या पता भविष्य में रोबोट की पेंटिंग्स की प्रदर्शनी भी लगा करे.
रसोइया
फ्रिज में क्या क्या सामान रखा है, इसे देख कर रोबोट खुद ही तय कर सकता है कि खाने में क्या बनेगा. अगर आपकी कोई खास फरमाइश है, तो रोबोट दुकान पर सामग्री का ऑर्डर भी दे सकता है.
नागरिकता भी
सोफिया पहली ऐसी ह्यूमनॉइड रोबोट है जिसे किसी देश की नागरिकता मिल गयी है. 2017 में सऊदी अरब ने इसे अपना पासपोर्ट दिया. यह भारत समेत कई देश घूम चुकी है.

और भी बहुत कुछ
बहुत कुछ मुमकिन है. पब में बारटेंडर से ले कर वकीलों के दफ्तर में रिसर्च करने वाले पैरालीगल तक, सब काम रोबोट संभाल सकते हैं. तो क्या साइंस फिक्शन फिल्मों की तरह भविष्य में इंसान रोबोट से घिरा दिखा करेगा? यह तो वक्त ही बताएगा.

रिपोर्ट: ईशा भाटिया  sabhar dw:de


























Read more

बुधवार, 25 अक्तूबर 2017

योग के बाद अब ध्यान में डूबते अमेरिकी

0

बाहरी दुनिया शोर गुल से भरी है और भीतर मन की उथल पुथल है. ऐसे में क्या ध्यान शांति दे पाएगा? योग के बाद अब ध्यान अमेरिका को अपनी आगोश में ले रहा है.
Frau Büro Yoga (Colourbox)
शाम के पांच बजते ही 31 साल की जूलिया लायंस अपना काम काज समेटती हैं. न्यू यॉर्क से सटे शहर मैनहटन में रहने वाली जूलिया सीधे ध्यान केंद्र की ओर बढ़ती हैं. वहां वह आधे घंटे गहरे ध्यान में डूबने की कोशिश करेंगी. जूलिया इनवेस्टमेंट बैंकर हैं. अप्रैल 2016 में अचानक उन्होंने ध्यान शुरू किया. ध्यान केंद्र के सोफे में बैठकर वह कहती हैं, "मैं शांति का एक लम्हा चाहती हूं. इस शहर में आप हमेशा भाग रहे होते हैं और यहां कोई भी ऐसा कोना नहीं जहां शांति हो."
योग भले ही दुनिया भर में मशहूर हो चुका हो, लेकिन ध्यान अभी भी चुनिंदा लोगों तक ही सीमित है. पश्चिम में अब तक ध्यान को आध्यात्मिकता की ओर् झुके हुए लोगों से जोड़कर देखा जाता रहा है. लेकिन अब तस्वीर बदल रही है. अमेरिका के कई अस्पतालों में गंभीर बीमारियों के इलाज में ध्यान की मदद ली जा रही है. स्कूलों में टेलिविजन के जरिये ध्यान सिखाया जा रहा है. स्मार्टफोन तक सिमट चुकी जिंदगी का ही नतीजा है कि अमेरिका में अब निर्वाण और ध्यान बड़ा कारोबार बन रहा है.
2015 में ग्रीनविच नाम के गांव में लोड्रो रिंजलर ने मेडिटेशन स्टूडियो खोला. अब ब्रुकलिन और मैनहटन में भी उनके दो स्टूडियो हैं. लॉस एजेंलेस, मियामी, वॉशिंगटन और बॉस्टन में भी कई मेडिटेशन स्टूडियो खुल चुके हैं. रिंजलर कहते हैं, "यहां न्यू यॉर्क के समाज के हर तबके के लोग आते हैं. सब एक ही बात कहते हैं कि मुझे बहुत तनाव है. मैं जानना चाहता हूं कि अपने मन को कैसे नियंत्रित करूं."
Krankheit Kopfschmerzen (Colourbox)
तनाव और भाग दौड़ से भरी जिंदगी
ज्यादातर शहरों में ध्यान के आधे घंटे का सेशन 10 डॉलर का है. स्टूडियो में हल्की रोशनी होती है, खास तरह की सुगंध होती है और ऑर्गेनिक टी भी मिलती है.
सिलिकॉन वैली की कई कंपनियां भी अपने कर्मचारियों के लिए ध्यान के कोर्स आयोजित कर रही हैं. हॉलीवुड की पूर्व अभिनेत्री एमिली फ्लेचर ने 2012 में कंपनियों के कर्मचारियों के लिए मेडिटेशन कोर्स शुरू किया. शुरूआत में सिर्फ 150 लोग थे. आज यह संख्या 7,000 से ज्यादा है. ऑनलाइन कोर्स के जरिये वह क्लीवलैंड, ओहायो और फ्लोरिडा जैसे शहरों तक पहुंचना चाहती हैं.
जीवा मेडिटेशन की प्रमुख एमिली फ्लेचर कहती हैं, "मैं कंपनियों के सीईओ को ध्यान सिखाती हूं और इससे उन्हें फायदा होता है और वो मुझे अपनी कंपनी तक ले जाते हैं. शुरूआत में कर्मचारी स्वार्थ के कारण ध्यान सत्र में हिस्सा लेते हैं. एमिली के मुताबिक, "वे बेहतर ढंग से बात करना चाहते हैं, अपने बॉस को खुश रखना चाहते हैं, ज्यादा पैसा कमाना चाहते हैं या फिर सेक्स लाइफ बेहतर करना चाहते हैं."
लेकिन एमिली उनसे एक ही बात कहती हैं, "अगर आप ध्यान करने लगेंगे तो आप अपने जीवन का आनंद लेने लगेंगे, आपका मस्तिष्क बेहतर ढंग से काम करेगा, आपके शरीर को अच्छा अहसास होगा, आप कम बीमार पड़ेंगे." अमेरिका में अब ध्यान के ऐप्स भी तेजी से फैलने लगे हैं. सबसे लोकप्रिय ऐप्स में से एक है, हेडस्पेस. अब तक इसे 1.1 करोड़ बार डाउनलोड किया जा चुका है. इसके 4,00,000 पेड यूजर्स हैं.

Read more

बुधवार, 23 अगस्त 2017

समाधि का पहला अनुभव कैसा होता है?

0



होगा तो ही जानोगे। कहा जा सके, ऐसा नहीं है। कुछ-कुछ इशारे किये जा सकते हैं। जैसे अंधेरे में अचानक दीया जल जाये, ऐसा होता है। या जैसे बीमार मरता हो और अचानक कोई दवा लग जाये...मरते-मरते कोई दवा लग जाये; और जीवन की लहर, जीवन की पुलक फिर फैल जाये--ऐसा होता है। जैसे कोई मुर्दा जिंदा हो जाये--ऐसा होता है समाधि का पहला अनुभव।

अमृत का अनुभव है। परम संगीत का अनुभव है। पर होगा तो ही होगा। और होगा तो ही तुम समझ पाओगे; मेरे कहने से समझ में न आ सकेगा। प्रेम में जैसा होता है। अब कोई किसी को कैसे समझाये? जिसने प्रेम न किया हो, जिसने प्रेम जाना न हो, उसके सामने तुम कितना लाख सिर पटको, कितनी व्याख्या करो--सुन लेगा सब, मगर फिर भी पूछेगा कि मेरी कुछ समझ में नहीं आया, कुछ और थोड़ी व्याख्या करिए।

ऐसा ही जैसे अंधे को तुम प्रकाश समझाओ, या बहरे को नाद समझाओ--नहीं समझ में आ सकेगा। जिसके नासापुट खराब हो गये हैं, जिसे गंध नहीं आती, उसे गंध का कोई अनुभव कैसे बताओगे? अनुभव कभी भी शब्दों में बांधे नहीं जा सकते, लेकिन कुछ इशारे किये जा सकते हैं।

गीत प्राणों में जगे, पर भावना में बह गए!
एक थी मन की कसक,
जो साधनाओं में ढली, कल्पनाओं में पली;
पंथ था मुझको अपरिचित, मैं नहीं अब तक चली,
प्रेम की संकरी गली;
बढ़ गए पग, किंतु सहसा
और मन भी बढ़ गया;
लोक-लीकों के सभी भ्रम, एक पल में ढह गए!
गीत प्राणों में जगे, पर भावना में बह गए!

वह मधुर वेला प्रतीक्षा की मधुर अनुहार थी,
मैं चकित साभार थी;
कह नहीं सकती हृदय की जीत थी, या हार थी,
वेदना सुकुमार थी;
मौन तो वाणी रही, पर
भेद मन का खुल गया;
जो न कहना चाहती थी, ये नयन सब कह गए!
गीत प्राणों में जगे, पर भावना में बह गए!

कल्पना जिसकी संजोई सामने ही पा गई,
वह घड़ी भी आ गई;
छवि अनोखी थी हृदय पर छा गई,
मन भा गई; देखते शरमा गई;
कर सकी मनुहार भी कब
मैं स्वयं में खो गई;
और अब तो प्राण मेरे कुछ ठगे-से रह गए!
गीत प्राणों में जगे, पर भावना में बह गए!

जैसे अचानक तुम्हारे हृदय में एक गीत जगे। जैसे अचानक, अनायास; अकारण तुम्हारे भीतर एक रस का झरना फूट पड़े!


पंथ था मुझको अपरिचित, 

मैं नहीं अब तक चली
प्रेम की संकरी गली!


और अचानक प्रेम जग जाये...ऐसा अनुभव है समाधि का प्रथम अनुभव। जैसे पतझड़ था और अचानक वसंत आ जाये! और जहां रूखे-सूखे वृक्ष खड़े थे, हरे हो जाएं, लद जायें पत्तों से, फूल खिल जायें--ऐसा अनुभव है समाधि का प्रथम।


बढ़ गए पग, किंतु सहसा और जिसके भीतर प्रेम जगा या जिसके भीतर प्रकाश जगा, या जिसे नाद सुनाई पड़ा, फिर उसके पैर सहसा बढ़ जाते हैं। फिर भय नहीं पकड़ता। जिसके भीतर प्रेम जगा, वह सब भय छोड़ देता है। इसलिए तो गणित, हिसाब बिठानेवाले लोग कहते हैं कि प्रेम अंधा होता है--कि जहां आंखवाले जाने से डरते हैं, वहां प्रेमी चला जाता है। जहां आंखवाले कहते हैं सावधान, सावधान, बचो, झंझट में पड़ोगे--वहां प्रेमी नाचता और गीत गुनगुनाता प्रवेश कर जाता है।


इसलिए समझदार प्रेमी को अंधा कहते हैं। असलियत उलटी ही है। समझदारों के सिवाय कोई और अंधा नहीं। प्रेमी के पास ही आंख होती है। अगर प्रेम आंख नहीं है तो फिर और आंख कहां होगी?
पंथ था मुझको अपरिचित, मैं नहीं अब तक चली
प्रेम की संकरी गली;
बढ़ गए पग, किंतु सहसा
और मन भी बढ़ गया;
लोक-लीकों के सभी भ्रम, एक पल में ढह गए!
ऐसा है समाधि का पहला अनुभव। अब तक की सारी धारणाएं, अब तक के सारे पक्षपात, अब तक के सारे सिद्धांत, शास्त्र, ऐसे बह जायेंगे, जैसे वर्षा का पहला पूर आया नदी में और सब कूड़ा-करकट किनारों का ले गया...सब बह गया।
वह मधुर वेला प्रतीक्षा की मधुर अनुहार थी,
मैं चकित साभार थी;
हां, चकित होकर रह जाओगे खड़े; सोच न सकोगे क्या हो रहा है। विचार बंद हो जायेंगे। सोचने का अवसर नहीं है। सोचने के पार कुछ घट रहा है।
वह मधुर वेला प्रतीक्षा की मधुर अनुहार थी,
मैं चकित साभार थी;
कह नहीं सकती हृदय की जीत थी, या हार थी,
कहना कठिन है--कौन जीता, कौन हारा? क्योंकि वहां दो नहीं हैं, इसलिए जीत कहो तो ठीक, हार कहो तो ठीक। एक अर्थ में हार है, क्योंकि मिट गये; दूसरे अर्थ में जीत है, क्योंकि परमात्मा हो गये। एक अर्थ में हार है बूंद की कि बूंद मिट गई, दूसरे अर्थ में जीत है कि बूंद सागर हो गई।
कह नहीं सकती हृदय की जीत थी, या हार थी,
वेदना सुकुमार थी;
पर इतना पक्का है कि वह जो पीड़ा थी बड़ी प्रिय थी, बड़ी मीठी थी। कहा नहीं गोरख ने--मरण है मीठा! तिस मरणी मरो, जिस मरणी गोरख मरि दीठा। बड़ी मीठी प्रीति है, बड़ी मीठी प्रीतिकर मृत्यु है!
कल्पना जिसकी संजोई सामने ही पा गई
सच तो यह है, तुमने जितनी कल्पनाएं संजोई हैं, सब छोटी पड़ जाती हैं सत्य के समक्ष। तुमने जो मांगा था उससे बहुत ज्यादा मिलता है, जब मिलता है; छप्पर तोड़कर मिलता है।
वह घड़ी भी आ गई
जिसका भरोसा भी नहीं होता था कि आ जायेगी; घड़ी आती है।
वह घड़ी भी आ गई
छवि अनोखी थी हृदय पर छा गई, मन भा गई;
देखते शरमा गई,
भरोसा नहीं आता कि मेरी ऐसी पात्रता! कि प्यारा मिलेगा, कि प्रियतम से मिलन होगा।
कर सकी मनुहार भी कब
कहते कुछ न बना। स्वागत के दो शब्द न बोले जा सके...।
मैं स्वयं में खो गई;
और अब तो प्राण मेरे कुछ ठगे-से रह गए!


समाधि का पहला अनुभव, जैसे बिलकुल ठग गए, जैसे बिलकुल लुट गये...। हारे कि जीते, पता नहीं; इतना-भर पक्का है कि सीमाएं टूट गईं, संकीर्णताएं टूट गईं--उतरा पूरा आकाश। कबीर ने कहा है: बुंद में समुंद समाना...। बूंद में समुद्र समा गया। सीमा में असीम आ गया, दृश्य में अदृश्य...। जो गोचर था उसके भीतर अगोचर खड़ा हो गया।


समाधि का पहला अनुभव इस जगत का सर्वाधिक बहुमूल्य अनुभव है। और फिर अनुभव पर अनुभव है, कमल पर कमल खिलते चले जाते हैं। फिर कोई अंत नहीं है, फिर पंक्तिबद्ध कमल खिलते चले जाते हैं। फिर ऐसा कभी होता ही नहीं कि समाधि के अनुभव कम पड़ते हैं, बढ़ते ही चले जाते हैं। इसलिए परमात्मा को अनंत कहा है, कि उसका अनुभव कभी चुकता नहीं है।


जीसस के जीवन में उल्लेख है कि जब बपतिस्मा वाले जॉन ने--यह भी एक अदभुत आदमी था जॉन--जीसस को दीक्षा दी। जीसस के गुरु थे जॉन। जोर्दन नदी में जीसस को ले जाकर जब उन्होंने जल से दीक्षा दी तो बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गयी थी, क्योंकि जॉन कह रहा था कि जिस आदमी के लिए दीक्षा देने को मैं रुका हूं, वह आया, अब आया, अब आया, आने ही वाला है। तो बहुत भीड़ इकट्ठी हो गयी थी उस आदमी को देखने। और जब जीसस आये तो जॉन ने कहा, आ गया यह आदमी, इसी को दीक्षा देने के लिए मैं रुका था; मेरा काम अब पूरा हो गया। अब यह सम्हालेगा। मैं बूढ़ा भी हो चुका हूं।


जब जीसस को दीक्षा दी जोर्दन नदी में तो कहानी बड़ी प्रीतिकर बात कहती है--ये प्रतीक हैं--कि एक सफेद कबूतर अचानक आकाश से उतरा और जीसस में समा गया...। यह तो प्रतीक है। सफेद कबूतर शांति का प्रतीक है। कोई वस्तुतः कबूतर आकाश से उतरकर जीसस में नहीं समा गया, लेकिन जरूर कोई सफेदी अचानक आकाश से उतरती हुई अनुभव हुई होगी बहुत लोगों को--जैसे बिजली कौंध गई हो! जिनके पास जरा-सी भी आंख थी...और आंखवाले लोग ही इकट्ठे हुए होंगे। किसको पड़ी है? जॉन जोर्दन नदी में जीसस को दीक्षा दे रहा है, किसको पड़ी है? प्यासे इकट्ठे हुए होंगे। जिन्हें थोड़ी बूंदें लग गयी थीं, वे इकट्ठे हुए होंगे। जिन पर थोड़े रंग के छींटे पड़ गये थे, वे इकट्ठे हुए होंगे। जिन पर थोड़ी जॉन की गुलाल पड़ गयी थी, वे इकट्ठे हुए होंगे। देखा होगा एक ज्योतिर्पुंज, जैसे उतरा आकाश से और जीसस में समा गया...। और जॉन ने तत्क्षण कहा कि मेरा काम पूरा हुआ। जिसके लिए मैं प्रतीक्षा कर रहा था, वह आ गया। अब मैं विदा हो सकता हूं।


वह समाधि का पहला अनुभव था जीसस के लिए। समाधि का जब पहला अनुभव किसी को होता है तो उसे तो होता ही है, उसके आसपास भी भनक पड़ जाती है। कहते हैं, जब बुद्ध को समाधि का पहला अनुभव हुआ तो बेमौसम फूल खिल गये। यह भी प्रतीक है, जैसे कबूतर; कबूतर यहूदियों का प्रतीक है--शांति का प्रतीक। फूल का खिल जाना भारतीय प्रतीक है--बेमौसम, अचानक...। जब भी किसी को समाधि फलती है--बेमौसम का फूल है समाधि; क्योंकि इस पृथ्वी पर मौसम ही कहां है समाधि के खिलने के लिये! इस पृथ्वी पर समाधि न खिले, यह तो बिलकुल सामान्य बात है; समाधि खिले, यही असामान्य है। यह पृथ्वी तो रेगिस्तान है, यहां हरियाली कहां, रसधार कहां? जब कभी उतर आती है तो बेमौसम का फूल है। नहीं होना था और हुआ, चमत्कार है! समाधि चमत्कार है!


अनुभव तुम्हें होगा तो ही जान पाओगे। या जिन्हें अनुभव हुआ हो उनके पास बैठो, उठो, शायद किसी दिन सफेद कबूतर उतरता दिखाई पड़े, या अचानक फूल खिलते दिखाई पड़ जायें।

मेरे आंगन श्वेत कबूतर!
उड़ आया ऊंची मुंडेर से, मेरे आंगन श्वेत कबूतर!

गर्मी की हल्की संध्या यों--
झांक गई मेरे आंगन में,
झरीं केवड़े की कुछ बूंदें
किसी नवोढ़ा के तन-मन में;

लहर गई सतरंगी-चूनर, ज्यों तन्वी के मृदुल गात पर!
उड़ आया ऊंची मुंडेर से, मेरे आंगन श्वेत कबूतर!

मेरे हाथ रची मेहंदी, उर--
बगिया में बौराया फागुन,
मेरे कान बजी बंसी-धुन
घर आया मनचाहा पाहुन;

एक पुलक प्राणों में, चितवन एक नयन में, मधुर-मधुरतर!
उड़ आया ऊंची मुंडेर से, मेरे आंगन श्वेत कबूतर!

कोई सुंदर स्वप्न सुनहले--
आंचल में चंदा बन आया,
कोई भटका गीत उनींदा,
मेरी सांसों से टकराया;
छिटक गई हो जैसे जूही, मन-प्राणों में महक-महक कर!
उड़ आया ऊंची मुंडेर से, मेरे आंगन श्वेत कबूतर!

मेरा चंचल गीत किलकता
घर-आंगन देहरी-दरवाजे।
दीप जलाती सांझ उतरती
प्राणों में शहनाई बाजे;

अमराई में बिखर गए री, फूल सरीखे सरस-सरस स्वर!
उड़ आया ऊंची मुंडेर से, मेरे आंगन श्वेत कबूतर!

आता है उतर एक श्वेत कबूतर समाधि के पहले अनुभव में। चारों तरफ फूल खिल जाते हैं। वंशी की धुन बज उठती है। भीतर कोई शहनाई बजाने लगता है। सारे नाद जगते हैं।

मेरे कान बजी वंशी-धुन
घर आया मनचाहा पाहुन

आ गया मेहमान जिसकी प्रतीक्षा है--अतिथि। जानते हो न, इस देश में हमने मेहमान को अतिथि इसलिए कहा कि वह बिना तिथि बतलाये आता था। परमात्मा ही एकमात्र अतिथि बचा है अब तो, बाकी सब अतिथि तो तिथि बतलाकर आते हैं। अब तो खबर कर देते हैं कि आ रहे हैं। वे यह कह देते हैं कि धक्का एकदम से देना ठीक नहीं; आ रहे हैं, सम्हल जाओ, कि तैयार कर लो अपने को। क्योंकि अतिथि को देखकर अब कोई प्रसन्न तो होता नहीं। पहले से खबर आ जाती है तो तैयारी हो जाती है, गाली-गलौज जो देनी है दे लेते हैं लोग। पत्नी को जो कहना होता है कह लेती है। पति को जो कहना होता है कह लेते हैं। तब तक आते-आते शिष्टाचार वापिस लौट आता है। एकदम से आ जाओ, कौन जाने सच्ची बातें निकल जायें। कहना तो यही पड़ता है कि धन्यभाग, कि आप को देखकर बड़ा हृदय प्रफुल्लित हो रहा है! यह मन की बात नहीं। मन की बात कुछ और है। ठीक ही है पश्चिम का रिवाज कि पहले खबर कर दो, ताकि लोग तैयारी कर लें, अपने हृदय मजबूत कर लें।


अब तो परमात्मा ही एकमात्र अतिथि बचा है--तिथि नहीं बतलाता। उसकी कोई भविष्वाणी नहीं हो सकती कब आयेगा। समाधि का पहला अनुभव कब घटेगा, कोई भी नहीं कह सकता। अनायास, बेमौसम...। सच तो यह है, जब तुम प्रतीक्षा नहीं कर रहे थे, बिलकुल नहीं कर रहे थे, तब घटता है। क्योंकि जब तक तुम प्रतीक्षा करते हो, तुम तने ही रहते हो। तुम्हारे चित्त में तनाव रहता है। तुम राह देखते हो तो तुम पूरे संलग्न नहीं हो पाते। राह देखना भी विचार है, और विचार बाधा है। जब तक तुम सोचते हो अब हो जाये, अभी तक नहीं हुआ--तब तक तो तुम चिंताओं से घिरे हो; बदलियां घिरी हैं, सूरज निकले तो कैसे निकले? आता है आकस्मिक, अनायास--जब तुम सिर्फ बैठे होते हो...कुछ भी नहीं कर रहे होते, ध्यान भी नहीं कर रहे होते--समाधि का पहला अनुभव तब होता है। क्योंकि जब तुम ध्यान भी कर रहे होते हो, तब भी तुम्हारे मन में कहीं वासना सरकती रहती है--शायद अब हो जाये, अब होता होगा; अभी तक नहीं हुआ, बड़ी देर लगाई! शिकायतें उठती रहती हैं।
ध्यान करते-करते, करते-करते एक दिन ऐसी घड़ी घटती है कि तुम बैठे होते हो, ध्यान भी नहीं कर रहे होते हो, शांत होते हो, बस स्वस्थ होते हो, मौन होते हो--और आ गया!

मेरे कान बजी वंशी-धुन
घर आया मनचाहा पाहुन

छिटक गई हो जैसे जूही, मन-प्राणों में महक-महक कर!

मेरा चंचल गीत किलकता
घर-आंगन देहरी-दरवाजे।
दीप जलाती सांझ उतरती
प्राणों में शहनाई बाजे,

अमराई में बिखर गए री, फूल सरीखे सरस-सरस स्वर!

घटती है घटना। परिभाषा मत पूछो, राह पूछो। पूछो कि कैसे घटेगी, यह मत पूछो कि क्या घटता है? क्योंकि कहा नहीं जा सकता। बताने का कोई उपाय नहीं है। यह बात कहने की नहीं है, यह बात जानने की है। लेकिन विधि बताई जा सकती है, इशारा किया जा सकता है--ऐसे चलो, ऐसे सम्हलो। चित्त निर्विचार हो, शांत हो, अपेक्षा-शून्य हो, वासना, तृष्णा से मुक्त हो--बस उसी क्षण में। जब भी ऐसी वसंत की घड़ी तुम्हारे भीतर सज जायेगी--बज उठती है भीतर की शहनाई; खिल जाते हैं बेमौसम फूल; उतर आती है कोई किरण आकाश से और कर जाती है तुम्हें सदा के लिए और, भिन्न। फिर तुम दोबारा वही न हो सकोगे। समाधि का पहला अनुभव--और स्नान हो गया!
सदियों-सदियों से तुम गंदे हो। धूल जम गई है बहुत, लंबी यात्राएं की हैं। समाधि का पहला अनुभव सारी धूल बहा ले जाता है। सारी धारणाएं, सारी धारणाओं के जाल--सब समाप्त हो जाते हैं; तुम निर्दोष हो जाते हो।
कहा नहीं गोरख ने कि जैसे छोटा बालक भीतर जन्मता है--अंतर के शून्य में एक बालक बोल उठे, एक नये जीवन का आविर्भाव! समाधि में तुम्हारी मृत्यु हो जाती है।
मरौ हे जोगी मरौ...। अहंकार मर जाता है। तुम मिट जाते हो और परमात्मा हो जाता है।

चौथा प्रश्न: प्यारे प्रभु!
प्रश्नों के अंबार लगे हैं
उत्तर चुप हैं,
कौन सहेजे इन कांटों को
बगिया चुप है, माली चुप है
प्रश्न स्वयं में रहता चुप है
दिनकर चुप है, रातें चुप हैं
उठी बदरिया कारी-कारी
लगा अंधेरा बिलकुल घुप है
प्रभु, इस स्थिति का निराकरण करने की अनुकंपा करें।

कन्नूमल! जब तक प्रश्न हैं तब तक उत्तर चुप रहेंगे। प्रश्नों के कारण ही उत्तर चुप हैं। प्रश्नों से उत्तर नहीं मिलता; जब प्रश्न चले जाते हैं और चित्त निष्प्रश्न हो जाता है तब उत्तर मिलता है। प्रश्नों की भीड़ में ही तो उत्तर खो गया है।


ठीक कहते हो तुम: प्रश्नों के अंबार लगे हैं, उत्तर चुप हैं।


उत्तर चुप रहेंगे ही। प्रश्न इतना शोरगुल मचा रहे हैं, उत्तर बोलें तो कैसे बोलें? और खयाल रखना, प्रश्न अनेक होते हैं, उत्तर एक है। उत्तर तो एकवचन है, प्रश्न बहुवचन। प्रश्नों की भीड़ होती है। जैसे बीमारियां तो बहुत होती हैं, स्वास्थ्य एक होता है। बहुत तरह के स्वास्थ्य नहीं होते। तुम किसी से कहो कि मैं स्वस्थ हूं तो वह यह नहीं पूछता कि किस प्रकार के स्वस्थ, कौन-सी भांति के स्वास्थ्य में हो? लेकिन किसी से कहो मैं बीमार हूं तो तत्क्षण पूछता है--कौन-सी बीमारी? बीमारियां बहुत हैं, स्वास्थ्य एक है। प्रश्न बहुत हैं, उत्तर एक है। और बहुत प्रश्नों के कारण वह एक उत्तर पकड़ में नहीं आता। भीड़ लगी है प्रश्नों की, सच कहते हो। चारों तरफ प्रश्न ही प्रश्न हैं...प्रश्न से प्रश्न निकलते जाते हैं, खड़े होते जाते हैं, मिटते जाते हैं, नये बनते जाते हैं। तुम इतने घिरे हो प्रश्नों से यह सच है। मगर इसी कारण उत्तर चुप है।


तुम कहते हो: प्रश्नों के अंबार लगे हैं, उत्तर चुप हैं।


उत्तर चुप नहीं है; उत्तर भी बोल रहा है; लेकिन उत्तर एक है और प्रश्न अनेक हैं। नक्कारखाने में तूती की आवाज जैसे खो जाये...। बाजार में, शोरगुल में कोई धीमे-धीमे स्वर में गीत गाये, जैसे खो जाये, ऐसा ही सब खो गया है।


उत्तर पाया जा सकता है। उत्तर दूर भी नहीं है। उत्तर बहुत निकट है। उत्तर तुम हो। उत्तर तुम्हारे केंद्र में बसा है। जरा प्रश्नों को जाने दो। प्रश्नों को मूल्य मत दो। प्रश्नों को बहुत ज्यादा अर्थ भी मत दो। प्रश्नों से धीरे-धीरे उदासीन हो जाओ। प्रश्नों को सहयोग मत दो, सत्कार मत दो। प्रश्नों की उपेक्षा करो। प्रश्नों के प्रति तटस्थ हो जाओ। क्योंकि जो प्रश्नों में चला गया, वह दर्शनशास्त्र के जंगल में भटक जाता है। तुम प्रश्नों को चलने दो, आने दो, जाने दो। ऐसे ही देखो प्रश्नों की भीड़ को, जैसे तुम रास्ते पर चलते लोगों को देखते हो--न कुछ लेना, न कुछ देना--असंग-भाव से, दूर खड़े...। तुम्हारे और तुम्हारे प्रश्नों के बीच जितनी दूरी बढ़ जाये, उतना हितकर है; क्योंकि उसी अंतराल में उत्तर उठेगा।


बुद्ध के पास जब भी कोई जाता था, कोई प्रश्न पूछने, तो बुद्ध कहते: रुक जाओ, दो वर्ष रुक जाओ। दो वर्ष चुप बैठो मेरे पास, फिर पूछ लेना।
ऐसा हुआ, एक बड़ा दार्शनिक बुद्ध के पास गया। मौलुंकपुत्त उसका नाम था। जाहिर दार्शनिक था। उसने बड़े प्रश्नों के अंबार लगा दिये। बुद्ध ने प्रश्न सुने और कहा कि मौलुंकपुत्त, तू सच ही उत्तर चाहता है? अगर सच ही चाहता है, कीमत चुका सकेगा? 
मौलुंकपुत्त ने कहा: जीवन मेरा अंत होने के करीब आ रहा है। जीवन-भर से ये प्रश्न पूछ रहा हूं। बहुत उत्तर मिले, लेकिन कोई उत्तर उत्तर साबित नहीं हुआ। हर उत्तर में से नये प्रश्न निकल आये हैं। किसी उत्तर में समाधान नहीं हुआ है। आप क्या कीमत मांगते हैं? मैं सब कीमत चुकाने को तैयार हूं। मैं इन प्रश्नों के हल चाहता ही हूं। मैं इनका समाधान लेकर इस पृथ्वी से जाना चाहता हूं। फिर, बुद्ध ने कहा, ठीक है। क्योंकि लोग उत्तर तो मांगते हैं, मगर कीमत चुकाने को राजी नहीं होते; इसलिए मैंने तुझसे पूछा। फिर दो साल तू चुप बैठ जा, यह कीमत है। तू मेरे पास दो साल चुप बैठ, बोलना ही मत। जब दो साल बीत जायेंगे, मैं खुद ही तुझसे पूछूंगा कि मौलुंकपुत्त, अब पूछ ले। फिर तू पूछ लेना तुझे जो पूछना हो। और आश्वासन देता हूं कि सब उत्तर दे दूंगा, सब निराकरण कर दूंगा! मगर दो साल बिलकुल चुप,सन्नाटा...दो साल बात मत उठाना। मौलुंकपुत्त सोच ही रहा था कि हां कहूं कि ना, क्योंकि दो साल लंबा वक्त है और इस आदमी का क्या भरोसा, दो साल बाद देगा भी उत्तर कि नहीं? उसने कहा कि आप पक्का विश्वास दिलाते हैं कि दो साल बाद उत्तर देंगे? बुद्ध ने कहा: बिलकुल विश्वास दिलाता हूं, तू पूछेगा तो दूंगा। तू पूछेगा ही नहीं तो मैं किसको उत्तर दूंगा? तभी एक भिक्षु पास के एक वृक्ष के नीचे बैठा ध्यान कर रहा था। खिलखिलाकर हंसने लगा। मौलुंकपुत्त ने पूछा: यह भिक्षु क्यों हंस रहा है? बुद्ध ने कहा: तुम्हीं पूछ लो। उस भिक्षु ने कहा कि अगर पूछना हो, अभी पूछ लो। यही धोखा मेरे साथ हुआ। हम भी ऐसे ही बुद्धू बने! मगर यह बात सच कह रहे हैं वे कि अगर पूछोगे तो दो साल बाद उत्तर देंगे, मगर दो साल बाद कौन पूछता है! दो साल से मैं चुप बैठा हूं। अब वे मुझसे कुरेद-कुरेद कर पूछते हैं कि पूछो भाई, मगर दो साल चुप रहने के बाद पूछने को कुछ बचता नहीं, उत्तर मिल ही जाता है। अगर पूछना हो तो अभी पूछ लो, नहीं तो दो साल बाद फिर पूछने को कुछ न बचेगा। और यही हुआ, मौलुंकपुत्त दो वर्ष रुका। दो वर्ष पूरे हुए, बुद्ध भूले नहीं, तिथित्तारीख सब याद रखी। ठीक दो साल पूरे होने पर, मौलुंकपुत्त तो भूल ही गया था, क्योंकि जिसके विचार धीरे-धीरे शांत हो जायें, उसे समय का बोध भी खो जाता है। क्या समय का हिसाब, कौन दिन आया, कौन वर्ष आया, क्या हिसाब! सब जा चुका था, सब बह चुका था। जरूरत भी क्या थी! बैठना था रोज बुद्ध के पास तो शुक्र हो कि शनि, कि रवि हो कि सोम, सब बराबर था। आषाढ़ हो कि जेठ, गर्मी हो कि सर्दी, सब बराबर था। भीतर तो एक ही रस था--शांति का, मौन का। दो वर्ष पूरे हो गये, बुद्ध ने कहा: मौलुंकपुत्त, तुम खड़े हो जाओ। खड़ा हो गया मौलुंकपुत्त। बुद्ध ने कहा: अब तुम पूछ लो, क्योंकि मैं अपने वचन से मुकरता नहीं। तुम्हें कुछ पूछना है? मौलुंकपुत्त हंसने लगा और उसने कहा: वह भिक्षु ठीक कहा था। मेरे पास पूछने को अब कुछ भी नहीं है। उत्तर आ ही गया। आपकी कृपा से उत्तर आ ही गया।

उत्तर दिया नहीं गया और आ गया ! उत्तर बाहर से आता ही नहीं, उत्तर भीतर से आता है। ऐसा ही समझो, जैसे कोई कुआं खोदता है तो पहले कंकड़-पत्थर निकलते हैं, कूड़ा-करकट निकलता है, सूखी जमीन निकलती है, फिर गीली जमीन आती है, फिर कीचड़ निकलती है, फिर जलस्रोत...। 

जलस्रोत तो दबे पड़े हैं। तुम्हारे प्रश्नों की ही पर्त-पर्त जम गयी है, उसी के नीचे जलस्रोत दबा पड़ा है। खुदाई करो, इन प्रश्नों को हटाओ। और हटाने का उपाय एक ही है: जाग कर साक्षी-भाव से इन प्रश्नों के प्रवाह को देखते रहो। सिर्फ देखते रहो इस प्रवाह को, कुछ मत करो। बैठ जाओ रोज घंटे-दो-घंटे, चलने दो प्रवाह को। जल्दी भी न करना कि आज ही बंद हो जाये।

इसलिए बुद्ध ने कहा, दो साल। कोई तीन महीने के बाद पहली सरसराहट सन्नाटे की शुरू होती है। और कोई दो साल होतेऱ्होते अनुभव पक जाता है। बस कोई इतना धीरज भी रखे कि दो घंटे रोज बैठता रहे, कुछ न करे...। उस कुछ न करने में सारी कला छिपी है।


लोग पूछते हैं: बुद्ध को पहली समाधि कैसे घटी? बैठे थे वृक्ष के नीचे, कुछ कर नहीं रहे थे, तब घटी। छह साल तक बहुत कुछ किया--बड़े यम, व्यायाम, प्राणायाम, न मालूम क्या-क्या किया। सब करके थक गये थे, उस रात तय करके सोये कि अब कुछ नहीं करना, हो गया बहुत। करने से भी कुछ नहीं होता। उस रात करना भी छोड़ दिया। उस रात बिलकुल बिना करने की अवस्था में सो गये। शून्य भाव था। सुबह आंख खुली और समाधि द्वार पर खड़ी थी। जिस मेहमान की प्रतीक्षा थी, वह आ गया। आखिरी तारा डूबता था सुबह का और भीतर बुद्ध के आखिरी विचार डूब गया। उधर आखिरी तारे से आकाश खाली हुआ, इधर आखिरी विचार भी डूब गया। समाधि आ गयी, उत्तर आ गया। इसीलिए तो समाधि कहते हैं उसे, क्योंकि उसमें समाधान है।

सांझ आई, चुप हुए धरती-गगन
नयन में गोधूलि के बादल उठे
बोझ से पलकें झपीं नम हो गईं
सांझ ने पूछा, उदासी किसलिए?
किंतु मेरे पास कुछ उत्तर नहीं!

रात आई, कालिमा घिरती गई
सघन तम में द्वार मन के खुल गए
दाह की चिनगारियां हंसने लगीं
रात ने पूछा, जलन यह किसलिए?
किंतु मेरे पास कुछ उत्तर नहीं!

नींद आई, चेतना सब मौन है
देह थककर सो गई, पर प्राण को
स्वप्न की जादूभरी गलियां मिलीं
नींद ने पूछा, भुलावे किसलिए?
किंतु मेरे पास कुछ उत्तर नहीं!
प्रश्न तो बिखरे यहां हर ओर हैं
किंतु मेरे पास कुछ उत्तर नहीं!

तुम प्रश्नों को पकड़ो ही मत, उत्तर तुम्हें मिलेंगे भी नहीं। कोई कभी प्रश्नों के सहारे चलकर उत्तर पाया भी नहीं। तुम प्रश्न उठने दो, यह मन की खुजलाहट है। खुजलाहट ठीक शब्द है। कभी-कभी खुजलाहट उठती है, तुम खुजा लेते हो--बस ऐसे ही मन की खुजलाहट हैं प्रश्न। खुजा लेने से कुछ हल नहीं होता, लेकिन न खुजाओ तो भी बेचैनी होती है। खुजा लेने से थोड़ी-सी क्षण-भर को राहत मिलती है। बस ऐसे ही तुम्हारे उत्तर हैं। एक उत्तर पकड़ लिया, थोड़ी देर राहत मिलती है। जल्दी ही उस उत्तर में से भी प्रश्न निकल आयेंगे। फिर राहत खो जायेगी, फिर उत्तर की तलाश शुरू हो जायेगी।


कन्नूमल तुम ठीक कहते हो: प्रश्नों के अंबार लगे हैं उत्तर चुप हैं


कौन सहेजे इन कांटों को
बगिया चुप है, माली चुप है
प्रश्न स्वयं में रहता चुप है
दिनकर चुप है, रातें चुप हैं
उठी बदरिया कारी कारी
लगा अंधेरा बिलकुल घुप है
प्रश्नों के अंबार लगे हैं
उत्तर चुप हैं।


उत्तर चुप रहेंगे। उत्तर बोलते नहीं। तुम बोलना जब बंद कर दोगे, तत्क्षण उन्हें पहचान लोगे। तुम्हारी वाणी खो जायेगी और तुम पाओगे--शून्य तुम्हारे भीतर बोला, मौन तुम्हारे भीतर बोला। उस मौन में अचानक समाधान है, सब प्रश्नों का उत्तर है; क्योंकि उस मौन में शांति है, सुख है, परम आनंद है।


तुमने एक बात खयाल की, प्रश्न उठते दुख के कारण हैं! दुख प्रश्नों का जन्मदाता है। जैसे तुम्हारे सिर में दर्द होता है तो तुम पूछते हो सिर में दर्द क्यों है? जब नहीं होता तो तुम यह नहीं पूछते कि सिर में दर्द क्यों नहीं है? तुम्हें जब बीमारी होती है तो तुम पूछते हो डाक्टर से जाकर कि बीमार क्यों हूं, कारण? लेकिन जब तुम स्वस्थ होते हो तब तुम डाक्टर के पास जाकर नहीं पूछते कि मैं स्वस्थ क्यों हूं, कारण? स्वास्थ्य में कोई प्रश्न नहीं उठता, बीमारी में प्रश्न उठता है। दुख से प्रश्नों का जन्म होता है, सुख में प्रश्न क्षीण हो जाते हैं।


तुम जैसे ही अपने भीतर शांत हो जाओगे और थोड़े-से सुख की झलक पाओगे, हैरान हो कर पाओगे--प्रश्न खो गये! कौन पूछता है, किसलिए पूछता है! दर्द ही न रहा तो दर्द से जन्मनेवाले प्रश्न कैसे बच सकते हैं? वे अपने-आप समाप्त हो जाते हैं। - ओशो


http://myspiritualitydiscourses.blogspot.in/2014/09/osho.html

Read more

बुधवार, 2 अगस्त 2017

dusare ke man ki baat kaise jaane

0




Read more

गुरुवार, 25 मई 2017

सेक्स से एलर्जी

0


default

शर्म और अज्ञान
भारत में हर साल लाखों शादियां होती हैं और शादी के बाद कई महिलाओं और कुछ पुरुषों की तबियत खराब रहने लगती है. शर्म के चलते और जानकारी के अभाव में ज्यादातर मामलों में गलत इलाज होता है. झाड़ फूंक का भी सहारा लिया जाता है. विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसे ही मामले दुनिया भर में होते हैं, और कई के लिए एलर्जी जिम्मेदार होती है.


क्या है स्पर्म एलर्जी
बॉन मेडिकल कॉलेज के डेर्माटोलॉजिस्ट और एलर्जी विशेषज्ञ जां पियर अला के मुताबिक, "हर बार सेक्स के बाद कुछ महिलाओं की तबियत खराब हो जाती है. उनके जननांगों में सूजन हो जाती है या खुजली होने लगती है." 35 फीसदी मामलों में इसके लिए शुक्राणुओं से होने वाली एलर्जी जिम्मेदार होती है.

एलर्जी के लक्षण
ज्यादातर महिलाओं में स्पर्म एलर्जी के लक्षण और भी गंभीर होते हैं. सेक्स के बाद उनके पूरे शरीर में सिलसिलेवार तरीके से रिएक्शन होने लगता है. बार बार टॉयलेट जाना, कमजोरी महसूस करना और बदन में खुजली जैसी समस्याएं सामने आती हैं. ज्यादा एलर्जिक रिक्शन होने पर तो सांस लेने में मुश्किल भी होने लगती है.

प्राणघातक लक्षण
एलर्जी विशेषज्ञ जां पियर अला के मुताबिक, एलर्जी अगर इससे भी ज्यादा गंभीर हो तो "इससे शरीर और दिमाग को सदमा पहुंच सकता है जिसके चलते रोगी चक्कर खाकर गिर सकता है, मौत भी हो सकती है." यह खतरा खाने या श्वास संबंधी एलर्जी में भी सामने आता है.

खुद के शुक्राणु से एलर्जी
इस एलर्जी का शिकार सिर्फ महिलाएं नहीं होती हैं. पुरुषों को भी अपने ही शुक्राणुओं से एलर्जी हो सकती है. आम तौर पर शुक्राणु निकलने के बाद अगर पुरुष के जननांगों में खुजली या जलन रहे, पेशाब करने में असुविधा हो सकती है.

वीर्य की जटिल संरचना
शुक्राणुओं में कई तत्वों का जटिल मिश्रण होता है. वीर्य में शरीर के अपने प्रोटीन और प्रोस्टेट स्पेशिफिक एंटीजेन (पीएसए) शामिल होते हैं. म्यूनिख के एलर्जी विशेषज्ञ श्टेफान वाइडिंग्नर और मिषेल कोह्न ने 2005 में इससे जुड़ा शोध प्रकाशित किया.

अंडकोष में छुपी एलर्जी
प्रोस्टेट स्पेशिफिक एंटीजेन (पीएसए) असल में पुरुष के अंडकोष में पाया जाना वाला प्रोटीन है. प्रोस्टेट कैंसर की जांच के लिए भी खून में पीएसए की मात्रा नापी जाती है. पीएसए, वीर्य को तरल और चिकना बनाने का काम करता है ताकि वह शुक्राणुओं को मादा के जननांग में भीतर तक फेंककर अंडाणुओं से मिला सके.

बेहद जरूरी है सावधानी
ब्राजील के मामले का जिक्र करते हुए बॉन मेडिकल कॉलेज के विशेषज्ञ आलां कहते हैं, "पार्टनर को पता था कि उसकी गर्लफ्रेंड को मूंगफली से एलर्जी है, इसलिए उसने टूथपेस्ट से दांत साफ किए और हाथ भी धोए. लेकिन इसके बावजूद एलर्जी पैदा करने वाले तत्व वीर्य के जरिए महिला के शरीर में पहुंच गए." जननांगों के आस पास की त्वचा लाल हो गई, उसमें जलन होने लगी.

भ्रम में डालने वाले लक्षण
वीर्य से होने वाली एलर्जी बहुत ही जटिल और भ्रम पैदा करने वाली भी होती है. आलां कहते हैं, "रोगियों ने ऐसे लक्षण भी बताए हैं जो एलर्जी से बिल्कुल भी मेल नहीं खाते. जैसे सिरदर्द, थकान, फ्लू जैसे लक्षण और ये वीर्य के संपर्क में आने के बाद दो दिन से लेकर हफ्ते भर तक बने रहते हैं."


शर्म ने बिगाड़े हालात
इस पर बहुत ज्यादा शोध भी नहीं हुआ है क्योंकि महिलाएं डॉक्टर के सामने भी खुलकर बात करने में शर्माती हैं. दूसरी ओर डॉक्टर भी अक्सर इस रोग को पकड़ने के बजाए इनफेक्शन की दवा दे देते हैं.

एलर्जी पहचानने के तरीके
स्किन एलर्जी टेस्ट, पीओआईएस में एलर्जिक रिक्शन टेस्ट के जरिये इसका पता लगाया जा सकता है. इन टेस्टों में पता चला है कि कई पुरुषों को अपने ही वीर्य के प्रोटीन से एलर्जी होती है. वैसे भी बार बार सर्दी, जुकाम, सांस आदि की परेशानी होने पर भी एलर्जी टेस्ट करवाना चाहिए. हमें पता होना चाहिए कि हमारा शरीर क्या खाने या क्या सूंघने से गड़बड़ाता है

एलर्जी विशेषज्ञ की अहमियत
विशेषज्ञों की सलाह है कि अगर सेक्स के बाद आपकी या आपके पाटर्नर की तबियत गड़बड़ाती है तो एलर्जी एक्सपर्ट से मिलें. सावधानी के लिए कंडोम का इस्तेमाल किया जा सकता है, हालांकि यह भी 100 फीसदी सुरक्षित नहीं है.

स्पर्म एलर्जी से कैसे बचें
एलर्जिक रिएक्शन के बावजूद बच्चा चाहने वाले जो़ड़ों के पास तीन विकल्प हैं. आलां कहते हैं, अगर पूरे बदन के बजाए एक ही जगह पर एलर्जिक लक्षण हों तो "वे एलर्जिक रिक्शन कम करने वाले एंटीहिस्टेमाइंस ले सकते हैं. यह एलर्जिक रिएक्शन को कम करेगा."

सावधानी ही सुरक्षा
दूसरा विकल्प है: कम से कम तीन दिन के अंतराल में सेक्स करना. शुरुआत में सेक्स के दौरान पार्टनर के जननांगों में कम से कम वीर्य छोड़ना. विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर तीन दिन नहीं रुके तो एलर्जी भड़केगी और अगर तीन दिन से ज्यादा देर कर दी तो एलर्जी टॉलरेंस पावर नष्ट हो जाएगी. एक्सपर्ट्स के मुताबिक इलाज के जरिये ऐसा करना ज्यादा सरल और सुरक्षित है.

लैब का रास्ता
संतान की चाह रखने वाले जोडो़ं के लिए तीसरा विकल्प है: लैब फर्टिलिटी के जरिये. इस प्रक्रिया में वीर्य से पीएसए निकाल दिया जाता है और फिर शुक्राणुओं को महिला के अंडाणु में डाला जाता है.

पानी फायदेमंद
जब कभी जननांगों, पेट और गुर्दों में एलर्जिक रिएक्शन या फिर इनफेक्शन सा लगे, तो खूब पानी पीजिए. पानी शरीर में मौजूद विषैले तत्वों को मूत्र के साथ बाहर कर देता है. जिन पुरुषों को प्रोस्टेट की समस्या हो, वे ऐसा न करें.

साफ रहो, सुखी रहो
अच्छी सेहत में साफ सफाई बड़ी भूमिका निभाती है और यह बात सेक्स पर भी लागू होती है. शारीरिक संबंध बनाने से पहले, मुंह, हाथों और जननांगों की अच्छे से सफाई करना कई समस्याओं से बचा सकता है. सेक्स के बाद भी इनकी सफाई होनी चाहिए. बेहतर तो है कि नहाकर अंतवस्त्र भी बदले जाएं.
रिपोर्ट: फाबियान श्मिट, ओंकार सिंह जनौटी

शर्म और अज्ञान
भारत में हर साल लाखों शादियां होती हैं और शादी के बाद कई महिलाओं और कुछ पुरुषों की तबियत खराब रहने लगती है. शर्म के चलते और जानकारी के अभाव में ज्यादातर मामलों में गलत इलाज होता है. झाड़ फूंक का भी सहारा लिया जाता है. विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसे ही मामले दुनिया भर में होते हैं, और कई के लिए एलर्जी जिम्मेदार होती है.




बहुत कम जानकारी

स्पर्म एलर्जी की खोज 1958 में हॉलैंड के एक डॉक्टर ने की. लेकिन कई दशक गुजरने के बाद भी लोग इसके बारे में करीब करीब अंजान हैं. सेक्स को लेकर बात करने में शर्मिंदगी की आदत ने हालात और बदत्तर किये हैं.

क्याएलर्जी के लक्षणक्या है स्पर्म एलर्ज

बॉन मेडिकल कॉलेज के डेर्माटोलॉजिस्ट और एलर्जी विशेषज्ञ जां पियर अला के मुताबिक, "हर बार सेक्स के बाद कुछ महिलाओं की तबियत खराब हो जाती है. उनके जननांगों में सूजन हो जाती है या खुजली होने लगती है." 35 फीसदी मामलों में इसके लिए शुक्राणुओं से होने वाली एलर्जी जिम्मेदार होती है.

Read more

 
Design by ThemeShift | Bloggerized by Lasantha - Free Blogger Templates | Best Web Hosting