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बुधवार, 23 अगस्त 2017

समाधि का पहला अनुभव कैसा होता है?

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होगा तो ही जानोगे। कहा जा सके, ऐसा नहीं है। कुछ-कुछ इशारे किये जा सकते हैं। जैसे अंधेरे में अचानक दीया जल जाये, ऐसा होता है। या जैसे बीमार मरता हो और अचानक कोई दवा लग जाये...मरते-मरते कोई दवा लग जाये; और जीवन की लहर, जीवन की पुलक फिर फैल जाये--ऐसा होता है। जैसे कोई मुर्दा जिंदा हो जाये--ऐसा होता है समाधि का पहला अनुभव।

अमृत का अनुभव है। परम संगीत का अनुभव है। पर होगा तो ही होगा। और होगा तो ही तुम समझ पाओगे; मेरे कहने से समझ में न आ सकेगा। प्रेम में जैसा होता है। अब कोई किसी को कैसे समझाये? जिसने प्रेम न किया हो, जिसने प्रेम जाना न हो, उसके सामने तुम कितना लाख सिर पटको, कितनी व्याख्या करो--सुन लेगा सब, मगर फिर भी पूछेगा कि मेरी कुछ समझ में नहीं आया, कुछ और थोड़ी व्याख्या करिए।

ऐसा ही जैसे अंधे को तुम प्रकाश समझाओ, या बहरे को नाद समझाओ--नहीं समझ में आ सकेगा। जिसके नासापुट खराब हो गये हैं, जिसे गंध नहीं आती, उसे गंध का कोई अनुभव कैसे बताओगे? अनुभव कभी भी शब्दों में बांधे नहीं जा सकते, लेकिन कुछ इशारे किये जा सकते हैं।

गीत प्राणों में जगे, पर भावना में बह गए!
एक थी मन की कसक,
जो साधनाओं में ढली, कल्पनाओं में पली;
पंथ था मुझको अपरिचित, मैं नहीं अब तक चली,
प्रेम की संकरी गली;
बढ़ गए पग, किंतु सहसा
और मन भी बढ़ गया;
लोक-लीकों के सभी भ्रम, एक पल में ढह गए!
गीत प्राणों में जगे, पर भावना में बह गए!

वह मधुर वेला प्रतीक्षा की मधुर अनुहार थी,
मैं चकित साभार थी;
कह नहीं सकती हृदय की जीत थी, या हार थी,
वेदना सुकुमार थी;
मौन तो वाणी रही, पर
भेद मन का खुल गया;
जो न कहना चाहती थी, ये नयन सब कह गए!
गीत प्राणों में जगे, पर भावना में बह गए!

कल्पना जिसकी संजोई सामने ही पा गई,
वह घड़ी भी आ गई;
छवि अनोखी थी हृदय पर छा गई,
मन भा गई; देखते शरमा गई;
कर सकी मनुहार भी कब
मैं स्वयं में खो गई;
और अब तो प्राण मेरे कुछ ठगे-से रह गए!
गीत प्राणों में जगे, पर भावना में बह गए!

जैसे अचानक तुम्हारे हृदय में एक गीत जगे। जैसे अचानक, अनायास; अकारण तुम्हारे भीतर एक रस का झरना फूट पड़े!


पंथ था मुझको अपरिचित, 

मैं नहीं अब तक चली
प्रेम की संकरी गली!


और अचानक प्रेम जग जाये...ऐसा अनुभव है समाधि का प्रथम अनुभव। जैसे पतझड़ था और अचानक वसंत आ जाये! और जहां रूखे-सूखे वृक्ष खड़े थे, हरे हो जाएं, लद जायें पत्तों से, फूल खिल जायें--ऐसा अनुभव है समाधि का प्रथम।


बढ़ गए पग, किंतु सहसा और जिसके भीतर प्रेम जगा या जिसके भीतर प्रकाश जगा, या जिसे नाद सुनाई पड़ा, फिर उसके पैर सहसा बढ़ जाते हैं। फिर भय नहीं पकड़ता। जिसके भीतर प्रेम जगा, वह सब भय छोड़ देता है। इसलिए तो गणित, हिसाब बिठानेवाले लोग कहते हैं कि प्रेम अंधा होता है--कि जहां आंखवाले जाने से डरते हैं, वहां प्रेमी चला जाता है। जहां आंखवाले कहते हैं सावधान, सावधान, बचो, झंझट में पड़ोगे--वहां प्रेमी नाचता और गीत गुनगुनाता प्रवेश कर जाता है।


इसलिए समझदार प्रेमी को अंधा कहते हैं। असलियत उलटी ही है। समझदारों के सिवाय कोई और अंधा नहीं। प्रेमी के पास ही आंख होती है। अगर प्रेम आंख नहीं है तो फिर और आंख कहां होगी?
पंथ था मुझको अपरिचित, मैं नहीं अब तक चली
प्रेम की संकरी गली;
बढ़ गए पग, किंतु सहसा
और मन भी बढ़ गया;
लोक-लीकों के सभी भ्रम, एक पल में ढह गए!
ऐसा है समाधि का पहला अनुभव। अब तक की सारी धारणाएं, अब तक के सारे पक्षपात, अब तक के सारे सिद्धांत, शास्त्र, ऐसे बह जायेंगे, जैसे वर्षा का पहला पूर आया नदी में और सब कूड़ा-करकट किनारों का ले गया...सब बह गया।
वह मधुर वेला प्रतीक्षा की मधुर अनुहार थी,
मैं चकित साभार थी;
हां, चकित होकर रह जाओगे खड़े; सोच न सकोगे क्या हो रहा है। विचार बंद हो जायेंगे। सोचने का अवसर नहीं है। सोचने के पार कुछ घट रहा है।
वह मधुर वेला प्रतीक्षा की मधुर अनुहार थी,
मैं चकित साभार थी;
कह नहीं सकती हृदय की जीत थी, या हार थी,
कहना कठिन है--कौन जीता, कौन हारा? क्योंकि वहां दो नहीं हैं, इसलिए जीत कहो तो ठीक, हार कहो तो ठीक। एक अर्थ में हार है, क्योंकि मिट गये; दूसरे अर्थ में जीत है, क्योंकि परमात्मा हो गये। एक अर्थ में हार है बूंद की कि बूंद मिट गई, दूसरे अर्थ में जीत है कि बूंद सागर हो गई।
कह नहीं सकती हृदय की जीत थी, या हार थी,
वेदना सुकुमार थी;
पर इतना पक्का है कि वह जो पीड़ा थी बड़ी प्रिय थी, बड़ी मीठी थी। कहा नहीं गोरख ने--मरण है मीठा! तिस मरणी मरो, जिस मरणी गोरख मरि दीठा। बड़ी मीठी प्रीति है, बड़ी मीठी प्रीतिकर मृत्यु है!
कल्पना जिसकी संजोई सामने ही पा गई
सच तो यह है, तुमने जितनी कल्पनाएं संजोई हैं, सब छोटी पड़ जाती हैं सत्य के समक्ष। तुमने जो मांगा था उससे बहुत ज्यादा मिलता है, जब मिलता है; छप्पर तोड़कर मिलता है।
वह घड़ी भी आ गई
जिसका भरोसा भी नहीं होता था कि आ जायेगी; घड़ी आती है।
वह घड़ी भी आ गई
छवि अनोखी थी हृदय पर छा गई, मन भा गई;
देखते शरमा गई,
भरोसा नहीं आता कि मेरी ऐसी पात्रता! कि प्यारा मिलेगा, कि प्रियतम से मिलन होगा।
कर सकी मनुहार भी कब
कहते कुछ न बना। स्वागत के दो शब्द न बोले जा सके...।
मैं स्वयं में खो गई;
और अब तो प्राण मेरे कुछ ठगे-से रह गए!


समाधि का पहला अनुभव, जैसे बिलकुल ठग गए, जैसे बिलकुल लुट गये...। हारे कि जीते, पता नहीं; इतना-भर पक्का है कि सीमाएं टूट गईं, संकीर्णताएं टूट गईं--उतरा पूरा आकाश। कबीर ने कहा है: बुंद में समुंद समाना...। बूंद में समुद्र समा गया। सीमा में असीम आ गया, दृश्य में अदृश्य...। जो गोचर था उसके भीतर अगोचर खड़ा हो गया।


समाधि का पहला अनुभव इस जगत का सर्वाधिक बहुमूल्य अनुभव है। और फिर अनुभव पर अनुभव है, कमल पर कमल खिलते चले जाते हैं। फिर कोई अंत नहीं है, फिर पंक्तिबद्ध कमल खिलते चले जाते हैं। फिर ऐसा कभी होता ही नहीं कि समाधि के अनुभव कम पड़ते हैं, बढ़ते ही चले जाते हैं। इसलिए परमात्मा को अनंत कहा है, कि उसका अनुभव कभी चुकता नहीं है।


जीसस के जीवन में उल्लेख है कि जब बपतिस्मा वाले जॉन ने--यह भी एक अदभुत आदमी था जॉन--जीसस को दीक्षा दी। जीसस के गुरु थे जॉन। जोर्दन नदी में जीसस को ले जाकर जब उन्होंने जल से दीक्षा दी तो बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गयी थी, क्योंकि जॉन कह रहा था कि जिस आदमी के लिए दीक्षा देने को मैं रुका हूं, वह आया, अब आया, अब आया, आने ही वाला है। तो बहुत भीड़ इकट्ठी हो गयी थी उस आदमी को देखने। और जब जीसस आये तो जॉन ने कहा, आ गया यह आदमी, इसी को दीक्षा देने के लिए मैं रुका था; मेरा काम अब पूरा हो गया। अब यह सम्हालेगा। मैं बूढ़ा भी हो चुका हूं।


जब जीसस को दीक्षा दी जोर्दन नदी में तो कहानी बड़ी प्रीतिकर बात कहती है--ये प्रतीक हैं--कि एक सफेद कबूतर अचानक आकाश से उतरा और जीसस में समा गया...। यह तो प्रतीक है। सफेद कबूतर शांति का प्रतीक है। कोई वस्तुतः कबूतर आकाश से उतरकर जीसस में नहीं समा गया, लेकिन जरूर कोई सफेदी अचानक आकाश से उतरती हुई अनुभव हुई होगी बहुत लोगों को--जैसे बिजली कौंध गई हो! जिनके पास जरा-सी भी आंख थी...और आंखवाले लोग ही इकट्ठे हुए होंगे। किसको पड़ी है? जॉन जोर्दन नदी में जीसस को दीक्षा दे रहा है, किसको पड़ी है? प्यासे इकट्ठे हुए होंगे। जिन्हें थोड़ी बूंदें लग गयी थीं, वे इकट्ठे हुए होंगे। जिन पर थोड़े रंग के छींटे पड़ गये थे, वे इकट्ठे हुए होंगे। जिन पर थोड़ी जॉन की गुलाल पड़ गयी थी, वे इकट्ठे हुए होंगे। देखा होगा एक ज्योतिर्पुंज, जैसे उतरा आकाश से और जीसस में समा गया...। और जॉन ने तत्क्षण कहा कि मेरा काम पूरा हुआ। जिसके लिए मैं प्रतीक्षा कर रहा था, वह आ गया। अब मैं विदा हो सकता हूं।


वह समाधि का पहला अनुभव था जीसस के लिए। समाधि का जब पहला अनुभव किसी को होता है तो उसे तो होता ही है, उसके आसपास भी भनक पड़ जाती है। कहते हैं, जब बुद्ध को समाधि का पहला अनुभव हुआ तो बेमौसम फूल खिल गये। यह भी प्रतीक है, जैसे कबूतर; कबूतर यहूदियों का प्रतीक है--शांति का प्रतीक। फूल का खिल जाना भारतीय प्रतीक है--बेमौसम, अचानक...। जब भी किसी को समाधि फलती है--बेमौसम का फूल है समाधि; क्योंकि इस पृथ्वी पर मौसम ही कहां है समाधि के खिलने के लिये! इस पृथ्वी पर समाधि न खिले, यह तो बिलकुल सामान्य बात है; समाधि खिले, यही असामान्य है। यह पृथ्वी तो रेगिस्तान है, यहां हरियाली कहां, रसधार कहां? जब कभी उतर आती है तो बेमौसम का फूल है। नहीं होना था और हुआ, चमत्कार है! समाधि चमत्कार है!


अनुभव तुम्हें होगा तो ही जान पाओगे। या जिन्हें अनुभव हुआ हो उनके पास बैठो, उठो, शायद किसी दिन सफेद कबूतर उतरता दिखाई पड़े, या अचानक फूल खिलते दिखाई पड़ जायें।

मेरे आंगन श्वेत कबूतर!
उड़ आया ऊंची मुंडेर से, मेरे आंगन श्वेत कबूतर!

गर्मी की हल्की संध्या यों--
झांक गई मेरे आंगन में,
झरीं केवड़े की कुछ बूंदें
किसी नवोढ़ा के तन-मन में;

लहर गई सतरंगी-चूनर, ज्यों तन्वी के मृदुल गात पर!
उड़ आया ऊंची मुंडेर से, मेरे आंगन श्वेत कबूतर!

मेरे हाथ रची मेहंदी, उर--
बगिया में बौराया फागुन,
मेरे कान बजी बंसी-धुन
घर आया मनचाहा पाहुन;

एक पुलक प्राणों में, चितवन एक नयन में, मधुर-मधुरतर!
उड़ आया ऊंची मुंडेर से, मेरे आंगन श्वेत कबूतर!

कोई सुंदर स्वप्न सुनहले--
आंचल में चंदा बन आया,
कोई भटका गीत उनींदा,
मेरी सांसों से टकराया;
छिटक गई हो जैसे जूही, मन-प्राणों में महक-महक कर!
उड़ आया ऊंची मुंडेर से, मेरे आंगन श्वेत कबूतर!

मेरा चंचल गीत किलकता
घर-आंगन देहरी-दरवाजे।
दीप जलाती सांझ उतरती
प्राणों में शहनाई बाजे;

अमराई में बिखर गए री, फूल सरीखे सरस-सरस स्वर!
उड़ आया ऊंची मुंडेर से, मेरे आंगन श्वेत कबूतर!

आता है उतर एक श्वेत कबूतर समाधि के पहले अनुभव में। चारों तरफ फूल खिल जाते हैं। वंशी की धुन बज उठती है। भीतर कोई शहनाई बजाने लगता है। सारे नाद जगते हैं।

मेरे कान बजी वंशी-धुन
घर आया मनचाहा पाहुन

आ गया मेहमान जिसकी प्रतीक्षा है--अतिथि। जानते हो न, इस देश में हमने मेहमान को अतिथि इसलिए कहा कि वह बिना तिथि बतलाये आता था। परमात्मा ही एकमात्र अतिथि बचा है अब तो, बाकी सब अतिथि तो तिथि बतलाकर आते हैं। अब तो खबर कर देते हैं कि आ रहे हैं। वे यह कह देते हैं कि धक्का एकदम से देना ठीक नहीं; आ रहे हैं, सम्हल जाओ, कि तैयार कर लो अपने को। क्योंकि अतिथि को देखकर अब कोई प्रसन्न तो होता नहीं। पहले से खबर आ जाती है तो तैयारी हो जाती है, गाली-गलौज जो देनी है दे लेते हैं लोग। पत्नी को जो कहना होता है कह लेती है। पति को जो कहना होता है कह लेते हैं। तब तक आते-आते शिष्टाचार वापिस लौट आता है। एकदम से आ जाओ, कौन जाने सच्ची बातें निकल जायें। कहना तो यही पड़ता है कि धन्यभाग, कि आप को देखकर बड़ा हृदय प्रफुल्लित हो रहा है! यह मन की बात नहीं। मन की बात कुछ और है। ठीक ही है पश्चिम का रिवाज कि पहले खबर कर दो, ताकि लोग तैयारी कर लें, अपने हृदय मजबूत कर लें।


अब तो परमात्मा ही एकमात्र अतिथि बचा है--तिथि नहीं बतलाता। उसकी कोई भविष्वाणी नहीं हो सकती कब आयेगा। समाधि का पहला अनुभव कब घटेगा, कोई भी नहीं कह सकता। अनायास, बेमौसम...। सच तो यह है, जब तुम प्रतीक्षा नहीं कर रहे थे, बिलकुल नहीं कर रहे थे, तब घटता है। क्योंकि जब तक तुम प्रतीक्षा करते हो, तुम तने ही रहते हो। तुम्हारे चित्त में तनाव रहता है। तुम राह देखते हो तो तुम पूरे संलग्न नहीं हो पाते। राह देखना भी विचार है, और विचार बाधा है। जब तक तुम सोचते हो अब हो जाये, अभी तक नहीं हुआ--तब तक तो तुम चिंताओं से घिरे हो; बदलियां घिरी हैं, सूरज निकले तो कैसे निकले? आता है आकस्मिक, अनायास--जब तुम सिर्फ बैठे होते हो...कुछ भी नहीं कर रहे होते, ध्यान भी नहीं कर रहे होते--समाधि का पहला अनुभव तब होता है। क्योंकि जब तुम ध्यान भी कर रहे होते हो, तब भी तुम्हारे मन में कहीं वासना सरकती रहती है--शायद अब हो जाये, अब होता होगा; अभी तक नहीं हुआ, बड़ी देर लगाई! शिकायतें उठती रहती हैं।
ध्यान करते-करते, करते-करते एक दिन ऐसी घड़ी घटती है कि तुम बैठे होते हो, ध्यान भी नहीं कर रहे होते हो, शांत होते हो, बस स्वस्थ होते हो, मौन होते हो--और आ गया!

मेरे कान बजी वंशी-धुन
घर आया मनचाहा पाहुन

छिटक गई हो जैसे जूही, मन-प्राणों में महक-महक कर!

मेरा चंचल गीत किलकता
घर-आंगन देहरी-दरवाजे।
दीप जलाती सांझ उतरती
प्राणों में शहनाई बाजे,

अमराई में बिखर गए री, फूल सरीखे सरस-सरस स्वर!

घटती है घटना। परिभाषा मत पूछो, राह पूछो। पूछो कि कैसे घटेगी, यह मत पूछो कि क्या घटता है? क्योंकि कहा नहीं जा सकता। बताने का कोई उपाय नहीं है। यह बात कहने की नहीं है, यह बात जानने की है। लेकिन विधि बताई जा सकती है, इशारा किया जा सकता है--ऐसे चलो, ऐसे सम्हलो। चित्त निर्विचार हो, शांत हो, अपेक्षा-शून्य हो, वासना, तृष्णा से मुक्त हो--बस उसी क्षण में। जब भी ऐसी वसंत की घड़ी तुम्हारे भीतर सज जायेगी--बज उठती है भीतर की शहनाई; खिल जाते हैं बेमौसम फूल; उतर आती है कोई किरण आकाश से और कर जाती है तुम्हें सदा के लिए और, भिन्न। फिर तुम दोबारा वही न हो सकोगे। समाधि का पहला अनुभव--और स्नान हो गया!
सदियों-सदियों से तुम गंदे हो। धूल जम गई है बहुत, लंबी यात्राएं की हैं। समाधि का पहला अनुभव सारी धूल बहा ले जाता है। सारी धारणाएं, सारी धारणाओं के जाल--सब समाप्त हो जाते हैं; तुम निर्दोष हो जाते हो।
कहा नहीं गोरख ने कि जैसे छोटा बालक भीतर जन्मता है--अंतर के शून्य में एक बालक बोल उठे, एक नये जीवन का आविर्भाव! समाधि में तुम्हारी मृत्यु हो जाती है।
मरौ हे जोगी मरौ...। अहंकार मर जाता है। तुम मिट जाते हो और परमात्मा हो जाता है।

चौथा प्रश्न: प्यारे प्रभु!
प्रश्नों के अंबार लगे हैं
उत्तर चुप हैं,
कौन सहेजे इन कांटों को
बगिया चुप है, माली चुप है
प्रश्न स्वयं में रहता चुप है
दिनकर चुप है, रातें चुप हैं
उठी बदरिया कारी-कारी
लगा अंधेरा बिलकुल घुप है
प्रभु, इस स्थिति का निराकरण करने की अनुकंपा करें।

कन्नूमल! जब तक प्रश्न हैं तब तक उत्तर चुप रहेंगे। प्रश्नों के कारण ही उत्तर चुप हैं। प्रश्नों से उत्तर नहीं मिलता; जब प्रश्न चले जाते हैं और चित्त निष्प्रश्न हो जाता है तब उत्तर मिलता है। प्रश्नों की भीड़ में ही तो उत्तर खो गया है।


ठीक कहते हो तुम: प्रश्नों के अंबार लगे हैं, उत्तर चुप हैं।


उत्तर चुप रहेंगे ही। प्रश्न इतना शोरगुल मचा रहे हैं, उत्तर बोलें तो कैसे बोलें? और खयाल रखना, प्रश्न अनेक होते हैं, उत्तर एक है। उत्तर तो एकवचन है, प्रश्न बहुवचन। प्रश्नों की भीड़ होती है। जैसे बीमारियां तो बहुत होती हैं, स्वास्थ्य एक होता है। बहुत तरह के स्वास्थ्य नहीं होते। तुम किसी से कहो कि मैं स्वस्थ हूं तो वह यह नहीं पूछता कि किस प्रकार के स्वस्थ, कौन-सी भांति के स्वास्थ्य में हो? लेकिन किसी से कहो मैं बीमार हूं तो तत्क्षण पूछता है--कौन-सी बीमारी? बीमारियां बहुत हैं, स्वास्थ्य एक है। प्रश्न बहुत हैं, उत्तर एक है। और बहुत प्रश्नों के कारण वह एक उत्तर पकड़ में नहीं आता। भीड़ लगी है प्रश्नों की, सच कहते हो। चारों तरफ प्रश्न ही प्रश्न हैं...प्रश्न से प्रश्न निकलते जाते हैं, खड़े होते जाते हैं, मिटते जाते हैं, नये बनते जाते हैं। तुम इतने घिरे हो प्रश्नों से यह सच है। मगर इसी कारण उत्तर चुप है।


तुम कहते हो: प्रश्नों के अंबार लगे हैं, उत्तर चुप हैं।


उत्तर चुप नहीं है; उत्तर भी बोल रहा है; लेकिन उत्तर एक है और प्रश्न अनेक हैं। नक्कारखाने में तूती की आवाज जैसे खो जाये...। बाजार में, शोरगुल में कोई धीमे-धीमे स्वर में गीत गाये, जैसे खो जाये, ऐसा ही सब खो गया है।


उत्तर पाया जा सकता है। उत्तर दूर भी नहीं है। उत्तर बहुत निकट है। उत्तर तुम हो। उत्तर तुम्हारे केंद्र में बसा है। जरा प्रश्नों को जाने दो। प्रश्नों को मूल्य मत दो। प्रश्नों को बहुत ज्यादा अर्थ भी मत दो। प्रश्नों से धीरे-धीरे उदासीन हो जाओ। प्रश्नों को सहयोग मत दो, सत्कार मत दो। प्रश्नों की उपेक्षा करो। प्रश्नों के प्रति तटस्थ हो जाओ। क्योंकि जो प्रश्नों में चला गया, वह दर्शनशास्त्र के जंगल में भटक जाता है। तुम प्रश्नों को चलने दो, आने दो, जाने दो। ऐसे ही देखो प्रश्नों की भीड़ को, जैसे तुम रास्ते पर चलते लोगों को देखते हो--न कुछ लेना, न कुछ देना--असंग-भाव से, दूर खड़े...। तुम्हारे और तुम्हारे प्रश्नों के बीच जितनी दूरी बढ़ जाये, उतना हितकर है; क्योंकि उसी अंतराल में उत्तर उठेगा।


बुद्ध के पास जब भी कोई जाता था, कोई प्रश्न पूछने, तो बुद्ध कहते: रुक जाओ, दो वर्ष रुक जाओ। दो वर्ष चुप बैठो मेरे पास, फिर पूछ लेना।
ऐसा हुआ, एक बड़ा दार्शनिक बुद्ध के पास गया। मौलुंकपुत्त उसका नाम था। जाहिर दार्शनिक था। उसने बड़े प्रश्नों के अंबार लगा दिये। बुद्ध ने प्रश्न सुने और कहा कि मौलुंकपुत्त, तू सच ही उत्तर चाहता है? अगर सच ही चाहता है, कीमत चुका सकेगा? 
मौलुंकपुत्त ने कहा: जीवन मेरा अंत होने के करीब आ रहा है। जीवन-भर से ये प्रश्न पूछ रहा हूं। बहुत उत्तर मिले, लेकिन कोई उत्तर उत्तर साबित नहीं हुआ। हर उत्तर में से नये प्रश्न निकल आये हैं। किसी उत्तर में समाधान नहीं हुआ है। आप क्या कीमत मांगते हैं? मैं सब कीमत चुकाने को तैयार हूं। मैं इन प्रश्नों के हल चाहता ही हूं। मैं इनका समाधान लेकर इस पृथ्वी से जाना चाहता हूं। फिर, बुद्ध ने कहा, ठीक है। क्योंकि लोग उत्तर तो मांगते हैं, मगर कीमत चुकाने को राजी नहीं होते; इसलिए मैंने तुझसे पूछा। फिर दो साल तू चुप बैठ जा, यह कीमत है। तू मेरे पास दो साल चुप बैठ, बोलना ही मत। जब दो साल बीत जायेंगे, मैं खुद ही तुझसे पूछूंगा कि मौलुंकपुत्त, अब पूछ ले। फिर तू पूछ लेना तुझे जो पूछना हो। और आश्वासन देता हूं कि सब उत्तर दे दूंगा, सब निराकरण कर दूंगा! मगर दो साल बिलकुल चुप,सन्नाटा...दो साल बात मत उठाना। मौलुंकपुत्त सोच ही रहा था कि हां कहूं कि ना, क्योंकि दो साल लंबा वक्त है और इस आदमी का क्या भरोसा, दो साल बाद देगा भी उत्तर कि नहीं? उसने कहा कि आप पक्का विश्वास दिलाते हैं कि दो साल बाद उत्तर देंगे? बुद्ध ने कहा: बिलकुल विश्वास दिलाता हूं, तू पूछेगा तो दूंगा। तू पूछेगा ही नहीं तो मैं किसको उत्तर दूंगा? तभी एक भिक्षु पास के एक वृक्ष के नीचे बैठा ध्यान कर रहा था। खिलखिलाकर हंसने लगा। मौलुंकपुत्त ने पूछा: यह भिक्षु क्यों हंस रहा है? बुद्ध ने कहा: तुम्हीं पूछ लो। उस भिक्षु ने कहा कि अगर पूछना हो, अभी पूछ लो। यही धोखा मेरे साथ हुआ। हम भी ऐसे ही बुद्धू बने! मगर यह बात सच कह रहे हैं वे कि अगर पूछोगे तो दो साल बाद उत्तर देंगे, मगर दो साल बाद कौन पूछता है! दो साल से मैं चुप बैठा हूं। अब वे मुझसे कुरेद-कुरेद कर पूछते हैं कि पूछो भाई, मगर दो साल चुप रहने के बाद पूछने को कुछ बचता नहीं, उत्तर मिल ही जाता है। अगर पूछना हो तो अभी पूछ लो, नहीं तो दो साल बाद फिर पूछने को कुछ न बचेगा। और यही हुआ, मौलुंकपुत्त दो वर्ष रुका। दो वर्ष पूरे हुए, बुद्ध भूले नहीं, तिथित्तारीख सब याद रखी। ठीक दो साल पूरे होने पर, मौलुंकपुत्त तो भूल ही गया था, क्योंकि जिसके विचार धीरे-धीरे शांत हो जायें, उसे समय का बोध भी खो जाता है। क्या समय का हिसाब, कौन दिन आया, कौन वर्ष आया, क्या हिसाब! सब जा चुका था, सब बह चुका था। जरूरत भी क्या थी! बैठना था रोज बुद्ध के पास तो शुक्र हो कि शनि, कि रवि हो कि सोम, सब बराबर था। आषाढ़ हो कि जेठ, गर्मी हो कि सर्दी, सब बराबर था। भीतर तो एक ही रस था--शांति का, मौन का। दो वर्ष पूरे हो गये, बुद्ध ने कहा: मौलुंकपुत्त, तुम खड़े हो जाओ। खड़ा हो गया मौलुंकपुत्त। बुद्ध ने कहा: अब तुम पूछ लो, क्योंकि मैं अपने वचन से मुकरता नहीं। तुम्हें कुछ पूछना है? मौलुंकपुत्त हंसने लगा और उसने कहा: वह भिक्षु ठीक कहा था। मेरे पास पूछने को अब कुछ भी नहीं है। उत्तर आ ही गया। आपकी कृपा से उत्तर आ ही गया।

उत्तर दिया नहीं गया और आ गया ! उत्तर बाहर से आता ही नहीं, उत्तर भीतर से आता है। ऐसा ही समझो, जैसे कोई कुआं खोदता है तो पहले कंकड़-पत्थर निकलते हैं, कूड़ा-करकट निकलता है, सूखी जमीन निकलती है, फिर गीली जमीन आती है, फिर कीचड़ निकलती है, फिर जलस्रोत...। 

जलस्रोत तो दबे पड़े हैं। तुम्हारे प्रश्नों की ही पर्त-पर्त जम गयी है, उसी के नीचे जलस्रोत दबा पड़ा है। खुदाई करो, इन प्रश्नों को हटाओ। और हटाने का उपाय एक ही है: जाग कर साक्षी-भाव से इन प्रश्नों के प्रवाह को देखते रहो। सिर्फ देखते रहो इस प्रवाह को, कुछ मत करो। बैठ जाओ रोज घंटे-दो-घंटे, चलने दो प्रवाह को। जल्दी भी न करना कि आज ही बंद हो जाये।

इसलिए बुद्ध ने कहा, दो साल। कोई तीन महीने के बाद पहली सरसराहट सन्नाटे की शुरू होती है। और कोई दो साल होतेऱ्होते अनुभव पक जाता है। बस कोई इतना धीरज भी रखे कि दो घंटे रोज बैठता रहे, कुछ न करे...। उस कुछ न करने में सारी कला छिपी है।


लोग पूछते हैं: बुद्ध को पहली समाधि कैसे घटी? बैठे थे वृक्ष के नीचे, कुछ कर नहीं रहे थे, तब घटी। छह साल तक बहुत कुछ किया--बड़े यम, व्यायाम, प्राणायाम, न मालूम क्या-क्या किया। सब करके थक गये थे, उस रात तय करके सोये कि अब कुछ नहीं करना, हो गया बहुत। करने से भी कुछ नहीं होता। उस रात करना भी छोड़ दिया। उस रात बिलकुल बिना करने की अवस्था में सो गये। शून्य भाव था। सुबह आंख खुली और समाधि द्वार पर खड़ी थी। जिस मेहमान की प्रतीक्षा थी, वह आ गया। आखिरी तारा डूबता था सुबह का और भीतर बुद्ध के आखिरी विचार डूब गया। उधर आखिरी तारे से आकाश खाली हुआ, इधर आखिरी विचार भी डूब गया। समाधि आ गयी, उत्तर आ गया। इसीलिए तो समाधि कहते हैं उसे, क्योंकि उसमें समाधान है।

सांझ आई, चुप हुए धरती-गगन
नयन में गोधूलि के बादल उठे
बोझ से पलकें झपीं नम हो गईं
सांझ ने पूछा, उदासी किसलिए?
किंतु मेरे पास कुछ उत्तर नहीं!

रात आई, कालिमा घिरती गई
सघन तम में द्वार मन के खुल गए
दाह की चिनगारियां हंसने लगीं
रात ने पूछा, जलन यह किसलिए?
किंतु मेरे पास कुछ उत्तर नहीं!

नींद आई, चेतना सब मौन है
देह थककर सो गई, पर प्राण को
स्वप्न की जादूभरी गलियां मिलीं
नींद ने पूछा, भुलावे किसलिए?
किंतु मेरे पास कुछ उत्तर नहीं!
प्रश्न तो बिखरे यहां हर ओर हैं
किंतु मेरे पास कुछ उत्तर नहीं!

तुम प्रश्नों को पकड़ो ही मत, उत्तर तुम्हें मिलेंगे भी नहीं। कोई कभी प्रश्नों के सहारे चलकर उत्तर पाया भी नहीं। तुम प्रश्न उठने दो, यह मन की खुजलाहट है। खुजलाहट ठीक शब्द है। कभी-कभी खुजलाहट उठती है, तुम खुजा लेते हो--बस ऐसे ही मन की खुजलाहट हैं प्रश्न। खुजा लेने से कुछ हल नहीं होता, लेकिन न खुजाओ तो भी बेचैनी होती है। खुजा लेने से थोड़ी-सी क्षण-भर को राहत मिलती है। बस ऐसे ही तुम्हारे उत्तर हैं। एक उत्तर पकड़ लिया, थोड़ी देर राहत मिलती है। जल्दी ही उस उत्तर में से भी प्रश्न निकल आयेंगे। फिर राहत खो जायेगी, फिर उत्तर की तलाश शुरू हो जायेगी।


कन्नूमल तुम ठीक कहते हो: प्रश्नों के अंबार लगे हैं उत्तर चुप हैं


कौन सहेजे इन कांटों को
बगिया चुप है, माली चुप है
प्रश्न स्वयं में रहता चुप है
दिनकर चुप है, रातें चुप हैं
उठी बदरिया कारी कारी
लगा अंधेरा बिलकुल घुप है
प्रश्नों के अंबार लगे हैं
उत्तर चुप हैं।


उत्तर चुप रहेंगे। उत्तर बोलते नहीं। तुम बोलना जब बंद कर दोगे, तत्क्षण उन्हें पहचान लोगे। तुम्हारी वाणी खो जायेगी और तुम पाओगे--शून्य तुम्हारे भीतर बोला, मौन तुम्हारे भीतर बोला। उस मौन में अचानक समाधान है, सब प्रश्नों का उत्तर है; क्योंकि उस मौन में शांति है, सुख है, परम आनंद है।


तुमने एक बात खयाल की, प्रश्न उठते दुख के कारण हैं! दुख प्रश्नों का जन्मदाता है। जैसे तुम्हारे सिर में दर्द होता है तो तुम पूछते हो सिर में दर्द क्यों है? जब नहीं होता तो तुम यह नहीं पूछते कि सिर में दर्द क्यों नहीं है? तुम्हें जब बीमारी होती है तो तुम पूछते हो डाक्टर से जाकर कि बीमार क्यों हूं, कारण? लेकिन जब तुम स्वस्थ होते हो तब तुम डाक्टर के पास जाकर नहीं पूछते कि मैं स्वस्थ क्यों हूं, कारण? स्वास्थ्य में कोई प्रश्न नहीं उठता, बीमारी में प्रश्न उठता है। दुख से प्रश्नों का जन्म होता है, सुख में प्रश्न क्षीण हो जाते हैं।


तुम जैसे ही अपने भीतर शांत हो जाओगे और थोड़े-से सुख की झलक पाओगे, हैरान हो कर पाओगे--प्रश्न खो गये! कौन पूछता है, किसलिए पूछता है! दर्द ही न रहा तो दर्द से जन्मनेवाले प्रश्न कैसे बच सकते हैं? वे अपने-आप समाप्त हो जाते हैं। - ओशो


http://myspiritualitydiscourses.blogspot.in/2014/09/osho.html

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बुधवार, 2 अगस्त 2017

dusare ke man ki baat kaise jaane

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गुरुवार, 25 मई 2017

सेक्स से एलर्जी

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शर्म और अज्ञान
भारत में हर साल लाखों शादियां होती हैं और शादी के बाद कई महिलाओं और कुछ पुरुषों की तबियत खराब रहने लगती है. शर्म के चलते और जानकारी के अभाव में ज्यादातर मामलों में गलत इलाज होता है. झाड़ फूंक का भी सहारा लिया जाता है. विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसे ही मामले दुनिया भर में होते हैं, और कई के लिए एलर्जी जिम्मेदार होती है.


क्या है स्पर्म एलर्जी
बॉन मेडिकल कॉलेज के डेर्माटोलॉजिस्ट और एलर्जी विशेषज्ञ जां पियर अला के मुताबिक, "हर बार सेक्स के बाद कुछ महिलाओं की तबियत खराब हो जाती है. उनके जननांगों में सूजन हो जाती है या खुजली होने लगती है." 35 फीसदी मामलों में इसके लिए शुक्राणुओं से होने वाली एलर्जी जिम्मेदार होती है.

एलर्जी के लक्षण
ज्यादातर महिलाओं में स्पर्म एलर्जी के लक्षण और भी गंभीर होते हैं. सेक्स के बाद उनके पूरे शरीर में सिलसिलेवार तरीके से रिएक्शन होने लगता है. बार बार टॉयलेट जाना, कमजोरी महसूस करना और बदन में खुजली जैसी समस्याएं सामने आती हैं. ज्यादा एलर्जिक रिक्शन होने पर तो सांस लेने में मुश्किल भी होने लगती है.

प्राणघातक लक्षण
एलर्जी विशेषज्ञ जां पियर अला के मुताबिक, एलर्जी अगर इससे भी ज्यादा गंभीर हो तो "इससे शरीर और दिमाग को सदमा पहुंच सकता है जिसके चलते रोगी चक्कर खाकर गिर सकता है, मौत भी हो सकती है." यह खतरा खाने या श्वास संबंधी एलर्जी में भी सामने आता है.

खुद के शुक्राणु से एलर्जी
इस एलर्जी का शिकार सिर्फ महिलाएं नहीं होती हैं. पुरुषों को भी अपने ही शुक्राणुओं से एलर्जी हो सकती है. आम तौर पर शुक्राणु निकलने के बाद अगर पुरुष के जननांगों में खुजली या जलन रहे, पेशाब करने में असुविधा हो सकती है.

वीर्य की जटिल संरचना
शुक्राणुओं में कई तत्वों का जटिल मिश्रण होता है. वीर्य में शरीर के अपने प्रोटीन और प्रोस्टेट स्पेशिफिक एंटीजेन (पीएसए) शामिल होते हैं. म्यूनिख के एलर्जी विशेषज्ञ श्टेफान वाइडिंग्नर और मिषेल कोह्न ने 2005 में इससे जुड़ा शोध प्रकाशित किया.

अंडकोष में छुपी एलर्जी
प्रोस्टेट स्पेशिफिक एंटीजेन (पीएसए) असल में पुरुष के अंडकोष में पाया जाना वाला प्रोटीन है. प्रोस्टेट कैंसर की जांच के लिए भी खून में पीएसए की मात्रा नापी जाती है. पीएसए, वीर्य को तरल और चिकना बनाने का काम करता है ताकि वह शुक्राणुओं को मादा के जननांग में भीतर तक फेंककर अंडाणुओं से मिला सके.

बेहद जरूरी है सावधानी
ब्राजील के मामले का जिक्र करते हुए बॉन मेडिकल कॉलेज के विशेषज्ञ आलां कहते हैं, "पार्टनर को पता था कि उसकी गर्लफ्रेंड को मूंगफली से एलर्जी है, इसलिए उसने टूथपेस्ट से दांत साफ किए और हाथ भी धोए. लेकिन इसके बावजूद एलर्जी पैदा करने वाले तत्व वीर्य के जरिए महिला के शरीर में पहुंच गए." जननांगों के आस पास की त्वचा लाल हो गई, उसमें जलन होने लगी.

भ्रम में डालने वाले लक्षण
वीर्य से होने वाली एलर्जी बहुत ही जटिल और भ्रम पैदा करने वाली भी होती है. आलां कहते हैं, "रोगियों ने ऐसे लक्षण भी बताए हैं जो एलर्जी से बिल्कुल भी मेल नहीं खाते. जैसे सिरदर्द, थकान, फ्लू जैसे लक्षण और ये वीर्य के संपर्क में आने के बाद दो दिन से लेकर हफ्ते भर तक बने रहते हैं."


शर्म ने बिगाड़े हालात
इस पर बहुत ज्यादा शोध भी नहीं हुआ है क्योंकि महिलाएं डॉक्टर के सामने भी खुलकर बात करने में शर्माती हैं. दूसरी ओर डॉक्टर भी अक्सर इस रोग को पकड़ने के बजाए इनफेक्शन की दवा दे देते हैं.

एलर्जी पहचानने के तरीके
स्किन एलर्जी टेस्ट, पीओआईएस में एलर्जिक रिक्शन टेस्ट के जरिये इसका पता लगाया जा सकता है. इन टेस्टों में पता चला है कि कई पुरुषों को अपने ही वीर्य के प्रोटीन से एलर्जी होती है. वैसे भी बार बार सर्दी, जुकाम, सांस आदि की परेशानी होने पर भी एलर्जी टेस्ट करवाना चाहिए. हमें पता होना चाहिए कि हमारा शरीर क्या खाने या क्या सूंघने से गड़बड़ाता है

एलर्जी विशेषज्ञ की अहमियत
विशेषज्ञों की सलाह है कि अगर सेक्स के बाद आपकी या आपके पाटर्नर की तबियत गड़बड़ाती है तो एलर्जी एक्सपर्ट से मिलें. सावधानी के लिए कंडोम का इस्तेमाल किया जा सकता है, हालांकि यह भी 100 फीसदी सुरक्षित नहीं है.

स्पर्म एलर्जी से कैसे बचें
एलर्जिक रिएक्शन के बावजूद बच्चा चाहने वाले जो़ड़ों के पास तीन विकल्प हैं. आलां कहते हैं, अगर पूरे बदन के बजाए एक ही जगह पर एलर्जिक लक्षण हों तो "वे एलर्जिक रिक्शन कम करने वाले एंटीहिस्टेमाइंस ले सकते हैं. यह एलर्जिक रिएक्शन को कम करेगा."

सावधानी ही सुरक्षा
दूसरा विकल्प है: कम से कम तीन दिन के अंतराल में सेक्स करना. शुरुआत में सेक्स के दौरान पार्टनर के जननांगों में कम से कम वीर्य छोड़ना. विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर तीन दिन नहीं रुके तो एलर्जी भड़केगी और अगर तीन दिन से ज्यादा देर कर दी तो एलर्जी टॉलरेंस पावर नष्ट हो जाएगी. एक्सपर्ट्स के मुताबिक इलाज के जरिये ऐसा करना ज्यादा सरल और सुरक्षित है.

लैब का रास्ता
संतान की चाह रखने वाले जोडो़ं के लिए तीसरा विकल्प है: लैब फर्टिलिटी के जरिये. इस प्रक्रिया में वीर्य से पीएसए निकाल दिया जाता है और फिर शुक्राणुओं को महिला के अंडाणु में डाला जाता है.

पानी फायदेमंद
जब कभी जननांगों, पेट और गुर्दों में एलर्जिक रिएक्शन या फिर इनफेक्शन सा लगे, तो खूब पानी पीजिए. पानी शरीर में मौजूद विषैले तत्वों को मूत्र के साथ बाहर कर देता है. जिन पुरुषों को प्रोस्टेट की समस्या हो, वे ऐसा न करें.

साफ रहो, सुखी रहो
अच्छी सेहत में साफ सफाई बड़ी भूमिका निभाती है और यह बात सेक्स पर भी लागू होती है. शारीरिक संबंध बनाने से पहले, मुंह, हाथों और जननांगों की अच्छे से सफाई करना कई समस्याओं से बचा सकता है. सेक्स के बाद भी इनकी सफाई होनी चाहिए. बेहतर तो है कि नहाकर अंतवस्त्र भी बदले जाएं.
रिपोर्ट: फाबियान श्मिट, ओंकार सिंह जनौटी

शर्म और अज्ञान
भारत में हर साल लाखों शादियां होती हैं और शादी के बाद कई महिलाओं और कुछ पुरुषों की तबियत खराब रहने लगती है. शर्म के चलते और जानकारी के अभाव में ज्यादातर मामलों में गलत इलाज होता है. झाड़ फूंक का भी सहारा लिया जाता है. विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसे ही मामले दुनिया भर में होते हैं, और कई के लिए एलर्जी जिम्मेदार होती है.




बहुत कम जानकारी

स्पर्म एलर्जी की खोज 1958 में हॉलैंड के एक डॉक्टर ने की. लेकिन कई दशक गुजरने के बाद भी लोग इसके बारे में करीब करीब अंजान हैं. सेक्स को लेकर बात करने में शर्मिंदगी की आदत ने हालात और बदत्तर किये हैं.

क्याएलर्जी के लक्षणक्या है स्पर्म एलर्ज

बॉन मेडिकल कॉलेज के डेर्माटोलॉजिस्ट और एलर्जी विशेषज्ञ जां पियर अला के मुताबिक, "हर बार सेक्स के बाद कुछ महिलाओं की तबियत खराब हो जाती है. उनके जननांगों में सूजन हो जाती है या खुजली होने लगती है." 35 फीसदी मामलों में इसके लिए शुक्राणुओं से होने वाली एलर्जी जिम्मेदार होती है.

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गुरुवार, 11 मई 2017

सौंफ में हैं इतने सारे गुण, यकीनन होंगे आप उनसे अनजान; जानें!

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सौंफ : भारत में सदियों से किसी भी रोग को ठीक करने के लिए आयुर्वेद का सहारा लिया जाता रहा है। प्राचीनकाल के वैद्य बड़ी से बड़ी बीमारी को आयुर्वेदिक तरीके से जड़ी-बूटियों से ठीक कर देते थे। आज भी आयुर्वेदिक तरीकों का प्रयोग भारत में किया जाता है। अब तो भारतीय आयुर्वेद पद्धति को विदेशों में भी अपनाया जाने लगा है।हमारे घर में कुछ ऐसी आयुर्वेदिक चीजें उपलब्ध होती हैं, जिनके गुण के बारे में कम ही लोग जानते हैं। इनमें से एक बहुत गुणकारी वस्तु है सौंफ। अक्सर जब आप कहीं खाना खाने बाहर जाते हैं तो वहां आपको सौंफ देखने को मिलती ही है। जब आप खाना खाकर बिल चुकाने जाते हैं तो वहीं पास में सौंफ और मिश्री रखी होती है

पाचन क्रिया ठीक करने में सहायक है सौंफ:

दरअसल सौंफ बहुत पहले से ही पाचन क्रिया को ठीक करने में इस्तेमाल की जाती रही है। ठीक इसी तरह सौंफ के अन्य बहुत से फायदें हैं, जिनसे ज्यादातर लोग अनजान हैं। आज हम आपको सौंफ के कुछ ऐसे ही फायदों के बारे में रूबरू करवाने वाले हैं।

इसलिए इस्तेमाल की जाती है सौंफ:

*- खाना खाने के बाद हर दिन आधा चम्मच सौंफ खाने से पेट सम्बन्धी सभी बीमारियां दूर हो जाती हैं। आंखों में जलन हो रही हो, आंखें लाल हों या आंखें थकी-थकी लग रही हों तो आप सौंफ के पत्ते के रस और सौंफ के पानी का इस्तेमाल कर सकते हैं।
*- अगर बहुत ज्यादा खांसी से परेशान हैं तो सौंफ के अर्क को लेकर उसे शहद में मिलाकर लें। खांसी से राहत मिलेगी।
*- सौंफ में भरपूर मात्रा में फाइबर पाया जाता है। यह शरीर के रक्त से कोलेस्ट्राल को कम करने में मदद करता है। यह हानिकारक एलडीएल की मात्रा को शरीर से कम करके दिल की बीमारियों से रक्षा करता है।
*- हाथ-पांव में जलन होने पर बराबर मात्रा में सौंफ और धनिया लेकर उसे अच्छी तरह कूट लें। अब इसमें मिश्री मिलाकर खाना खाने के बाद 6-7 ग्राम लें। कुछ ही दिनों में समस्या से राहत मिलेगी।
*- सौंफ की तासीर ठंढी होती है, यही वजह है कि यह ठंढाई में भी मिलाई जाती है। यह गर्मी के दिनों में शरीर के लिए बहुत ही लाभदायक होती है। यह शरीर के साथ-साथ दिमाग को भी ठंढा रखता है।
sabhar :www.newstrend.news

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मंगलवार, 9 मई 2017

ऐसा भी होता है! इस महिला को याद है जन्म के बाद की हर बात

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ऐसा भी होता है! इस महिला को याद है जन्म के बाद की हर बात

नई दिल्ली : हमें अपने जीवन और आसपास हुई कुछ अहम घटनाओं के अलावा शायद ही कोई बीती बात याद रहती है, लेकिन ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड की रबेका शैरॉक (27) के पास अद्भुत स्मरणशक्ति है. उनके मुताबिक, 12 दिन की उम्र से लेकर अब तक की हर दिन की बात याद है. यहां तक कि उन्होंने किस दिन क्या पहना था और उस दिन का मौसम कैसा था तक बता देती हैं.रबेका बताती हैं कि उनके जन्म के 12वें दिन उनके माता-पिता ने उन्हें ड्राइविंग सीट पर रखा था और उनकी तस्वीर ली थी. रबेका को अपना पहला जन्मदिन भी याद है. उन्होंने बताया कि वह जन्मदिन पर रोने लगी थीं, क्योंकि उनकी ड्रेस उन्हें असहज लग रही थी.डेली मेल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, रबेका के पास हाइली सुपीरियर ऑटोबायॉग्रफिकल मेमोरी (एचएसएएम) है. ऐसी स्मरणशक्ति वाले लोगों के पास असाधारण यादें संजोकर रखने की क्षमता होती है. बताया जा रहा है कि दुनियाभर में सिर्फ 80 लोगों के पास ऐसी स्मरणशक्ति है. रबेका को हैरी पॉटर बुक का एक-एक शब्द याद है. उनकी अपने जीवन से जुड़ी सबसे पहली बात जो याद है वह उनका जन्म है. उन्हें याद कि उनके पहले जन्मदिन पर उन्हें क्या गिफ्ट मिला था. उन्होंने ये सारी बातें अपने ब्लॉग पर लिखी हैं.
ज़ी न्यूज़ डेस्क 
sabhar :http://zeenews.india.com/

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आध्यात्मिक काम विज्ञान

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सनातन धर्म का प्रसाद
यद्यपि भारतीय धर्मग्रन्थों में ब्रह्मचर्य पालन की बड़ी महिमा बरवान की गयी है। परंतु आध्यात्म द्वारा नियन्त्रित जीवन में कामेच्छा की उचित भूमिका को अस्वीकार नहीं किया गया है। उसकी उचित मांग स्वीकार की गयी है किंतु उसे आवश्यकता से अधिक महत्व देने से इंकार किया गया है। जब व्यक्ति आध्यात्मिक परिपक्वता प्राप्त कर लेता है तब यौन-आकर्षण स्व्यं ही विलीन हो जाता है; उसका निग्रह करने के लिए मनुष्य को प्रयत्न नहीं करना पड़ता, वह पके फल की भाँति झड जाता है। इन विषयों में मनुष्य को अब और रूचि नहीं रह जाती। समस्या केवल तभी होती है जब मनुष्य चाहे सकारात्मक चाहे नकारात्मक रूप में कामेच्छा में तल्लीन या उससे ग्रस्त होता है।) दोनों ही परिस्थितियों में मनुष्य यौन चिंतन करता है व ऊर्जा का उपव्यय करता रहता है।
     इस संदर्भ में श्री अरविन्द कहते हैं कि जब हम यौन ऊर्जा के सरंक्षण की या ब्रह्मचर्य की बात करते हैं तब प्रश्न यह नहीं होता कि कामवृत्ति बुरी है या अच्छी, पाप है या पुण्य। यह तो प्रकृति की एक देन है। प्रत्येक मानव शरीर में कुछ द्रव्य होते हैं, ज्यों-ज्यों शरीर का विकास होता है वे संचित होते जाते हैं शारीरिक विकास की एक विशेष अवस्था आने पर प्रकृति जोर लगाने व दबाव डालने का तरीका काम में लेती है ताकि वे यौन द्रव्य बाहर निक्षिप्त कर दिए जांए और मानव जाति की अगली कडी (पीढ़ी) का निर्माण हो सकें।
     अब जो व्यक्ति प्रकृति का अतिक्रमण करना चाहता है, प्रकृति के नियम का अनुसरण करने, और प्रकृति की सुविधाजनक मंथर गति आगे बढ़ने से संतुष्ट नहीं होता वह अपनी शक्ति के संचय संरक्षण के लिए यत्नशील होता है, जिसे वह बाहर निक्षिप्त नहीं होने देता। यदि इस शक्ति की तुलना पानी से की जाए तो जब यह संचित हो जाती है तब शरीर में गरमी की, उष्णता की एक विशेष मात्रा उत्पन्न होती हैं यह उष्णता ‘तपस्’ प्रदीप्त ऊष्मा कहलाती है। वह संकल्प शक्ति को, कार्य निष्पादन की सक्रिय शक्तियों को अधिक प्रभावशाली बनाती है। शरीर में अधिक उष्णता, अधिक ऊष्मा होने से मनुष्य अधिक सक्षम बनता है, अधिक सक्रियतापूर्वक कार्य संपादन कर सकता है और संकल्प शक्ति की अभिवृद्धि होती है। यदि वह दृढ़तापूर्वक इस प्रयत्न में लगा रहे, अपनी शक्ति को और भी अधिक संचित करता रहे तो धीरे-धीरे यह ऊष्मा प्रकाश में, ‘तेजस्’ में रूपांतरित हो जाती है। जब यह शक्ति प्रकाश में परिवर्तित होती है तब मस्तिष्क स्वयं प्रकाश से भर जाता है, स्मरणशक्ति बलवान हो जाती है और मानसिक शक्तियों की वृद्धि और विस्तार होता है। यदि रूपातंर की अधिक प्रारंभिक अवस्था में सक्रिय शक्ति को अधिक बल मिलता है तो प्रकाश में परिवर्तन रूपांतर की इस अवस्था में मन की, मस्तिष्क की शक्ति में वृद्धि होती है। इससे भी आगे शक्ति-संरक्षण की साधना से ऊष्मा और प्रकाश दोनों ही विद्युत् में, एक आंतरिक वैद्युत् शक्ति में परिवर्तित हो जाते हैं जिसमें संकल्प शक्ति और मस्तिष्क दोनों की ही प्रवृद्ध क्षमताएं संयुक्त हो जाती है। दोनों ही स्तरों पर व्यक्ति को असाधारण सामथ्र्य प्राप्त हो जाती है। स्वाभाविक है कि व्यक्ति और आगे बढ़ता रहेगा और तब यह विद्युत् उस तत्व में बदल जाती है जिसे 'ओजस्' कहते हैं। ओजस् अस आद्या सूक्ष्म ऊर्जा ‘सर्जक ऊर्जा’ के लिये प्रयुक्त संस्कृत शब्द है जो भौतिक सृष्टि की रचना से पूर्व वायुमडंल में विद्यमान होती है। व्यक्ति इस सूक्ष्म शक्ति को जो एक सृजनात्मक शक्ति है, प्राप्त कर लेता है और वह शक्ति उसे सृजन की व निर्माण की यह असाधारण क्षमता प्रदान करती है। (सुंदर जीवन, माधव पण्डित पाण्डिचरी)
sabhar :vishwamitra-spiritualrevolution.blogspot.i

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सेक्स और हिंदू धर्म, संभोग से समाधि संभव है?

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खजुराहो के मन्दिर, अजंता-एलोरा की गुफाएं और कामशास्त्र तथा कामसूत्र के अलावा हिंदू देवी-देवतातों के किस्से कहानियां इस बात का सबूत है कि हिंदू धर्म सेक्स (sex in hindu religion) का विरोधी नहीं है।..तंत्रशास्त्र में सेक्स पर जोर दिया जाता रहा है।  वात्स्यायन के कामसूत्र का आधार भी प्राचीन कामशास्त्र और तंत्रसूत्र है। शास्त्रों अनुसार संभोग भी मोक्ष प्राप्त करने का एक साधन हो सकता है, लेकिन यह बात सिर्फ उन लोगों पर लागू होती है . जो सच में ही मुमुक्षु हैं।चार पुरुषार्थ (char purusharth) : भारतीय परम्परा में जीवन का ध्येय है पुरुषार्थ। पुरुषार्थ चार प्रकार का माना गया है- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इन चार को दो भागों में विभक्त किया है, पहला- धर्म और... और अर्थ। दूसरा- काम और मोक्ष।

काम का अर्थ है सांसारिक सुख और मोक्ष का अर्थ है सांसारिक सुख-दुःख और बंधनों से मुक्ति। इन दो पुरुषार्थ काम और मोक्ष के साधन हैं अर्थ और धर्म। अर्थ से काम और ..और धर्म से मोक्ष साधा जाता है।

शिव और पार्वती का मिलन (Shiva and Parvati) : कहते हैं कि भगवान शिव के प्रिय शिष्य नन्दी ने सर्वप्रथम कामशास्त्र की रचना की जिसमें एक हजार अध्यायों का समावेश था। अब...अब सोचिए सिर्फ सेक्स पर एक हजार अध्याय! महर्षि वात्स्यायन ने अपनी विश्व विख्यात रचना ‘कामसूत्र’ में इसी शास्त्र का संक्षिप्त रूप प्रस्तुत किया है। इससे पूर्व श्वेतकेतु और महर्षि ब्राभव्य ने इस शास्त्र...  को समझकर इसको अपने तरीके से लिखा था, लेकिन उनके शास्त्र कहीं खो गए।

हिंदू जीवन दर्शन में काम की भूमिका एवं उसके महत्व को सहज भाव से स्वीकारा गया है। उसे न तो गोपनीय रखा गया और न ही वर्जित करार दिया. इतनी महत्वपूर्ण बात जिससे सृष्टि जन्मती और मर जाती है इससे कैसे बचा जा सकता है, इसीलिए धर्म और अर्थ के बाद काम और मोक्ष का महत्व है।

काम शास्त्र ( kamasutra in hindi ) : काम संस्कृत शब्द है जिसकाकाम शास्त्र ( kamasutra in hindi ) : काम संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है आनंद की इच्छा या आकांक्षा। काम को सीधे तौर पर संभोग या सेक्स कहते हैं। हिंदुओं के प्रेम के देवता कामदेव के नाम से इस शब्द की..से इस शब्द की उत्पत्ति मानी गई है। भारतीय कामशास्त्र काम अर्थात संभोग और प्रेम करने की कला का शास्त्र है।

कहते हैं कि नंदी ने भगवान शंकर और पार्वती के ...पवित्र प्रेम के संवादों को सुनकर कामशास्त्र लिखा। नंदी नाम का बैल भगवान शंकर का वाहन माना जाता है। क्या कोई बैल एक हजार अध्यायों का शास्त्र लिख सकता है? हमारे जो तंत्र के जानकार हैं उनका मानना है कि? हमारे जो तंत्र के जानकार हैं उनका मानना है कि सिद्ध आत्मा के लिए शरीर के आकार का महत्व नहीं रह. जाता।

कामशास्त्र के अधिक विस्तृत होने के कारण आचार्य श्वेतकेतु ने इसको संक्षिप्त रूप में लिखा, लेकिन वह ग्रंथ भी काफी बड़ा था अतः महर्षि ब्राभव्य ने ग्रन्थ का पुनः संक्षिप्तिकरण कर उसे एक सौ पचास.अध्यायों में सीमित एवं व्यवस्थित कर दिया।

कामसूत्र ( kamsutra in hindi ) : महर्षि वात्स्यायन ने कामसूत्र की रचना की। इसे विश्व का प्रथम यौन शिक्षा ग्रंथ माना जाता है।। इसे विश्व का प्रथम यौन शिक्षा ग्रंथ माना जाता है। कामसूत्र के रचनाकार का मानना है कि दाम्पत्य उल्लास एवं संतृप्ति के लिए यौन-क्रीड़ा आवश्यक है। वास्तव में. वास्तव में सेक्स ही दाम्पत्य सुख-शांति की आधारशिला है। काम के सम्मोहन के कारण ही स्त्री-पुरुष विवाह सूत्र में बंधने का तय करते हैं। अतः विवाहित जीवन में काम के आनन्द की निरन्तर अनुभूति होते रहना ही.कामसूत्र का उद्देश्य है। जानकार लोग यह सलाह देते हैं कि विवाह पूर्व कामशास्त्र और कामसूत्र को नि:संकोच पढ़ना चाहिए।

संभोग से समाधि ( sambhog se samadhi ki aur in hindi ) : ऐसा माना जाता है कि जब... संभोग की चरम अवस्था होती है उस वक्त विचार खो जाते हैं। इस अमनी दशा में जो आनंद की अनुभूति होती है वह समाधि के चरम आनंद की एक झलक मात्र है। संभोग के अंतिम क्षण में होशपूर्ण रहने से ही पता चलता है कि.कि ध्यान क्या है। निर्विचार हो जाना ही समाधि की ओर रखा गया पहला कदम है।

अत: संभोग की चर्चा से कतराना या उस पर लिखी गई श्रेष्ठ किताबों को न पढ़ना अर्थात एक विषय में अशिक्षित रह जाना है।  कामशास्त्र या कामसूत्र इसलिए लिखा गया था कि लोगों में सेक्स के प्रति फैली भ्रांतियां दूर हों और वे इस शक्ति का अपने जीवन को सत्यम, शिवम और...और सुंदरम बनाने में अच्छे से उपयोग कर सकें।
-अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'
sabhar :http://hindi.webdunia.com

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सोमवार, 20 मार्च 2017

यह हैं खुशहाल शादीशुदा जिंदगी के 6 मंत्र

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relationship



कई बार सबकुछ होते हुए भी शादीशुदा जिंदगी टूटने के कगार पर पहुंच जाती है। पति-पत्नी चाहते तो यही हैं कि वे साथ रहें लेकिन एक बार जब चीजें बिगड़ना शुरू होती हैं तो बिगड़ती ही चली जाती हैं।

असलियत यह है कि शादीशुदा जिंदगी को संभालकर रखना थोड़ा मुश्किल जरूर है लेकिन अगर समझदारी से काम लिया जाए तो हर समस्या को दूर किया जा सकता है। यह वो 6 मंत्र हैं, जिनकी मदद से आप अपने वैवाहिक जीवन को टूटने से बचा सकते हैं।

- माना कि वह आपके पति हैं लेकिन हर समय उन्हें काबू करने की कोशिश न करें। उन्हें उनका स्पेस जरूर दें। इससे आपका रिश्ता मजबूत होगा।

- अगर आपको लगता है कि प्यार ही सबकुछ है तो आपको बता दें कि आप गलत हैं। प्यार का मतलब एक-दूसरे को इज्जत देना है। अगर आप एक-दूसरे को इज्जत देते हैं और सार्वजनिक जगहों पर भी एक-दूसरे की इज्जत का ख्याल रखते हैं तो इससे अच्छा कुछ नहीं। ये बातें आपके रिश्ते को मजबूत करेंगी। हर रिश्ते में कुछ समझौते करने पड़ते हैं। अगर आपको भी इस रिश्ते को बचाने के लिए कुछ समझौते करने पड़ें तो इसमें कोई बुराई नहीं है। आमतौर पर समझौता करने को कमजोरी से जोड़कर देखा जाता है लेकिन ऐसा नहीं है।

- अमूमन लोगों को लगता है कि रुपये-पैसे की बात करना बेकार है लेकिन कई बार रिश्तों में दरार ही इस वजह से पड़ जाती है। ऐसे में कोशिश करनी चाहिए कि आपके फाइनेंशियल मामले एक-दूसरे के लिए स्पषट हों और इसमें कोई झूठ न हो।

- अपने पति के घरवालों को सम्मान दें। खासतौर पर उनके माता-पिता को।अगर आप चाहते हैं कि आपका रिश्ता मजबूत हो तो कोशिश कीजिए कि आप अपने पार्टनर के परिवार वालों को सम्मान दें और उनसे जुड़े रहें। ऐसा करके आप अपने पार्टनर के और करीब हो सकेंगें।

- अगर आप दोनों के बीच का रोमांस खत्म हो गया है तो यह वाकई चिंता की बात है। चाहे कुछ हो जाए कोशिश कीजिए कि आप दोनों के बीच का प्यार जिंदा रहे क्योंकि यही आप दोनों को बांधे रखेगा।
sabhar :नवभारतटाइम्स.कॉम

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शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

वापसी कर रहा है Nokia 3310, इसी महीने होगा रीलॉन्च

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नोकिया 3310

नोकिया अपने बेहद पॉप्युलर रहे मोबाइल फोन Nokia 3310 को रीलॉन्च करने जा रहा है। अपनी मजबूती और लंबी बैटरी लाइफ के लिए पहचाने जाने वाले इस फोन ने मोबाइल फोन्स के नए युग की शुरुआत की थी। इससे पहले के मोबाइल फोन साइज में बहुत बड़े होते थे। आज भी लोग सबसे 'भरोसेमंद' फोन के तौर पर इसकी मिसाल देते हैं।

Nokia 3310 को आज से 17 साल पहले 2000 में लॉन्च किया गया था। कंपनी इसे इसलिए लॉन्च कर रही है ताकि लोग इसे अपने सेकंडरी फोन के तौर पर इस्तेमाल कर सकें। यानी जिन लोगों के पास पहले ही स्मार्टफोन है, वे इसे भरोसेमंद बैटरी वाले डिवाइस के तौर पर इस्तेमाल कर सकें।


गैजट्स के बारे में जानकारियां लीक करने वाले इवान ब्लास का कहना है कि 3310 के नए वर्जन को 59 यूरो यानी करीब 4000 रुपये में लॉन्च किया जाएगा। इवान का कहना है कि इसी महीने स्पेन के बार्सिलोना में होने जा रहे टेक इवेंट मोबाइल वर्ल्ड कांग्रेस (MWC2017) में इससे पर्दा उठाया जाएगा।

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खुशखबरी : अब पेड़ पर फलेंगी बिजलियां!

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खुशखबरी : अब पेड़ पर फलेंगी बिजलियां!

वाशिंगटन : पैसे भले पेड़ पर न फलें, लेकिन जल्द ही पेड़ पर बिजली फलेगी क्योंकि अब वैज्ञानिकों ने एकबायोमेट्रिक पेड़ विकसित किया है जिसमें उसके कृत्रिम पत्तियों से हवा गुजरने से बिजली पैदा होगी।
अमेरिका की आइओवा स्टेट युनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने यह तकनीक विकसित की है। इससे लोग बिना किसी बड़े पवन टर्बाइन के बिजली के अपने घरेलू उपकरण चला सकेंगे। वैज्ञानिकों ने जो उपकरण बनाया है जो किसी प्रोपेलर या कॉटनवुड के पेड़ की शाखाओं और पत्तियों से मिलता जुलता है और जब तेज हवा में उसकी कृत्रिम पत्तियां उड़ती हैं तो बिजली पैदा होती है।
इस उपकरण के डिजाइन का नेतृत्व करने वाले माइक मैकक्लोस्की ने कहा कि यह पवन टरबाइन की जगह नहीं लेगा, लेकिन इससे तेज हवा को बिजली में बदलने वाली छोटी मशीनों का एक बाजार बन सकता है।

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कुछ ऐसा होगा पृथ्वी का सर्वाधिक शक्तिशाली कंप्यूटर

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कुछ ऐसा होगा पृथ्वी का सर्वाधिक शक्तिशाली कंप्यूटर

लंदन : वैज्ञानिकों ने उन्नत श्रेणी के कम्प्यूटर ‘क्वांटम कम्प्यूर्ट्स के निर्माण का पहला ब्लूप्रिंट जारी किया है। इसे पृथ्वी का सर्वाधिक शक्तिशाली कम्प्यूटर माना जा रहा है जो उद्योग, विज्ञान, चिकित्सा और वाणिज्य के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है।
लंदन की यूनिवर्सिटी ऑफ ससेक्स और गूगल के वैज्ञानिकों द्वारा तैयार किए गए इस खाके में एक एैसी शक्तिशाली मशीन के निर्माण के लिए वास्तविक औद्योगिक ब्लूप्रिंट दिखाया गया है जो कि अब तक निर्मित किसी भी कम्प्यूटर के मुकाबले अनेकों समस्याओं को कम समय में अधिक सटीकता से हल कर सकता है।
क्वांटम कम्प्यूर्ट्स, अंतरिक्ष के अभी तक अनछुये पहलुओं तक पहुंचने और उनके रहस्यों से पर्दा उठाने में भी सहायता कर सकते हैं। इसके साथ ही यह उन समस्याओं को आसानी से हल कर सकेगा जिन्हें हल करने में साधारण कम्प्यूटर को लाखों वर्ष लग सकते हैं।
इस प्रारूप में एक नई तकनीक को शमिल किया है जिसमें वास्तविक क्वांटम बिट्स (छोटे टुकडे) को प्रत्येक कम्प्यूटिंग माड्यूल के बीच संचारित किया जाता है। इससे पहले वैज्ञानिकों का प्रस्ताव था कि प्रत्येक कम्प्यूटर माड्यूल को फाइबर ऑप्टिक्स के जरिए जोड़ा जाना चाहिए लेकिन नई खोज के अनुसार एक माड्यूल को दूसरे मॉड्यूल से इलेक्ट्रिक क्षेत्रों के जरिए जोड़ा जाए जो कि चार्ज अणुओं को एक माड्यूल से दूसरे तक पहुंचने में मदद करते हैं।
इस शोध के अगुवाकार यूनिवर्सिटी ऑफ ससेक्स के प्रोफेसर विनफ्राइड़ हेनसिंगर ने कहा कि काफी वषरें तक लोग कहते थे कि वास्तविक क्वांटम कम्प्यूर्ट्स का निर्माण लगभग असंभव है, लेकिन हमने अपने कामों से न केवल यह साबित किया कि इन्हें बनाया जा सकता है बल्कि इस शक्तिशाली मशीन के निर्माण के लिए नट और बोल्ट प्लांट लगाने पर भी विचार कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस शक्तिशाली कम्प्यूटर का आकार छोटा ही होगा।

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गुरुवार, 22 सितंबर 2016

यौन शक्ति को बढ़ाने के अचूक उपाय

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पुरुषों के लिए एक जरूरी खबर ये है कि अगर सेक्स की इच्छा कम हो गई है तो जरूरी नहीं कि जड़ी बूटियों या यौन वर्धक दवाओं की तरफ रुख करें।
बिना पैसे का एक आसान सा नुस्खा आपकी मदद करेगा।ये हम नहीं ये शोध कहता है। इटली के शोधकर्ताओं ने 40 साल से ज्यादा उम्र के लोगों को इस शोध में शामिल किया है।इस शोध की प्रेरणा इस बात से मिली की पुरुषों में कामेच्छा मौसम के हिसाब से बदल जाती है। खासतौर से सर्दी के मौसम में ये बदलाव ज्यादा नजर आता है।
शोधकर्ताओं ने पाया कि जो लोग रोज रोशनी में काफी समय बिताते हैं उनका टेस्टेस्टोरॉन का स्तर बढ़ जाता है जिससे सेक्स की इच्छा में इजाफा होता है।शोध के दौरान 38 पुरुषों को शामिल किया गया था। इनमें से इन्हें दो ग्रुपों में बांटा गया। कुछ को कम रोशनी तो कुछ को ज्यादा रोशनी में रखा गया।
शोध के बाद ज्यादा रोशनी में रखे गए लोगों ने स्वीकारा कि उनकी सेक्स लाइफ पहले से तीन गुना ज्यादा बेहतर हो गई है।
साभार http://www.drnuskhe.com/

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क्या समय यात्रा हो सकती है

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हम सब समय में यात्रा करते हैं. पिछले साल से में एक साल समय में आगे बढ़ चूका हूँ. दूसरें शब्दों में कहूँ तो हम सब प्रति घंटे 1 घंटा की दर से समय में यात्रा करते हैं. लेकिन यहाँ पर सवाल यह है कि क्या हम प्रति घंटे 1 घंटा की दर से भी ज्यादा तेजी से यात्रा कर सकते है? क्या हम समय में पीछे जा सकते हैं? क्या हम प्रति घंटे 2 घंटे की रफ़्तार से यात्रा कर सकते है? 20 वी सदी के महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने विशेष सापेक्षता (Special Relativity) नामक सिद्धांत विकसित किया था. विशेष सापेक्षता के सिध्धांत के बारे में तो कल्पना करना भी मुश्किल हैं क्योंकि यह रोजमर्रा की जिंदगी से कुछ अलग तरह की ही चीज़े उजागर करता हैं. इस सिध्धांत के मुताबिक समय और अंतरिक्ष एक ही चीज़ हैं. दोनों एकदूसरे से जुड़े हुए हैं. जिसे space-time भी कहते हैं. space-time में कोई भी चीज़ यात्रा कर रही हो उसकी गति की एक सीमा हैं- 3 लाख किलोमीटर. यह प्रकाश की गति हैं.विशेष सापेक्षता का सिध्धांत यह भी दर्शाता हैं की space-time में यात्रा करते वक्त कई आश्चर्यजनक चीजे होती हैं, खास कर के जब आप प्रकाश की गति या उसके आसपास की गति पा लेते हैं. जिन लोगो को आपने पृथ्वी पर पीछे छोड़ दिया हैं उनकी तुलना में आपके लिए समय की गति कम हो जाएगी. आप इस असर को वापस आए बिना नोटिस नहीं कर सकते हैं. सोचिए की आपकी उम्र अभी 15 साल की हैं और आप एक अंतरिक्ष यान में प्रकाश की गति की तुलना में 99.5% तक की गति पा लेते हैं. अपनी यात्रा के दौरान आपने अपने 5 जनमदिन सेलिब्रेट किए, यानी आपने अंतरिक्ष यान में 5 साल बिताए. 5 साल के सफ़र के बाद आप 20 साल की उम्र में अपने घर वापस आते हैं. आप देखेंगे की आपकी उम्र के आपके दोस्त 65 साल के हो गए होंगे. क्योंकि अंतरिक्ष यान में समय आपके लिए ज्यादा धीरे से बिता था. आपने जितने समय में 5 साल अनुभव किए उनते ही समय में आपके दोस्तों ने 50 साल महसूस किए.आइंस्टीन के General Relativity के सिध्धांत के मुताबिक किसी भी तरह के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में समय की रफ़्तार कम हो जाती हैं. जैसे समय की गति हमारी पृथ्वी पर अंतरिक्ष की तुलना में कम होगी. जैसे की किसी ब्लैक होल के नजदीक गुरुत्वाकर्षण बहुत तीव्र हो जाता हैं. ऐसी जगह पर समय की रफ़्तार बहुत ही कम हो जाती हैं. तीव्र गुरुत्वाकर्षण की वजह से space-time में कई विकृतियाँ पैदा हो जाती हैं. ऐसी विकृतियों से worm holes पैदा हो सकते हैं, जो की space-time में सफ़र करने के लिए शार्टकट हो सकते हैं. कुछ वैज्ञानिक तो ऐसा ही मानते हैं. जो भी हो मेरा तो यहीं मानना हैं की समय यात्रा सिर्फ भविष्य की ही मुमकिन हो सकती हैं. क्योंकि समय में पीछे जाना मुमकिन ही नहीं हैं. क्योंकि जो हो गया वह हम कभी बदल नहीं सकते लेकिन जो होनेवाला हैं वह अभी भी हाथ में हैं. हम शायद भविष्य की सैर कर सकते हैं लेकिन उसके लिए हमे बहुत ही उम्दा टेक्नोलॉजी की जरुरत होगी और बहुत ज्यादा उर्जा की भी जरुरत होगी.   साभार http://www.universeinhindi.com


हिन्दू धर्म और टाइम मशीन का रहस्य क्या है



इंग्लैंड के मशहूर लेखक ने 1895 में 'द टाइम मशीन' नामक एक प्रकाशित किया, तो समूचे योरप में तहलका मच गया। इस उपन्यास में वेल्स ने 'टाइम मशीन' की अद्भुत कल्पना की। यह उनकी कल्पना का एक ऐसा आविष्कार था, जिसे विश्व भर में लेखक आज तक उपयोग कर रहे हैं। उपन्यास से प्रेरित होकर इस विषय पर और भी कई तरह के कथा साहित्य रचे गए। इस कॉन्सेप्ट पर हॉलीवुड में एक फिल्म भी बनी। हालांकि वेल्स के उपन्यास में व्यावहारिक रूप से कई विसंगतियां है।
टाइम मशीन अभी एक कल्पना है। टाइम ट्रेवल और टाइम मशीन, यह एक ऐसे उपकरण की कल्पना है जिसमें बैठकर कोई भी मनुष्य भूतकाल या भविष्य के किसी भी समय में सशरीर अपनी पूरी मानसिक और शारीरिक क्षमताओं के साथ जा सकता है। अधिकतर वैज्ञानिक मानते हैं कि यह कल्पना ही रहेगी कभी हकीकत नहीं बन सकती, क्योंकि यह अतार्किक बात है कि कोई कैसे अतीत में या भविष्य में जाकर अतीत या भविष्य के सच को जान कर उसे बदल दे। जैसे कोई भविष्य में से आकर आपसे कहे कि वह आपका पोता है या अतीत में से आकर कहे कि वह आपका परदादा है, जो यह संभव नहीं है।
वैज्ञानिक कहते हैं कि दरअसल, जो घटना घट चुकी है उसका दृश्य और साउंड ब्रह्मांड में मौजूद जरूर रहेगा। जिस तरह आप एक फिल्म देखते हैं उसी तरह वह टाइम मशीन के द्वारा दिखाई देगा। आप उसमें कुछ भी बदलाव नहीं कर सकते। यदि ऐसा करने गए तो वह पार्टिकल्स बिखरकर और अस्पष्‍ट हो जाएंगे। दूसरा यह कि आप टाइम ट्रैवल से जो घटना नहीं घटी है, लेकिन जो घटने वाली है उसे भी देख सकते हैं, क्योंकि सभी कार्य और कारण की श्रृखंला में बंधे हुए हैं। हालांकि विद्वान यह भी मानते हैं कि भविष्य को जानकर वर्तमान में कुछ सुधारकर भविष्य को बदला जा सकता है, लेकिन अतीत को नहीं।
प्राचीनकाल में सनतकुमार, नारद, अश्‍विन कुमार आदि कई हिन्दू देवता टाइम ट्रैवल करते थे। की कल्पना भी भारतीय धर्मग्रंथों से प्रेरित है। आप सोचेंगे कैसे? वेद और पुराणों में ऐसी कई घटनाओं का जिक्र है। उदाहरणार्थ रेवत नाम का एक राजा ब्रह्मा के पास मिलने ब्रह्मलोक गया और जब वह धरती पर पुन: लौटा तो यहां एक चार युग बीत चुके थे। रेवती के पिता रेवत अपनी पुत्री को लेकर ब्रह्मा के पास योग्य वर की तलाश में गए थे। ब्रह्मा के लोक में उस समय हाहा, हूहू नामक दो गंधर्व गान प्रस्तुत कर रहे थे। गान समाप्त होने के उपरांत रेवत ने ब्रह्मा से पूछा अपनी पुत्री के वरों के बारे में।

ब्रह्मा ने कहा, 'यह गान जो तुम्हें अल्पकालिक लगा, वह चतुर्युग तक चला। जिन वरों की तुम चर्चा कर रहे हो, उनके पुत्र-पौत्र भी अब जीवित नहीं हैं। अब तुम धरती पर जाओ और शेषनाग के साथ इसका पाणिग्रहण कर दो जो वह बलराम के रूप में अवतरित हैं।' अब सवाल यह उठता है कि कोई व्यक्ति चार युग तक कैसे जी सकता है? कुछ ऋषि और मुनि सतयुग में भी थे, त्रेता में भी थे और द्वापर में भी। इसका यह मतलब कि क्या वे टाइम ट्रैवल करके पुन: धरती पर समय समय पर लौट आते थे?
इसका जवाब है कि हमारी समय की अवधारणा धरती के मान से है लेकिन जैसे ही हम अंतरिक्ष में जाते हैं, समय बदल जाता है। जो व्यक्ति ब्रह्मलोक होकर लौटा उसके लिए तो उसके मान से 1 वर्ष ही लगा। लेकिन अंतरिक्ष के उक्त 1 वर्ष में धरती पर एक युग बीत गया, बुध ग्रह पर तो 4 युग बीत गए होंगे, क्योंकि बुध ग्रह का 1 वर्ष तो 88 दिनों का ही होता है।
पहले यह माना जाता था कि समय निरपेक्ष और सार्वभौम है अर्थात सभी के लिए समान है यानी यदि धरती पर 10 बज रहे हैं तो क्या यह मानें कि मंगल ग्रह पर भी 10 ही बज रहे होंगे? लेकिन आइंस्टीन के सापेक्षता सिद्धांत के अनुसार ऐसा नहीं है। समय की धारणा अलग-अलग है।
आइंस्टीन ने कहा कि दो घटनाओं के बीच का मापा गया समय इस बात पर निर्भर करता है कि उन्हें देखने वाला किस गति से जा रहा है। मान लीजिए की दो जुड़वां भाई हैं- A और B। एक अत्यंत तीव्र गति के अंतरिक्ष यान से किसी ग्रह पर जाता है और कुछ समय बाद पृथ्वी पर लौट आता है जबकि B घर पर ही रहता है। A के लिए यह सफर हो सकता है 1 वर्ष का रहा हो, लेकिन जब वह पृथ्वी पर लौटता है तो 10 साल बीत चुके होते हैं। उसका भाई B अब 9 वर्ष बड़ा हो चुका है, जबकि दोनों का जन्म एक ही दिन हुआ था। यानी A 10 साल भविष्य में पहुंच गया है। अब वहां पहुंचकर वह वहीं से धरती पर चल रही घटना को देखता है तो वह अतीत को देख रहा होता है।
जैसे एक गोली छूट गई लेकिन यदि आपको उसको देखना है तो उस गोली से भी तेज गति से आगे जाकर उसे क्रॉस करना होगा और फिर पलटकर उसको देखना होगा तभी वह तुम्हें दिखाई देगी। इसी तरह ब्रह्मांड में कई आवाजें, चित्र और घटनाएं जो घटित हो चुकी हैं वे फैलती जा रही हैं। वे जहां तक पहुंच गई हैं वहां पहुंचकर उनको पकड़कर सुना होगा।
यदि ऐसा हुआ तो...? कुछ ब्रह्मांडीय किरणें प्रकाश की गति से चलती हैं। उन्हें एक आकाशगंगा पार करने में कुछ क्षण लगते हैं लेकिन पृथ्वी के समय के हिसाब से ये दसियों हजार वर्ष हुए।
भौतिकशास्त्र की दृष्टि से यह सत्य है लेकिन अभी तक ऐसी कोई नहीं बनी जिससे हम अतीत या भविष्य में पहुंच सकें। यदि ऐसे हो गया तो बहुत बड़ी क्रांति हो जाएगी। मानव जहां खुद की उम्र बढ़ाने में सक्षम होगा वहीं वह भविष्य को बदलना भी सीख जाएगा। इतिहास फिर से लिखा जाएगा।
एक और उदाहारण से समझें। आप कार ड्राइव कर रहे हैं आपको पता नहीं है कि 10 किलोमीटर आगे जाकर रास्ता बंद है और वहां एक बड़ा-सा गड्डा है, जो अचानक से दिखाई नहीं देता। आपकी कार तेज गति से चल रही है। अब आप सोचिए कि आपके साथ क्या होने वाला है? लेकिन एक व्यक्ति हेलीकॉप्टर में बैठा है और उसे यह सब कुछ दिखाई दे रहा है अर्थात यह कि वह आपका भविष्य देख रहा है। यदि आपको किसी तकनीक से पता चल जाए कि आगे एक गड्‍ढा है तो आप बच जाएंगे। भारत का ज्योतिष भी यही करता है कि वह आपको गड्ढे की जानकारी दे देता है।
लेकिन एक अतार्किक उदाहरण भी दिया जा सकता है, जैसे कि एक व्यक्ति विवाह करने से पहले अपने पुत्र को देखने जाता है टाइम मशीन से। वहां जाकर उसे पता चलता है कि उनका पुत्र तो जेल के अंदर देशद्रोह के मामले में सजा काट रहा है तो... तब वह दो काम कर सकता है या तो वह किसी अन्य महिला से विवाह करे या विवाह करने का विचार ही त्याग दे।
साभार http://hindi.webdunia.com


इंग्लैंड के वैज्ञानिक ने किया दावा, बना सकता है Time Machine

• क्या प्रकाश के लेज़र Tunnel से भविष्य में संदेश भेजा जा सकता है?


• अगर ऐसा हो सकता है, तो भविष्य के लोग हमसे क्या कहेंगे?

69 वर्षीय Ronald Mallett का यह मानना है कि उन्होंने एक ऐसा Tunnel डिज़ाइन किया है, जो समय से आगे संदेश भेज सकता है. उनका ये कहना है कि इस शताब्दी की ये पहली Time Machine सिद्ध होगी. Mallett अभी University of Connecticut में ख्याति-प्राप्त Theoretical Physicist हैं. वो फ़िलहाल एक डॉक्यूमेंटरी पर काम कर रहे हैं, जिसका विषय है ‘How To Build a Time Machine’.


टाइम मशीन बनाने की खोज Mallett ने 10 वर्ष की उम्र से ही शुरु कर दी थी. अपने पिता की मौत के बाद Mallett ने इसे पूरा करने की ठान ली. अपने डॉक्यूमेंटरी ‘How To Build A Time Machine’ के बारे में Ronald Mallett कहते हैं कि, उन्हें ये निर्णय बिलकुल सही लगा, क्योंकि वो अपने मृत पिता को वापस देखना चाहते थे. Mallett के दिमाग में ये सवाल था कि क्या कोई समय पर नियंत्रण कर सकता है? 
Mallett का ये कहना है, “मेरा व्यक्तित्व, मेरा एक सफल Physicist बनना ये सब बस मेरा पिता से प्यार की वजह से है. मेरा एक एक Mission है, जिसका लक्ष्य है ये पता लगाना कि टाइम मशीन कैसे बनाते हैं?”


टाइम मशीन कैसे काम करेगी?

Mallett की टाइम मशीन का मूल आधार Einstein की Theory of Relativity है. इस सिद्धांत के अनुसार ये बताया गया है कि प्रकाश की किरणें भी गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र पैदा कर सकती हैं. एक Scientific Paper में Mallett ने लिखा कि प्रकाश के एक अस्थायी Cylinder के संदर्भ में मजबूत गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र उत्पन्न करने के लिए मेरे पास एक सटीक समाधान है, जो Einstein के आंतरिक और बाह्य गुरुत्वाकर्षण और प्रकाश के समीकरणों के विश्लेषण पर आधारित है.
जुड़े हुए Timelike लाइन्स की उपस्थिति भविष्य और भूत में समय यात्रा करने का संकेत देती हैं. इस संकेत से ही प्रकाश के अस्थायी Cylinder की सहायता से टाइम मशीन के निर्माण की संभावना दिखती है. Mallett का ये मानना है कि भौतिक सिद्धांत पर समय यात्रा असंभव है, पर वो ऐसा सोचते है कि अगर समय के साथ सन्देश भेजा जा सकता है, तो प्रकाश के Tunnel की मदद से Neutrons भी भेजे जा सकेंगे. Mallett कहते हैं कि 1 को Spin Up की दिशा में लगाने पर और 0 को Spin Down की दिशा में लगाने पर हम Neutron Spin के द्वारा बाइनरी कोड भी भेज सकते हैं.


अगर वाकई टाइम मशीन बन सकती है तो क्या ये सपनों की दुनिया में जीना जैसा नहीं होगा? विकास की दिशा में ये पहल एक चमत्कारी वरदान की भांति सिद्ध होगी. भविष्य और अतीत में सफ़र करना मनुष्य के लिए अत्यंत रोमांचकारी होगा.

साभार http://www.gazabpost.com/

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